“निकाल इसी बात पै सौ का नोट”

***राजीव तनेजा***

Corrupt_Traffic_Cop_Cartoon

“रुक…अबे रुक"….

"ज्जी…मैँ?"….

"ओर तेरा फूफ्फा?".…

"जी…बोलिए"…

"बेट्टे!….बोलूँगा तो मैँ जरूर और सुणेगा बी तू जरूर"अपनी मूँछों को ताव दे बैरियर पे खड़ा सिपाही बोला

"हाँ जी!…बोलिए"…

"के बात?….तैन्ने दीखया कोणी यो गज भर लाम्बा… ठाढा सा(तगड़ा) पूरे अढाई किलो का हाथ?"…

"ज्जी….शायद!…म्रेरा ध्यान दूसरी तरफ था"…

"वोई तो…निकाल इसी बात पै सौ का नोट"…

"सौ का नोट?…वो किसलिए?"….

"वो इसलिए मेरे फूफ्फा…के मन्ने आज घर पै बाहमण(ब्राहमण) जीमाणे सैं"….

"तो?"…

"अरे मेरे ताऊ!….मैन्ने घण्णी कुफात(मेहनत) कर  के तैन्ने रुकवाया सै के नई?"…

"जी…रुकवाया तो है"…

"तो हरजाणा कोण भरेगा?…..मैँ के तू?".…

"जी मैँ"…

"तो निकाल इसी बात पे सौ का नोट"…

"लेकिन सर!…ना तो मैँने लाल बत्ती जम्प की है और ना ही मैँ बिना ड्राईविंग लाईसैंस के गाड़ी चला रहा हूँ और हैलमेट भी मैँने ‘आई.एस.आई’ मार्का वाला पहना हुआ है"…

"ओ बेट्टे!…तैन्ने तो म्हारे दुश्मण देश का टोप्पा पहण्या सै"…

"ईब्ब तो बेट्टे…तू गया काम से"…

"तू जाणता कोणी….म्हारे साब जी घण्णे सख्त किस्म के इनसान सैं…..देशद्रोहियाँ ने तो वो कति ना बक्शें…किसी भी कीमत पे छोड़ें कोणी"…

"ओर आज…आज तो साब जी वैसे भी  घण्णे गुस्से में सैं"……

"क्या बात?….बीवी ने कहीं…….

"स्साले!…म्हारे साब जी का मजाक उड़ावे सै?"….

"ईब्ब तो बेट्टे…तेरी खैर कोणी"….

"सुसरे!…म्हारे साब जी की दुखती रग पे हाथ रखै सै…..ईब्ब तो बेट्टे तैने तेरा बाप बी कोणी  बचा सके"…

"लगा अपनी फटफटी ने सैड पे ओर अपणे इस ‘आई.एस.आई’ के  टोप्पे ने तार के छांह मे आ ज्या"सिपाही गुस्से से चिल्लाता हुआ बोला…

"तेरा रिमांड तो बेट्टे!…ईब्ब साहब जी आप ही लेवेंगे"…

"साब जी!…इस लौण्डे ने आप ही सूधा(सीधा) करो…घण्णा कानून झाड़ रिया सै और म्हारे लाख मणा करणे के बावजूद आपके फैमिली मैटर को सरेआम पब्लिक में उछालण की कोशिश कर रिया सै"….

"कामयाब तो कोणी होया ना?"…

"म्हारे होते हुए कोई ओर क्यूँकर कामयाब हो जावेगा?"…

"के बके सै?"..

"सॉरी जनाब!…गलती से मुँह से निकल गया"…

"हम्म!…

"क्यों बे?….कित्त का सै तू?"उसे इग्नोर कर काँस्टेबल मुझे घूरता हुआ बोला…

"जी….शालीमार बाग का"….

"के बात?….घणा एण्डी बणे सै?"…

"ना जी"…

"सुण!…इस सुसरे ने अड़े छोड़ ओर तू एक काम कर"सिपाही की तरफ मुखातिब होते हुए काँस्टेबल बोला….

"जी….जी जनाब"…

"तू उस ट्राले वाल्ले से सुलट के आ….सुसरा!…बिना एंट्री दिए ही खिसकण के चक्कर में दीख रैया सै मन्ने"…

"जा!…तब तक मैँ इस सुसरे के पेंच ढील्ले करता हूँ"…

"जी जनाब"…

"ओर सर जी…हैलमेट भी पाकिस्तानियों का पहणेया सै पट्ठे ने"सिपाही काँस्टेबल के कान में फुसफुसाता हुआ बोला….

"हम्म…"काँस्टेबल ने मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारा और बोला…."नाम बता"…

"ज्जी…र…र..रा..

"ओए…ये र….र…रा कर के मन्ने रागणी(हरियाणवी लोक गीत) ना सुणा ओर सीधी तरिया अपणा नाम बता"कान खुजाते हुए काँस्टेबल बोला …

"जी…रा….राजी…

"राजी तो बेट्टे तन्ने मैँ करूँगा जब तेरे घर पै…रेड मारण तांई पूरी फोर्स भेजूँगा"….

"सूधी तरियाँ क्लीयर कट अपणा पूरा नाम बता….

"जी…राजीव"…

"जी राजीव?….के बात?…थारे में ‘जी’ पहले लगावें हैँ ओर ‘नाम’ बाद में?"…

"ना जी…नाम पहले ओर जी बाद में"….

"तो इसका मतबल्ल तेरा नाम राजीव है"….

जी"…

"ओ.के…ईब्ब अच्छे बच्चों की तरिया यो बी साफ-साफ बता दे कि तू किसके लिए ओर….कितने सालों से जासूसी करे सै?…थम्हारे…यहाँ कौन-कौन से और कितने एजेंट सैं?"

"सर!…आपको गलतफहमी हुई है…मैँ….मैँ तो पक्का खालिस देशभक्त हूँ…आप चाहें तो बेशक मेरी बीवी से पूछ लें"…

"ओए…मन्ने औरतां के मुँह लगणे का शौक कोणी"….

"माँ कसम….पक्का बाल-ब्रह्मचारी सूँ"…..

"सर!…मैँ सच कह रहा हूँ….आप खुद चैक कर लें…कपड़े भी मैँ स्वदेशी याने के होम मेड इस्तेमाल करता हूँ"…

"होम मेड का मतबल्ल स्वदेशी होवे है?"…..

"ज्जी…वो दरअसल मेरा मतबल्ल…ऊप्स सॉरी मेरा मतलब था कि….

"स्साले हरामखोर!…’रे बैन’ का इम्पोर्टेड गॉगल लगा के मण्णे बेवकूफ बणावे सै?"….

"तेरे जीस्से छत्तीस को तो मैँ रोज झोट्टाराम के  खेत में चराऊँ सूँ"…

"सर!…ये झोट्टाराम कौन?"सिपाही वापिस आ काँस्टेबल के कान में फुसफुसाता हुआ बोला…

"मेरे ताऊ का फूफ्फा…और कौण?"…

"सर!…आपको गलतफहमी हुई है…मैँ…मैँ तो….

"यो मैँ…मैँ कर के मिमियाणा छोड़ और सीधी तरह बता के कब से तू देश के साथ गद्दारी कर रहा है?"….

"सर!…मैँ तो सर सीधा-साधा लेखक प्राणी हूँ…मैँ भला अपने ही देश के साथ गद्दारी क्यों करने लगा?"…

"तू….तू लेखक सै?"मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारते हुए काँस्टेबल बोला…

"ज्जी…जी सर"…

"स्साले!…पहले क्यूँ नहीं बताया तैन्ने कि तू पत्रकार बिरादरी का बन्दा है"मेरे कन्धे पे धौल मार मुस्कराते हुए काँस्टेबल बोला….

"सॉरी!…आई.एम रियली वैरी सॉरी"काँस्टेबल के स्वर में अचानक मिठास आ चुकी थी

"माफ कीजिए..गल्ती से आपको रोक लिया….आप जा सकते हैँ"….

"बेवाकूफ कहीं के….गधे और घोड़े का फर्क समझे बिना सबको एक ही छड़ी से हांके चले जाते हैँ"काँस्टेबल सिपाही की तरफ देख बुड़बुड़ाता हुआ बोला….

"ओए!….

"जी जनाब"….

"स्साले!….देख तो लिया कर कि किसे रोकना है और किसे नहीं"….

"इतने साल हो गए यहाँ @#$%ं हुए….इतना भी नहीं पता कि किस से कैसे बात करनी है और कैसे नहीं"काँस्टेबल सिपाही पर चिल्लाता हुआ बोला…

"क्या हुआ जनाब?"…

"साहब जी तो पत्रकार बिरादरी के निकले"….

"क्या?"…

ओह!…सॉरी सर…..माफ कर दें सर…माई मिस्टेक सर..मैँ आपको पहचान नहीं पाया सर"….

"स्साले!…तेरे को कितनी बार हिन्दी में साफ-साफ समझा चुका हूँ कि अपने धन्धे में मल्लिका सहरावत की नंगी-पुंगी फिल्मों ने किसी काम नहीं आना है… असल जिन्दगी में अगर कुछ काम आएगा तो वो तेरा अपना हुनर…तेरा अपना टैलेंट काम आएगा"

"जा…जा के कहीं से फेस रीडिंग में एक्सपर्टाईज़ होने का कोर्स कर ले"…

"जी जनाब"….

"उस ट्राले वाले ने दिए के नहीं?"….

"आपके होते हुए देगा कैसे नहीं जनाब?"…

"लेकिन इतनी देर कैसे लग गई?"…

"बिना पर्चे के माल ले जा रहा था ससुरा…..मैँने बतौर जुर्माना दो हज़ार की डिमांड रखी तो सौ-दो सौ रुपल्ली दिखा मुझे टरकाने लगा कि ईब्ब तो ब्योंत कोणी…आगली बार मांगण ते पहलां ही ऊपरली गोझ(जेब) म्ह थम्हारी खातर धर लेयूँगा"….

"फिर?"मैँ उत्सुकता के मारे पूछ बैठा…

"फिर क्या?….मैँने गुस्से में ट्राला ही जब्त करने की धमकी दे डाली"….

"अच्छा …फिर?"…

"फिर क्या?….एक ही घुड़की में धोती ढीली हो गई…पट्ठे की"…

"ये देखो जनाब….कड़कड़ाते नोट सैं"…कह सिपाही अपनी जेब की तरफ इशारा करने लगा

"बावला सै के तू?"….

"इस तरिया सड़क पे खुलेआम….मरवाएगा के?"….

"साब जी!…माफ कर दो…गल्ती हो गई"….

"अच्छा…अच्छा….छोड़ इस सब ने और उस नीली वाली सैंत्रो ने हाथ दे….सुसरा लाल बत्ती जम्प कर के निकल रिया है"…

"जी जनाब"….

"आप खड़े क्यों हैँ?…यहाँ…यहाँ मेरी बाईक पर बैठिए सर"….

"नहीं…बस रहने दीजिए….मैँ ऐसे ही खड़ा ठीक हूँ"….

"कमाल करते हैँ आप भी …हमारे होते हुए भला आप खड़े रहें….ऐसा कैसे हो सकता है?"

"ओए!…साहब के लिए कुर्सी ला"काँस्टेबल नज़दीक खड़े जूस वाले को हुक्म देते हुए बोले

"आप क्या लेंगे सर?…ठण्डा या गर्म?"

"नहीं…रहने दो….ऐसी कोई खास इच्छा नहीं है"…

"अजी!…इच्छा को मारिए गोल्ली और अनार का ये स्पैशल जूस पीजिए"जूस वाला मेरे हाथ में गिलास थमाता हुआ बोला

"हम्म!…जूस तो वाकयी बहुत बढिया बनाया है"मैँ होंठों पे अपनी जुबान फिरा चटखारा लेता हुआ बोला….

"स्साले की शामत आनी है जो बढिया नहीं बनाएगा"जूसवाले को घूरते हुए काँस्टेबल बोला …

"हाँ तो जनाब!…आप राजनैतिक या फिर फिल्मी?….किस तरह की पत्रकारिता करते हैँ?"…

"सर!…मैँने आपको पहले भी बताया था और अब फिर से बता रहा हूँ कि मैँ पत्रकार नहीं बल्कि एक छोटा-मोटा लेखक हूँ और हँसते रहो के नाम से अपना एक ब्लॉग चलाता हूँ"….

"स्साले!…इतनी ड्रामे बाज़ी की के जरूरत थी?…सीधी तरिया नई बता सकता था के तू एक मसखरा है"….

"मसखरा?"….

"ओर नईई तो के बहरुपिया?"…

"नहीं सर!…आप गलत समझ रहे हैँ…मैँ मसखरा नहीं हूँ"…

"तू मसखरा कोण्णी?"…

"जी"…

"तू पत्रकार बी कोण्णी?"….

"ओर तू बहरुपिया बी कोण्णी?"…

"जी सर"…

"तो फिर तू है के चीज?"…

"दरअसल….मैँ हास्य और व्यंग्य में लिखता हूँ"…

"ठीक सै!…तो फिर तू मन्ने हँसा"….

"मतलब?…मैँ आपको कैसे हँसा सकता हूँ?"…..

"‘छोरी %$#@  के’तैन्ने पूरी दुनिया को हँसाने का ठेका लिया हुआ सै ना?…

ईब्ब तू  मन्ने हँसा के दिखा"काँस्टेबल गुस्से से अपना चेहरा अकड़ा के मुझ पर अपना सर्विस रिवाल्वर तानता हुआ बोला…

"सर!…आपको गलत फैमिली…ऊप्स सॉरी गलतफहमी हुई है"मैँ सकपकाता हुआ बोला…

"बेट्टे!….हँसाना तो तुझी को पड़ेगा…ईब्ब तू चाहे हँस के हँसा या फिर रो के हँसा"सिपाही भी अपना डण्डा मेरे सर पे तानते हुए बोला…

"ओफ्फो!…कितनी बार समझा चुका हूँ कि मैँ कोई जोकर या मसखरा नहीं बल्कि एक जिम्मेदार लेखक हूँ और देश के प्रति अपने कर्तव्य का पूरी ईमानदारी और निष्ठा से वहन कर रहा हूँ"…

"लोगों को हँसा के?"….

"अब मैँ लोगों को हँसाऊँ या फिर रुलाऊँ…इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मेरा असली मकसद अपनी लेखनी के जरिए गलत हो रहे कार्यों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करना है"….

"मैँ भी तो सुणूँ के किस तरह के गलत कामों की तरफ तू लोगों का ध्यान आकर्षित करता है ?"सिपाही गर्म हो मेरे और नज़दीक आता हुआ बोला…

"जैसे आपने अभी नाजायज़ तरीके से उस ट्राले वाले से दो हज़ार वसूले"मैँ सकपका कर पीछे हटते हुए बोला….

"तो?"…

"मैँ ऐसे ही कामों के बारे में बता के जनता को जागरूक करता हूँ"मेरी आवाज़ में दृढता थी…

"तो तेरा मतबल्ल कि जनता जो है…वो कति बेवाकूफ है?"गुस्से से बिफरता हुआ जूस वाला बोला….

"ओर ये नाजायज़-नाजायज़ के लगा रक्खा सै?"डण्डा छोड़ अपनी आस्तीन ऊपर करते हुए  सिपाही बोला

"इसणे तो बेर की @#$% का पता कोण्णी….ओर चलया सै देश की जणता ने जागरूक करण खातर"काँस्टेबल का क्रोध भरा स्वर….

"जनाब!…इस कल के लौण्डे ने के बेरा कि जायज़ के होव्वे है ओर नाजायज़ के होव्वे है?"….

"ये जो प्राईवेट सकूल वाले रोज-रोज फीस बढावें सैं…यो जायज़ सै?"सिपाही भावुक हो बोल उठा….

"या ये जो पाछले ऐरियर  वसूल रहए सैं…यो जायज़ सै?"काँस्टेबल ने बात पूरी की…

"वो तो पे कमीशन ने….

"पे कमीशण गया तेल लेने…इस सुसरे स्कूल वालयाँ ने पहलए घणा कमा रक्खा सै …उस्से म्ह से थोड़ा खर्च कर देंगे तो कोई पहाड़ ना टूट पड़ेगा"….

"थम्म तो यार!…पता नय्यी कूण सी दुनिया के….कौण से जुग में जीवो हो…..थम्म ने के बेरा कि इस मँहगाई के जुग में बच्चे कीस्से पाले जावें सैं?"

"अब यार!…आप तो पढे-लिखे हो…समझदार हो…खुद जाणो हो कि बच्चे तो भगवान का रूप होवे सैं…ओर भगवान की बात हम कैसे टाल सकते हैँ"…

"जी"…

"अब परसों मेरे मंझले छोरे ने ‘एडीडास’ के जूतों की और तीन नम्बर वाली छोरी ने ‘वन्दना लूथरा’ से अपना मेक-ओवर करवाने की फरमाईश कर दी तो मैँ कैसे टाल सकता था उन्हें?…

"जी"…

"तो बस भईय्ये!…यूँ समझ ले कि इसी खातिर मैँने उस ट्राले को रुकवाया था"….

"और अब ये जो सैंत्रो को…

"इसे?…इसे तो यार…मैँने अपनी श्रीमति जी के चक्कर में……

त्रिभुवन दास भीम जी झावेरी’ के यहाँ एक पेंडेंट पसन्द कर आई है"…

"लेकिन आप तो कह रहे थे कि सिर्फ बच्चों की फरमाईश….

"जी….बिलकुल!…तुम तो जानते ही हो कि मुझे बच्चों से कितना प्यार है?….बस छुटकी को बड़ा हो जाने दीजिए…उसी को उसके सोलहवें बर्थडे पर गिफ्ट कर दूंगा"…

"यू नो!…तीन महीने बाद वो पूरे स्वीट सिक्सटीन की हो जाएगी"काँस्टेबल के चेहरे पे गर्व भरी मुस्कान थी…

"ओह!…काँग्रैचुलेशन….मेरी तरफ से एडवान्स में ही बधाई स्वीकार करें"…

"क्यों?…एडवांस में क्यों?"…

"एडवांस में इसलिए कि…क्या मालुम कल हों ना हों"…

"खबरदार!…जो मुँह से कोई अशुभ या अनहोनी बात निकाली…मुझ से बुरा ना कोई होगा"…..

"अरे यार!…मैँ तो बस ऐसे ही..

"ना…ये तो बिलकुल गलत बात है…..ना कोई मिठाई….और ना ही कोई गिफ्ट…ऐसी फोक्की बधाई तो आपको ही मुबारक"..

"हा…हा….हा…जस्ट किडिंग यार…आप तो काम के बन्दे हैँ…..आपसे क्या गिफ्ट लेना?"…

"मैँ भी…मैँ भी तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रहा था"….

"पुलिस वाले से मज़ाक?"काँस्टेबल का रौद्र रूप…और फिर अचानक ज़ोर से हँसी…"हा…हा…हा…हा….डर गए ना?"…

"यार!….अभी तो तीन महीने पड़े हैँ…और अब जब  जान-पहचान हो ही गई है…अब तो हमारा-आपका मिलना-जुलना होता ही रहेगा ना?"…

"जी…बिलकुल"…

"लेकिन ये एडवांस में बधाई-वधाई बिलकुल नहीं चलेगी….ग़्राँड हयात में पार्टी दे रहा हूँ….आपने भी आना है…और ध्यान रहे कि भाभी जी को ज़रूर लाना है"…

"और बच्चे?"….

"क्या उन्हें घर पर ही छोड़ कर?….

"हाँ-हाँ!…क्यों नहीं?….तुम एक काम करना…उन्हें डब्बे में बन्द कर …बाहर से ताला लगा….

"?…?…?…?"….

"बेवाकूफ!….बच्चों के लिए ही तो पार्टी दे रहा हूँ और तू है कि उन्हें ही घर पे छोड़ कर आने की बात कर रहा है?"..

"कैसा निर्मोही दोस्त है रे तू?"…..

"चल!…माफी माँग मुझ से"…

"सॉरी यार!…माफ कर दे मुझे"…

"ना…बिलकुल ना"….

"पहली गलती है यार"….

"आज पहली गलती कर रहा है…कल को दूसरी गलती करेगा और परसों को तीसरी"…

"इतना ज़लील तो ना कर यार मुझे"…

"तू है ही इसी लायक"…

"प्लीज़!….माफ कर दे ना मुझे"मेरी आँखों से आँसुओँ की अविरल धारा बह चली….

"पागल कहीं का…कैसे बच्चों की तरह रो रहा है"काँस्टेबल भी अपने आँसू पोंछ मुझे गले लगाता हुआ बोला

"क्या जनाब?…आप दोनों तो बिलकुल बच्चों की तरह रोते हैँ"हमें रोता देख सिपाही की आँखो से भी आँसू बह निकले …

"हम सब को रोता देख जूस वाले से भी रहा ना गया और वो भी धाड़ मार-मार के रोने लगा"

"चुप हो जाएँ जनाब…यूँ सड़क पर ऐसे रोने से अपने बिज़नस पे गलत अफैक्ट पड़ेगा"सिपाही कमीज़ से अपने आँसू पोंछ समझदारी से काम लेता हुआ बोला

"यस!…यू ऑर राईट….बिज़नस कमज़ ऑलवेज़ फर्स्ट"काँस्टेबल भी भावुकता छोड़ अटैंशन मुद्रा में आ गया….

"जी!….धन्धा पहले…बाकी सब काम बाद में"…

"हाँ!…रोक…रोक उसे…स्साला मोबाईल पे बात करता हुआ गाड़ी चला रहा है"….

"जी जनाब"कहते ही सिपाही से बीच सड़क के छलांग लगा दी…

"और सुनाओ…घर में सब ठीकठाक?"…

"जी बिलकुल"….

"कोई दिक्कत या परेशानी?"…

"ना जी"…

"कोई भी…किसी भी तरह का….कैसा भी काम हो….बिना किसी प्रकार की झिझक के तुरंत मुझे याद कर लेना"…

"जी…बिलकुल"…

"चाहे मई-जून का टिप-टिप कर टपकता महीना हो या फिर हो ….जुलाई-अगस्त का लू भरा महीना …बन्दे को हमेशा अपने साथ…अपने दिल के करीब पाओगे"…

"जी…शुक्रिया"….

"यार!…एक बात पूछनी थी तुमसे"…

"एक क्या…दो पूछो…जी में आए तो बेशक सौ पूछो"…

"ये जो तुम नैट पे लिखते हो….

"जी"…

"ये पूरी दुनिया तक पहुँच जाता है?"…

"जी..बिलकुल"..

"इधर लिखा और उधर बटन दबाया…बस पूरी दुनिया के सामने हमारा लिखा तुरंत के तुरंत पहुँच जाता है"…

"इधर लिखा और उधर बटन दबाया?"…

"जी"…

"इसका मतलब लिखा कहीं और जाता है और बटन कहीं और दबाया जाता है?"…

"नहीं!…जिधर लिखा जाता है…उधर ही बटन दबाया जाता है"…

"लेकिन तुमने ही तो अभी कहा कि इधर लिखा और उधर….

"ओफ्फो!…ऐसे सिर्फ कहा जाता है…किया नहीं जाता है"….

"अब यार!…मुझे क्या पता?…मैँ ठहरा मोलढ इनसान"….

"अरे वाह!…मोलढ भी कह रहे हो और इनसान भी"…

"अरे यार!…मेरा मतलब था कि तुम खुद तो कम्प्यूटर के महाज्ञानी हो और मुझे इसका ‘क.ख.ग’ भी नहीं आता…मुझे क्या पता कि क्या चीज़ …कैसे करते हैँ"…

"चिंता ना करो…दो-चार दिन मेरे साथ रहोगे तो सब सीख जाओगे"….

"पक्का?"…

"बिलकुल पक्का"….

"थैंक्स"…

"किस बात का?"…..

"कम्प्यूटर….

"एक बात कान खोल के सुन लो तुम मेरी"…

"जी"…

"यारी-दोस्ती में नो थैंक्स…नो शुक्रिया"….

"ओ.के…ओ.के बाबा….नो थैंक्स…नो शुक्रिया"…

"यार !…एक काम था तुमसे"…

"जब तुम्हें दिल से अपना मान लिया है तो एक क्या…दो काम कहो"….

"क्या तुम मेरा इंटरव्यू छाप सकते हो?"…

"हाँ-हाँ!…क्यों नहीं"…

"तो फिर छापो"….

"अभी?"…

"हाँ…अभी…अभी छापने में क्या दिक्कत है?"….

"अभी तो यार!…मेरे पास ना यहाँ कोई कागज़ है ना ही लैपटॉप"…

"कागज़ की तुम चिंता ना करो…अपने पास सब जुगाड़ हैँ"…

"ये लो"कह काँस्टेबल ने अपनी पूरी चालान बुक ही मेरी हथेली पे धर दी

"ये क्या?…ये तो सरकारी चालान बुक है"…

"तुम्हें सरकारी या गैर-सरकारी से आम लेने हैँ?"…

"तुम्हें कागज़ चाहिए ना?"….

"जी"…

"और वो मैँ तुम्हें दे रहा हूँ"…

"लेकिन….

"अरे!…लेकिन-वेकिन…किंतु-परंतु को मारो गोली और इस चालान बुक को पलट कर देखो….पीछे से ब्लैंक है"….

"लेकिन सरकारी संपत्ति का ऐसे दुरप्योग?"….

"अरे!…सरकारी कहाँ?…मैँने खुद अपने पल्ले से छपवाई हैँ"…

"ये देखो!…सरकारी वाली तो डिक्की में पड़ी है"काँस्टेबल अपनी बाईक की डिक्की खोल मुझे दिखाता हुआ बोला

"यू मीन…आपने खुद?…अपनी जेब से?…अपना पैसा खर्च कर के छपवाई हैँ?"…

"हाँ यार!…खुद ही छपवाई हैँ…कसम से"काँस्टेबल अपने कानों को हाथ लगा सफाई सी देता हुआ बोला

"पैसा भी आपका…खुद का ही था?"मुझे विश्वास नहीं हो रहा था

"भगवान झूठ ना बुलवाए…पैसा तो आम पब्लिक से ही वसूला हुआ था"…

"याने के रिश्वत का था"मैँ निर्णय पे पहुँचते हुए बोला….

"यार!…पैसा…पैसा होता है…चाहे वो रिश्वत का हो या फिर हक-हलाल की कमाई का"…

"क्या फर्क पड़ता है?"…

"अरे वाह!…फर्क क्यों नहीं पड़ता?"…

"कोई फर्क नहीं है दोनों में…बाज़ार में दोनों एक ही दाम पर चलते हैँ"…

"जी नहीं…अगर हक-हलाल की कमाई होगी तो आप उसे सोच-समझ के खर्च करेंगे और अगर कमाई गलत तरीके से की गई है तो आप पैसे को अनाप-शनाप तरीके से उड़ाएँगे"…

"हाँ उड़ाऊँगा!…एक नहीं सौ बार उड़ाऊँगा…किसी को जो करना हो…कर ले"…

"मेरा….मेरी मेहनत का पैसा है…मैँ उसका जो चाहे करूँ…तुम होते कौन हो मुझे रोकने वाले?"काँस्टेबल का पारा हाई हो चला था

"मेहनत का पैसा अगर होता तो आप ग्राँड हयात में पार्टी नहीं रखते"….

"तो क्या यार-दोस्तों को खाना भी ना खिलाऊँ?"….

"खाना तो आप घर पे भी खिला सकते हैँ"…

"हाँ!…घर में भी खिला सकता हूँ लेकिन फिलहाल मेरा इरादा अपनी नाक कटवाने का नहीं है"…

"अड़ोसी-पड़ोसी….नाते-रिश्तेदार…सभी तो जानते हैँ मुझे"…..

"क्या सोचेंगे वो?…कि पॉश इलाके में तैनात  दिल्ली पुलिस के इस काँस्टेबल की इतनी औकात भी नहीं है कि वो ढंग से चार बन्दों को खाना भी खिला सके"…

"मेरी खिल्ली नहीं उड़ाएँगे?"…

"और तुम?….लेखक बिरादरी के टटपूंजिए लोग…तुम क्या जानों की मेहनत से कमाना किसे कहते हैँ?"…

"क्यो?….क्या हम मेहनत नहीं करते हैँ?"…

"जनाब!…आराम से पक्की छत के नीचे बैठ…उलटी-सीधी ऊँगलियाँ टकटका लेने को मेहनत नहीं कहा जाता"…

"तो फिर किसे कहा जाता है?"…

"ये जो हम तपती दोपहरी में खुले आसमान के नीचे धूल और धुआँ फाखते हुए जो मर-खप्प के दिहाड़ी बनाते है…उसे मेहनत कहते हैँ"…

"रहने दीजिए जनाब….रहने दीजिए…कितनी बार तो मैँने खुद अपनी इन्हीं आँखो से आपको मैट्रो स्टेशन के नीचे या फिर किसी पेड़ की छांह तले आराम फरमाते-फरमाते लोगों से पैसे वसूलते देखा है"….

"तुम्हें पेड़ की छांह के नीचे खड़े हो हमारा आराम फरमाना तो दिख गया लेकिन  हम जो झाड़-झंखाड़ों के बीच छुप के  काले सियारों का शिकार करते हैँ…वो तुम्हें दिखाई नहीं देता?"सिपाही से बोले बिना रहा नहीं गया…

"ये काले सियार कौन?"…

"कानून तोड़ने वाले…और कौन?"काँस्टेबल मेरी जिज्ञासा शांत करता हुआ बोला…

"तुम क्या जानों कि इस चक्कर में ना जाने कितनी दफा मेरी खुद की कोहनी…पीठ…लहुलुहान हो छिल चुकी है"काँस्टेबल बाज़ू ऊपर कर अपनी फूटी हुई कोहनी दिखाता हुआ बोला…

"पंगा तो पहले आप खुद लेते हैँ और बाद में शोर भी आप भी खुद ही खुद मचाते हैँ"…

"मतलब?"…

"आखिर आपको झाड़-झंखाड़ में घुस कर अपनी ऐसी-तैसी करवाने की ज़रूरत ही क्या होती है?"…

"आए-हाय…क्या ज़रूरत होती है?"…

"पब्लिक को इतना सीधा समझ रक्खा है क्या"…

"मतलब"…

"अरे!..आजकल की पब्लिक बड़ी चलती-पुर्ज़ी याने के चालू टाईप की है"….

"कैसे?"…

"अगर उसे ज़रा सी भी…तनिक सी भी भनक लग जाए कि हम लोग वाच कर रहे हैँ…तो एकदम गऊ के माफिक सीधी हो जाती है"….

"वो कैसे?"…

"कोई कानून ही नहीं तोड़ती है…यहाँ तक की पैदल चलने वालों से भी पूरी इज़्ज़त के साथ पेश आती है"…

"ओह!…

"इसी कारण हमें छुप कर उन्हें कानूनन…कानून तोड़ने के लिए बाध्य करना पड़ता है"…

"जी"…

"लेकिन ये सब तो गलत है कि पहले आप खुद ही लोगों को उकसा के कानून तोड़ने पे मजबूर करो और बाद में इसी जुर्म के लिए उनकी धर-पकड़ करो"…

"अब भईय्ये!..अगर सीधी ऊँगली से घी निकल जाए तो हम अपनी ऊँगली टेढी ही क्यों करें?"…

"लेकिन…

"इस लेकिन-वेकिन और किंतु-परंत को ठण्डे बस्ते में डाल के ध्यान से मेरी बात कान खोल के सुनो"…

"जी…"कान को हलके से उमेठते हुए मैँने जवाब दिया …

"सबकी बात तो मैँ नहीं करता लेकिन मुझ में और मुझ जैसे कईयों में शराफत अभी बाकी है"…

"मतलब?"…

"हमारा ज़मीर अभी ज़िन्दा है…इस नाते हमें खुद अच्छा नहीं लगता कि हम ऐसी हराम की कमाई को हाथ भी लगाएँ लेकिन…..

"लेकिन?"….

"क्या करें?…हमारी भी अपनी मजबूरिया होती हैँ"….

"अजी छोड़िए…मजबूरियाँ होती हैँ….ये सब आप मर्ज़ी से….अपनी खुशी से….अपने ज़मीर को गिरवी रख के करते हैँ"…

"नहीं…झूठ!…झूठ है ये बिलकुल….तनिक भी इसमें सच्चाई नहीं है"सिपाही रुआँसा हो बोल उठा…

"क्या तुम जानते हो इस बीट पर ट्रांसफर करवाने के एवज में हर महीने मुझे पन्द्रह लाख रुपए की मंथली ऊपर ‘एस.एच.ओ’ को भेजनी पड़ती है?"…

"पन्द्रह लाख?"मेरा मुँह खुला का खुला रह गया… 
"जी हाँ जनाब!…पूरे पन्द्रह लाख…ना एक पैसा कम …ना एक पैसा ज़्यादा"काफी देर से चुप जूस वाला बोल पड़ा…

"ना एक पैसा कम…ना एक पैसा ज़्यादा?"मुझे विश्वास नहीं हो रहा था…

"अगर किसी के पास दो-चार सौ कम हों तो?"मैँने शंका प्रकट की….

"नहीं…बिलकुल नहीं….रूल इज़ रूल"….

"हमारे यहाँ कानून सबके लिए बराबर है…उसकी नज़र में कोई छोटा नहीं…कोई बड़ा नहीं"…

"कोई अपना नहीं…कोई पराया नहीं"सिपाही ने बात पूरी की….

"तो क्या कानूनन आपको ये रकम देनी पड़ती है?"…

"अरे!…अगर कहीं किसी नीलामी में हम कोई बोली लगाएँगे तो हमें वही बोली की रकम देनी पड़ेगी कि नहीं"…

"जी…देनी तो पड़ेगी"…

"तो फिर कम या ज़्यादा से क्या मतलब?"…

"लेकिन नीलामी अलग चीज़ है और आपका काम अलग चीज़….इस से आपके काम का क्या कनैक्शन?"…

"अरे!..जैसे पुराने माल…पुरानी गाड़ियों की नीलामी होती है कि नहीं?"…

"जी…होती है"….

"तो बन्धु मेरे!…ठीक वैसे ही हमारे यहाँ थाने में आने वाली बीटों और डिवीज़नों की नीलामी होती है"सिपाही मुझे समझाता हुआ बोला…

"ओह…अच्छा"…

"तो क्या ये बोली साफ-सुथरे और निष्पक्ष तरीके से?…..

"100%"…

"बेशक हमारा धन्धा बे-ईमानी का सही लेकिन होता पूरी ईमानदारी से है"…

"सबके सामने खुले में बोली होती है…अपना जिसको जिस बीट या डिवीज़न की दरकार होती है…वो उस हिसाब से बोली लगाता है"…

"ओह!…अच्छा"…

"ये पैसा हर महीने आप ‘एस.एच.ओ’ को?"…

"जी"….

"तो क्या ‘एस.एच.ओ’ अकेला ही?"…..

"अब ये तो भगवान जाने कि अकेला डकार जाता या फिर और ऊपर तक चढावा चढाता है लेकिन इतना ज़रूर पता है कि पिछले महीने हमारे उसने गुड़गांव की एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में छै कमरों का एक शानदार लग्ज़रियस अपार्टमैंट खरीदा है"…..

"जनाब!..‘टी.डी.पी’ मॉल में उनके शानदार ऑफिस के बारे में बताना तो भूल ही गए"सिपाही काँस्टेबल की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला…

"वाह!…क्या ऑफिस खरीदा है..वाह-वाह"जूस वाला भी हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला…

"इसमें वाह-वाह की क्या बात है?…उससे शानदार तो मेरा डिफैंस कालौनी वाला बँगला है और उसके वरसोवा वाले शो-रूम से कई गुना बड़ा और महँगा मेरा घाटकोपर वाला मॉल है "‘एस.एच.ओ’ की तारीफ सुन काँस्टेबल भड़क उठा…

"हुँह!…बड़ा आया शो-रूम वाला"…

"दिल तो करता है कि किसी दिन ऊपर…जॉइंट कमिश्नर तक ई-मेल भेज के सारे कच्चे चिट्ठे खोल के रख दूँ इस ‘एस.एच.ओ’ के बच्चे के कि कैसे ये डिवीज़नों की और बीटों की नीलामी लगवाता है"…

"स्साला!…मुझ से पंगा लेता है"…

"साब जी…क्या बिगाड़ा है ‘एस.एच.ओ’ साहब ने आपका?"…
"ये तुम?…तुम मुझ से पूछ रहे हो शुक्ला?"…

"जानते नहीं कि इस बार घंटाघर चौक की कमाऊ बीट मैँने अपने लिए माँगी थी लेकिन उस स्साले…हराम के &ं%$#@  ने  वो उस तिवारी के बच्चे को लॉलीपॉप की तरह थमा दी"…

"उसके पैसे…पैसे हैँ और मेरे पैसे……

"जमाई लगता है क्या वो उसका?"…..

"साब जी!…जाने दीजिए"…

"इस हमाम में हम सभी तो नंगे हैँ…क्यों बेकार में पंगा लेते हैँ?….खाने दीजिए ना उसे…हम भी तो खा रहे हैँ"…

ऊपरवाला सब देख रहा है…अपने आप सबक दे देगा"…

"अरे!…ऊपरवाला अगर देख रहा होता तो वो ये भी देखता कि हम तो बस चख रहे हैँ…असल में खा तो वो भैण का टका रहा है…खा नहीं…बल्कि डकार रहा है"….

"ना!…ना जनाब ना"….

"मैँने आज तक आपकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाई है लेकिन इसका ये मतलब नहीं हो जाता कि मैँ आपकी गलत बातों को भी जायज़ ठहराऊँ"सिपाही से बिना बोले रहा ना गया….

"हाँ जनाब!…यहाँ तो मैँ भी आपसे सहमत नहीं हूँ….मैँने खुद उनको कई बार इन्हीं हाथों से जूस पिलाया है लेकिन….

"जी जनाब!…मैँने खुद कई बार ‘शेर-ए-पँजाब’ ढाबे में उनके साथ डिनर किया है लेकिन कसम है मुझे उस खुदा…उस परवरदिगार की जो मैँने कभी डकार मारते हुए देखा हो"…

"जी…मैँने भी उनके बारे में कभी ऐसी खबर ना पढी और ना ही सुनी लेकिन हाँ…ये डकार मारने की बात पे याद आया कि मैँ तो घर खाना खाने जा रहा था बीवी काफी देर से इंतज़ार कर रही होगी"…
"ओह!….

"तो मैँ चलूँ?"…

"लेकिन मेरा इंटरव्यू?"….

"हो तो गया"…

"कब?"…

"अभी…और कब?"…

"मतलब?"…

"मैँ ये जो आपसे इतनी देर से बात कर रहा था"…

"तो?"…

"वो आपका इंटरव्यू ही तो ले रहा था"…

"लेकिन तुमने कुछ लिखा तो है ही नहीं"…

"अरे!…कागज़-कलम और दवात का ज़माना तो कब का बीत गया"….

"ये देखो"…

"ये क्या है?"….

"एम.पी.थ्री’ प्लेयर कम वॉयस रेकार्डर..आपकी सारी बातें रेकार्ड कर ली है मैँने"…"ओह!…तुम तो यार…छुपे रुस्तम निकले"…

"जी…अपना काम ही कुछ ऐसा है"….

"लेकिन यार!…वो ‘श्रीमान ‘एस.एच.ओ’ जी के खिलाफ जो मैँने टिप्पणियाँ की थी…

"जी"…

"वो तो बस ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक में….

"ज़रा सा बहक गए थे?"…

"ज्जी…जी बिलकुल"…

"प्लीज़!..उनसे रिलेटिड बातों को मत छापना"…

"हाँ-हाँ!..क्यों नहीं"…

"शुक्रिया"….

"निकाल!…इसी बात पे सौ का नोट"…

"हा…हा…हा…(सम्वेत स्वर)

***राजीव तनेजा****

Rajiv Taneja(India)

http://hansteraho.blogspot.com

rajivtaneja2004@gmail.com 

+919810821361

+919213766753

 

1.Blogger Vivek Rastogi said… 
 
वाह एक बार पढ़ना शुरु किया तो ऐसा लगा कि कोई सीरियल की कडी देख रहा हूँ, बहुत अच्छा व्यंग्य।

 

Blogger 2.AlbelaKhatri.com said…

ha ha ha ha ha ha ha ha ha
bhai raajiv tanejaji,
aapne to hansa hansa kar pet dukha diya.
TOH NIKAL SAU KA PATTA ISEE BAAT PAI
ha ha ha ha

Delete

Blogger 3.विनोद कुमार पांडेय said…

बेहतरीन लिखा है,
मज़ा आ गया..

Delete

4.Blogger सुशील कुमार छौक्कर said…

हम तो तभी कमेंट करेगे जब आप सौ रुपये का नोट निकाल कर देगे। पर फिर भी एक बात तो कह जाते है कि इस हरियाणवी भाषा में व्यंग्य का मजा दुगना हो गया।

 

Delete

Blogger 5.योगेन्द्र मौदगिल said…

सटीक व्यंग्य…. भाषा का सही प्रयोग… बधाई स्वीकारें

Blogger 6.Murari Pareek said…

राम का मरया के लिख्या स्य अधि घंटा स्यूं पढ़ रयो हूँ !!और गाल्यां भी @#*& यु कर के भोत काडी स, इसी बात पर निकाल सो का नोट!!

7.ब्लॉगर विजय वडनेरे ने कहा…
बाप रे बाप!!
घणा ढेर सारा लिक्ख रक्खा है रे तूने तै।
मजा आ गया।

8.ब्लॉगर काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

हम्म लगता है कि बाजिब है सौ का नोट :-)

9.ब्लॉगर अविनाश वाचस्पति ने कहा…

बोली हरियाणवी और दिक्‍कत जन जन की। सौ के नोट की अभी भी इतनी साख है जानकर अच्‍छा लगा और वो भी इस घनघोर मंदी में।

10.ब्लॉगर Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

यदि बुरा न माने तो इमानदारी से कहना चाहूंगा कि जहाँ तक हरियाणवी भाषा का प्रयोग किया गया है, वहाँ तक तो आपकी ये व्यंग्य रचना बहुत जबरदस्त बन पडी है,किन्तु उससे आगे तो ऎसा लग रहा था कि जैसे इसे जबरदस्ती खींचा जा रहा है।….आशा है कि आप इसे अन्यथा न लेंगे।

11.Blogger Vijay Kumar Sappatti said…

sahi hai rajeev bhai .. padhkar maza aa gaya..dil khush ho gaya……aap to kamal ke likhte ho ji .. wah aur sirf wah .. apse mila tha to laga nahi tha ki aap itni acchi comedy karte honge .. lekin bhai kya kahun…
salam hai aapko ..
vijay

"बम चिकी बम…बम….बम"

***राजीव तनेजा***

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"बोल बम चिकी बम चिकी बम…बम….बम"

"बम….बम…बम"….

"बम….बम…बम"(सम्वेत स्वर)…

"परम पूज्य स्वामी श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की जय"….

"जय"….

"जय हो श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में नतमस्तक हो गया

"प्रणाम गुरूवर"….

"जीते रहो वत्स"….

"क्या बात?…कुछ परेशान से दिखाई दे रहे हो"….

"क्कुछ खास नहीं महराज"…

"कोई ना कोई कष्ट तो तुझे ज़रूर है बच्चा"…..

"तुम्हारे माथे पे खिंची हुई आड़ी-तिरछी रेखाएँ बता रही हैँ कि तुम किसी गहरी सोच में डूबे हुए हो"….

"बस ऐसे ही…

"कहीं ट्वैंटी-ट्वैंटी के वर्ल्ड कप में……

"ना..ना महराज ना….जब से ‘आई.पी.एल’ के मैचों में मुँह की खाई है…तब से ही तौबा कर ली"…

"सट्टा खेलने से?"…

"ना…ना महराज ना…बिना सट्टे के तो जीवन बस अधूरा सा लगता है"….

"तो फिर किस चीज़ से तौबा कर ली तुमने?"…

"’टी.वी’ देखना छोड़ दिया है मैँने…यहाँ तक कि अपना फेवरेट प्रोग्राम…"खाँस इंडिया खाँस" भी नहीं देखता आजकल

"सोच रहा हूँ कि टी.वी की तरफ रुख कर के सोना भी छोड़ दूँ….ना जाने बुरी लत फिर कब लग जाए"…

"तो फिर क्या कष्ट है बच्चा?"….

"कहीं घर में बीवी या भौजाई से किसी किस्म का कोई झगड़ा या क्लेश?….

"ना….ना महराज ना….भाभी तो मेरी एकदम शशिकला के माफिक सीधी…सच्ची और भोली है"…

"और बीवी?"….

"वो तो जैसे कलयुग में  साक्षात निरूपा रॉय की अवतार"….

"तो फिर क्या बच्चे तुम्हारे कहे अनुसार नहीं चलते?"…

"ना..ना महराज ना…पिछले जन्म में तो मैँने ज़रूर मोती दान किए होंगे जो मुझे प्राण…रंजीत और शक्ति कपूर जैसे होनहार…नेक और तेजस्वी बालक मिले….ऐसी औलादें तो भगवान हर माँ-बाप को दे"..

"तो फिर काम-धन्धे में कोई रुकावट?……कोई परेशानी?"…

"ना…ना महराज ना…जब से आपने उस एक्साईज़ वाले से हरामखोर से सैटिंग करवाई है….अपना धन्धा तो एकदम चोखा चल रहा है"…

"तो इसका मतलब यूँ समझ लें कि दिन-रात लक्ष्मी मईय्या की फुल्ल बटा फुल्ल कृपा रहती है"…

"जी…बिलकुल"….

"तो फिर चक्कर क्या है?"…

"चक्कर?….कैसा चक्कर?…कौन सा चक्कर?"…

"ओफ्फो!…बीवी तुम्हारी नेक एवं सीधी-साधी है"….

"जी महराज"…

"बच्चे तुम्हारे गुणवान हैँ"…

"ज्ज…जी महराज"…

"धन्धा पूरे ज़ोरों पर चल रहा है"…

"जी महराज"…

"तो फिर भईय्ये!…तन्ने के परेशानी सै?"…

"अब क्या बताऊँ स्वामी जी…आज के ज़माने में भाई का भाई पर से विश्वास उठ चुका है…दोस्त एक दूसरे से दगा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैँ…नौकर का मालिक पर से और मालिक का नौकर के ऊपर से विश्वास उठ चुका है"…

"तो?"…

"सच कहूँ तो स्वामी जी…जब अपने चारों तरफ ऐसे अँधकार भरे माहौल को देखता हूँ तो अपने मनुष्य जीवन से घिन्न आने लगती है….जी चाहता है कि ये मोह-माया त्यागूँ और अभी के अभी सब कुछ छोड़-छाड़ के सन्यास ले लूँ?"…

"के बात?…म्हारे सिंहासण पे कब्जा करणा चाहवे सै?"…

"ना …महराज ना…कीस्सी बातां करो सो?"…

"कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली?"…

"म्हारी के औकात कि थम्म जीस्से पहाड़ से मुकाबला कर सकूँ"…

"कोशिश भी ना करियो….जाणे सै नां कि म्हारे लिंक घण्णी ऊपर तक…

"ज्जी…जी महराज"….

"ईब्ब साफ-साफ बता मन्ने कि के कष्ट सै तन्ने?…

"के बताऊँ महराज….इस वाईनी की खबर ने घण्णा दिमाग खराब कर रखा सै"….

"खबर?….कूण से वाईनी की खबर?"…

"अरे!…वो बैंगस्टर वाला वाईनी….और कौन?"….

"के पुलिस ने गोल्ली मार दी?"….

"ना…ना महराज ना…कीस्सी अनहोणी बात करो सो?…..ऊपरवाले को बी ईस्से लोगां की जरूरत नां सै….इस णाते ससुरा कम्म से कम्म  सौ साल और जीवेगा"…

"ईसा के गजब ढा दिया इस छोकरे णे के सौ साल जीवेगा?"…

"नूं तो कई नाटकां में हीरो का रोल कर राख्या सै पट्ठे ने लेकिन असल जिन्दगी में तो पूरा विल्लन निकल्या…पूरा विल्लन"…

"के बात करे सै?"…

"लगता है महराज जी आप यो पंजाब केसरी अखबार ने सिरफ नंगी हिरोईणां के फोटू देखण ताईं मंगवाओ सो"…

"के मतबल्ल?"…

"रोज तो खबर छप रही सै अखबार म कि वाईनी की नौकरानी ने उस पर ब्लात्कार करने का आरोप लगाया है"…

"अरे!…आरोप लगाने से क्या होता है?"…आरोप तो हर्षद मेहता ने भी अपने नरसिम्हा जी पर लगाए थे लेकिन हुआ क्या?"…

"चिंता ना कर….यहाँ भी कुछ नहीं होने वाला"….

"पैसे में बहुत ताकत होती है…कल को छोकरी खुद ही तमाम आरोपों से मुकर जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं"…

"वैसे मुझे इन मीडिया वालों पर बड़ी खुन्दक आती है"…

"वो किसलिए महराज?"…

"ये बार-बार अखबार…टीवी और मैग्ज़ीनों वाले जो ‘ब्लात्कार-ब्लात्कार’ कर रहे हैँ…इन्हें खुद ‘ब्लात्कार‘ का मतलब नहीं पता"…

"क्या बात करते हैँ स्वामी जी…आजकल तो बच्चे-बच्चे को मालुम है कि ‘ब्लात्कार’ किसे कहते हैँ?…कैसे किया जाता है"….कितनी तरह के ब्लात्कार होते हैँ वगैरा-वगैरा"…

"तो चलो तुम्हीं बता दो कि ‘ब्लात्कार’ किसे कहते हैँ?"….

"इसमें क्या है?….किसी की मर्ज़ी के बिना अगर उसके साथ सैक्स किया जाए तो उसे ब्लात्कार कहते हैँ"…

"ये तुमसे किस गधे ने कह दिया?"…

"कहना क्या है?….मुझे मालुम है"…

"बस यही तो खामी है हमारी आज की युवा पीढी में….पता कुछ होता नहीं है और बनती है फन्ने खाँ"…

"तो आपके हिसाब से ‘ब्लात्कार’ का मतलब कुछ और होता है?"…

"बिलकुल"…

"तो फिर आप अपने ज्ञान से मुझे कृतार्थ करें"…

"बिलकुल…तुम अगर ना भी कहते तो भी मैँ तुम्हें समझाए बिना नहीं मानता"…

"ठीक है!…फिर बताएँ कि क्या मतलब होता है ‘ब्लात्कार’ का"…

"देखो!…’ब्लात्कार’ शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है…बलात+कार=ब्लात्कार अर्थात बल के प्रयोग से किया जाने वाला कार्य"…

"जी"…

"इसका मतलब जिस किसी भी कार्य को करने में बल या ताकत का प्रयोग किया जाए उसे ब्लात्कार कहते हैँ?"…

"यकीनन"…

"इसका मतलब अगर खेतों में किसान बैलों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें हल में जोतता है तो ये कार्य भी ब्लात्कार की श्रेणी में आएगा?"…

"बिलकुल…सीधे और सरल शब्दों में इसे किसान द्वारा  निरीह बैलों का ब्लात्कार किया जाना कहा जाएगा और इसे कमर्शियल अर्थात व्यवसायिक श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"और अगर हम अपने बच्चों को डांट-डपट कर पढने के लिए मजबूर करते हैँ तो?"…

"तो ये भी माँ-बाप के द्वारा बच्चों का ब्लात्कार कहलाएगा और इसे डोमैस्टिक अर्थात घरेलू श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"और अगर फौज का कोई मेजर या जनरल अपने सैनिकों को दुश्मन पर हमला बोलने का हुक्म देता है तो?"….

"अगर सैनिक देशभक्ति से ओत-प्रोत हो अपनी मर्ज़ी से इस कार्य को अंजाम देते हैँ तो अलग बात है वर्ना ये भी अफसरों द्वारा सनिकों का ब्लात्कार कहलाएगा"…

"इसे तो नैशनल अर्थात राष्ट्रीय श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा ना?"

"बिलकुल"…

"तो इसका मतलब …कार्य कोई भी हो….अगर मर्ज़ी से नहीं किया गया तो वो ब्लात्कार  ही कहलाएगा?"…

"बिलकुल"…

"अगर तुम्हारी बीवी तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के बिना बैंगन या करेला खाने पर मजबूर करती है तो इसे भी पत्नि द्वारा पति का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"या फिर अगर आप अपनी पत्नि की इच्छा के विरुद्ध उसे सास-बहू के सीरियलों के बजाय  किसी खबरिया चैनल पर बेहूदी खबरें देखने के लिए मजबूर करते हैँ तो इसे भी पति द्वारा आपकी पत्नि का ब्लात्कार ही कहा जाएगा" 

"लेकिन महराज एक संशय मेरी दिमागी भंवर में गोते खा रहा है"…

"वो क्या?"…

"यही कि क्या सैक्स करना बुरा है?"….

"नहीं!…बिलकुल नहीं"….

"अगर ऐसा होता तो हमारे यहाँ अजंता और ऐलोरा की गुफाओं और खजुराहो के मंदिरो में रतिक्रिया से संबंधित मूर्तियाँ और तस्वीरें ना बनी होती"…

"हमारे पूर्वजों ने उन्हें बनाया ही इसलिए कि आने वाली नस्लें इन्हें देखें और देखती रहें ताकि वे अन्य अवांछित कार्यों में व्यस्त हो कर इस पवित्र एवं पावन कार्य को भूले से भी  भूल ना पाएँ"….

"ओशो रजनीश ने भी तो फ्री सैक्स की इसी धारणा को अपनाया था ना?"…..

"सिर्फ अपनाया ही नहीं बल्कि इसे देश-विदेश में लोकप्रिय भी बनाया"…

"जी"…

"उनकी इसी धारणा की बदौलत पूरे संसार में उनके लाखों अनुयायी बने और अब भी बनते जा रहे हैँ"…

"स्वयंसेवकों के एक बड़े कैडर ने उनकी धारणाओं एवं मान्यताओं को पूरे विश्व में फैलाने का बीड़ा उठाया हुआ है इस नाते वे पूरे संसार में उनकी शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार कर रहे हैँ"…

"अगर ये कार्य इतना ही अच्छा एवं पवित्र है तो फिर हमारे यहाँ इसे बुरा कार्य क्यों समझा जाता है?"….

"ये तुमसे किसने कहा?"…अगर ऐसा होता तो आज हम आबादी के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे नम्बर पर ना होते"…

"स्वामी जी!…कुकर्म का मतलब बुरा कर्म होता है ना?"….

"हाँ…बिलकुल"…

"और आपके हिसाब से रतिक्रिया करना अच्छी बात है लेकिन ये अखबार वाले तो इसे बुरा कार्य बता रहे हैँ"…

"वो कैसे?"…

"आप खुद ही इस खबर को देखें….यहाँ साफ-साफ लिखा है कि….

"फलाने-फलाने ‘एम.एल.ए’ का पी.ए’ फलानी-फलानी स्टैनो के साथ कुकर्म के जुर्म में पकड़ा गया"….

"इसीलिए तो मुझे गुस्सा आता है इन अधकचरे अखबार नफीसों पर…कि ढंग से ‘अलिफ’… ‘बे’ आती नहीं है और चल पड़ते हैँ मुशायरे में शायरी पढने"…

"बेवाकूफो….कुकर्म का मतलब होता है कु+कर्म=कुकर्म अर्थात बुरा कर्म और सुकर्म का मतलब होता है सु+कर्म=सुकर्म अर्थात अच्छा कर्म

"पागल के बच्चे…जिसे बुरा कर्म बता रहे हैँ….उस कर्म के बिना तो खुद उनका भी वजूद नहीं होना था"…
"इतना भी नहीं जानते कि ये कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म है….याने के अच्छा कार्य….ये तो सोचो नामाकूलो कि अगर ये कार्य ना हो तो इस पृथ्वी पर बचेगा क्या…
टट्टू?

"ना जीव-जंतु होंगे…ना पेड़-पौधे होंगे और ना ही हम मनुष्य होंगे और अगर हम ही नहीं होंगे तो ना ये ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ होंगी और ना ही कल-कल करते हुए कल-कारखाने होंगे….ना ये सड़कें होंगी और ना ही घोड़ा गाड़ियाँ होंगी"….

"घोड़ा गाड़ियाँ क्या….छोटी या बड़ी…किसी भी किस्म की गाड़ियाँ नहीं होंगी"…

"हर तरफ बस धूल ही धूल जैसे चाँद पर या फिर किसी अन्य तारा मण्डल पर"

"लेकिन इन्हें इस सब से भला क्या सरोकार?…इन्हें तो बस अपनी तनख्वाह से मतलब रहता है भले ही इनकी वजह से अर्थ का अनर्थ होता फिरे…इन्हें कोई परवाह नहीं…कोई फिक्र नहीं"…

"अब "बोया पेड़ बबूल का तो फल कहाँ से आए?"…

"मतलब?"…

"अब जैसा सीखेंगे…वैसा ही तो लिखेंगे"…

"सीखने वाले भी पागल और सिखाने वाले भी पागल"…

"तो फिर आपके हिसाब से कैसे खबरें छपनी चाहिए?"…

"कैसी क्या?…जैसी हैँ…वैसे छपनी चाहिए"…

"मतलब?"…

"मतलब कि लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए"…

"जैसे?"…

"चार पुलिसकर्मी एक नाबालिग लड़की के साथ ज़बरदस्ती सुकर्म करने के आरोप में पकड़े गए" या फिर…

"सार्वजनिक स्थल पर सुकर्म की चेष्टा में एक अफगानी जोड़ा गिरफ्तार"

"इस खबर में यकीनन लड़्की की मर्ज़ी से सुकर्म को अमली जामा नहीं पहनाया गया होगा"…

"जी"…

"कार्य चाहे मर्ज़ी से हुआ या फिर बिना मर्ज़ी के लेकिन कार्य तो अच्छा ही हुआ ना?

"ज्जी"…

"इस नाते यहाँ नीयत का दोष है ना कि कार्य का…और हमारी…तुम्हारी और आपकी शराफत और भलमनसत तो यही कहती है कि हम बिला वजह किसी अच्छे कार्य को बुरा कह उसे बदनाम ना करें"…

"जी बिलकुल"…

"लेकिन अगर नीयत खोटी है और कार्य भी खोटा है तो उसे यकीनन बुरा कर्म अर्थात कुकर्म ही कहा जाएगा"…

"जैसे?"…

"जैसे अगर कोई चोर चोरी करता है तो वो बुरा कर्म याने के बुरा कार्य हुआ…उसे किसी भी संदर्भ में अच्छा कार्य नहीं कहा जा सकता"…

"लेकिन इसके भी तो कई अपवाद हो सकते हैँ ना गुरूदेव?"..

"कैसे?"….

"अगर हमारे देश की इंटलीजैंस का कोई जासूस दुश्मन देश में जा कर हमारे हित के दस्तावेजों की चोरी करता है तो उसे कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म कहा जाएगा"…

"हाँ!…लेकिन दूसरे देश की नज़रों में बिना किसी शक और शुबह के ये कुकर्म ही कहलाएगा

"धन्य हैँ गुरूदेव आप…आपने तो मुझ बुरबक्क की आँखों पे बँधी अज्ञान की पट्टी को हटा मुझे अपने ओजस्वी ज्ञान से दरबदर…ऊप्स सॉरी तरबतर कर मालामाल कर दिया"..

"बोलो…. बम चिकी बम चिकी बम…बम….बम"

"बम….बम…बम"….

"बम….बम…बम"(सम्वेत स्वर)…

"परम पूज्य स्वामी श्री सुकर्मानन्द महराज की जय"….

"जय"….

"जय हो श्री सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में फिर से नतमस्तक हो गया

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja(Delhi,India)

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मेरी आठवीं कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की

छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा

सातवीं कहानी-थमा दो गर मुझे सत्ता

आठवी कहानी- मेड फॉर ईच अदर

 


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मेड फॉर ईच अदर
14 Mar 2009, 1538 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम 

राजीव तनेजा

हेलो। मे आई स्पीक टू मिस्टर राजीव तनेजा ? यस , स्पीकिंग। सर , मैं रिया बोल रही हूं। फ्लाना एंड ढीमका बैंक से। हां जी , बोलिए। सर , वी आर प्रवाइडिंग होम लोन एट वेरी रीज़नेबल रेट्स। सॉरी मैडम , आई एम नॉट इंटरेस्टिड। सर , बहुत अच्छी स्कीम दे रही हूं आपको।
हां जी , बताएं। सर , हम आपको बहुत ही कम ब्याज पर लोन प्रवाइड कराएंगे। अभी कहा न आपको कि नहीं चाहिए। सर , पहले मेरी पूरी बात सुन लें। प्लीज़ , अच्छा फटाफट बताएं , मैं रोमिंग में हूं। सर , आप अगर हमसे लोन लेते हैं तो उसका सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि समय पर किश्त न चुका पाने की कंडीशन में हम आपके घर अपने गुंडे और बदमाश नहीं भेजते हैं।

ओह , अच्छा ! फिर तो ठीक है। एक्चुअली , मुझे गुंडों और उनकी मार – कुटाई से बड़ा डर लगता है। यू नो , एक बार मेरे दोस्त कम पड़ोसी कम रिश्तेदार के घर पर काफी तोड़फोड़ और हंगामा कर गए थे। सर , वे उस एक्स कम्पनी के रिकवरी एजंट होंगे। यह तो पता नहीं। दरअसल , वे हैं ही बड़े बेकार लोग। बिना वजह कस्टमर्स को तंग करते हैं।

यह भी नहीं जानते कि ग्राहक तो भगवान का रूप होता है और कोई अपनी मर्ज़ी से थोड़े ही फंसता है , बैंकों के जाल में। ऊपर से बाज़ार में मंदा – ठंडा तो चलता ही रहता है। थोड़ा सब्र तो उन्हें रखना ही चाहिए कि कोई उनके पैसे खा थोड़े ही जाएगा। वैसे हमारे बैंक से लोन लेने के बाद तो वैसे भी आदमी किश्तें चुकाते – चुकाते अपने ही कष्टों से मर जाता है। ही … ही …. ही ..

क्या ? प्लीज़ , आप माइंड न करें। आप इतना सब उल्टा – सीधा बके चली जा रही हैं और मुझे कह रही हैं कि माइंड न करें। एक्चुअली , इट वॉज़ अ पी . जे। पी . जे माने ? प्योर जोक … प्रैक्टिकल जोक। ओह , फिर तो आप बड़े ही खतरनाक जोक मारती हैं मिस पिंकी। सर यह तो कुछ भी नहीं , मेरे जोक्स के आगे तो बड़े – बड़े हिल जाया करते हैं। ओह , रियली ? जी और सर , मेरा नाम पिंकी नहीं बल्कि रिया है। ओह , फिर तो आपने ठीक किया। क्या ठीक किया सर ?

यही कि अपना नाम बता दिया। वर्ना बेवजह कन्फ्यूज़न क्रिएट होता रहता। किस तरह का कन्फ्यूज़न सर ? एक्चुअली फ्रैंकली स्पीकिंग , इस तरह के दो – चार फोन तो रोज़ ही आ जाते हैं ना ! तो तो सबके नाम याद करने में अच्छी – खासी मुश्किल पेश आ जाया करती है। सर , जब आप हमसे एक बार लोन ले लेंगे न तो फिर कभी भी मेरा नाम नहीं भूल पाएंगे। और वैसे भी मैं भूलने वाली चीज़ नहीं हूं सर। जी , यह तो आपकी बातों से ही मालूम चल गया है। क्या मालूम चल गया है सर ?

यही कि आप बातें बड़ी दिलचस्प करती हैं। थैंक्स फॉर दा कॉम्प्लिमंट सर। एक्चुअली फ्रैंकली स्पीकिंग , यू हैव ए वेरी स्वीट एंड सेक्सी वॉयस। झूठे। फ्लर्ट करना तो कोई आप मर्दों से सीखे। प्लीज़ , इसे झूठ न समझें। सच में आपकी आवाज़ बड़ी ही मीठी और सुरीली है। तुम्हारी कसम। अच्छा जी , अभी मुझसे बात करते हुए सिर्फ आपको यही कोई दस – बारह मिनट हुए हैं और आप मेरी कसमें भी खाने लगे।

एक्चुअली , रिया वह क्या है कि किसी को समझने में पूरी उम्र बीत जाया करती है और किसी को जानने के लिए सिर्फ चंद सेकंड ही काफी होते हैं। यू नो , जोड़ियां ऊपर से ही बन कर आती हैं। जी , बात तो आप सही कह रहे हैं। सर ! वैसे आप रहते कहां हैं ? जी , शालीमार बाग। वहां तो प्रॉपर्टी के बहुत ज़्यादा रेट होंगे न सर ? जी , यही कोई सवा लाख रुपये गज के हिसाब से सौदे हो रहे हैं आजकल और अभी परसों ही डेढ़ सौ गज में बना एक सेकंड फ्लोर बिका है पूरे अस्सी लाख रुपये का।
गुड , मैं भी सोच रही थी कोई सौ – पचास गज का प्लॉट ले कर डाल दूं। आने वाले समय में कुछ न कुछ मुनाफा दे कर ही जाएगा। बिलकुल सही सोचा है आपने। किसी भी और चीज़ में इनवेस्ट करने से अच्छा है कि कोई प्लॉट या मकान खरीद कर रख लिया जाए। लेकिन , मुझे यह फ्लोर – फ्लार का चक्कर बेकार लगता है।

ये भी क्या बात हुई कि नीचे कोई और रहे और ऊपर कोई और। ऊपर छत पर सर्दियों में धूप सेंकनी हो या फिर पापड़ – वड़ियां सुखाने हों तो बस दूसरों के मोहताज हो गए हम तो। जी , ये बात तो है। इसमें कहां की अक्लमंदी है कि ज़रा – ज़रा से काम के लिए दूसरों को डिस्टर्ब कर उनकी घंटी बजाते रहो। जी , बिलकुल सही कहा सर आपने। सर , आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं ? अरे यार , इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? हक बनता है आपका। आप एक – दो क्या पूरे सौ सवाल पूछें तो भी कोई गम नहीं।
ये नाचीज़ आपकी सेवा में हमेशा हाज़िर रहेगा। टीं … टीं … बीप … बीप … बीप। ओह , लगता है कि बैलंस खत्म होने वाला है। मैं बस दो मिनट में ही रिचार्ज करवा कर आपको फोन करता हूं। हां , चिंता न करें मैं नम्बर सेव कर लूंगा। नहीं आप रहने दें , मैं ही कर लूंगी। हमें वैसे भी अपना दिन का टारगिट पूरा करना होता है।

ओ . के। ( दस मिनट बाद ) हैलो , राजीव ? हां जी। और सुनाएं , क्या हाल – चाल हैं ? बस , क्या सुनाएं ? कट रही है जैसे तैसे। ऐसे क्यों बोल रही हो यार ? बस ऐसे ही , कई बार लगता है कि जैसे जीवन में कुछ बचा ही नहीं है। चिंता ना करो , मैं हूं ना ? सब ठीक हो जाएगा।

कुछ ठीक नहीं होने वाला है। थोड़ी – बहुत ऊंच – नीच तो सब के साथ लगी रहती है। इनसे घबराने के बजाए इनका डट कर मुकाबला करना चाहिए। जी , खैर आप बताएं। क्या पूछना चाहती थीं आप ?
नहीं , रहने दें। फिर कभी , किसी अच्छे मौके पे। आज से अभी से अच्छा मौका और क्या होगा ? आज ही आपसे पहली बार बात हुई और आज ही आपसे दोस्ती हुई। और वैसे भी दोस्ती में कोई शक नहीं रहना चाहिए।

जी , सही कहा आपने। सर , मैं यह कहना चाहती थी कि … । पहले तो आप ये सर … सर लगाना छोड़ें। एक्चुअली , टू बी फ्रैंक बड़ा अजीब सा फील होता है जब कोई अपना इस तरह फॉरमैलिटी भरे लहज़े में बात करे। आप मुझे सीधे – सीधे राजीव कह कर पुकारें। जी सर , ऊप्स सॉरी राजीव।

हा हा हा हा … एक्चुअली क्या है राजीव कि मैंने कभी किसी से ऐसे ओपनली फ्री हो कर बात नहीं की है। हमें हमारे प्रफेशन में सिखाया भी यही गया है कि सामने वाला बंदा कैसा भी घटिया हो और कैसे भी कितना भी रूडली बात करे , लेकिन हमें अपनी पेशंस अपने धैर्य को नहीं खोना है और अपने चेहरे पर हमेशा मुस्कान बना कर रखनी है।

हमारी आवाज़ से किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि हमारे अन्दर क्या चल रहा है। यू नो प्रफेशनलिज़म। सही ही है , अगर आप लोग अपने कस्टमर्स के साथ बदतमीज़ी के साथ पेश आएंगे तो अगला पूरी बात सुनने के बजाए झट से फोन काट देगा। वही तो …

हां तो आप बताएं कि आप क्या पूछना चाहती थीं ? राजीव , किसी और दिन पर क्यों न रखें यह टॉपिक ? देखो , जब मैंने तुम्हें दिल से अपना मान लिया है तो हमारे बीच कोई पर्दा कोई दीवार नहीं रहनी चाहिए। जी , तो फिर पूछो न यार , क्या पूछना है आपको ? मैं तो सिम्पली बस यही जानना चाहती थी कि यहां शालीमार बाग में आपका अपना मकान है या फिर किराए का ? यार , यह किराया – विराया देना तो मुझे शुरू से ही पसन्द नहीं। इसलिए तो पांच साल पहले पिताजी का जमा – जमाया टिम्बर का बिज़नस छोड़ मैं अमृतसर से भाग कर दिल्ली चला आया कि कौन हर महीने किराया भरता फिरे ?

और आज देखो , अपनी मेहनत से मैंने सब कुछ पा लिया है। मकान , गाड़ी … । ओह , तो इसका मतलब खूब तरक्की की है जनाब ने दिल्ली आने के बाद। बिलकुल , लाख मुश्किलें आई मेरे सामने लेकिन ज़मीर गवाह है मेरा कि मैंने कभी हार नहीं मानी और कभी ऊपरवाले पर अपने विश्वास को नहीं खोया। उसी ने दया – दृष्टि दिखाई अपनी। वर्ना मैं तो कब का थक – हार के टूट चुका होता और आज यहां दिल्ली में नहीं बल्कि वापस अमृतसर लौट गया होता। .. ऐसे नहीं बोलते , अब मैं हूं न तुम्हारे साथ। तुम्हारे हर दुख हर दर्द की साथिन।

वैसे कितने कमरे हैं आपके मकान में ? क्यों ? क्या हुआ ? कुछ नहीं , वैसे ही पूछ लिया। पूरे छह कमरों का सेट है। छह कमरे ? वाऊ … दैट्स नाइस। लेकिन आप इतने कमरों का क्या करते हैं ? क्या बीवी … बच्चे ? कहां यार , अभी तो मैं कुंवारा हूं। व्हाट अ लवली कोइंसीडंस , मैं भी अभी तक कुंवारी हूं। फिर तो खूब मज़ा आएगा जब मिल बैठेंगे कुंवारे दो। जी बिलकुल , लेकिन आप अकेले इतने कमरों का करते क्या हैं ?
दो तो मैंने अपने पास रखे हैं और एक मेहमानों के लिए। बाकी के तीन कमरे , वो क्या है कि कई बार मैं अकेला बोर हो जाता हूं इसलिए फिलहाल किराए पर चढ़ा रखा है। ठीक किया। थोड़ी – बहुत आमदनी भी हो जाती होगी और अकेले बोर होने से भी बच जाते होंगे। जी। लेकिन अब चिंता न करें , मैं आपको बिलकुल भी बोर न होने दूंगी। जब कभी भी ज़रा सा भी लगे कि आप बोर हो रहे हैं तो आप कभी भी किसी भी वक्त मुझे फोन कर दिया करें। मेरा वायदा है आपसे कि आप मेरी कम्पनी को पूरा एंजाय करेंगे।

जी , ज़रूर। शुक्रिया। दोस्ती में … प्यार में … नो थैंक्स … नो शुक्रिया। बातों ही बातों में मैं ये पूछना तो भूल ही गया कि आप कहां रहती हैं ? घर में कौन – कौन हैं वगैरह। अब क्या बताऊं , घर में मां – बाप और बस हम तीन बहनें हैं। सबसे छोटी , सबसे लाडली और सबसे नटखट मैं ही हूं। और घर ? रहने को फिलहाल मैं जहांगीर पुरी में रह रही हूं। वह जो साईड पर लाल रंग के फ्लैट बने हुए हैं ? नहीं यार , जे . जे . कॉलनी में रह रही हूं। गुस्सा तो मुझे बहुत आता है अपने मम्मी – पापा पर कि उन्हें यही सड़ी सी कॉलनी मिली थी रहने के लिए , लेकिन क्या करूं मां – बाप हैं मेरे। बचपन से पाला – पोसा , पढ़ाया – लिखाया उन्होंने। उनके सामने फालतू बोलना ठीक नहीं।
खैर , आप बताएं , क्या – क्या आपकी हॉबीज़ हैं ? मुझे बढ़िया खाना , बढ़िया पहनना , बड़े – बड़े होटलों में घूमना – फिरना , स्वीमिंग करना , फिल्में देखना और फाइनली देर रात तक डिस्को में अंग्रेज़ी धुनों पर नाचना – गाना पसंद है। गुड , म्यूज़िक तो मुझे भी बहुत पसंद है। लेकिन , मुझे ये रीमिक्स वाले गाने तो बिलकुल ही पसंद नहीं। संगीत के अलावा और क्या – क्या शौक हैं आपके ? म्यूज़िक के अलावा मुझे हॉर्स राइडिंग पसंद है , लॉन्ग ड्राइव और हॉलीवुड मूवीज़ पसंद है। इसके अलावा और भी बहुत कुछ पसंद है , जब मिलोगी तब बताऊंगा। ओ . के। तो फिर कब मिल रही हैं आप ? देखते हैं। बताओ न , प्लीज़। क्या बात है ? बड़े बेताब हुए जा रहे हो मुझसे मिलने को ? ऐसा क्या है मुझमें ? और नहीं तो क्या , जिसकी आवाज़ ही इतनी खूबसूरत हो उससे पर्सनली मिलना भी तो चाहिए। पता तो चले कि ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में कौन सा नायाब तोहफा लिखा है।

इतना ऊपर न चढ़ाओ मुझे कि कभी नीचे उतर ही न पाऊं। बताओ न यार , कब मिल रही हो ? ओके , कल तो मुझे शापिंग करने करोल बाग जाना है। क्यों न आप भी मेरे साथ चलें। जी , बिलकुल। आप बताएं , कितने बजे मिलेंगी ? मैं आपको आपके घर से ही पिक कर लूंगा। नहीं , आस – पड़ोस वाले फालतू में बाते बनाएंगे। सुबह मुझे अपनी सहेली के साथ शालीमार बाग में ही काम है , वहीं से मैं आपके घर आ जाऊंगी। कोई प्रॉब्लम तो नहीं है न आपको ? नहीं , मुझे भला क्या प्रॉब्लम होनी है। मैं तो वैसे भी अकेला रहता हूं। आपने पता तो बताया ही नहीं ?

हां नोट करें , आपने ये केला गोदाम देखा है शालीमार का ? जी , अच्छी तरह। बस , उसी के साथ ही है। क्या BK-1 Block में ? नहीं , नहीं उस तरफ नहीं। दूसरी तरफ तो A-Pocket है। हां , उसी तरफ। इसका मतलब AA Block है आपका। नहीं यार , फिर कहां ? AA Block के साथ वो फोर्टिस वालों का अस्पताल बन रहा है न ? जी , बस उसी के साथ जो झुग्गी बस्ती है। हां , है। बस , उसी में … उसी में घर है मेरा।

क्या ? जी , लेकिन तुम तो कह रहे थे कि अपना मकान है , छह कमरों का। अरे , दिल्ली में अपनी झुग्गी होना मतलब अपना मकान होना ही है। पूरी छह झुग्गियों पर कब्ज़ा है मेरा और उन्हीं में से तीन किराये पर उठाई हुई होंगी ? जी , तुम तो ये भी कह रहे थे कि अमृतसर में तुम्हारे पिताजी का टिम्बर का बिज़नस है ? हां , है न। वहीं सदर थाने के पास वाले चौक पर ‘ दातुन ‘ बेचने का बरसों पुराना काम है हमारा। क्या ? और ये जो तुम म्यूज़िक और घुड़सवारी के शौक के बारे में बता रहे थे , वह सब भी क्या धोखा था ? जानू , ना मैंने तुम्हें पहले कभी झूठ कहा और न ही अब कहूंगा।
ये सच है कि म्यूज़िक का मुझे बचपन से बड़ा शौक है और इसी वजह से मैंने दिल्ली आने के बाद शादी – ब्याहों में ढोल बजाने का काम शुरू किया। ओह , इसका मतलब तभी बैंड – बाजे वालों की सोहबत में रहते हुए कई तरह के म्यूज़िक इंस्ट्रूमंटस को बजाना सीख लिया होगा ? जी।…और यह घुड़सवारी भी आपने वहीं से सीखी ? जी , दरअसल क्या है कि बैंड – बाजे वालों के यहां घोड़ी वाले भी आते रहते थे , तो उनसे ही ये हुनर सीख लिया।जी , ओ . के।
तो फिर कल कितने बजे आ रही हो ? आ रही हूं ? सपने में भी ऐसे ख्वाब न देखना। क्यों , क्या हुआ ? इडियट , मेरे साथ डेट पर जाना चाहता है ? ऐसी हालत करवा दूंगी कि न किसी को कहते बनेगा न छिपाते। एक मिनट , चुप बिलकुल चुप। मुझे इतना बोल रही है , तो तू कौन सा आसमान से टपकी है ? जानता हूं , अच्छी तरह जानता हूं। जहां तू रहती है न , वहां की एक – एक गली से एक – एक चप्पे से वाकिफ हूं मैं। तुम्हारे यहां किसी की भी सौ रुपए से ज़्यादा की औकात नहीं है। आऊंगा , आऊंगा तेरी ही गली आऊंगा और तुझसे नहीं बल्कि तेरी ही पड़ोसन के साथ डेट पर जाऊंगा।

शटअप , यू ऑलसो शटअप। गो टू हेल …

 

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मेरा खुला पत्र योगेश समदर्शी के नाम

rajiv holi cartoon

समदर्शी जी नमस्कार….

ये खुला पत्र मैँ आपको इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मेरे पास लिफाफा खरीदने के लिए खुले पैसे नहीं हैँ। एक्चुअली क्या है कि मेरे पास लिफाफे को बन्द करने लायक ज़रूरी गोंद नहीं थी तो मैँने सोचा कि…….अब आप कहेंगे कि गोंद नहीं थी तो क्या हुआ?…अपना चबड़-चबड़ करती गज़ भर लम्बी ज़बान तो थी…अपना झट से लिफाफे के किनारे पे उसी को सर्र से सरसराते हुए फिराते और फट से दाब देते अँगूठे से।….मुआफ कीजिएगा समदर्शी जी….आपने मुझे सही से नहीं पहचाना…..अपने शरीर के ‘अँगूठे’ जैसे पवित्र और पावन हिस्से को ऐसे बेकार के….. गैरज़रूरी कामों में ज़ाया कर  तिरसकृत  करने के बजाय मैँ उसका सदुपयोग लेनदारों को अँगूठा दिखाने में या फिर यार-दोस्तों को वक्त-ज़रूरत पर ठेंगा दिखाने में इस्तेमाल करना ज़्यादा बेहतर समझता हूँ और फिर आज के माड्रन ज़माने में…थूक से…..छी!…पढा-लिखा इनसान होने के नाते मैँ ऐसी घटिया सोच…ऐसा वाहियात ख्याल भी मैँ अपने दिल में कैसे ला भी  सकता हूँ?

नोट:होली के अवसर पर योगेश समदर्शी जी ने हम साहित्य शिल्पियों के काफी अच्छे कार्टून बनाए।अपने कार्टून को देख एक नया प्रयोग करने की सोची।उम्मीद है कि आप सभी को  पसन्द आएगा

बेकार की फुटेज ना खाते हुए मैँ सीधे-सीधे असल मुद्दे  पे आता हूँ।इसमें कोई शक नहीं कि आप एक कवि…लेखक होने के साथ-साथ कम्प्यूटर तकनीक के महान ज्ञाता भी हैँ।आप गुणी है….भगवान हैँ…..ऊपरवाले ने आपको एक नहीं…अनेक गुणों से लबरेज़ करके इस धरती पर भेजा है।आप में कार्टून बनाने की कला कूट-कूट कर भरी हुई है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आपको हर किसी के माखौल को उड़ाने का खुला लाईसंस मिल गया।

आपके नाम के अनुरूप मेरा ख्याल है कि आप योग वगैरा में काफी रुचि रखते हैँ।अच्छी बात है…इससे तन मन दोनों तंदुरस्त रहते हैँ।अगर मैँ सही हूँ तो समदर्शी का मतलब होता है …सबको समान दर्‍ष्टि से देखने वाला लेकिन यहाँ तो ये जान के घोर निराशा हुई किए आप तो समान दर्‍ष्टि से देखने के बजाए आप तो किसी को देखते ही नहीं है(कुछ लड़कियों को भी आपसे यही शिकायत है लेकिन उनकी गोपनियता और निजता के लिहाज से उनका नाम यहाँ मकड़जाल पर उजागर करना उचित नहीं होगा)हाँ!…तो मैँ कह रहा था कि आप किसी को देखते ही नहीं हैँ बल्कि जो मन में आता है…जैसा मन को भाता है…बिना कुछ सोचे समझे उसे तुरंत कर डालने पे उतारू हो जाते हैँ।

हाह!…मैँ आपको क्या समझा और आप क्या निकले?….

कुछ तो आपने अपना और मेरी इज़्ज़त का ख्याल किया होता।क्या सोचा था कि आपकी ऐसी हिमाकत देख के राजीव खुश होगा?… शाबाशी देगा?…ऑक थू…..रोना आ रहा है मुझे अपनी किस्मत पर।गली-मोहल्ले के छोटे-छोटे…नन्हें-मुन्ने बच्चे तक बड़े कांफीडैंस के साथ मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैँ कि ‘निक्कर’ वाले अँकल आ गए…‘निक्कर’ वाले अँकल आ गए।

कसम ले लो मुझसे उस काली कमली वाले परवरदिगार की कि मैँने उस “बिन माँगे मोती मिले” वाले भयानक हादसे के बाद से ही निक्कर पहनना छोड़ा हुआ है।सच!…कसम है मुझे काली दिवार पे सूखते सफेद पॉयजामे के मटमैले नाड़े की जो मैँ एक लफ्ज़ भी झूठ कहा हो।

अब आप कहेंगे कि बच्चे तो भगवान का रूप हुआ करते हैँ

झूठ…बिलकुल झूठ…..कभी हुई करते होंगे भगवान का रूप….आजकल तो इनसे बड़ा शैतान…इनसे बड़ा उत्पाती पूरे जहाँ में भी ढूंढे ना मिलेगा।क्या कहा?….विश्वास नहीं होता?….अरे!…हाथ कँगन को आरसी क्या और पढे-लिखे को फारसी क्या?..एक बार यहाँ….मेरे यहाँ आ के मेरे ही नासपीट्टे बच्चों के साथ दो-दो हाथ कर के देख लें…अपने आप पता चल जाएगा।आप चाहें तो बेशक तस्दीक के लिए गवाही के तौर पर अपने साथ कुछ निजी गवाह और बॉर्डीगॉर्ड भी ला सकते हैँ….आपको खुली छूट है लेकिन ये सब आपके अपने जोखिम और विवेक पर निर्भर करेगा कि आपका ऐसा करना उचित भी होगा या नहीं।

मानता हूँ कि चिट्ठाजगत में आप मेरे सबसे प्रिय हैँ…अभिन्न मित्र हैँ लेकिन फिर भी मैँ यही कहूँगा कि आपने मेरे साथ अच्छा नहीं किया।अरे!…सच्चे दोस्त वो होते हैँ जो वक्त-ज़रूरत पर दोस्ती के लिए खुद को कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटरे और कुछ दोस्त आप जैसे नामुराद भी होते हैँ जो मौका देखते ही जले पे नमक छिड़कना नहीं भूलते।

जैसे कमान से निकल चुके तीर को रोका नहीं जा सकता और ज़बान से निकले हुए शब्दों को फिर से पलटा नहीं जा सकता और पलटना भी नहीं चाहिए क्योंकि क्षत्रिय जो एक बार ठान लेते हैँ…सो ठान लेते हैँ।

चलो!…जो किया सो किया…लेकिन ये तो सोचा होता कम से कम कि किस बेस पे आप मुझ जैसे जवाँ मर्द पट्ठे की रोएंदार टाँगों को क्लीनशेव्ड दिखा रहे हैँ?….तनिक सा….तनिक सा भी ख्याल नहीं आया आपके दिल में एक बार कि क्या बीतेगी राजीव बेचारे पर?…कैसे सामना करेगा वो इस जग-जहाँ के निष्ठुर तानों का?….कैसे पिएगा वो शर्बत इतने अपमानों का?….कैसे वो  बरसों की मेहनत से बनाया हुआ अपना छद्दम मैचोइज़्म बरकरार रख पाएगा।…कैसे “फड़ के किल्ली…चक्क दे फट्टे” का नारा बुलंद कर पाएगा?

नहीं!….कुछ नहीं सोचा आपने….अगर सोचा होता तो इस कार्टून में मैँ नहीं बल्कि वो नुक्कड़ पे बैठने वाला ब्ळॉगर ‘मौदगिल’ जी को भिगो रहा होता।हाँ!….नुक्कड़ से याद आया कि आखिर क्या मिल जाता है आपको किसी को ऐसे टिप्पणी माँगते हुए दिखाने से?….या फिर किसी बेचारे बुज़ुर्ग ब्लॉगर को लाईफ टाईम ऐचीवमैंट अवार्ड देने के बजाय ज़बरदस्ती किसी महिला के हाथों पकड़वा के रंग डलवाने में?….अब वो बेचारी महिला शान से अपनी चाय पत्ती बेचें या फिर कविताएँ लिखें?…

आखिर!….आप साबित क्या करना चाहते हैँ?….वैसे भी आपको पता होना चाहिए कि शेर खुद अपने दम पे अकेले ही शिकार किया करता है।ये याद दिलाने की मैँ ज़रूरत नहीं समझता कि उसे किसी चारे या फिर सहारे की ज़रूरत नहीं होती।खास कर के किसी औरत के सहारे की तो बिलकुल नहीं लेकिन ये गूढ ज्ञान की बातें आप क्या समझेंगे?….आप!….आप तो बस अपने गाँव और गाँव की कविताओं में ही डूबे रहिए…रमे रहिए।वैसे मैँने शायद आपके मुँह से ही उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि आपका कोई कविता संग्रह भी जल्द ही छपने वाला है।अगर ऐसा सचमुच में है तो आपके मुँह में घी-शक्कर।मेरी तरफ से अग्रिम बधाई स्वीकार कर लें।अग्रिम इसलिए कि इतना सब कुछ होने के बाद मैँ इस निष्ठुर ज़माने में जी भी पाऊँगा या नहीं…इसका मुझे डर है।…..

इस जीवन को अपना साथी बनाने से पहले मेरी जॉन मुझे बहुत कुछ सोचना है।

ठीक है…माना कि मैँ निराश हूँ…उदास हूँ…हताश हूँ  लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ मत समझिएगा कि पाँच महीने से मैँने कुछ नहीं लिखा…इसलिए मैँ चुक गया हूँ ।बस इतना समझ लीजे कि ‘लॉट सॉहब’ आराम फरमावत रहे।

और हाँ!…किसी झूठे गुमान में ना रहिएगा कि मैँ आपसे हार मान गया हूँ या फिर आपसे डर गया हूँ। वैसे मैँ आपकी जानकारी के लिए बता दूँ तो इस पूरे जहाँ में मुझे डर लगता है सिर्फ दो चीज़ों से…एक…ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा से और दूसरा नीचे बैठी अपनी महरारू….याने के अपनी घरवाली से ।ऊपर बैठे परमात्मा से तो खैर सभी डरते हैँ क्योंकि हमारे हर अच्छे-बुरे काम का वो गवाह होता है और फिर हमारी जीवन नैय्या का रिमोर्ट कंट्रोल भी तो उसी के हाथ में होता है ना?…इधर हमने कुछ गड़बड़ करी नहीं कि उधर उनका हाथ सीधा रिमोर्ट के बटन की तरफ झपट पड़ना है।उनसे कैसे कोई पंगा ले सकता है?…रही बात बीवी की तो…भईय्या….क्या बताएँ?….उससे तो इसलिए डर लगता है कि पापी पेट का सवाल जो छाया रहता है हरदम हमारे दिमाग पर।

“क्या कहा?…नहीं समझे”……

“अरे बाबा!…खाना जो उसी ने पका के खिलाना होता है हमको …सिम्पल…और ये तो आप भली भांति जानते ही हैँ कि तीनो टाईम बिना डट खाए तो हमसे रहा नहीं जाता।…..अब ऐसी खाए-पिए की जगह नहीं डटेंगे तो क्या अपनी ऊ.पी वाली ‘मायावती’ बहन जी के आगे जा के कटेंगे?

एक शिकायत और है मुझे आपसे कि इतने बड़े तुर्रम खाँ कवि कम शायर….कम ब्लॉगर….कम आयोजनकर्ता को भिगोने के लिए आपने मेरे हाथ में ‘A.K 47′ या फिर ‘A.K 3 पकड़ाने के बजाए ये बच्चों का सा फिस्स-फिस्स करता फिस्सफिस्सा सा झुनझुना पकड़ा दिया…ये बहुत गलत किया।….

“क्या कहा?…क्या गलत है इसमें?”……

“हद हो यार!…तुम भी?…..अब इतने बड़े कवि सम्राट को चारों खाने चित्त करना है तो क्या ऐसे ‘फिस्स’…..’फिस्स’…’फचाक्क’….करके ढेर करूँगा?…..

नहीं!…अब और बे-इज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं होती मुझसे।मैँ आपके खिलाफ मानहानि का केस दायर करने जा रहा हूँ।…जी हाँ!…मानहानि का….अगर नकद गिन के पूरे सवा इक्यावन रुपए ना धरवा लिए इस हथेली पे तो मेरा भी नाम राजीव तनेजा नहीं।….वो इसलिए कि क्या आपको डाक्टर ने कहा था कि मेरे काम-धन्धे का ढिंढोरा पूरे जहाँ में पीट डालो?…अरे!….खुशी से नहीं करता हूँ इसे….काम है मेरा ये …बच्चे जो पालने हैँ लेकिन अफसोस….अब तो शायद बच्चे भी ठीक से ना पाल पाऊँ….पहले ही उधार वालों से परेशान हूँ…ऊपर से आपने जग-जहाँ को अपनी एक पोस्ट द्वारा बतला दिया कि राजीव का रैडीमेड दरवाज़े-खिड़कियों का काम है।अब तो जिसको नहीं भी बनाना होगा…वो भी सोचेगा कि चल यार!…दो कमरे एक्स्ट्रा डाल लेते हैँ….अपना क्या जाता है?…..आए-गए के काम आएँगे।…..राजीव है ना

उम्मीद है कि अब सीधा कोर्ट में ही मुलाकात होगी…..नोटिस बस पहुँचता ही होगा।…..और हाँ!….ध्यान रहे कि ‘पूरे सवा इक्यावन रुपए’ का क्लेम ठोका है आपके ऊपर…

ना एक पैसा कम…ना एक पैसा ज़्यादा।

फिलहाल इतना ही…बाकि फिर कभी

आपका शुभेच्छु,

राजीव तनेजा

कसम कनखजूरे के तिरछे कान की

***राजीव तनेजा***

“सुनो”…

“ये ‘ट्यूब’ कितने की आती है?”….

“बूत्था(चेहरा) चमकाना है कि दाँत मंजवाने हैँ?”…

“क्यों?…मेरे चौखटे को क्या हुआ है?”…

“अच्छा-भला तो है”…

“और दाँत?…दाँत देखे हैँ कभी आईने में?”…

“क्यों?…दाँतो में मेरे क्या कमी दिख गई जनाब को”….

“अच्छे भले मोतियों जैसे तो हैँ”…

“तो मैँने कब कहा कि मोती सिर्फ सफेद ही हुआ करते हैँ?”…

“तुम्हारा मतलब मेरे दाँत पीले हैँ?”….

“ऐसा मैँने कब कहा?”…

“तुम क्या मुझे घसियारिन समझते हो जो मैँ तुम्हारी इन आड़ी-तिरछी बातों का मतलब ना समझूँ?”….

“सब समझती हूँ मैँ…तुम्हारा इशारा कहीं और होता है और निशाना कहीं और”…

“तो मैँने क्या गलत कह दिया?”…

“क्या तुम्हारे दाँतों में हल्की सी ‘ऑफ व्हाईटिश’ टोन नहीं है?”…

“है”…

“तो?”…

“उससे क्या फर्क पड़ता है?”…

“फर्क क्यों नहीं पड़ता?”…

“आज ज़रा से पीले हैँ…ध्यान नहीं रखोगी तो कल को सुनहरे होंगे और फिर भूरे हो बदरंग होते देर ना लगेगी”…

“और वैसे भी बच्ची नहीं हो तुम कि तुम्हें डांट-डपट के ज़बरदस्ती वाश-बेसिन के आगे खड़ा कर ब्रश करवाया जाए”….

“अच्छा!…तो अब तुम मुझे डांटोगे?”….बीवी कमर पे हाथ रख चिल्लाती हुई बोली

“ऐसा मैँने कब कहा?”….

“कहने में कोई कसर छोड़ी भी है?”…

“अरी भागवान!….कितनी बार प्यार से समझा चुका हूँ कि दिन में कम से कम तीन दफा ब्रश किया करो लेकिन मेरे कहे का तुम पे कोई असर हो…तब तो”…

“हुँह!…तीन दफा ब्रश किया करो”…

“और तो जैसे मुझे कोई काम ही नहीं है?”…

“तुम्हारे फायदे की बात करो तो भी मुश्किल…ना करो …तो भी मुश्किल”…

“कोई ज़रूरत नहीं है मेरे फायदे की सोचने की…अपना अच्छा-बुरा मैँ खूब समझती हूँ”….

“हुँह!…बड़े आए मेरा फायदा करवाने वाले”…

“खुद तो नुकसान पे नुकसान करते रहे पूरी ज़िन्दगी”….

“अब चले हैँ दूसरों का उद्धार करने”…

“अरे!..मेरा बैड लक मुझे कामयाबी पाने से हमेशा रोकता रहे तो इसमें मैँ क्या करूँ?”…

“स्साला!…हमेशा मुझसे दो कदम आगे चलने की होड़ में रहता है”…

“कौन?”…

“मेरा बुरा वक्त…और कौन?”….

“तो क्या डाक्टर कहता है कि कभी ‘भलस्वा’ तो कभी ‘गुड़गांवा’ तो कभी ‘पानीपत’ जा के डेरा जमाओ”…

“अरी भागवान मेरे दाहिने पांव के नीचे तिल है”…

“तो?”…

“मेरे पैर में चक्कर है”…

“सब बेकार की बात है”…

“अरे नही!…इसीलिए तो मैँ एक जगह टिक के नहीं बैठ सकता”…

“लेकिन चिंता ना कर…लौट के बुद्धू घर को आ चुका है”…

“मेरा अच्छा वक्त बस अब आया ही समझो”…

“इतने साल तो हो गए देखते-देखते….पता नहीं कब आएगा”…

“अरे!…कभी ना कभी तो घूरे के दिन भी फिरते हैँ”….

“परेशान ना हो…अब देर नहीं है अच्छा समय आने में….इसीलिए तो सब पंगे छोड़ के वापिस ‘नांगलोई’…अपने अड्डे पे आ गया हूँ कि नहीं?”….

“यहाँ अपनी खुद की जगह है…ना कोई किराया और ना ही किसी और किस्म का ऊटपटांग खर्चा”…

“जो बचना है…अपने लिए…खुद के लिए बचना है”…..

“वो सब तो ठीक है लेकिन कभी-कभी मुझे ये लगता है कि तुम तो मुझे बिलकुल भी प्यार नहीं करते”…

“अरे जानू!…मैँ तो तुम्हें इतना प्यार करता हूँ…इतना प्यार करता हूँ कि बस पूछो मत”….मैँ दोनों बाहें फैला प्यार का साईज़ सा बताता हुआ बोला

“तो फिर तुम हर समय मेरी बुराई क्यों करते रहते हो?….

और तो किसी को मेरे अन्दर कोई कमी नहीं दिखती”….

“तो क्या कोई तुम्हारी तारीफ भी करता है?”…

“छत्तीस हैँ!…किस-किस का नाम बताऊँ?”बीवी पंजा फैला आँखे नचाती हुई बोली…

“फिर भी!…पता तो चले”….

“अभी परसों ही की लो…बगल वाले ‘शर्मा जी’ कह रहे थे कि….

“संजू जी!..जब-जब आप हँसती हैँ तो ऐसे लगता है कि जैसे मोती झड़ रहे हों”…

“हाँ!…कमज़ोर ही इतने हैँ कि अब झड़े..कि अब झड़े”…

“तुम तो बस ऐसे ही ऊट पटांग बकते रहा करो?”…

“बक नहीं रहा हूँ…सही कह रहा हूँ”….

“जा के समझाओ उस ‘शर्मा’ के बच्चे को कि दूसरों की बीवियों को लाईन मारना बन्द करे और अपने चश्मे का नम्बर किसी अच्छे ऑप्टीशियन से चैक करवाए”…

“स्साले!…को नए-पुराने माल में फर्क दिखाई देना बन्द हो गया है”….

“तो मैँ तुम्हें बुढिया दिखती हूँ?”…बीवी फिर कमर पे हाथ रख चिल्लाई.

“ऐसा मैँने कब कहा?”…

“कहा तो नहीं लेकिन क्या तुमने मुझे उल्लू समझ रखा है?”…

“अरे!..मैँ तो उस ‘शर्मा’ के बच्चे की बात कर रहा था कि….

स्साला ‘ठरकी’ ना हो किसी जगह का तो”…

“बुढापे में हाथ को हाथ नहीं सूझता है और ये चला है लाईन मारने”…

“हाँ!…लाईन मारता है लेकिन उसे जो कहना या करना होता है…साफ-साफ तो करता है”…

“तुम्हारी तरह नहीं कि दिल में कुछ और….दिमाग में कुछ और”…

“क्यों?…मैँने क्या गलत कह दिया…या…कर दिया?”…

“रहने दो…रहने दो…सुबह-सुबह मेरी ज़ुबान खुलवा क्यों अपनी मिट्टी पलीद करवाते हो?”…

“नहीं!…जब इतनी खुल ही गई है तो बाकि की कसर भी क्यों छोड़ती हो?”…

“निकाल लो अपने दिल की भड़ास और बक डालो आज वो सब..जो तुम्हारे दिल में है”…

“वो जो उस दिन पार्टी में भविष्य बांचने के नाम पे तुम मेरी सहेली ‘शिप्रा’ के हाथ को बार-बार सहला रहे थे…वो क्या  था?”…

“तो यूँ कहो ना कि तुम्हें जलन हो रही है”…

“हुँह!…जले मेरी जूती”…

“अरे मेरी माँ!…मैँ तो बस ऐसे ही…ज़रा सा मज़ाक करने के मूड में था”….

“हाँ-हाँ!…अब तो मैँ तुम्हें माँ ही दिखूँगी….वो कमीनी जो मिल गई है”…

“मेरी ही गल्ती है जो मैँने उस करमजली को तुमसे इंट्रोड्यूस करवाया”….

“सब मेरी ही गल्ती है”…

“लेकिन उस कलमुँही को तो सोचना चाहिए था कि डायन भी हमला करने से पहले आजू-बाजू के सात घर छोड़ देती है”.

“अरे यार!…तुम तो बुरा मान गई”….

“मैँ तो बस ऐसे मज़ाक-मज़ाक में ट्राई कर के देख रहा था कि सैट-वैट भी होती है कि नहीं”….

“तुमने उसको सैट करके आम लेने हैँ?”….

“अरे यार!…तुम्हारे मुँह से ही तो कई बार उसकी तारीफ सुनी थी”….

“तो?”….

“तो यही चैक कर रहा था कि बात सच में सच्ची है या फिर तुम ऐसे ही हवाई फॉयर कर रही थी”…

“कोई ज़रूरत नहीं है मेरी किसी भी सहेली के फाल्तू मुँह लगने की”….

“मैँ?…और तुम्हारी इन पान-गुटखा चबाती सहेलियों के मुँह लगूँ?”…

“सवाल ही नहीं पैदा होता”…

“तो फिर वो उस से चिपक-चिपक जो बातें कर रहे थे…वो क्या था?”….

“अरे!…सिर्फ बात ही तो कर रहा था”….

“कौन सा उसे ब्याह के घर ला रहा था?”…

“ला के तो देखो…टाँगे ना तोड़ दूंगी उसकी”…

“अरे!…ज़रा सा फ्लर्ट क्या कर लिया?….तुम तो बुरा मान के बैठ गई”…

“मालुम है मुझे!…इस उम्र में ‘निकाह’ या ‘ब्याह’ नहीं बल्कि सिर्फ फ्लर्ट ही हुआ करते हैँ”…

“गलत!….बिलकुल गलत”…

“ये तुमसे किस गधे ने कह दिया”…

“क्यों?….कहना या सुनना किससे है?….मुझे खुद पता है”…

“कितनी बार समझा चुका हूँ कि रोज़ाना सुबह अखबार पढने की आदत डालो”….

“इससे दीन-दुनिया में क्या चल रहा है…इसका पता रहता है”…

“लग गए ना फिर मेरी नुक्ताचीनी करने?”…

“अच्छा!…चलो बताओ क्या चल रहा है तुम्हारी इस दीन-दुनिया में?”…

“अभी कुछ दिन पहले की ही तो खबर है कि काठमांडू की जेल में बन्द चौसंठ साल के चार्ल्स शोभराज ने इसी दशहरे को अपनी बीस वर्षीय प्रेमिका से ब्याह रचाया है”…

“इसमें क्या है?…फिरंगी आदमी है…जब चाहे…जहाँ चाहे ब्याह कर अपनी ठरक ठण्डी करता फिरे”…

“हाँ!…चाहे तो ब्याह ना भी करे”….

“लेकिन उसकी देखादेखी हर कोई बेहय्याई पे उतर आए…ऐसा भी तो ठीक नहीं”…

“ओ.के…ओ.के मैडम जी”…

“तुम सही…मैँ गलत”…

“मैँ कभी गलत भी हुई हूँ?”…

“ना!…कभी नहीं”….

हाँ!…अब बताओ…कौन सी ट्यूब के दाम पूछ रही थी तुम?”…

पैप्सोडैंट या फिर बोरोलीन?”….

“वो वाली नहीं रे बाबा”…

“तो फिर?”…

“अरे!..वो..जिस से चमचम चमकती हुई रौशनी पैदा होती है”…

“तो ऐसे बोलो ना”…

“बताओ!…किसका दाम बताऊँ?”…

“‘फिलिप्स’….‘सिलवैनिया’ या फिर ‘राम-लक्ष्मण’?”….

“राम-लक्ष्मण…माने?”..

“अरे!…‘राम-लक्ष्मण’ याने के ‘लक्सराम’“…

“ओह!…अच्छा”….

“कोई भी हो…क्या फर्क पड़ता है?”….

“तुम बस दाम बताओ”…

“क्यों?..खराब हो गई क्या?”….

“अभी दस-बारह दिन पहले ही तो बदलवाई ‘बिजली पहलवान’ से”…

बिजली पहलवान?”….

“लेकिन वो तो नाटा सा…सींकिया सा…मरियल सा है”….

“वो क्या खाक पहलवानी करेगा?”…

“अरे!..बदन पे ना जाओ उसके”…

“डील-डौल ना हुए तो क्या?…गज़ब की…चीते सी फुर्ती है पट्ठे में”…

“आज भी याद है मुझे…वो तपती दोपहरी में…सावन का…बिना बारिश वाला महीना….जब धूल भरी आँधी चल रही थी…ऐसे में उस ‘चने-मुरमुरे’ बेचने वाले ‘पलटूद्दीन’ ने बीचोंबीच सड़क के कीचड़ और गोबर से लथपथ हो अपने से दुगने वज़न के ‘रामनिवास’ को गज़ब की पलटी मारते हुए चारों खाने चित्त किया था”…

रामनिवास को तो मैँ जानती हूँ लेकिन ये ‘पलटूद्दीन’ कौन?”…

“अरे!..इसी ‘पलटूद्दीन’ को तो अब सारा मोहल्ला ‘बिजली पहलवान’ के नाम से पुकारता है”…

“ओह!…लेकिन वो तो ‘चने-मुरमुरे’ बेचता था ना?”…

“अरे!…जब नाम ‘बिजली पहलवान’ रखा गया तो काम भी बदल लिया”….

“दर असल !…बचपन में कई बार बिजली चोरी के चक्कर में  खंबे पे चढ खूंटी फँसाते-फँसाते वो खुद भी बिजली के झटके खाने का आदि हो चुका था”…

“तो?”….

“तो क्या?…..इससे बेहतर और भला क्या काम रहता उसके लिए?”….

“एक मिनट!…इसे तो शायद मैँ भी जानती हूँ”….

“कैसे?”….

“एक मिनट!…सोचने दो”….

“हाँ!…याद आया”…

“तुम्हारे इस ‘पलटूदीन’ का असली नाम ‘देवी प्रसाद’ है”…

“तुम्हें कैसे पता?”…

“अरे वो बगल वाले ‘चुन्नू’ की मौसी बता रही थी कि उनके मोहल्ले में एक रिक्शेवाला हुआ करता था ‘देवी प्रसाद’ नाम का”…

“तो?”….

“उसे ढंग से रिक्शा चलाना आता नहीं था…..इसलिए बार-बार पलट जाता था”….

“बस!…लोगों ने उसका मज़ाक उड़ा उसे ‘पलटू राम’ कहना शुरू कर दिया”…

“तुम्हें गल्ती लगी है..वो कोई और होगा”….

“ये ‘पलटू राम’ नहीं बल्कि ‘पलटूद्दीन’ है और हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लमान है”…

“नहीं!…ये हिन्दू है”….

“तुम्हें इतना यकीन कैसे है?”..  

“मैँ गारैंटी से कह सकती हूँ”…

“कैसे?”….

“अरे कैसे क्या?..जब-जब इसका रिक्शा पलटता होगा तब इसका चेहरा दुखी हो दीन रूप धारण कर लेता होगा”… सो!…लोगों ने पलटू के साथ दीन और जोड़ इसे ‘पलटूराम’ से ‘पलटूदीन’ बना दिया”….

“ओह!..काफी इंटरैस्टिंग कहानी है”….

“अरे!…अभी तुमने पूरी कहानी सुनी ही कहाँ है?”…

“इसके बारे में तो मौसी और भी कहानी सुना रहे थी”….

“वो क्या?”…

“यही कि बचपन में कोई इसे आर्य समाज मन्दिर की सीढियों पर रोता-बिलखता छोड़ गया था”…

“ओह!…

“व्यवस्थापकों को दया आ गई और उन्होंने इसे वहीं रख लिया”…

“गुड!…वैरी गुड”…

“लेकिन इसका मन किसी एक जगह ना लगा”…

“कभी इस मन्दिर तो कभी उस मन्दिर में अपना डेरा जमाता रहा”…

“रंग काला होने की वजह से लोगों ने ‘कलुआ’ कह पुकारना शुरू किया”…

“कलुआ!….वाह क्या नाम है”….

“लेकिन इसका नाम तो ‘देवी प्रसाद’ है ना?”…

“पता नहीं लोगों ने  कितने नाम बदले इसके?”…

“कोई इसे ‘कल्लू’ ..तो कोई इसे ‘कल्लन’ तो कोई इसे ‘कालिया’ कह के पुकारता था”

“लेकिन ये ‘देवीप्रसाद’ नाम इसे कैसे मिला?”…

“सुना है!…मन्दिर वगैरा जागरण के वक्त इसके अन्दर ‘देवी’ प्रगट हुआ करती थी और ये ऐसा तांडव करता था कि पूछो मत”..

“ओह!…इसी लिए लोग इसे ‘देवी प्रसाद’ कहने लग गए होंगे”…

“नहीं!…पुकारते तो सब इसे ‘देवी’‘देवी’ ही करके थे”…

“फिर ये ‘प्रसाद’ नाम का टाईटल इसके साथ कैसे जुड़ गया?”….

“एक दो बार मन्दिरों में ये दूसरे भिखारियों का प्रसाद चुराते हुए पकड़ा गया तो सब इसे ‘देवी प्रसाद’ कहने लग गए”…
“वाकयी काफी रोचक कहानी है”….

“लेकिन तुम्हारा तो ये लंगोटिया यार है ना?”…

“हाँ!…है तो?”…

“तुम्हें इसने कभी अपनी कहानी नहीं बताई?”…

“अरे!…कुछ बातें ऐसी होती हैँ जिनका पर्दे में रहना ही अच्छा होता है”…

“हाँ!…ये तो है”…

“खैर छोड़ो…हमें क्या?”…

“तुम बताओ!…कब खराब हुई?”…

“क्या?”…

“ट्यूब…और क्या?”…

“अरे नहीं!…खराब कहाँ?”….

“अपनी तो सभी ट्यूबें एकदम भली-चंगी चकाचक है”.

“तो फिर ऐसे ही बेकार में मोल-भाव पूछ के मेरे दिमाग का दही क्यों कर रही थी?”…

“ऐसे ही”…

“ऐसे ही?…मतलब?”…

“कोई तो वजह होगी”…

“अरे यार!…नॉलेज के लिए पूछ रही थी”…

“तुम कभी घर पे ना हुए तो”…

“पता तो होना चाहिए कम से कम”..

“कभी ऐसा हुआ है कि मैँ तुम्हारे बिना घर से कहीं बाहर गया हूँ?”…

“अच्छा छोड़ो!…और ये बताओ कि ये ‘चोक’ वगैरा कितने की आती होगी?”…

“हुण्ण ‘चोक’ नूँ केहड़ी गोली वज्ज गई?”…

“होना क्या है?…कुछ भी तो नहीं”…

“तो फिर?”….

“व्वो…दरअसल…

“क्या हुआ?”…

“तुम्हारी ज़बान लड़खड़ा के ‘चोक’ क्यूँ होने लगी?”….

“अरे नहीं बाबा!…मैँ तो बस ऐसे ही…

“नॉलेज के लिए ही पूछ रही थी ना तुम?”…

“हाँ”…

“सच-सच बताओ कि चक्कर क्या है?’…

“आज तुम कभी ‘ट्यूब’ पे ..तो कभी ‘चोक’ पे क्यूँ फिदा हुए जा रही हो?”..

“वो दरअसल क्या है कि..आज के अखबार में इश्तेहार आया है कि…घर बैठे ‘चोक-ट्यूब’ उद्योग लगाओ और मनचाहे पैसे कमाओ”…

“तो तुम भी लाखों कमाने की सोचने लगी?”…

“मैँ क्या?..अपने मोहल्ले की ‘पिंकी’…..‘प्रीति’ और ‘प्रिया’ समेत ‘सुनीता’ भी यही सोच रही है”….

“व्हाट ए जोक?”…

“तो इसमें बुरा ही क्या है?”…

“तुम?…और फैक्ट्री?”…

“ही….ही….ही….

“तुम औरतें लगाओगी ये ‘ट्यूब-श्यूब’ का कारखाना?”…

“क्यों?…हैरत क्यों हो रही है तुम्हें?”…

“हम क्यों नहीं लगा सकती?”…

“अरे मेरी जान!…ये कोई ‘भिण्डी’….‘तोरई’ या ‘करेले’  की तरकारी नहीं है कि बस काट-कूट के तड़का लगाया और हो गया काम-तमाम”….

“तो?”….

“जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है इसके लिए”…

“तो मेहनत करने से डरता ही कौन है?”…

“समझा कर!….कई तरह के चाहे-अनचाहे पंगों के दौर से गुज़रना पड़ता है”..

“मैँ सब मैनेज कर लूंगी”….

“ना…तुम्हारे बस का नहीं होगा ये सब”…

“एक्चुअली!..उनका तो मुझे कोई खास पता नहीं लेकिन तुम इस तरह के कामों के लिए बनी ही नहीं हो”..

“प्लीज़ यार!….

“अब इसमें ‘प्लीज़ यार’ क्या करेगा?”…

“कह तो दिया ना एक बार कि तुम एक औरत हो और औरत होने के नाते तुम किसी भी कीमत पर ये काम नहीं कर सकती”…

“तो क्या किसी ‘कठमुल्ला’ ने फतवा जारी किया हुआ है इस सब के खिलाफ?”…

“अरे नहीं बाबा!…. ना ही किसी मन्दिर के ‘पंडे’ ने और ना ही किसी मस्जिद के ‘मौलवी’ ने फिलहाल औरतों के काम करने पे ऐतराज़ किया है”…

“तो फिर किसी प्रकार की कोई रोक…बैन या पाबंदी लगाई हुई है अपनी सरकार ने कि औरते इस तरह के काम नहीं कर सकती?”…

“नहीं!…ऐसी तो कोई बात नहीं है”..

“‘सोनिया जी’ तो वैसे भी औरतो की हिमायती है”…

“उनकी सरकार ने क्या रोकना है?”…

“उल्टा सरकार तो आगामी बजट में औरतों को ‘एक्साईज़’ और ‘सेल्स टैक्स’ वगैरा से भी छूट देने की भी योजना बना रही है”….

“वाऊ!…दैट्स नाईस”….

“लेकिन…

“लेकिन क्या?”…

“कभी किसी औरत को ऐसे ‘ट्यूब’‘अगरबत्ती‘ या ‘चोक’ जैसे काम करते नहीं देखा है ना”…

“इसलिए थोड़ा ऑकवर्ड सा फील हो रहा है”…

“हाँ-हाँ!…तुम मर्दों को तो हम औरतो का आगे बढ कामयाबी हासिल करना अजीब ही लगेगा”…

“नहीं यार!…तुम तो जानती ही हो कि मैँ औरतों का कितना बड़ा हितैशी हूँ”…

“छोटी…नन्ही बच्चियों से लेकर….कमसिन बालाओं तक और…. ‘अधेड़’ उम्र की महिलायों से लेकर उम्रदराज़  स्त्रियों तक ..मैँने कभी किसी को छोटा या ओछा नहीं समझा”…

“ऐक्चुअली!…जवानी के दिनों में सभी की मेरे साथ दोस्ती रह चुकी है”…

“ओह!..दैट्स नाईस….बहुत बढिया”…

“लेकिन फिर तुम मुझे काम करने से रोकना क्यों चाहते हो?”…

“अरे यार!…फैक्ट्री वगैरा चलाने में सौ लफड़े होते हैँ…कभी पार्टियों से निबटो तो कभी स्टाफ से…कभी बिजली की चोरी करो तो कभी एक्साईज़ वालों की जेब गर्म करो”….

“और ऊपर से ये लेबर वाले इतने मुँहफट होते हैँ कि पूछो मत”…

“अरे!..तुम नहीं जानते…शादी से पहले मैँ अपने इलाके की सबसे बड़ी मुँहफट रह चुकी हूँ”…

“ओह!…रियली?”…

“और नहीं तो क्या”….

“दैट्स नाईस”….

“तीन बार तो मैँ कालेज में सैकेंड रनर अप भी रह चुकी हूँ”….

मुँहफट होने में?”…

“नहीं!…बैस्ट वक्ता होने में”…

“गुड!…वैरी गुड”…

“लेकिन….

“अरे!…मेरी तरफ से तुम बेफिक्र और बेचिंत हो जाओ…जब कभी भी लेबर वालों ने मेरे साथ गलत तरीके से पेश आना है…मैँने उन्हें ऐसे-ऐसे सीधे और पुट्ठे …सभी तरह के श्लोक सुनाने हैँ कि उनसे ना कुछ कहते बनेगा…और ना ही कुछ करते बनेगा”..

“लेकिन पहले कभी किसी औरत को ऐसे दो टके के लोगों के साथ  मगजमारी करते नहीं देखा है ना”…

“पहले तो कभी किसी ने औरत को अंतरिक्ष में जाते भी नहीं देखा था”…

“आज औरत रिक्षा चलाने जैसे छोटे-मोटे काम से लेकर शिक्षा देने जैसे दिमाग वाले काम में और भिक्षा मांगने जैसे घटिया काम में सबसे अव्वल है”….

“अरे वाह!…‘रिक्षा,शिक्षा और भिक्षा की तुमने क्या तुक मिलाई है”…

“तुम्हें तो सिम्पल हाउस वाईफ नहीं बल्कि एक कामयाब लेखिका होना चाहिए”…

“रहने दो…रहने दो…ये मस्काबाज़ी बन्द करो और सीधे-सीधे ये बताओ कि तुम मुझे अपना पर्सनल काम करने दोगे या नहीं?”…

“अरे यार!…समझा करो”…

“क्या समझूँ मैँ? कि जहाँ आज एक तरफ आम भारतीय नारी ‘बस-ट्राम’ से लेकर ‘लोकोमोटिव’ तक सब चला रही है  और दूसरी तरफ मैँ हूँ कि घर में वेल्ली बैठ-बैठ अपना वजूद ही खोती जा रही हूँ”…

“अरे यार!…क्यों बात का बतंगड़ बनाने पे तुली हो?”..

“आज की नारी कहाँ से कहाँ पहुँच गई है और तुम चाहते हो कि मैँ कुँए की मेंढकी बन…जिसमें हूँ…उसी में संतोष कर लूँ?”….

“सच!…आज की नारी कहाँ से कहाँ पहुँच गई है”…

“साड़ी…सूटृ और दुपट्टा छोड़….जींस…कैपरी के रस्ते मिनी स्कर्ट तक जा पहुँची है”…

“तो अब तुम्हें हमारे पहनावे से भी दिक्कत होने लगी?”…

“अरे!…ये सब तो हम अपने लिए थोड़े ही पहनती हैँ…ये तो तुम मर्दों को लुभाने के लिए”…

“वोही तो….इतनी देर से मैँ यही तो समझाना चाह रहा हूँ मेरी जान ..कि कोई ऐसा काम करो जिसमें मर्दों को लुभा उनसे अच्छा खासा पैसा ऐंठा जा सके”

“सलाह तो तुम्हारी मुझे नेक लग रही है लेकिन…..

“एक अकेली अबला नारी…कैसे करे इतनी  मगजमारी?”…

“अरे!…मैँ हूँ ना”….

“मेरे होते हुए अकेली कहाँ हो तुम?”..

“सच?”…

“मुच”…

“मैँने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे ऊँचा…और ऊँचा उठने के ख्वाबों को पूरा करने में तुम मेरा साथ दोगे”…

“अरे!..तुम बस हिम्मत तो करो…फिर देखती जाओ…मैँ क्या कमाल दिखाता हूँ”…

“देख लो!…बीच मंझधार में मेरा साथ ना छोड़ देना”…

“अरे!…मैँ कोई गैर नहीं बल्कि तुम्हारा पति हूँ”…

“इस नाते मैँ तुम्हारा साथ नहीं दूंगा तो क्या उस कलमुँही ‘शिप्रा’ का दूंगा?”….

“हा…हा…हा”….

“नाम मत लो उस चुड़ैल का”….

“और तुम तो वैसे भी कमाने की बात कर रही हो…

“हाँ!…अगर गवाने की बात होती तो मैँ सोचता भी”…

“एक बात बताऊँ?”…

“क्या?”…

“अपनी शादी के वक्त…फेरे शुरू होने से पहले ही मैँने सदा तुम्हारा साथ देने का वचन ले लिया था”…

“ओह रियली?”….

“तुम कितने अच्छे हो”…

“लेकिन एक बात मेरे पल्ले अभी तक नहीं पड़ रही”….

“क्या?”….

“यही कि तुम जैसी माड्रन और बिन्दास लड़की को उन गँवारनों के साथ मिलकर ये ट्यूब या चोक जैसा घटिया काम करने की क्या सूझी?”..

“अरे!..ये सब तो मैँ तुम्हारा मन टटोलने के लिए कह रही थी और यही काम वो सब भी अपने-अपने पतियों के साथ कर रही हैँ”…

“क्या?”….

“दरअसल हमारे दिमाग की फैक्ट्री में नोट कमाने के ऐसे-ऐसे धांसू आईडिए घूम रहे हैँ कि बस पूछो मत”…

“कमाई इतनी होनी है कि गिनने की फुरसत नहीं मिलनी है”…

“अरे वाह!…फिर तो मज़े आ जाएँगे”..

“और नहीं तो क्या”….

“तो फिर क्या सोचा है तुमने?”….

“किस बारे में?”….

“यही कि कौन सा काम करना है?”…

“फिलहाल नहीं बता सकती”…..

“क्यों?”…

“इट्स ए टॉप सीक्रेट”…

“लेकिन…

“समझा करो यार!…सहेलियाँ बुरा मान जाएँगी”….

“कसम है तुम्हें ओस में डूबी छतरी के नीचे बैठे कनखजूरे के तिरछे कान की जो तुमने मुझे सब कुछ सच-सच ना बताया”…

“इटस नॉट फेयर राजीव”…

“मैँ तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ और अपनी बीवी को भला कोई इस तरह इमोशनली ब्लैक मेल करता है?”…

“तो इसका मतलब तुम नहीं बताओगी?”…

“ओ.के!…ओ.के बाबा…बताती हूँ लेकिन पहले तुम ये वादा करो कि तुम इस राज़ को राज़ ही रखोगे और किसी से कुछ नहीं कहोगे”…

“ओ.के”…

“कसम है तुम्हें भी झमाझम बारिश में पनघट पे भीगती पनिहारिन के उड़ते आँचल की जो तुमने इस बाबत किसी से एक शब्द भी कहा”…

“हाँ!…नहीं कहूँगा”…

“ऐसे नहीं!…कसम खाओ”…

“ओ.के….मैँ कसम खाता हूँ ‘आन’…’बान’ और ‘शान’ से जलते मुर्दों से भरे शमशान की कि ये राज़…ताज़िन्दगी राज़ ही रहेगा और मेरी मौत के बाद मेरी लाश के साथ ही स्वाहा हो जाएगा”…

“ओ.के”…

“तो फिर क्या सोचा है तुमने?”…

“अरे!…सोचने-वोचने का टाईम तो कब का निकल गया गया”…

“हम तो अपना जॉय़ंट वैंचर शुरू भी कर चुकी हैँ”….

“मतलब?”…

“मतलब यही कि अपना धन्धा तो मस्त चाल से दौड़ना भी शुरू हो चुका है”…

“कौन सा धन्धा?”…

“हम सहेलियों ने मिलकर फ्रैण्डशिप क्लब FriendshipClub खोला है”….

“ओह!….गुड…वैरी गुड”….

“तुमने तो मेरे मुँह की बात छीन ली”…

“वैसे…किस नाम से खोला है तुमने अपना ये क्लब?”…

“मस्ती फ्रैण्डशिप क्लब” के नाम से

“और टैग लाईन क्या रखी है?”….

“हमने ‘टैग लाईन’ रखी है…‘मस्ती वही जो मिले सस्ती”

“धत…तेरे की”…

“सस्ती?”….

“हुँह!…फिर क्या फायदा?”…

“अरे!…सिर्फ टैग लाईन है ये…लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए”…

“असल में तो हमने खाल उतार लेनी है अपने मैम्बरों की”…

“ओह!…मगर कैसे?”…

“पहले तो जिस किसी भी बकरे का फोन आता है…उससे से हम ऐसी-ऐसी नशीली बातें करती हैँ कि वो तुरंत हमारे क्लब का मैम्बर बनने को उतावला हो उठता है”…

“गुड!…वैरी गुड”…

“उसके बाद?”…

“उसके बाद हम उससे मैम्बर बनाने के नाम पर 501/- का शगुन अपने बैंक एकाउंट में डलवाती हैँ और उसके बदले में उसे तीन लड़कियों के फोन नम्बर देने का वायदा करती हैँ जिनसे वो मनचाही बातें कर सके”…

“देखो!..किसी का भी ऐसे-वैसे नम्बर देने से कहीं फँस-फँसा ना जाना”….

“अरे!..पागल समझ रखा है क्या हमें?”…

“हम किसी और का नहीं बल्कि अपने ही नम्बर बारी-बारी से अपने कस्टमर्ज़ को देती हैँ”….

“गुड!…वैरी गुड”…

“लेकिन बैंक खाते से भी तो तुम लोग पकड़ में आ सकते हो”…

“बिलकुल नहीं”…

“बैंक एकाउंट भी हमने बोगस आई.डी से खुलवाया हुआ है और पैसे निकालने के लिए हम बैंक नहीं जाएँगी बल्कि हर बार अलह-अलग ए.टी.एम कार्ड इस्तेमाल करेंगी”..

“एकचुअली!..आज सुनीता गई हुई है वो शास्त्री नगर वाले ‘ए.टी.एम’ से पैसे निकालने”…

“कुछ भी करो लेकिन अपना ध्यान रखना क्योंकि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैँ”…

“चिंता क्यों करते हो?”…

“हम अपने खिलाफ कोई सबूत नहीं छोड़ रही हैँ”….

“गुड!…लेकिन लोगों तक तुम्हारे फोन नम्बर कैसे पहुँचते हैँ?”…

“अरे!….तुम तो जानते ही हो कि प्रीति …’छत्तीसगढ’ से ब्याह के यहाँ आई है और प्रिया…’आसनसोल’ से और पिंकी….’राजस्थान’ से तो सुनीता….‘बहालगढ’ से

और तुम ‘धनबाद’ से”…

“हाँ”…

“तो इस से क्या फर्क पड़ता है”…हम अखण्ड भारत के नागरिक हैँ और पूरा भारत हमारा है”….

“कोई भी कहीं से आ के कहीं भी बस सकता है”…

“सिर्फ ‘कश्मीर’ को छोड़ के”…

“हाँ”…

लेकिन इस से फर्क क्या पड़ता है?”…

“अरे!….इन गर्मी की छुट्टियों में हम सभी अपने-अपने मायके गई थी के नहीं?”…

“तो?”…

“वहाँ से हम सभी ने वहाँ के लोकल अखबारों में मित्रता सबँधी विज्ञापन छपवाए”…

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“ओह!…लेकिन एक बार विज्ञापन देने से क्या होगा?”….

“ऐसे विज्ञापन तो लगातार छाए रहने चाहिए अखबारों के भीतरी पन्नों पर”…

“चिंता ना करो!….हम पूरे साल की पेमेंट एडवांस में ही दे आए हैँ”…

“अब वहाँ हमारे होने…ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा”…

“नियत तिथियों को अपने आप हमारे विज्ञापन छपते रहेंगे”….

“वाउ!…दैट्स नाईस”….

“अब अपने लगातार फोन घनघनाते रहेंगे…कभी ‘सतना’ से …तो कभी ‘पटना’ से”…बीवी कमर मटकाती हुई बोली

“लेकिन फोन नम्बर से तो पकड़े जाने का डर है”….

“अरे इतनी पागल भी नहीं हैँ हम कि अपनी असली पहचान देकर फोन कनैक्शन लें”…

“तो?”…

“अरे!…वो सुनीता जो है उसने कुछ दिन के लिए एक मोबाईल की दुकान में काम किया था”….

“तो?”….

“बस वहीं से उसने कुछ लोगों की फोटो उड़ाई और उन्हीं के जरिए हमने फोन खरीद लिए”…

“लेकिन सिर्फ फोटो से क्या होता है?”….

आई डी भी तो चाहिए होती है”….

“वो कौन सा मुश्किल काम है?”…

“उस मास्टर के बच्चे को फोटॉ थमाए और फी ‘आई डी’ के दो सौ रुपए दिए और हफ्ते भर में ही हमारे पास नकली वोटर कार्ड थे”…

“ग्रेट”…

“लेकिन तुम्हें ध्यान कैसे रहता है कि तुम्हारे क्लब का कौन मैम्बर है और कौन मैम्बर नहीं?”…

“मतलब?”…

“ये भी तो हो सकता है कि कोई एक आदमी मैम्बर बन के तुमसे लड़कियों के नम्बर ले ले और बाद में उन नम्बरों को पूरी दुनिया में बांट दे”…

“अरे!…हम तो पूरी दुनिया को चलाने चली हैँ…कोई दूसरा हमें क्या चलाएगा?”…

“मतलब?”…

“जो भी हमारा मैम्बर बनता है उसके मोबाईल नम्बर को रजिस्टर कर लेती हैँ और साथ ही ग्राहक को साफ-साफ बता दिया जाता है कि अगर वो इसी नम्बर से बात करेगा तभी लड़कियाँ..बात करेंगी वर्ना नहीं”…

“गुड…वैरी गुड”…

“तारीफ करनी पड़ेगी तुम्हारी कि क्या नायाब तरीका निकाला है”…..

“करो…करो…जी भर तारीफ करो”….

“मैँ चीज़ ही ऐसी हूँ”…

“लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही कि आखिर ये मैम्बर लोग बातें ही क्या करते होंगे?”….

“यकीनन…साफ सुथरी और अच्छी बातें तो नहीं करते होंगे”…

“बिलकुल”….

“अगर साफ-सुथरी और अच्छी बातें ही करनी हैँ तो भला इसके लिए कोई नोट क्यों फूंकेगा?”…

“ये बात भी है”…

“तुम्हारा मन मान जाता है हर किसी से ऐसी बातें करने के लिए?”…

“सच कहूँ तो खुद से ही घिन्न आने लगती है जब किसी पराए मर्द की अश्लील और गंदी बातें इन कानों में पड़ती हैँ लेकिन क्या करूँ धन्धा है ये हमारा और इसमें पैसे ही इतना है कि शर्म-वर्म सबको भूल जाना पड़ता है”…

“बात तो तुम ठीक ही कह रही हो और वैसे भी बड़े-बुज़ुर्ग कह गए हैँ कि जिसने की शर्म…उसके फूटे कर्म”

“बिलकुल”…

“एक और कंफ्यूज़न दिमाग के भंवर में गोते लगा रहा है…तुम कहो तो बताऊँ?”…

“इसमें शर्माना कैसा?”…जो पूछना है…बेधड़क हो के पूछो”…

“क्या तुम्हारे क्लब के मैम्बरों का मन सिर्फ फोन पे बातें कर के भर जाता होगा?”..

“मतलब?”…

“मतलब कि उनका मन मिलने को नहीं करता होगा?”…

“भय्यी!…अगर उनकी जगह मैँ होता तो दूसरी बार में ही मुलाकात की ज़िद पकड़ लेता”…

“मन क्यों नहीं करता है?….ज़रूर करता है”…

“आखिर वो भी जीते-जागते इनसान हैँ और इस नाते उनका मन तो बहुत कुछ करने को करना चाहिए”..

“वोही तो”….

“तो ऐसी सिचुएशन को आप लोग कैसे हैण्डिल करती हो?”…

“क्या सचमुच…..

“ए मिस्टर!…क्या समझ रखा है तुमने हमें”…

“हम सभी अच्छे और खानदानी घरों से आई हैँ और इस नाते हमारे माँ-बाप ने हमें ऐसे घटिया संस्कार नहीं दिए हैँ “…

“छी!…छी…कितनी घटिया और ओछी बात कह दी तुमने अपनी पत्नी के लिए…छी…”…

“राजीव!…मैँ तो तुम्हें अच्छा-खासा  ब्रॉड माईंडेड इनसान समझती थी”…

“मैँने तुम्हें क्या समझा और तुम क्या निकले?”…

“सॉरी डॉर्लिंग!…मेरी बातों से तुम्हें चोट पहुँची…मगर मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था”…

“मैँ तो बस ऐसे ही नॉलेज के लिए पूछ रहा था”…

“रहने दो…रहने दो…जानती हूँ कि तुम बात बदलने में कितने माहिर हो”…

“प्लीज़ यार!…ऐसी भी क्या नाराज़गी?”…

“मान भी जाओ”…

“ओ.के बाबा!…नहीं बताना है तो मत बताओ”…

“नहीं!…अब जब तुमने पूछ ही लिया है तो ज़रूर बताऊँगी”…

“दर असल जब कोई हम से मिलने की ज़्यादा ही ज़िद करता है तो हम उसे Rs.10,000/- से Rs.12,000/-तक और हमारे खाते में डालने के लिए राज़ी कर लेती हैँ”…

“वैरी क्लैवर”….

“कुछ एक तो और पैसे के नाम से ही बिदक लेते हैँ लेकिन कुछ एक रईसज़ादे ऐसे भी दिलदार होते हैँ कि तुरंत पैसा जमा कर देते हैँ हमारे एकाउंट में”…

“गुड…वैरी गुड”…

“उसके बाद?”…

“उसके बाद क्या?”…

“उसके बाद तो उसका नम्बर हमारे मोबाईलों से डिलीट हो चुका होता है और हम पराए मर्दों के फोन तो कभी भूल कर भी नहीं उठाती हैँ”…

“हा…हा…हा”…

“लेकिन तुम्हारा तो सिर्फ पाँच लड़कियों का ग्रुप है जबकि मर्दों की चॉयस तो बेहिसाब होती है”…

“मतलब?”…

“मतलब किसी का गाँव की ‘ग्वालन’ से बात करने का मन करता होगा तो किसी का शहर की एकदम ‘मॉड कन्या’ से”….

“हाँ!…किसी को ‘ठेठ पंजाबन’ चाहिए होती है तो किसी को ‘अल्हड़ बिहारिन’…किसी को ‘तेज़तर्रार बंगालन’ चाहिए होती है तो किसी को ‘मस्तमौली मराठन”

“कोई ‘हिन्दू’ लड़की की डिमांड करता होगा तो कोई ‘क्रिशचियन’ की इच्छा भी जाहिर करता होगा”…

“कोई कोई तो ‘मुस्लिम’ लड़की की भी माँग करने लगते हैँ”….

“तो इस सब को तुम कैसे मैनेज करती होगी?”…

“अरे!…बहुत आसान है….जिस की जैसी डिमांड आती है…उसी हिसाब से उसके मोबाईल नम्बर को सेव कर लिया जाता है”…

“मैँ समझा नहीं”…

“अरे यार!…सिम्पल सी बात पता नहीं तुम्हारे भेजे में क्यों नहीं घुस रही?”…

“अगर किसी को ‘पंजाबन’ लड़की से बात करनी होती है तो हम उसका नम्बर ‘रज्जो’...‘जस्सी’ वगैरा के नाम से सेव कर लेती हैँ ..और जिसका दिल ‘क्रिशचियन’ लड़की पे आया होता है तो हम उसका नम्बर ‘जूली’ या फिर ‘सूज़ी’ वगैरा के नाम से सेव कर लेती हैँ”…

“गुड!…वैरी गुड”…

“इससे हमें याद रहता है कि किससे क्या बन के बात करनी है लेकिन इस चक्कर में हम अपने असली नाम भी भूलने लगी हैँ”…

“वो भला क्यों?”…

“अरे!…एक ही दिन में हमें अपने नाम बीसियों बार बदलने पड़ते है…कभी किसी से ‘सूज़ी’ बन इंगलिश झाड़नी पड़ती है तो…अगले ही मिनट हमें ‘विमलादेवी’ बन किसी से‘अवधी’ और भोजपुरी’ में बात कर उसे राज़ी कर रही होती हैँ”…

“ओह!…

“कई बार तो बड़ी ही फन्नी सिचुएशन पैदा हो जाती है”…

“वो भला कैसे?”…

“अरे!…जिससे हमें अँग्रेज़ी में बात करनी होती है उसके सामने हम असी-तुसी कर पंजाबी मार रही होती हैँ और जिसके सामने हमें ‘हमार…तुम्हार…आवत…जावत’ करना होता है…उस निपट गँवार के आगे हम ‘Hi Buddy….Looking Gr8′ कह अँग्रेज़ी झाड़ रही होती हैँ”…

“ओह!…

“चिंता ना करो…कुछ दिन में ही हम इस सब की हैबिचुअल हो जाएँगी…फिर हमें कोई दिक्कत नहीं होगी”…

“बस!…फिर पैसा ही पैसा बरसना है”…

“गुड!…इसे कहते हैँ जज़्बा”…

“अगर दिमाग तेज़ हो और इरादे नेक व मज़बूत हों तो कोई मंज़िल दूर नहीं रहती”…

“जी!…बिलकुल”…

“दाद देनी पड़ेगी तुम्हारी और तुम्हारी सहेलियों की जिन्होंने इतनी शानदार और जानदार स्कीम सोची पैसा बनाने की”…

“टट्टू!…सारा दिमाग मैँने लगाया और तुम मेरे साथ उनकी भी तारीफ कर रहे हो”…

“वो सब तो मेरी उँगलियों पे नाचने वाली महज़ कठपुतलियाँ हैँ”…

“जिस तरफ उँगली झुकाई मैँने…उस तरफ ही झुक जाना है उन्होंने”…

“ओह!…अगर ये सब सच है तो तुमने उस सुनीता की बच्ची को पैसे निकलवाने के लिए क्यों भेज दिया?”…

“क्यों?…इससे क्या फर्क पड़ता है?”…

“अरे वाह!…फर्क क्यों नहीं पड़ता?”…

“कल को वो बहाँ से निकलवाए बीस हज़ार और तुम्हें बता दे बारह हज़ार…तो तुम उसका क्या उखाड़ लोगी”…

“ओह!…ये बात तो मैँने सोची ही नहीं”…

“इसीलिए मैँ कहता हूँ कि अपनी मर्ज़ी से कोई काम ना किया करो”…

“अगर कुछ करना भी है तो घर में एक मर्द खाली निठल्ला बैठा है…उसकी कम से कम सलाह ही ले लो”…

“अरे!…इस काम में मर्द नहीं बल्कि लड़किया चाहिए होती हैँ”…

“तो?”…

“तो कहाँ से पैदा करती मैँ लड़कियाँ?”….

“अपनी मुन्नी तो वैसे भी अभी नासमझ है”…

“अरे!…बहुत बेरोज़गारी है अपने देश में”….

“छत्तीस धक्के खाती फिरती हैँ इधर-उधर नौकरी की तलाश में”…

“उन्ही में से बढिया सी आठ-दस को छाँट के रख लेते नौकरी पे”…

“ताकि तुम्हारे मज़े हो जाते?”…

“सब समझती हूँ मैँ…हर समय तुम्हारी नज़र पराई स्त्रियों पर ही रहती है”…

“अरी भाग्वान…कसम है मुझे मरियल बिल्ली के डर से पलंग के नीचे छुपे हुए दढियल हैवान की जो मैँने तुम्हारे अलावा किसी और को ताका भी तो”…

“ओ.के!…फिर ठीक है”…

“लेकिन तुम भी कसम खाओ खंबा नोचती खिसियानी बिल्ली के टूटे नाखूनों की जो तुम मेरे अलावा किसी भी पराए मर्द की तरफ आकर्षित भी हुई तो”…

“ओ.के…ओ.के मेरी जान”…

“अरे!…उठो…..सुबह-सुबह ये नींद में बड़बड़ाते हुए कैसी-कैसी अजीब सी कसमें खा रहे हो और मुझे खिलवा रहे हो?”…

“ओह!…

“ओह!…मॉय गॉड…ये सब तो सपना था”…

“क्यों?…क्या हुआ सपने में?”…

“क्कुछ नहीं”…

“सुनो!…बाहर चल के बॉलकनी में बैठो…मैँ चाय लेकर आती हूँ”…

“हम्म….

“सुनो”…

“क्या?”…

“एक बहुत बढिया आईडिया आया नोट बनाने का”…

“बनाने का?”…

“हाँ!…पागल होते हैँ वो लोग जो नोट कमाते हैँ….हमारे पास तो नोट अपने आप चल कर आएँगे”…

“अरे वाह!…फिर तो मज़ा आ जाएगा”…

“बिलकुल”…

“आप बाहर चल के बैठो तो सही…वहीं चाय की चुस्कियों के बीच आराम से बात करते हैँ”…

“ठीक है”…

“और हाँ!…फ्रंट पेज की खबर को विस्तार से पढना”….

“क्यों?…क्या लिखा है उसमें?”…

“कलयुग आ गया है अब तो…घोर कलयुग”…

“आखिर हुआ क्या?”…

“होना क्या है?”…यहीं आज़ाद पुर के लूसा टॉवर में एक दफ्तर पकड़ा गया है…जहाँ से दो लड़के और पाँच लड़कियाँ अरैस्ट हुई हैँ”…

“ज़रूर चकला चला रहे होंगे”…

“नहीं”…

“तो फिर?”…

फ्रैण्डशिप क्लब soultrainsa190108ur4 चला रहे थे”…

“ओह!…

“पुलिस को शिकायत मिली और सब के सब धरे गए”…

“अच्छा हुआ…स्साले के मकान…दुकान…बैंक एकाउंट सब के सब सीज़ हो गए”…

“अब चक्की पीसता फिरेगा कई साल”…

“पता नहीं उसके पीछे से उसके बीवी-बच्चों का क्या होगा?”…

“सबको रातोंरात करोड़पति बनने की पड़ी है”….

“पता नहीं!…लोग मेहनत कर हलाल की खाने को राज़ी क्यों नहीं हैँ”…

“हाँ!…तो तुम किस स्कीम के बारे में बता रहे थे?”…

“अरे!…व्वो…वो तो कुछ नहीं…मैँ तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रहा था”…

“खाओ मेरी कसम”…

कसम है मुझे ओस में डूबी छतरी के नीचे बैठे कनखजूरे के तिरछे कान की”…

“नहीं जनाब!..तिरछे वाला कान तो ऑलरैडी मेरे लिए बुक है”….

“हाँ!….आप चाहें तो बेशक सीधे वाले कान की कसम खा सकते हैँ”…

“मुझे कोई ऐतराज़ नहीं”…

“हा…हा…हा”

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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+919213766753

"हट ज्या…सुसरी…पाच्छे ने"

“हट ज्या…सुसरी…पाच्छे  ने”

***राजीव तनेजा***

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“बधाई हो”….

“किस बात की?”…

“अरे!…खुशियाँ मनाओ…खुशियाँ”….

“पहले बात का पता तो चले…फिर सोचता हूँ कि खुशी मनानी है या फिर मातम”….

“अरे!..मातम मनाएँ हमारे दुश्मन”….

“तो क्या लाला रौशनलाल के घर पाँचवी बार फिर लड़का पैदा हुआ है?”…

“वो दरअसल….

“लगता है….पिछले जन्म में मोती दान करे थे पट्ठे ने”….

“किस्मत ही बड़ी तेज़ है स्साले की”…

“यहाँ हम दिन-रात अपनी ऐसी की तैसी करवा..थक-हार के बुरी तरह टूट लिए लेकिन  नतीजा वही…ढाक के तीन पात”…

“एक के बाद एक…लगातार तीन लड़कियाँ”…

“उफ!…क्या किस्मत है मेरी?”……

“वहाँ….वो स्साला…हराम का जना…पता नहीं कौन से सन्यासी या वैद्य का घर में बना  शिलाजीत युक्त  च्यवनप्राश खाता है कि एक बार में ही सब कुछ फिट-फाट”…..

“तुरंत…बिना किसी प्रकार की देरी के…अगले प्रोजैक्ट को अमली जामा पहनाने में जुट जाता है”…

“अरे नहीं!…वो तो आजकल इस सब काम से छुट्टी ले सियाचिन-वियाचिन जैसी किसी ठण्डी जगह पे आराम फरमा रहा है”…

“क्यों?”…

“क्या हुआ उसके जोश औ जुनून को”….

“निकल गई सारी हेकड़ी?”….

“पहले तो हमेशा …बड़े मज़े से अफ्लातूनी साँड के माफिक एक के बाद एक  नए मिशन पे जुटा रहता था”… “हुँह!…बड़ा आया दानवीर बनने वाला”…

“अरे यार!….उसकी बात नहीं कर रही हूँ मैँ”…

“आजकल तो वो बिमार पड़ा हुआ है”..

“क्या बात?”….

“बड़ी खबर है तुम्हें उसकी?”….

“कहीं कुछ…?”…

“तुम तो हमेशा एक से एक पुट्ठा ही सोचा करो”….

“तो फिर तुम्हें कैसे….

“अरे!…अपनी maid राम कटोरी बता रही थी”….

“कौन राम कटोरी?”….

“वही जो उनके घर का झाड़ू-पोंछा करती है?”….

“हाँ!…वही”….

“ओह!…अच्छा”….

“ये राम कटोरी भी आजकल कहीं पेट से तो नहीं है?”….

“क्यों?….तुम्हें कैसे खबर?”बीवी का शंकित स्वर

“बस!…ऐसे ही उड़ती-उड़ती सी नज़र पड़ी थी उस पर तो लगा कि शायद…..

तुम ना..अपनी इस उड़ती-उड़ती सी नज़र को ज़रा काबू में रखा करो”…

“मैँ तो बस ऐसे ही….

“सब समझती हूँ मैँ कि…क्या ऐसे ही?…और क्या वैसे ही?”…..

“जिस दिन मेरा दिमाग फिरना है…..

“अरे छोड़ो यार तुम भी ..क्या बात ले के बैठ गई?”…

“मुझे तो लगता है कि रौशनलाल ने ही अपने नूर की थोड़ी सी  रौशनाई बिखेर दी होगी उस अबला बेचारी पर”…

“हम्म!…वर्ना उसका पति ‘राम आसरे’ तो पिछले दो साल से बाहरले मुलुक गया हुआ है पैसा बनाने के वास्ते”…

“अच्छा है!…बेचारी के माथे से बांझ के नाम का ठप्पा तो हटेगा कम से कम”….

“लेकिन!…ये जो बदचलन का एक्स्ट्रा लेबल लग जाएगा…उसका क्या?”…

“और क्या करे बेचारी?”…

“पति तो पिछले छै महीने से एक दुअन्नी भी नहीं भेज रहा है खर्चे के वास्ते”…

“कहाँ से?….और कैसे गुज़ारा करे?”…..

“हद है!…इस ‘राम आसरे’ को ना तो अपने बिमार माँ-बाप की कोई चिंता है और ना ही अपनी बीवी से किसी भी किस्म का कोई लगाव है”…

“सुना है!…कि वहीं कोई और रख ली है उसने”….

“छोड़ो!…हमें क्या?”…

“हाँ!..हमें क्या?”…

“तुम बताओ!…किस चीज़ के लिए खुशियाँ मनाने के लिए कह रही थी?”…

“वो दरअसल…..

“एक मिनट!…खुशी मनाने की बात है तो ज़रूर छुन्नी के पापा की फिर से लॉटरी लग गई होगी”…..

“स्साला!…है ही बड़ा किस्मत का धनी”….

“बुरी नज़र करे भी तो आखिर क्या करे?”…

“ताश नई-पुरानी कैसी भी हो…अगला आँख बन्द करके भी अगर पत्ते फेंटता है तो भी बेगम उसी के धोरे खड़ी मिलती है”…

“खैर!…कभी ना कभी तो अपने दिन भी आएँगे”….

“आएँगे नहीं तो क्या…माँ…….

“बस…बस!….जब देखो ज़ुबान पे कोई ना कोई गाली चढी रहती है”….

“अरे!…कौन उल्लू का पट्ठा…किसकी माँ-बहन एक कर रहा है?”…

“अभी तुम ही तो…….

“अरे!…मेरे कहने का तो मतलब था कि कभी तो हम पर किस्मत मेहरबान होगी”….

“हाँ!…कभी ना कभी तो इस घूरे के दिन भी फिरेंगे”….

“बॉय दा वे!…तुम किसकी बात कर रही हो?”…

“अरे!…‘जयहिन्द मीडिया’ वालों ने तुम्हारे काम से खुश हो कर तुम्हारी लेखनी को सराहा है”…

“अच्छा?”….

“तो इसमें कौन सी नई बात है?”…

“सभी तो तारीफ पे तारीफ किए जा रहे हैँ आजकल”…

“हाँ!…ट्रेन में चना-दाल बेचने वाले से लेकर चूरन वालियों तक…सबको अपना मुरीद बना रखा है तुमने”…

“और नहीं तो क्या?”…..

“तुम्हारे घरवाले की कलम में है ही ऐसा जादू कि जो पढे…पढता ही रह जाए”…..

“बिलकुल”….

“तो क्या उनका फोन आया था?”….

“किनका?”…

“अरे!…‘जयहिन्द’ वालों का…और किनका?”….

“नहीं!….उनका तो कोई फोन नहीं आया”…..

“तो इसका मतलब तुमने ज़रूर मेरी मेल चैक की है”….

“कितनी बार मना कर चुका हूँ कि मेरी पीठ पीछे मेरी किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया करो लेकिन तुम हो की…छेड़खानी किए बिना चैन ही नहीं पड़ता”…

“अरे!…ये सब तुम्हारे दिमाग का खलल है कि तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हारी चीज़ों के साथ पंगे लेता है”….

“क्यो?…उस दिन वो जो मेरी  हॉफ पैंट पहन…बीच गली के इधर-उधर मटक रही थी”…

“वो क्या था?”…

“अरे वो?”…

“वो तो मैँ बस ऐसे ही पहन के ट्राई कर रही थी कि मुझ पर ये निक्कर-शिक्कर फबती भी है कि नहीं?”….

“हाँ!…बहुत फबती है”…..

“क्या सच?”….

“और नहीं तो क्या?”….

“कैसी लग रही थी मैँ?”…

“ऐसे लग रहा था जैसे सांय-सांय करती तेज़ हवा में फर्र-फर्र करता एक विशालकाय दोमुँहा ‘तंबू’……सिर्फ तुम्हारी ‘बम्बू’ समान सींकिया टाँगों के सहारे टिका खड़ा हो”…

“क्या?”…

“मुझे ये बात समझ नहीं आती कि तुम्हें मेरी चीज़ों के साथ छेड़-छाड़ कर के आखिर मिलता ही क्या है?”….

“कसम ले लो मुझसे बेशक…काले पर्वत पे उड़ने वाले ‘सफेद बाज़’ की जो मैँने तुम्हारी किसी भी चीज़ को छेड़ा हो”…

“तो फिर क्या हकीकत का जामा पहने तुम्हें ये ‘श्वेत-श्याम’ सपना आया तुम्हें कि तुम्हारे पति…याने के मेरी…लेखनी बड़ी ही दमदार है?”… 

“पहली बात कि मैँ इतनी भोली या बुरबक्क भी नहीं हूँ कि तुम्हारी पोस्टस के बदले आने वाले इक्के-दुक्के कमैंटस के जरिए इतना भी ना जान  सकूँ और दूसरी बात ये कि ये ‘श्वेत-श्याम’ याने के ब्लैक एण्ड व्हाईट वाले थर्ड क्लास सपने आएँ तुम्हारी उस ‘चम्पा’ की बच्ची को…मुझे नहीं”…

“मुझे भला क्यों आने लगे?”…

“चम्पा?”…

“क्कौन चम्पा?”….

“हाँ!…हाँ  अब भला मेरे सामने क्यों याद आने लगी?”…

“अरे!…वही निगोड़ी ‘चम्पा-चमेली’…जिसके लिए तुम रोज़-रोज़ कोई ना कोई बहाना बना के पानीपत से जल्दी फूट वक्त-बेवक्त घर आ धमकते हो”…

“तो इससे तुम्हें क्यों मिर्ची लगने लगी?”…

“मेरा घर है…जब मर्ज़ी आऊँ”…

“आऊँ!…ना आऊँ”….

“हाँ..हाँ….तो मैँने कब रोका है”…

“आना है आओ….नहीं तो ….उसी करम जली के दड़बे में बैठ अण्डे सेते रहो”…

“अण्डे?”….

“मर्द होने के नाते अण्डे देना मुझे गवारा नहीं”…

“कोई और काम हो तो बताओ”….

“फॉर यूअर काईंड इनफार्मेशन!…मैँ अण्डे देने के लिए नहीं बल्कि सेने के लिए कह रही थी”….

“ओफ्फो!…सुबह से क्या बकवास लगा रखी है?”….

“कभी अण्डा दो…कभी अण्डा सेओ”…

“शुरूआत तो तुमने ही की थी”…

“अच्छा!…चलो मैँ ही इसे खत्म भी करता हूँ”…

“सॉरी”…..

“ओ.के….आई एम ऑलसो सॉरी”…

“हाँ!…अब बताओ!…क्या कह रही थी?”…

“यही कि ‘जयहिन्द मीडिया’ वालों ने चैक भेजा है”…

“अरे वाह!…पहले क्यूँ नहीं बताया?”…

“तुमने मौका ही कब दिया?”…

“आते ही तो शुरू हो गए थे”…

“ओ.के बाबा!…कह तो दिया सॉरी”……

“सब जानती हूँ तुम्हारी इस सॉरी-शॉरी के ड्रामे को”…

“अभी गीदड़ बन बकरी के माफिक मिमिया  रहे हो बाद में मौका लगते ही तुमने अपना असली रूप दिखाने से बाज़ नहीं आना है”….

“ओफ्फो!…अब क्या कान पकड़ के मुर्गा भी बनूँ?”…

“नहीं!…इसकी ज़रूरत नहीं है”…..

“ओ.के”…

“वैसे एक बात कहूँ?”….

“क्या?”…

“यही कि तुम्हें मुर्गा बने हुए देखे अर्सा बीत गया”….

“तो?”…

“एक बार…

“नहीं!…बिलकुल नहीं”…

“प्लीज़!..पुरानी यादों को ताज़ा हो जाने दो”….

“कौन सी यादें?….कैसी यादें?”…

“वही जब तुम पहली बार मुझसे मिलने मेरे होस्टल की दिवार फान्द के आए थे और मेरे बजाय धोखे से वार्डन को छेड़ दिया था”….

“ओह!…..

“फिर सबके सामने उसने तुम्हें…..

“बस…बस…रहने दो”….

“अपनी इस कहानी को पढने वाले सभी प्रबुद्ध पाठक हैँ”…..

“तो?”….

“क्यों सबके सामने मेरी मिट्टी पलीद करती हो यार?”…

“ओ.के…बाबा!…नहीं करती लेकिन पहले मेरी पूरी बात बिना किसी टोका-टाकी के सुननी पड़ेगी”…

“हाँ!..बताओ…क्या कह रही थी?”..

“यही कि ‘जयहिन्द मीडिया’ वालों ने तुम्हें चैक भेजा है”…

“कितने का?”….

“एक हज़ार रुपए का”….

“बस?….धुर्र फिट्टे मुँह“…

“मेरी अठाईस कहानियों के हिसाब से तो….ये कोई ‘पैंतीस रुपए और इकहतर नए पैसे’ पर कहानी नहीं पड़ा?”…

“कुछ कम नहीं है?”…

“अरे!…इतना भी मिल गया…गनीमत समझो”…

“वर्ना वो ‘नवभारत’ वाले तो छापने-छूपने के बाद भी…..

“हाँ!..चलो…ये सोच के ही खुश हो लेता हूँ कि कम से कम मेरे लेखन को पहचाना तो सही”…

“और कुछ भी लिखा है उन्होंने?”…

“हाँ!…पन्द्रह दिन के अन्दर एक नई कहानी लिख ‘अखिल भारतीय कहानी कम्पीटीशन’ में भाग लेने के लिए भी कहा है”…

“पन्द्रह दिन में?”….

“इनके बाप का नौकर हूँ जैसे?”….

“कुछ ईनाम-विनाम भी दे रहे हैँ?…या ऐसे ही फोकट में?”….

“अरे!…फोकट में काहे को?”…

“पूरे पाँच हज़ार का ईनाम है प्रतियोगिता में प्रथम आने वाले के लिए”…

“बस?”….

“अपने बस का नहीं है कि महज़ पाँच हज़ार के पीछे कम्प्यूटर पे घंटो उँगलियाँ टकटकाता फिरूँ”….

“तो फिर पहले क्यों पूरी रात टक…टकाटक कर मेरी तथा बच्चों के साथ अपनी भी नींदें हराम किया करते थे?”…

“अरे!…तब अपुन का कोई नाम-शाम नहीं था ना”..

“तो?”….

“अरे!…समझा कर यार”…

“तब ज़रूरी था”…

“अच्छा!…एक बात बता”…

“क्या?”…

“पाँच हज़ार ज़्यादा होते हैँ के एक करोड़?”…

“मतलब?”….

“अरे!…पहले तू बता तो सही”….

“करोड़”….

“बस!…इसीलिए तो कह रहा हूँ कि ये कम्पीटीशन-वम्पीटीशन में भाग लेना….बस टाईम खोटी करने के अलावा कुछ नहीं है”…

“मतलब?”…

“अरे!…बढिया स्क्रिप्ट लिखने के बदले में अपने बॉलीवुड के सबसे बड़े शोमैन याने के   ‘सुभाष घई’ ने पूरे एक करोड़ का ईनाम रखा है”…

“एक क्करोड़?”….

“हाँ!…पहला ईनाम ‘एक करोड़’ का…..

दूसरा ईनाम …‘पचास लाख’ का और तीसरा ईनाम …‘बीस लाख’ का”…

“भांग तो नहीं चढा रखी कहीं?”..

“इतना पैसा भला लेखक को कौन देता है?”…

“अरे!…अब भांग चढाएँ मेरे दुश्मन”…

सुभाष घई से अपने ताज़ा-तरीन इंटरविय्यू में साफ-साफ कहा है कि……”जब हमारी फिल्में देश-और विदेश में कुछ ही हफ्तों में करोड़ों का बिज़नस कर लेती हैँ” …….

“तो क्या हम एक अच्छी और उम्दा कहानी के लिए एक करोड़ नहीं खर्च कर सकते?”…

“मैँने तो जब से ये इंटरव्य्यू पढा है…तब से ‘भांग’‘सुरती’ और ‘गांजा’ छोड़ सिर्फ और सिर्फ ‘स्काच’ तथा ‘चरस’ ही पीने का मन बना लिया है”…

“तो क्या ‘सुभाष घई’ जैसे बड़े और नामी व्यक्ति  के लिए तुम ‘जयहिन्द मीडिया’ जैसे नए खिलाड़्यों को मना कर दोगे?”..

“और नहीं तो क्या?”…

“इधर भी पंद्रह दिन का समय है…और उधर भी पंद्रह दिन का ही समय है”…

“तो?”…

‘कोसी’ का पानी तो उसी तरफ बहेगा ना…जिस तरफ ढाल होगा”…

“लेकिन अपने काम के प्रति निष्ठावान ‘लेखक’ का छोटे-बड़े…नामी-बेनामी से क्या लेना-देना?”…

“क्यों नहीं लेना-देना?”…

“क्या वो कोने वाला मोची बिना पैसे लिए ही मेरा फटा जूता सिल देता है?”…

“या वो ‘एवर ग्रीन’ ब्यूटी पॉरलर वाली मीनाक्षी बिना पैसे लिए ही ‘पैडीक्योर’…’मैनीक्योर’ और ‘थ्रैडिंग’ से लेकर ‘फेशियल’ तक कर तुम्हारे इस ‘पैंतालिसवाँ बसंत’ देख रहे थोबड़े को चमका कर महज़ बत्तीस का कर डालती है?….

“ओफ्फो!…कोई ज़रूरी नहीं कि तुम कहानी पढ रहे इन पाठकों के सामने मेरी असली उम्र का बखान भी करों”…

“अच्छा बाबा….नहीं करता”….

“अब खुश?”…

“हम्म!….बस अब आप बिना किसी भी प्रकार की कोई देरी किए फटाफट से जुट जाओ अपने लेखन में”….

“अरे!…फिकर नॉट वर्री करी”…

“अभी बहुत टाईम बाकी है”….

“किसमें टाईम बाकी है?”…

जयहिन्द वालों के लिए तो तुम साफ मना ही कर रहे हो”…

“एक्चुअली!…मैँ सोच रहा हूँ कि किसी को ऐसे ही बेकार में क्यों नाराज़ करा जाए?”….

“क्या पता?…खोटा सिक्का कब काम आ जाए”…

“कम से कम नैट का चार-छै महीने का खर्चा तो निकलेगा…अलग से”…

“हाउ स्वीट!…तुम कितने अच्छे हो”….

“मेरे ख्याल से अब देर करना ठीक नहीं”…

“अरे!…तुम चिंता ना करो…सब आराम से मैनेज हो जाएगा”….

“माना कि तुम कलम के धनी हो लेकिन ‘टॉपिक’ वगैरा के बारे में तो पहले से ही सोच के रखना पड़ेगा ना कि क्या लिखना है और क्या नहीं”…

“कहानी का प्लाट….ताना-बाना वगैरा”….

“कहा ना!…तुम बिलकुल भी…तनिक भी परेशान ना हो”…

“एक से एक…धांसू से धांसू…कहानियों और उपन्यासों के प्लाट ऑलरैडी भरे पड़े हैँ इस ‘डॉयमंड कट’ भेजे में”…

“‘डॉयमंड कट’…माने?”…

“अरे!…‘डॉयमंड कट’ माने अच्छी तरह से कुशलतापूर्वक तराशा गया नक्काशीदार भेजा”…

“किसी भी एक आध…फुटकर से आईडिए को सुबह-सवेरे खुली हवा में….हवा भर लगानी है और पल भर धमाकेदार कहानी तैयार समझो”…

“ओ.के….जैसी तुम्हारी मर्ज़ी”….

{पाँच दिन बाद}

“कुछ हुआ?”….

“कुछ होने वाला था क्या?”….

“लड़का या लड़की?”….

“ओफ्फो!….मैँ कहानी की बात कर रही हूँ और तुम कहाँ की कहाँ सोचे जा रहे हो?”…..

“ओह!…मॉय मिस्टेक”…

“फिलहाल तो मैँ ये सोच रहा हूँ कि इस बार कहानी का सबजैक्ट क्या रखूँ?”…

“हे भगवान!…पाँच दिन गुज़र गए और जनाब ने अभी तक विष्य ही नहीं सोचा है”…

“अरे!…वैसे तो मेरा प्रिय विष्य हास्य एवं व्यंग्य है लेकिन इस बार फॉर ए चेंज…मैँ सोच रहा हूँ कि ‘प्रेम त्रिकोण’ याने के लव ट्राईएंगल पर कोई कहानी लिखूँ”…

“अरे नहीं!…ऐसी भूल बिलकुल भी ना करना”…

“नहीं!…ये तो किसी भी हालत में सही टॉपिक नहीं है”…

“क्यों?…क्या बुराई है इसमें?”…

“हर तीसरी या चौथी फिल्म में यही कहानी तो बार-बार दोहराई जा रही है”….

“तो फिर भाईगिरी या गैंगवार वगैरा पे क्यों ना लिखूँ?….

“ना बाबा ना!…भाईगिरी और गैंगवार के बारे में लिखने में तो बहुत लफड़ा है”…

“कैसे?”…

“कल को क्या पता ‘दुबई’ में बैठा कौन सा भाई नाराज़ हुआ पाए?…और सीधा खड़ा हो तुम्हारे कान के नीचे  घोड़ा लगा धमाका करता नज़र आए”….

“ओह!…

“और वैसे भी अपने  ‘राम गोपाल वर्मा’ जी को इस सब तरह की कहानियों में महारथ हासिल है”…

“मैँने तो यहाँ तक सुना है कि अब वो ऐसी फिल्मों को बनाने और लिखने के बारे में होल वर्ल्ड का ऑल इण्डिया फेमस कॉपीराईट लेने की सोचने लगे हैँ ताकि ना रहे बाँस और ना ही बज पाए किसी दूसरे की बाँसुरी”….

“ओह!…

तो फिर  गान्धीगिरी के बारे में लिखना कैसा रहेगा?”…..

“अरे यार!…उसमें तो  संजू बाबा पहले ही राईटर-डाईरैक्टर के साथ मिल कर ऐसा कमाल दिखा चुके हैँ कि कुछ और लिखने या करने की गुंजाईश ही कहाँ बचती है किसी और के लिए?”…

“तो फिर क्यों ना किसी ‘पीरियड’ याने के ऐतिहासिक फिल्म की कहानी लिखूँ…जैसे  ‘पृथ्वीराज चौहान’‘लक्ष्मीबाई’ वगैरा..?”….

“पता भी है कि कितने चैनलों पे ऐसे सीरियल बे-भाव धक्के खा रहे हैँ आजकल”….

“और ‘लक्ष्मीबाई’ पर तो अपनी  ‘सुश्मिता’ बना रही है फिल्म”…

“नहीं!…‘एक्स मिस यूनीवर्स’ याने के ‘पूर्व ब्रह्मांड सुन्दरी’ से पंगा लेना ठीक नहीं होगा”….

“तुम कुछ ‘मॉयथोलॉजिकल’ याने के धार्मिक टाईप की कहानी क्यों नहीं लिखते?”…

“अरे!…उसमें तो अपनी ‘एकता कपूर’ पहले से ही ‘हमारी-तुम्हारी  ‘महाभारत’ शुरू कर चुकी है और ‘सागर बन्धु’ अपने पिताजी के ज़माने के बीस-बाईस साल पुराने  ‘रामायण’ वाले हिट फार्मुले को फिर से भुनाने में जुटे हैँ”…

“ये कहाँ का इनसाफ है कि किसी एक कहानी को बार-बार एक ही आदमी भुनाए?”…..

“कभी  ‘नदिया के पार’ के नाम पे तो कभी….  ‘हम आपके हैँ कौन’ के नाम पे?”….

“सही में!…दूसरों को भी बराबर का चाँस मिलना चाहिए”….

“हमारी सरकार वैसे बातें तो बड़ी-बड़ी समानता और सदभावना की करती है लेकिन….

“सही में…देश में….बड़े-छोटे में…अमीर-गरीब में समानता तो तब आएगी जब हर एक को नकल करने का बराबर का हक होगा चाहे वो स्कूल-कॉलेज का कोई इम्तिहान हो या फिर हो किसी ‘एम.बी.ए’ वगैरा का कोई टैस्ट”….

“बिलकुल!…तभी हमारा देश बिना किसी बाधा के तेज़ी से उन्नति के पथ की ओर अग्रसर हो पाएगा”…

“लेकिन मेरे हिसाब से तो आजकल में ऐसा होना नामुमकिन सा ही जान पड़ता है”….

“सरकार को तो चाहिए कि जो करना है..जल्दी करे”….

“हाँ!…बाद में जब लपलपाती ‘कोसी’ के कहर से सब मर लेंगे…तब राहत और आपदा सामग्री मिल भी गई तो क्या फायदा?”…

“अब तुम ये ‘कोसी-वोसी’ को मारो गोली और कहानी लिखना शुरू कर दो”…

“बिलकुल”….

{दस दिन बाद}

“हाँ!….कुछ हुआ कहानी का?”….

“यार!…लाख कोशिशों के बावजूद भी बात कुछ जम नहीं रही”…

“क्यों?..क्या हुआ?”…

“कुछ सोच के लिखने बैठता हूँ तो याद आता है कि ऐसा सीन तो फलानी-फलानी फिल्म में या फिर फलानी-फलानी कहानी में पहले ही कोई लिख चुका है”…

“किस तरह की फिल्मों में तुम्हें ऐसे सीन दिखाई देते हैँ?”…

“देसी या विदेशी?”….

“देसी”…

“ओ.के!…फिर तो कोई मुश्किल नहीं है”…

“तुम एक काम करो!…ये देसी-दासी का चक्कर छोड़े और कुछ नीली-पीली फिरंगी फिल्में झट से देख मारो”…

“और जिस से जो अच्छा लगता है…सब चुन-चान के एक उम्दा सी कहानी रातोंरात तैयार कर डालो”…

“नहीं…बिलकुल नहीं”….

“अरे!…क्या फर्क पड़ता है?”….

“जैसे सब कर रहे हैँ…वैसे ही तुम भी करो”….

“और डंके की चोट पे अपनी कहानी के मौलिक तथा मालिक होने का दावा पेश कर डालो”…

“ध्यान रहे!…ऐसा दावा पेश करते समय तुम्हारा चेहरा आत्म ग्लानी से पीड़ित नहीं बल्कि कांफीडैस से भरपूर एकदम लबालब दिखाई देना चाहिए”….

“अरे!…वो  ‘साजिद खान’ का बच्चा एक मिनट भी टिकने नहीं देगा मेरे दावे को”…

“पल भर में ही पोल खोल के रख देगा कि मैँने फलाना-फलाना सीन फलानी-फलानी फिल्लम से चुराया है”…..

“तो वो खुद ही कौन सा दूध का धुला है?”…

“उसने भी तो अपनी फिल्म ‘हे बेबी’ में ‘जैकी चैन’ की एक फिल्म से दृष्य उड़ाए थे”…

“अरे!…चुराए या उड़ाए नहीं थे बल्कि वो तो इंस्पायर हुआ था उस फिल्लम से”..

“हाँ!…तभी कुछ सीनो में फ्रेम दर फ्रेम नकल कर मारी थी”…

“ये सब संयोग भी तो हो सकता है या नहीं?”….

“हाँ-हाँ!….हो क्यों नहीं सकता?”….

“होने को तो कुछ भी हो सकता है”….

“मैँ ‘जार्ज बुश’ के घर और…‘जार्ज बुश’…बिना किसी भी प्रकार का कोई लेन-देन किए   ‘ओसामा बिन लादेन’ के घर भी पैदा हो सकता है”….

“क्यों?…है कि नहीं”…

“हा हा हा हा”…

“खैर!…बहुत हो लिया मज़ाक-वज़ाक”….

“अब कुछ सीरियस बात हो जाए?”…

“हाँ..हाँ….क्यों नहीं?”…

“तुम मुझे साफ-साफ खुले शब्दों में बता दो कि तुमने कहानी लिखनी है या मैँ किसी और को भाड़े पे रख लूँ?”…

“अरे!…ऐसा गज़ब मत करना”….

“लिखनी क्यों नहीं है?”…

“ज़रूर लिखनी है”…

“तो फिर ये आलस-वालस छोड़ो और तुरंत जुट जाओ काम पे”…

“जैसा हुकुम मेरे आका का”…..

“बस…बस …ये लल्लो-चप्पो छोड़ो और अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाओ”….

“ठीक है”…

{बारह दिन बाद}

“अरे!…सुनो!…..बड़े मज़े की बात सुनो”…

“क्या हुआ?…कहानी पूरी हो गई क्या?”…

“कहाँ यार?”…

“अभी-अभी एक बड़ी ही धांसू सी….फन्ने खाँ टाईप….फन्नी सी कहानी का आईडिया आया है”…..

“अच्छा?…अभी सिर्फ आईडिया भर ही आया है?”…

“मैँ ही पागल हूँ जो तुम्हारे पीछे पड़-पड़ के बार-बार कहानी के बारे में पूछती फिरती हूँ और एक तुम हो कि कोई फिक्र ही नहीं”…

“अरे!…अगर अच्छी कहानी लिखोगे तो तुम्हारा ही नाम होगा…मेरा नहीं”….

“अरे!…तुम सुनो तो”…

“मैँ एक ऐसी कहानी लिखने जा रहा हूँ जिसमें ट्रैजेडी अपनी चरम सीमा पर होगी…रोमांस अपने पूरे उत्थान पर होगा और…और एक्शन के मामले में मेरी कहानी हॉलीवुड की फिल्मों की भी सरताज होगी”…

“गुड!…वैरी गुड”…..

“मेरी कहानी पर बनी फिल्म बॉक्स आफिस के अगले-पिछले सभी रेकार्डों को धवस्त कर डालेगी”…

“अरे वाह!…क्या कहने”…

“मेरी कहानी बच्चों से लेकर बड़ों तक…सभी को भाएगी”…

“मैँने सब सोच लिया है…सुभाष जी से मैँ पर्सनल  रिकवैस्ट कर कहानी का ऐसा साऊंड ट्रैक बनवाऊँगा कि सब हक्के-बक्के रह जाएँगे”…

“बिना इसका संगीत सुने गाय-भैंसे दूध देना बन्द कर देंगी…हिरन घास चरना छोड़ देंगे…शेर शिकार करना भूल अपनी-अपनी मांदों में लुप्त हो जाएंगे”….

“ओ.के….ये सब म्यूज़िक वगैरा तो खैर एक्स्ट्रा बात हो गई…किसी अच्छी और सफल की आत्मा तो उसकी पटकथा याने के कहानी होती है”…

“बिलकुल”…

“तो फिर उसी के बारे में बताओ ना”…

“मैँ तो कहानी सुनने को उतावली हुए जा रही हूँ”…

“तो फिर सुनो…..

“नहीं!…पहले तुम सुनो…

कहानी में “जाने तू या जाने ना’  जैसा रोमांस ज़रूर डालना …आजकल यही ट्रैंड चल रहा है”…

अरे!…तू काहे को चिंता करती है?”…

“मैँ हूँ ना”…

“चिंता ना कर!…मेरी कहानी में वो सभी ज़रूरी मसाले हैँ जो एक हिट फिल्म के लिए निहायत ही ज़रूरी होते हैँ”…

“जैसे?”…

“जैसे उसमें  मदर इण्डिया जैसा माँ का प्यार भी है …और ‘दोस्ती’ जैसी दोस्ती भी”…..

“मेरी कहानी में  ‘संगम’  जैसी कुर्बानी होगी और…‘गोलमाल’ जैसी कॉमेडी भी होगी”…

‘लैला-मजनू’ जैसे प्यार-मोहब्बत पे मिटने वाले प्रेमियों की दास्तान भी होगी…और ‘एतबार’ जैसा षड़यंत्र भी होगा”….

‘आग ही आग’ जैसी दिल दहला देने वाली दुश्मनी होगी….और ‘फूंक’ जैसा फूंक सरका देने वाला डरावनापन भी होगा”…..

“दर्द का रिश्ता’  जैसा आखों से आँसू ला देने वाला दर्द होगा…और ‘कयामत से कयामत तक’ जैसा नयापन भी होगा”…

 ‘शूल’  जैसा शुद्ध आईटम नम्बर होगा….और अंत में ‘शोले’ जैसा धांसू  क्लाईमैक्स तो ज़रूर होगा ही”…..

“गुड!…वैरी गुड”…

“लेकिन एक बात का ध्यान रखना कि कहानी बिलकुल ओरिजिनल लिखनी है…तभी सुभाष घई जी ने उसे अप्रूव करना है…वर्ना नहीं”….

“जानता हूँ यार कि नकल के पाँव नहीं होते”…

“अरे!…तुम चिंता ना करो”….

“पहला ईनाम ना मिले …ना सही”…

“दूसरा ईनाम भी बेशक ना मिले…कोई गम नहीं लेकिन ये तीसरा वाला याने के ‘बीस लाख’ का नकद ईनाम तो अपना पक्का ही समझो”…

“भले ही सारी दुनिया इधर-उधर हो जाए…कोई भी बड़े से बड़ी ताकत मुझे इस ईनाम को हासिल करने से रोक नहीं सकती”….

“इतना ओवर कॉंफीडैंस भी ठीक नहीं”….

“कॉंफीडैंस की बात करती हो?”….

“वो तो इतना है कि पूछो मत”….

“ईनाम की तो तुम चिंता मत ही करो”…

“मैँ तो ये सोच-सोच के कंफ्यूज़ हुए जा रहा हूँ कि जब सुभाष घई से एक करोड़ वसूलने जाऊँगा तो…

“कौन सी ड्रैस पहन के जाऊँगा?”…

“कौन सा परफ्यूम लगा के जाऊँगा?”…

“‘वुडलैंड’ के या फिर ‘रैड टेप’ के जूते पहन के जाऊँगा?”….

‘ज़ोडियॉक’ की टाई पहनूँगा या फिर इम्पोर्टेड ‘बो’ लगाऊँगा?”…

“बो को तो तुम रहने ही देना”..

“क्यों?…क्या कमी है ‘बो’  लगाने में?”….

“अच्छी भली तो लगती है नन्ही सी….प्यारी सी”…

“अरे!…ये ‘बो-बॉ’ लगा के बन्दा कम और वेटर ज़्यादा लगता है”…

“देखा नहीं है क्या शादियों और पार्टियों में वेटरों को ये ‘चार्ली चैपलिन’ के बड़े भाई माफिक मूछों को कमीज़ पे लगा प्लेटें इधर-उधर करते हुए?”…

“ओह!….

“तुम ये ‘बो-बॉ’ का लफड़ा छोड़ सीधे-सीधे टाई ही लगा लेना”…

“टाई?”…

“क्यों?…उसमें क्या बुराई है?”….

“अच्छी भली तो लगती है”…

“ओ.के…तुम्हारी बात मान लेता हूँ लेकिन सूट तो मैँ अपनी मर्ज़ी का ही पहनूँगा”…

“और ऐन टाईम पे आपा-धापी से बचने के लिए मैँने तो अभी से तैयारी कर ली है”….”

“तैयारी?..कैसी तैयारी”….

“जैसे के मैँ करोल बाग वाले  ‘दिवान साहब’ को दो सूट बनाने का आर्डर पहले ही दे आया हूँ”….

“दिवान साहब’ को?”….

“हाँ”….

“लेकिन उनके चार्जेज़ तो….

“अरे!…कपड़ों से शाही अन्दाज़ टपकना चाहिए और इस मामले में उनसे बेहतर कौन?”…

“वो कहते हैँ ना अँग्रेज़ी में कि फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ दा लास्ट इम्प्रैशन“…

“हाँ!….ये बात तो है”….

“सामने वाले को भी पता होना चाहिए कि बन्दा खाते-पीते घर का नामी-गिरामी लिक्खाड़ है कोई वेल्ला सड़कछाप टट-पूंजिया लेखक नहीं”…

“बिलकुल!…पहनावा रुआबदार होना चाहिए”….

“नहीं तो ये फिल्मी लोग पहले तो मज़े-मज़े में सारे काम करवा लेते हैँ और बाद में पेमेंट के वक्त….

इतने नहीं…इतने…..कह बॉरगेनिंग पे उतर आते हैँ”….

“तो ठीक है आप अपनी कहानी फाईनल कर प्रिंट-आउट निकाल लें”…

“मैँ सोच रहा हूँ कि दो-चार एक्स्ट्रा कॉपी भी साथ ही साथ निकाल लूँ”…

“वो किसलिए?”…

“बॉलीवुड के दूसरे निर्माताओं को फ्री में ऐज़ ए सैम्पल गिफ्ट देने के काम आ जाएगी”…

“लेकिन अगर किसी दूसरे प्रोड्यूसर ने नकल मार उनसे पहले ही अपनी फिल्म रिलीज़ कर दी तो?”…

“ओह!…इस बारे में तो मैँने सोचा ही नहीं”…

“अगला हमारी कहानी के दम पे करोड़ों रुपया दाव पे लगाएगा…तो ऐसे में उससे गद्दारी करना ठीक नहीं”…

“बिलकुल”…

“ठीक है!…आज तो मैँ आराम करता हूँ…कल से कहानी को फाईनल टच दे दूंगा”….

“ओ.के”….

{चौदहवाँ दिन}

“सुनो!…वो कहानी का प्रिंट आउट तो दिखाना”…

“ज़रा देखूँ तो सही कि मेरे मियाँ जी ने कैसी कहानी लिखी है?”….

“अरे!…क्या खाक प्रिंट आउट दिखाऊँ?”….

“इस स्साले!…प्रिंटर को भी आज ही खराब होना था”…

“क्यों?…क्या हुआ है इसे?”…

“पता नहीं जब-जब कमांड देता हूँ इसे प्रिंट करने की…तब-तब बस सैम्पल पेपर छाप अपने कर्तव्य को पूरा समझ लेता है”…

“ओह!…अब क्या होगा?”…

“हे ऊपरवाले!…हमारी लाज बचा ले”…

“अब इसमें ऊपरवाला क्या करेगा?”….

“जो करना है…सो मकैनिक ने करना है…उसे फोन कर दिया है…बस आता ही होगा”…

“तुम बेकार में टैंशन मत मोल लो”..

“ओ.के”…

“उम्मीद करती हूँ कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन मुझे एक चिंता खाए जा रही है”…

“क्या?”…

“यही कि ईनाम मिलने के बाद हम बड़े आदमी बन जाएंगे”….

“तो?”…

“बधाईयाँ देने के लिए दोस्तों…रिश्तेदारों का घर में आना-जाना लगा रहेगा”…

“तो?”…

“यार!…इस पुराने मॉडल के घर में आदर से सबका स्वागत-सत्कार करना अच्छा लगेगा क्या?”…

“वाशबेसिन है तो वो टूटा पड़ा है”..

“बाथरूम से लेकर रसोईघर तक की सभी टूटियाँ लीक करती हैँ”….

“रंग-रोगन करवाए हुए तो बरसों बीत गए”…

“सीलन के मारे प्लास्टर कभी भी बिना किसी न्योते के पपड़ी बन आ टपकता है”….

“अरे!…मेरे होते हुए चिंता काहे को करती है?”…

“जानती नहीं कि चिंता…चिता समान है?…और तुझे-मुझे तो अभी कई सावन एक साथ…एक ही छत के नीचे गुज़ारने हैँ”…

“छत?”….

“छत कमज़ोर इतनी है कि सोते हुए भी डर सा लगता है कि कहीं पंखा मेरे सिर के ऊपर ही ना पड़े”…

“परेशान ना हो…अभी प्लम्बर को फोन करके सभी टूटियाँ बदलवा डालता हूँ”…

“लेकिन ये चौखटों में भी तो दीमक ताबड़-तोड़ हमला कर चुकी है”…

“चिंता ना कर…पैस्ट कंट्रोल वालों को भी अभी के अभी फोन कर देता हूँ”….

“कोई फायदा नहीं होता ये कंट्रोल-शंट्रोल करके”…

“कंट्रोल करना ही है तो अपने नामुराद बच्चियों को करो”…

“नाक में दम किए रहती हैँ हमेशा”…

“कभी किसी की कॉपी गुम हुई रहती है तो कभी किसी की पैंसिल”….

“अरे!…तुम घर की बात करती हुई ये बीच में बच्चों का टॉपिक कहाँ से घुसेड़ लाई?”…

“शर्मा जी कह रहे थे कि तीन साल की गारैंटी देते हैँ”….

“बच्चों की?”….

“ओफ्फो!…बच्चों की नहीं रे बाबा”…

“पैस्ट कंट्रोल के बाद घर में दीमक ना लगने की तीन साल की गारैंटी देते हैँ वो लोग”….

“तो ऐसे कहो ना”….

“सब बकवास…बेफिजूल की है ये गारैंटी-शारैंटी”…

“लेकिन शर्मा जी तो….

“तो उन्हीं से कह के देखो कि एक बार ऐसे ही फोन मिला …बुलवा के देखें उन्हें”…

“पहली बात तो फोन नम्बर ही बन्द पाएगा”….

“और अगर गल्ती से मिल भी गया फोन तो…आज कल…आज कल के झूठे वायदे के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगने वाला”….

“तो क्या फिर सारी चौखटें ही बदल दें?”…

“मैँ तो कहती हूँ कि ये घर ही बदल दो”…

“बहुत साल हो गए एक ही जगह रहते-रहते”….

“कमाल करती हो तुम भी”….

“घर बदल दो”….

“कोई मज़ाक है क्या?”…

“घर बनाना भला कहाँ आसान है?”….

“कौन बावलों की तरह कभी ‘सैनीटेरी’ का तो कभी ‘इलैक्ट्रीशियन’ का सामान इकट्ठा करता फिरे?”…

“कभी लेबर के नखरे सहे तो कभी ठेकेदार से माथा फोड़े”…

“कभी पुलिस वालों को चढावा चढाए तो कभी ‘एम.सी.डी.वालों की मुट्ठी गरम करे”….

“अपने बस का नहीं है ये ईंट…बदरपुर और रेते के साथ सीमेंट में धूल-धूसीरत होना”…

“इसका मतलब!…मेरा नए घर का सपना…सिर्फ सपना बन के रह जाएगा?”….

“अरे!…मेरी जान…तुझ पर मेरा प्यार….मेरा दुलार…सब कुर्बान”….

“तुम बस पैसे आने दो…सीधे-सीधे तुम्हें पंजाबीबाग में ढाई सौ गज़ की कोठी दिलवा दूंगा”…

“क्या सच?”…

“सच-सच…एम.डी.एच’ के मसाले…सच-सच”…

हा हा हा हा हा…

“अच्छा मैँ तो चली खाना बनाने”…

“तुम उस मकैनिक के बच्चे को अभी फोन करो और तुरंत आने को कहो”..

“ओ.के”…

{पंद्रहवें दिन}

“अरे!…क्या हुआ….कल मकैनिक आया था के नहीं?”…

“मुझे तो घर के काम-काज से फुर्सत ही नहीं मिली कि मैँ तुमसे इस बाबत कुछ पूछ सकूँ”….

“नहीं!…मकैनिक तो आया नहीं था”….

“ओह!…

“हे भगवान…अब क्या होगा?”…

“धरी रह गई सारी की सारी मेहनत”….

“पानी फिर गया हमारे अरमानों पर”…

“अरे!….ऐसा कुछ नहीं हुआ है जो तुम इतनी हाय-तौबा मचा रही हो”…

“कुछ नहीं हुआ है?”…

“पूरे एक करोड़ निकल गए हाथ से और तुम कह रहे हो कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है”…

“हाँ!..बेगम…यकीन मानों…ऐसा कुछ नहीं हुआ है”…

“उस पैसे पे हमारा हक है और वो हमें मिल के ही रहेगा”…

“तुम चिंता ना करों”…

“क्या तुम सच कह रहे हो?”…

“बिलकुल”…

“खाओ मेरी कसम”….

“तुम्हारी कसम”…

“लेकिन तुम तो कह रहे थे कि मकैनिक आया ही नहीं”…

“हाँ”…

“तो फिर प्रिंट आउट…..

“उसकी तो ज़रूरत ही नहीं पड़ी”…

“मतलब?”…

“यार…आज कहानी भेजने का आखरी दिन था और प्रिंटर भी खराब था तो मैँने सोचा कि क्यों ना सारी कहानी उनकी मेल आई.डी पर मेल कर दूँ”…

“ओह!…अच्छा किया”…

“मेरी इस समझदारी ने कई फायदे भी करा दिए”…

“वो कौन से?”…

“कागज़ का कागज़ बचा और पैसे के पैसे भी बचे”…

“और कई पेड़ भी तो कटने से बचे”…

“पेड़?”…वो कैसे?”…

“अरे!…कागज़ लकड़ी से ही तो बनता है”…..

हा हा हा…सही बात”….

“अरे हाँ!…देखना ज़रा…तुम्हारी फोनबुक में उस कमला का नम्बर होगा”…

“कौन कमला?”…

“अरे!…तुम्हारी सहेली कमला…और कौन?”…

“अच्छा!….वही…जिसको पटाने के चक्कर में तुमने उसके बँगले के कई-कई चक्कर काटे थे”…

“कोई ज़रूरी नहीं कि यहाँ…इस कहानी के बीच में तुम गड़े मुर्दे उखाड़ो”…

“ओ.के….मॉय मिस्टेक”…

“हाँ!…अब बताओ…क्या काम पड़ गया तुम्हें उस कमला से?”…

“कहीं फिर से कमला के जलवों का हमला तो नहीं होने वाला?”….

“अरे!…ऐसी कोई बात नहीं है”…

“तो फिर क्या खास काम पड़ गया?”….

“ऐसा कुछ खास काम नहीं है”…

“मुझे तो बस नई मर्सडीज़ के रेट पता करने थे”…

“काहे को?”…

“अच्छी-भली दो-दो कारें तो हैँ…

“हाँ!..हैँ…एक तीन साल पुरानी ‘वैगन ऑर’ जो डैंटिंग-पेंटिंग माँग रही है और दूसरी बाबा आदम के ज़माने की ‘फिएट ऊनो’ जो बिना धक्के के स्टार्ट ही नहीं होती”….

“अच्छा लगेगा क्या हमें ईनाम मिलने के बाद इन लो स्टैंडर्ड की गाड़ियों में चढना-उतरना?”…

“बात तो तुम ठीक ही कर रहे हो”…

“सोच रहा हूँ कि अभी बुक करा देता हूँ..फैस्टिव सीज़न है…अच्छा-खासा डिस्काउंट मिल जाएगा”…

“लेकिन मर्सडीज़ लेने का मतलब हम कहीं ओवर बजट तो नहीं होते जा रहे?”….

“अरे!…पूरी फिल्म इंडस्ट्री क्या सिर्फ ‘सुभाष घई’ के दम पे चलती है?”….

“कला के कद्रदान भतेरे हैँ अपने इस बॉलीवुड में”…

“पहले सुभाष घई को खरीदने दो हमारी कहानी…उसके बाद बस तुम चुपचाप कोने में खड़ी हो कर तमाशा देखती रहना”….

“अपने आप ही ‘यश चोपड़ा’ से लेकर ‘विधु विनोद चोपड़ा’ तक….और  ‘शाहरुख’ से लेकर ‘सलमान’ तक सभी ने ब्लैंक चैक ले अपनी-अपनी होम प्रोडक्शन के लिए हमें साईन करने के वास्ते लाईन बना के खड़े हो जाना है”…

“लेकिन मेरा दिल कहता है कि कम से एक बार हमारी कहानी को लेकर  बिग बी ज़रूर फिल्म बनाएँ”…

“मेरी दिली तमन्ना भी यही है लेकिन क्या किसी के पास जा कर ऐसे काम मांगते हमें शोभा देगा?”….

“लेकिन अगर वो तुम्हारी प्रसिद्धी सुन खुद ही आ जाएँ तो?”…

“तो वायदा है ये राजीव का कि मेरा पहला प्रैफरैंस…पहला रुझाना उन्हीं की तरफ होगा”….

“आखिर ‘बिग बी’ सचमुच में बिग भी हैँ”….

{परिणाम घोषित}

“ज़रा कम्प्यूटर तो ऑन करना…आज ही नतीजा आना था”….

“एक मिनट!…पहले ये बालाजी टैलीफिल्मस का प्रसाद लो और कम्प्यूटर को चन्दन-तिलक कर सफलता प्राप्ति मंत्र का जाप करते हैँ”…

“ठीक है”…

ऊँ गणपति नमाय:….

ऊँ कम्प्यूटराय नम:….

ऊँ सुभाष घई नमाय:…

ऊँ बॉलीवुडाय नम:…

ऊँ लेखकाय नम:..

हाँ!…अब ऑन करो कम्प्यूटर”…

अरे वाह!…

देखो तो!…घई साहब ने खुद मेल भेजा है”….

“गुड!…वैरी गुड”…

“ये देखो!…सबजैक्ट में ‘अर्जैंट रिप्लाई नीडिड’ लिखा है”…

“इसका मतलब ज़रूर पूछना चाह रहे होंगे कि हमें पैसा एक नम्बर में चाहिए कि दो नम्बर में?”…

‘कैश’ में चाहिए या फिर ‘बैंक ड्राफ्ट’ के रूप में?”…

इंडिया में चाहिए या फिर अब्राड में?”…

हम तो साफ-साफ कह देंगे कि…..

“ओ जी!…हम ठहरे पक्के देशभक्त”…

“इस नाते पैसा हमें विदेश में नहीं बल्कि स्वदेश में चाहिए”…

“और वो भी नकद नहीं बल्कि ‘पे-आर्डर’ के रूप में”…

“अपना जितना टैक्स बनेगा…ईमानदारी से भर देंगे”…

“बिलकुल!…ज़मीर नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?”…

“हाँ!..एक बात उनको पहले से बोल देंगे”…

“क्या?”…

“यही कि पे आर्डर हमे सिंगल नेम पे नहीं बल्कि जॉयंट नेम पे चाहिए”…

“मतलब?”…

“अरे यार!…पे आर्डर पे हम दोनों का नाम होना चाहिए कि नहीं?”…

“वो किस खुशी में?”…

“क्यों?…मेरा भी हक बनता है कि नहीं?”…

“हक?…किस बात का हक?….और कैसा हक?”….

“प्लाट सोच…कहानी का ताना-बाना बुनूँ …मैँ”…..

“रात भर जाग-जाग के अपनी उँगलियाँ टकटकाऊँ…मैँ”…

“और जब माल कमाने की बारी आए तो   तुम फोकट में अपनी हिस्सेदारी जताने लगो?”…

“वाह…क्या सोच है तुम्हारी?”…

“हट ज्या सुसरी…पाच्छे  ने”


“कोई हक नहीं बनता तेरा”…

“हाँ…तुम्हारे लिए बार-बार चाय बनाऊँ …मैँ”…

“कहानियाँ लिखने के नए-नए आईडियाज़ खोज निकालूँ …मैँ”….

“तुम्हारे मैले-कुचैले …कपड़े-लीड़े धोऊँ…मैँ”…

“तुम्हारे नासपीटे….न्याणों को पालूँ…मैँ”…

“तुम्हारे जूठे-सुच्चे बर्तन माँजूँ….मैँ”….

“और जब चार पैसे कमाने की बारी आए…तो….

“हट ज्या…सुसरी…पाच्छे  ने”

“क्यों यार?…सुबह-सुबह….अच्छे-भले…बने-बनाए मूड को खराब करने पे तुली हो”….

“मैँ खराब करने पे तुली हूँ?”….

“और नहीं तो क्या?”…

“तो फिर सीधे-सीधे मेरा हक मुझे क्यों नहीं सौंप देते?”…

“अरे!..थोड़ा-बहुत हो तो मान भी जाऊँ…लेकिन तुम तो सीधे-सीधे आधा हिस्सा माँग रही हो”…

“तो क्या गलत कर रही हूँ?”…

“आज तुम ये जो लेखक का तमगा लगाए-लगाए फिर रहे हो ना?….

“वो सब मेरी ही देन है”…

“अच्छा?”…

“कई बार तो तुम्हारी टोका-टाकी के कारण मुझे अपनी कई कहानिय़ाँ बीच में ही रद्द कर रद्दी की टोकरी में फैंकनी  पड़ी  और तुम कह रही हो कि तुमने मुझे लेखक बनाने में मदद की?”…

“और नहीं तो क्या?”…

“सच-सच बताना…मेरे द्वारा की गई टोका-टाकी को तुमने कितनी बार अपनी कहानियों में हूबहू लिखा है?”…

“कई बार”…

“तो?”…

“चाहे वजह कोई भी रही हो…लेकिन तुमने जाने-अनजाने मेरी नकल तो की ही ना?”…

“हाँ!…ये तो है”…

“तो फिर मेरा आधा हिस्सा पक्का?”…

“हम्म!…आधा तो नहीं…लेकिन चलो…पैंतीस से चालीस परसैंट के बीच में कहीं ना कहीं तुम्हारी सैटिंग कर दूँगा”…

“नहीं!…बिलकुल नहीं”…

“तो फिर जाओ भाड़ में…अपना जो उखाड़ना हो…उखाड़ लो”…

“एक मिनट!…मुझे सोचने का मौका दो”…

“ओ.के….जो सोचना है..जल्दी सोचो”…

“ज़्यादा वक्त नहीं है मेरे पास”…

“ठीक है…मैँ काम्प्रोमाईज़ करने को तैयार हूँ”…
“हमारे आपसी इस झगड़े की वजह से तुम कहीं पति से ‘एक्स पति’ ना हो जाओ ….इसलिए मान जाती हूँ…..वर्ना कोई और हो तो आधे हिस्से से कम का तो सवाल ही नहीं पैदा होता”…

“चलो…अब ओपन करो मेल”..

“ओ.के”….

“ओह!…ये क्या?”…

“शिट!…शिट….शिट…..

मेरी कहानी तो अंतिम दस में भी नहीं पहुँच पाई”…..

“ज़रूर तुम्हें गल्ती लगी है….वर्ना  ये ऊपर  ‘अर्जैंट रिप्लाई’ ना लिखा होता”….

“उत्तर देने के लिए लिखा है कि हमारी हिम्मत कैसे हुई उसे ये बेकार की…..सड़ी सी…वाहियात कहानी भेज उसका कीमती समय खराब करने की”…

“हुँह…दो-चार हिट फिल्में क्या बना ली”…

“बड़ा तीसमारखाँ समझता है खुद को”…

“मेरी कहानी को बेकार की कह रद्दी की टोकरी में डालने वाले  पहले आईने में खुद को तो झाँक के देख”….

“ये तो पब्लिक पागल है वर्ना तेरी फिल्लम तो पहले हफ्ते में ही ठुस्स हो जाए”….

बता…क्या अनोखा मसाला होता है तेरी कहानियों में जो मैँने नहीं डाला?”…

“ओ जनाब जी…ये नींद में बड़बड़ाते हुए किस पे गरम हुए जा रहे हो?”…

“उठो!…सुबह हो गई है”…

“ये क्या?…रात को तो कह रहे थे कि पूरी कहानी एक ही बार में लिख कर सुभाष जी को मेल करूँगा और यहाँ तो एक पेज भी लिखा दिखाई नहीं दे रहा है”…

“ओह!…लगता है कि लिखना शुरू करने से पहले ही आँख लग गई थी”…

“कोई बात नहीं!..अभी तो पूरे पंद्रह दिन पड़े हैँ कहानी भेजने में”…

“अपना …आराम से बाद में लिख लेना”…

“नहीं…बाद में नहीं….अभी से सोच-सोच के लिखना शुरू करूँगा तभी टाईम पे पूरी हो पाएगी”…

“ओ.के…जैसी तुम्हारी मर्ज़ी”…

“लिखने से पहले एक बात अच्छी तरह दिमाग में बिठा लेना कि तुमने अपने लेखन से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना है”…

“ऊपरवाले का दिया बहुत कुछ है”…

“ईनाम भले ही मिले ना मिले…लेकिन एक पहचान ज़रूर मिले”…

“जी”….

“ऐसी नेक और पाक कोशिश करोगे तो इंशाअल्लाह एक ना एक दिन सफलता तुम्हारे कदम ज़रूर चूमेगी”…

“आमीन”…

“हा…हा…हा….हा”…

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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