"बम चिकी बम…बम….बम"

***राजीव तनेजा***

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"बोल बम चिकी बम चिकी बम…बम….बम"

"बम….बम…बम"….

"बम….बम…बम"(सम्वेत स्वर)…

"परम पूज्य स्वामी श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की जय"….

"जय"….

"जय हो श्री श्री 108 सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में नतमस्तक हो गया

"प्रणाम गुरूवर"….

"जीते रहो वत्स"….

"क्या बात?…कुछ परेशान से दिखाई दे रहे हो"….

"क्कुछ खास नहीं महराज"…

"कोई ना कोई कष्ट तो तुझे ज़रूर है बच्चा"…..

"तुम्हारे माथे पे खिंची हुई आड़ी-तिरछी रेखाएँ बता रही हैँ कि तुम किसी गहरी सोच में डूबे हुए हो"….

"बस ऐसे ही…

"कहीं ट्वैंटी-ट्वैंटी के वर्ल्ड कप में……

"ना..ना महराज ना….जब से ‘आई.पी.एल’ के मैचों में मुँह की खाई है…तब से ही तौबा कर ली"…

"सट्टा खेलने से?"…

"ना…ना महराज ना…बिना सट्टे के तो जीवन बस अधूरा सा लगता है"….

"तो फिर किस चीज़ से तौबा कर ली तुमने?"…

"’टी.वी’ देखना छोड़ दिया है मैँने…यहाँ तक कि अपना फेवरेट प्रोग्राम…"खाँस इंडिया खाँस" भी नहीं देखता आजकल

"सोच रहा हूँ कि टी.वी की तरफ रुख कर के सोना भी छोड़ दूँ….ना जाने बुरी लत फिर कब लग जाए"…

"तो फिर क्या कष्ट है बच्चा?"….

"कहीं घर में बीवी या भौजाई से किसी किस्म का कोई झगड़ा या क्लेश?….

"ना….ना महराज ना….भाभी तो मेरी एकदम शशिकला के माफिक सीधी…सच्ची और भोली है"…

"और बीवी?"….

"वो तो जैसे कलयुग में  साक्षात निरूपा रॉय की अवतार"….

"तो फिर क्या बच्चे तुम्हारे कहे अनुसार नहीं चलते?"…

"ना..ना महराज ना…पिछले जन्म में तो मैँने ज़रूर मोती दान किए होंगे जो मुझे प्राण…रंजीत और शक्ति कपूर जैसे होनहार…नेक और तेजस्वी बालक मिले….ऐसी औलादें तो भगवान हर माँ-बाप को दे"..

"तो फिर काम-धन्धे में कोई रुकावट?……कोई परेशानी?"…

"ना…ना महराज ना…जब से आपने उस एक्साईज़ वाले से हरामखोर से सैटिंग करवाई है….अपना धन्धा तो एकदम चोखा चल रहा है"…

"तो इसका मतलब यूँ समझ लें कि दिन-रात लक्ष्मी मईय्या की फुल्ल बटा फुल्ल कृपा रहती है"…

"जी…बिलकुल"….

"तो फिर चक्कर क्या है?"…

"चक्कर?….कैसा चक्कर?…कौन सा चक्कर?"…

"ओफ्फो!…बीवी तुम्हारी नेक एवं सीधी-साधी है"….

"जी महराज"…

"बच्चे तुम्हारे गुणवान हैँ"…

"ज्ज…जी महराज"…

"धन्धा पूरे ज़ोरों पर चल रहा है"…

"जी महराज"…

"तो फिर भईय्ये!…तन्ने के परेशानी सै?"…

"अब क्या बताऊँ स्वामी जी…आज के ज़माने में भाई का भाई पर से विश्वास उठ चुका है…दोस्त एक दूसरे से दगा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैँ…नौकर का मालिक पर से और मालिक का नौकर के ऊपर से विश्वास उठ चुका है"…

"तो?"…

"सच कहूँ तो स्वामी जी…जब अपने चारों तरफ ऐसे अँधकार भरे माहौल को देखता हूँ तो अपने मनुष्य जीवन से घिन्न आने लगती है….जी चाहता है कि ये मोह-माया त्यागूँ और अभी के अभी सब कुछ छोड़-छाड़ के सन्यास ले लूँ?"…

"के बात?…म्हारे सिंहासण पे कब्जा करणा चाहवे सै?"…

"ना …महराज ना…कीस्सी बातां करो सो?"…

"कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली?"…

"म्हारी के औकात कि थम्म जीस्से पहाड़ से मुकाबला कर सकूँ"…

"कोशिश भी ना करियो….जाणे सै नां कि म्हारे लिंक घण्णी ऊपर तक…

"ज्जी…जी महराज"….

"ईब्ब साफ-साफ बता मन्ने कि के कष्ट सै तन्ने?…

"के बताऊँ महराज….इस वाईनी की खबर ने घण्णा दिमाग खराब कर रखा सै"….

"खबर?….कूण से वाईनी की खबर?"…

"अरे!…वो बैंगस्टर वाला वाईनी….और कौन?"….

"के पुलिस ने गोल्ली मार दी?"….

"ना…ना महराज ना…कीस्सी अनहोणी बात करो सो?…..ऊपरवाले को बी ईस्से लोगां की जरूरत नां सै….इस णाते ससुरा कम्म से कम्म  सौ साल और जीवेगा"…

"ईसा के गजब ढा दिया इस छोकरे णे के सौ साल जीवेगा?"…

"नूं तो कई नाटकां में हीरो का रोल कर राख्या सै पट्ठे ने लेकिन असल जिन्दगी में तो पूरा विल्लन निकल्या…पूरा विल्लन"…

"के बात करे सै?"…

"लगता है महराज जी आप यो पंजाब केसरी अखबार ने सिरफ नंगी हिरोईणां के फोटू देखण ताईं मंगवाओ सो"…

"के मतबल्ल?"…

"रोज तो खबर छप रही सै अखबार म कि वाईनी की नौकरानी ने उस पर ब्लात्कार करने का आरोप लगाया है"…

"अरे!…आरोप लगाने से क्या होता है?"…आरोप तो हर्षद मेहता ने भी अपने नरसिम्हा जी पर लगाए थे लेकिन हुआ क्या?"…

"चिंता ना कर….यहाँ भी कुछ नहीं होने वाला"….

"पैसे में बहुत ताकत होती है…कल को छोकरी खुद ही तमाम आरोपों से मुकर जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं"…

"वैसे मुझे इन मीडिया वालों पर बड़ी खुन्दक आती है"…

"वो किसलिए महराज?"…

"ये बार-बार अखबार…टीवी और मैग्ज़ीनों वाले जो ‘ब्लात्कार-ब्लात्कार’ कर रहे हैँ…इन्हें खुद ‘ब्लात्कार‘ का मतलब नहीं पता"…

"क्या बात करते हैँ स्वामी जी…आजकल तो बच्चे-बच्चे को मालुम है कि ‘ब्लात्कार’ किसे कहते हैँ?…कैसे किया जाता है"….कितनी तरह के ब्लात्कार होते हैँ वगैरा-वगैरा"…

"तो चलो तुम्हीं बता दो कि ‘ब्लात्कार’ किसे कहते हैँ?"….

"इसमें क्या है?….किसी की मर्ज़ी के बिना अगर उसके साथ सैक्स किया जाए तो उसे ब्लात्कार कहते हैँ"…

"ये तुमसे किस गधे ने कह दिया?"…

"कहना क्या है?….मुझे मालुम है"…

"बस यही तो खामी है हमारी आज की युवा पीढी में….पता कुछ होता नहीं है और बनती है फन्ने खाँ"…

"तो आपके हिसाब से ‘ब्लात्कार’ का मतलब कुछ और होता है?"…

"बिलकुल"…

"तो फिर आप अपने ज्ञान से मुझे कृतार्थ करें"…

"बिलकुल…तुम अगर ना भी कहते तो भी मैँ तुम्हें समझाए बिना नहीं मानता"…

"ठीक है!…फिर बताएँ कि क्या मतलब होता है ‘ब्लात्कार’ का"…

"देखो!…’ब्लात्कार’ शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है…बलात+कार=ब्लात्कार अर्थात बल के प्रयोग से किया जाने वाला कार्य"…

"जी"…

"इसका मतलब जिस किसी भी कार्य को करने में बल या ताकत का प्रयोग किया जाए उसे ब्लात्कार कहते हैँ?"…

"यकीनन"…

"इसका मतलब अगर खेतों में किसान बैलों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें हल में जोतता है तो ये कार्य भी ब्लात्कार की श्रेणी में आएगा?"…

"बिलकुल…सीधे और सरल शब्दों में इसे किसान द्वारा  निरीह बैलों का ब्लात्कार किया जाना कहा जाएगा और इसे कमर्शियल अर्थात व्यवसायिक श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"और अगर हम अपने बच्चों को डांट-डपट कर पढने के लिए मजबूर करते हैँ तो?"…

"तो ये भी माँ-बाप के द्वारा बच्चों का ब्लात्कार कहलाएगा और इसे डोमैस्टिक अर्थात घरेलू श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"और अगर फौज का कोई मेजर या जनरल अपने सैनिकों को दुश्मन पर हमला बोलने का हुक्म देता है तो?"….

"अगर सैनिक देशभक्ति से ओत-प्रोत हो अपनी मर्ज़ी से इस कार्य को अंजाम देते हैँ तो अलग बात है वर्ना ये भी अफसरों द्वारा सनिकों का ब्लात्कार कहलाएगा"…

"इसे तो नैशनल अर्थात राष्ट्रीय श्रेणी का ब्लात्कार कहा जाएगा ना?"

"बिलकुल"…

"तो इसका मतलब …कार्य कोई भी हो….अगर मर्ज़ी से नहीं किया गया तो वो ब्लात्कार  ही कहलाएगा?"…

"बिलकुल"…

"अगर तुम्हारी बीवी तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के बिना बैंगन या करेला खाने पर मजबूर करती है तो इसे भी पत्नि द्वारा पति का ब्लात्कार कहा जाएगा"…

"या फिर अगर आप अपनी पत्नि की इच्छा के विरुद्ध उसे सास-बहू के सीरियलों के बजाय  किसी खबरिया चैनल पर बेहूदी खबरें देखने के लिए मजबूर करते हैँ तो इसे भी पति द्वारा आपकी पत्नि का ब्लात्कार ही कहा जाएगा" 

"लेकिन महराज एक संशय मेरी दिमागी भंवर में गोते खा रहा है"…

"वो क्या?"…

"यही कि क्या सैक्स करना बुरा है?"….

"नहीं!…बिलकुल नहीं"….

"अगर ऐसा होता तो हमारे यहाँ अजंता और ऐलोरा की गुफाओं और खजुराहो के मंदिरो में रतिक्रिया से संबंधित मूर्तियाँ और तस्वीरें ना बनी होती"…

"हमारे पूर्वजों ने उन्हें बनाया ही इसलिए कि आने वाली नस्लें इन्हें देखें और देखती रहें ताकि वे अन्य अवांछित कार्यों में व्यस्त हो कर इस पवित्र एवं पावन कार्य को भूले से भी  भूल ना पाएँ"….

"ओशो रजनीश ने भी तो फ्री सैक्स की इसी धारणा को अपनाया था ना?"…..

"सिर्फ अपनाया ही नहीं बल्कि इसे देश-विदेश में लोकप्रिय भी बनाया"…

"जी"…

"उनकी इसी धारणा की बदौलत पूरे संसार में उनके लाखों अनुयायी बने और अब भी बनते जा रहे हैँ"…

"स्वयंसेवकों के एक बड़े कैडर ने उनकी धारणाओं एवं मान्यताओं को पूरे विश्व में फैलाने का बीड़ा उठाया हुआ है इस नाते वे पूरे संसार में उनकी शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार कर रहे हैँ"…

"अगर ये कार्य इतना ही अच्छा एवं पवित्र है तो फिर हमारे यहाँ इसे बुरा कार्य क्यों समझा जाता है?"….

"ये तुमसे किसने कहा?"…अगर ऐसा होता तो आज हम आबादी के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे नम्बर पर ना होते"…

"स्वामी जी!…कुकर्म का मतलब बुरा कर्म होता है ना?"….

"हाँ…बिलकुल"…

"और आपके हिसाब से रतिक्रिया करना अच्छी बात है लेकिन ये अखबार वाले तो इसे बुरा कार्य बता रहे हैँ"…

"वो कैसे?"…

"आप खुद ही इस खबर को देखें….यहाँ साफ-साफ लिखा है कि….

"फलाने-फलाने ‘एम.एल.ए’ का पी.ए’ फलानी-फलानी स्टैनो के साथ कुकर्म के जुर्म में पकड़ा गया"….

"इसीलिए तो मुझे गुस्सा आता है इन अधकचरे अखबार नफीसों पर…कि ढंग से ‘अलिफ’… ‘बे’ आती नहीं है और चल पड़ते हैँ मुशायरे में शायरी पढने"…

"बेवाकूफो….कुकर्म का मतलब होता है कु+कर्म=कुकर्म अर्थात बुरा कर्म और सुकर्म का मतलब होता है सु+कर्म=सुकर्म अर्थात अच्छा कर्म

"पागल के बच्चे…जिसे बुरा कर्म बता रहे हैँ….उस कर्म के बिना तो खुद उनका भी वजूद नहीं होना था"…
"इतना भी नहीं जानते कि ये कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म है….याने के अच्छा कार्य….ये तो सोचो नामाकूलो कि अगर ये कार्य ना हो तो इस पृथ्वी पर बचेगा क्या…
टट्टू?

"ना जीव-जंतु होंगे…ना पेड़-पौधे होंगे और ना ही हम मनुष्य होंगे और अगर हम ही नहीं होंगे तो ना ये ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ होंगी और ना ही कल-कल करते हुए कल-कारखाने होंगे….ना ये सड़कें होंगी और ना ही घोड़ा गाड़ियाँ होंगी"….

"घोड़ा गाड़ियाँ क्या….छोटी या बड़ी…किसी भी किस्म की गाड़ियाँ नहीं होंगी"…

"हर तरफ बस धूल ही धूल जैसे चाँद पर या फिर किसी अन्य तारा मण्डल पर"

"लेकिन इन्हें इस सब से भला क्या सरोकार?…इन्हें तो बस अपनी तनख्वाह से मतलब रहता है भले ही इनकी वजह से अर्थ का अनर्थ होता फिरे…इन्हें कोई परवाह नहीं…कोई फिक्र नहीं"…

"अब "बोया पेड़ बबूल का तो फल कहाँ से आए?"…

"मतलब?"…

"अब जैसा सीखेंगे…वैसा ही तो लिखेंगे"…

"सीखने वाले भी पागल और सिखाने वाले भी पागल"…

"तो फिर आपके हिसाब से कैसे खबरें छपनी चाहिए?"…

"कैसी क्या?…जैसी हैँ…वैसे छपनी चाहिए"…

"मतलब?"…

"मतलब कि लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए"…

"जैसे?"…

"चार पुलिसकर्मी एक नाबालिग लड़की के साथ ज़बरदस्ती सुकर्म करने के आरोप में पकड़े गए" या फिर…

"सार्वजनिक स्थल पर सुकर्म की चेष्टा में एक अफगानी जोड़ा गिरफ्तार"

"इस खबर में यकीनन लड़्की की मर्ज़ी से सुकर्म को अमली जामा नहीं पहनाया गया होगा"…

"जी"…

"कार्य चाहे मर्ज़ी से हुआ या फिर बिना मर्ज़ी के लेकिन कार्य तो अच्छा ही हुआ ना?

"ज्जी"…

"इस नाते यहाँ नीयत का दोष है ना कि कार्य का…और हमारी…तुम्हारी और आपकी शराफत और भलमनसत तो यही कहती है कि हम बिला वजह किसी अच्छे कार्य को बुरा कह उसे बदनाम ना करें"…

"जी बिलकुल"…

"लेकिन अगर नीयत खोटी है और कार्य भी खोटा है तो उसे यकीनन बुरा कर्म अर्थात कुकर्म ही कहा जाएगा"…

"जैसे?"…

"जैसे अगर कोई चोर चोरी करता है तो वो बुरा कर्म याने के बुरा कार्य हुआ…उसे किसी भी संदर्भ में अच्छा कार्य नहीं कहा जा सकता"…

"लेकिन इसके भी तो कई अपवाद हो सकते हैँ ना गुरूदेव?"..

"कैसे?"….

"अगर हमारे देश की इंटलीजैंस का कोई जासूस दुश्मन देश में जा कर हमारे हित के दस्तावेजों की चोरी करता है तो उसे कुकर्म नहीं बल्कि सुकर्म कहा जाएगा"…

"हाँ!…लेकिन दूसरे देश की नज़रों में बिना किसी शक और शुबह के ये कुकर्म ही कहलाएगा

"धन्य हैँ गुरूदेव आप…आपने तो मुझ बुरबक्क की आँखों पे बँधी अज्ञान की पट्टी को हटा मुझे अपने ओजस्वी ज्ञान से दरबदर…ऊप्स सॉरी तरबतर कर मालामाल कर दिया"..

"बोलो…. बम चिकी बम चिकी बम…बम….बम"

"बम….बम…बम"….

"बम….बम…बम"(सम्वेत स्वर)…

"परम पूज्य स्वामी श्री सुकर्मानन्द महराज की जय"….

"जय"….

"जय हो श्री सुकर्मानन्द महराज की"मैँने ज़ोर से जयकारा लगाया और गुरू के चरणॉं में फिर से नतमस्तक हो गया

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja(Delhi,India)

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एक बराबर

“एक बराबर” 

***राजीव तनेजा***

rape

“बाप रे!…क्या ज़माना आ गया है”…

“क्या हुआ?”…

“कलयुग!…घोर कलयुग”…

“क्यों सुबह-सुबह ज़माने को कोसे चली जा रही हो?”…

“कुछ बताओगी भी या यूँ ही बेफाल्तू में घोर कलयुग…घोर कलयुग नाम का एक ही डॉयलाग मार फुटेज खाती

रहोगी?”…

“मुझे नहीं पता…बस अभी के अभी तुम अपना ये ब्लॉग डिलीट कर दो”…

“क्यों?…क्या हुआ?”…

“आखिर!…पता तो चले”…

“क्यों मैडम जी हाथ धो के पड़ गई हैँ मेरे  ब्लॉग के पीछे?”…

“कह दिया ना एक बार!…बस अभी एक अभी ये ब्लॉग डिलीट हो जाना चाहिए”….

“और नहीं किया तो?”…

“तो सम्भालो अपनी धर्मशाला….मैँ तो चली अपने मायके”…

“दो दिन में नानी ना याद आ जाए तो मैँ भी अपने बाप की बेटी नहीं”…

“हद है!…अच्छा भला लोगों को हँसा रहा हूँ और इसमें भी तुम्हें दिक्कत हो रही है?”…

“छोड़ अब!..बहुत हो ली हँसी-हँसाई”…

“जितना वक्त तुम अपने इस निगोड़े ब्लॉग को देते हो ना…उतना अगर कहीं और लगाओ तो जम कर नोट बरसें…नोट”…

“ये नहीं होता जनाब से कि ये वेल्ला काम छोड़ के कोई ढंग का काम कर लें”…

“एक दिन इसी मुय्ये ब्लॉग के चक्कर में तुम्हारी खुद की जग हँसाई ना हो जाए तो मेरा नाम ‘पारो  से बदल कर ‘चँद्रमुखी’ रख देना”…

“क्यों क्या हुआ?”…

“क्या दिक्कत है तुम्हें इतने बढिया नाम से?”…

“अच्छा भला तो है …‘पारो’

“मुझे दिक्कत अपने नाम से नहीं बल्कि तुम्हारे ब्लॉग से है”…

“क्यों?..क्या हुआ है मेरे ब्लॉग को?”…

“अच्छा भला तो चल रहा है”…

“बिना कोई पोस्ट डाले ही दस-बीस रीडर रोज़ाना के हिसाब से अपनी हाजरी बजा जाते हैँ”…

“वोही तो…पता नहीं कैसे कैसे लोग पढते होंगे तुम्हारी कहानियाँ?और…

इस लिखने-लिखाने के चक्कर में कैसे-कैसे लोगों से तुम्हारा दोस्ताना हो रहा होगा आजकल” …

“गलत लोगों की सोहबत में पड़कर कहीं तुम भी…

“क्या हुआ?…

“ये देखो!…ये ब्लॉगर लोग आजकल कैसी लो स्टैंडड की  गिरी हुई ओछी हरकते करने लग गए हैँ?”…

“कमीने कहीं के”..

“क्यों?…क्या हुआ है ब्लॉगरों को?”…

“क्यों ब्लॉगरों जैसे सीधे-साधे जंतुओं को उनकी पीठ पीछे नाहक बदनाम कर रही हो?”..

“पीठ पीछे?”…

“अरे!…वो *&ं%$#@ मेरे सामने आ जाए सही…अभी के अभी जूतियाँ मार-मार के सर गंजा ना कर दूँ तो मेरा भी नाम…..

“पारो नहीं”…

“अरे यार!…क्यों गुस्सा खा रही हो इतना?”…

“पता तो चले कि आखिर हुआ क्या है?”…

“एक बात बताऊँ?”…

“जिसे तुम गंजा करने की प्लानिंग बना रही हो ना…वो तो शुरू से ही टकला है”

“हा हा हा हा”…

“तुम भी ना!…कुछ ना कुछ बकवास कर के वक्त-बेवक्त हँसा दिया करो”…

“अरे यार!..तुम गुस्से में थी तो मैँने सोचा कि….

अरे!…गुस्सा कहाँ खा रही हूँ?”…

“मैँ तो जैसा पढ रही हूँ…वैसा ही बता रही हूँ”

“क्या पढ रही हो?”…

“ये देखो!…इन ब्लॉगर सज्जन को ही लो….कोतवाली पुलिस पकड़ कर ले गई है थाने”…

“हुँह!…बनते तो बहुत बड़े समाज सुधारक हैँ और…काम ऐसे-ऐसे?”…

“छी”….

“किसकी बात कर रही हो?”…

“अरे!..उसी की बात कर रही हूँ जिसने अपनी तथा अपने साथियों की भड़ास उगलती पोस्टस के जरिए समाज को सुधारने का ठेका लिया हुआ है”…

“नहीं!…वो नहीं..कोई और होगा”..

“ज़रूर!..तुमसे कोई मिस्टेक हुई है”…

“ज़रा!..ध्यान से पढ के बताओ”…

“शायद!…कुछ और लिखा हो”…

“गलतफहमी भी हो सकती है”

“ये देखो!…साफ साफ तो लिखा है…तुम खुद ही पढ लो”…

“एक मिनट!…पहले ये मटर तो छील लूँ”…

“रहने दो!…थोड़े ही बचे हैँ…मैँ अपने आप छील लूँगी”

“नहीं!…बाद में तुम्हीं ने ताना मारना है कि….मेरी कोई हैल्प नहीं करते”

“तो मैँ क्या झूठ बोलती हूँ?”…

“बताओ…कब की है मेरी हैल्प?”…

“ये मटर क्या ऐंव्वे ही छील रहा हूँ?”…

“हुँह!…ज़रा से मटर हैँ….ये तो मैँ खुद भी छील लेती …इसमें कौन सा पहाड़ तोड़ना है?”…

“तो क्या मैँ भी ‘खली दा ग्रेंट’ की तरह पत्थर तोड़ूँ?” …

“रहने दो…रहने तो तुम्हारे बस की नहीं है ये सब”…

“वो पत्थर तोड़ते तोड़ते पता नहीं कहाँ का कहाँ पहुँच गया और ‘शाहरुख’ से लेकर ‘तेंदुलकर’ तक के बच्चे उसके दिवाने हैँ और खुद उसे अपने घर पे लंच और डिनर के लिए इनवाईट करते हैँ”….

“अब तो फिल्मों में भी उसे चाँस मिलने लगा है”…

“चिंता ना करो!.मेरे भी दिन पलटने वाले हैँ”….

“मेरे लिए तो बस तुम  ये मटर…टिण्डा…खीरा….और मूली वगैरा छीलते-काटते एक दिन छोटे-मोटे लिक्खाड़ बन जाओ..यही बहुत है”…

“हाँ!…हो गया”…

“अब बताओ कि…क्या हुआ है?”मैँ तौलिए से हाथ पोंछता हुआ बोला…

“यही कि..तुम्हारा चहेता ब्लागर साथी रेप के इलज़ाम में पकड़ा गया है”…

“रेप?”…

“कौन सा?”…

“अरे वही!…जो हमेशा कुछ उगलने…उगलवाने की बात करता है”…

“ओह!…फिलहाल कहाँ है?”…

“क्या अभी भी अन्दर है?”…

“नहीं!…ज़मानत तो उसी दिन शाम को ही हो गई थी उसकी”…

“बाकि केस तो चलता ही रहेगा”…

“पता नहीं ऐसे निगोड़े लोगों को भी ज़मानती कैसे आसानी से मिल जाते हैँ”…

“ये देखो…मोटे अक्षरों में साफ-साफ लिखा है कि “भड़ास उगलता नामी बलॉगर बलात्कार की कोशिश में पकड़ा गया”…

“कहाँ?”…


“अरी बेवाकूफ!….ये तो कोई दो-ढाई महीने पुरानी बासी खबर है और तू मुझे आज सुना रही है?”…

“इसके बारे में तो मुझे पहले से ही पता था”…

“तो फिर मुझे क्यों नहीं बताई ये बात?”…

“वो बस ऐसे ही…दिमाग से उतर गया होगा”…

“हुँह!…दिमाग से उतर गया होगा”…

“सब जानती हूँ मैँ…तुम्हें भी और तुम्हारे दिमाग को भी”…

“क्या सोचा था? कि तुम नहीं बताओगे तो  मुझे पता नहीं चलेगी ये खबर”…

“अरे यार!…रात गई ..बात गई”…

“अब इस बारे में बात कर के क्या फायदा?”…

“तो क्या हुआ?”…

“खबर है तो सच्ची ही है ना?”…

“पता नहीं”…

“एक काम करो”….

“क्या?”…

“चिट्ठाजगत या फिर ब्लॉगवाणी की साईट ओपन करो और उनके पुराने अर्काईव चैक करो”…

“अगर डिलीट नहीं हुए होंगे तो इस बारे में कुछ मालुमात तो अभी भी मिल ही जाएँगे”…

“ओ.के”…

“ओह!…यहाँ तो लगभग हर ब्लॉग पे इसी बारे में कोई ना कोई पोस्ट है”…

“इसका मतलब दो महीने पुराना ये मुद्दा अभी भी ब्लॉगजगत की सुर्खियों में छाया हुआ है”…

“पागल हैँ स्साले!…सब के सब …मेहनत कोई करे…और मौके का फायदा ये मुफ्त में उठाना चाहते हैँ”…

“अरे!…अगर तुम में दम है तो खुद करो ना बलात्कार की कोशिश और बाद में उसे अपने ब्लाग की हैडलाईन बना सुर्खियों में रहो”…

“ऐसे ही मुफ्त में नहीं हो जाता किसी से बलात्कार”…

“इसके लिए… ये बड़ा…कलेजा चाहिए होता है पत्थर का”…

“गुर्दे में दम होना चाहिए”…

“रोते बिलखते आँसुओं को नकारने की हिम्मत होनी चाहिए”…

“चीखती चिल्लाती आवाज़ों को बहरा बन अनसुना करने की कला होनी चाहिए”…

“इसका मतलब…बड़ी मतलब परस्त है तुम ब्लॉगरों की ये दुनिया”…

“यहाँ तो लगे हाथ हर कोई जलते तवे पे रोटियाँ सेंक अपने ब्ळॉग की रीडरशिप बढाना चाहता है”…

“हाँ!..उन्हें इस से कोई सरोकार नहीं कि क्या बीत रही होगी उस बेचारी अबला नारी पर?…उसके पति पर?…उसके बच्चों पर?…उसके रिश्तेदारों पर?”

“क्या बात?…बड़ा तरस आ रहा है तुम्हें उस औरत पर”….

“कहीं तुम भी उसी की नेचर के तो नहीं हो?”…

“अरे यार!…क्या बात करती हो?”…

“मैँने तो ऐसे ही सरसरी तौर पर कह दिया था”…

“यही तो कमी है तुम मर्दों में कि बिना सोचे-समझे कुछ भी कह डालते हो”..

“मुझे देखो!…कोई भी बात मुँह से निकालने से पहले ये सोचती हूँ कि मैँ ये बोलूँगी तो सामने वाला क्या सोचेगा? और क्या जवाब देगा?”…

“फिर वो ये जवाब देगा तो मुझे उसके उत्तर में ये कहना होगा और अगर वो ये नहीं बल्कि  कुछ और कहेगा तो मुझे भी ये नहीं कुछ और ही कहना होगा”…

“ओफ्फो!…क्या बेकार में…बेफाल्तू का कंफ्यूज़न क्रिएट कर रही हो?”…

“हमें क्या पता कि किसकी गल्ती है और किसकी नहीं?”…

“ये भी तो हो सकता है कि सारा कसूर उस औरत का ही हो और हम बेकार में नाहक ही अपने बलॉगर भाई को बदनाम कर रहे हों”…

“क्या ये नहीं हो सकता कि खुद उसी औरत ने उकसाया हो इस सब के लिए और किसी के द्वारा देख लिए जाने के कारण खुद को सती-सावित्री साबित करते हुए बेचारे ब्लॉगर पे ही सारा का सारा इलज़ाम लगा दिया हो”

“और नहीं तो क्या?”…

“हाँ!…होने को तो कुछ भी हो सकता है”..

“ये देखो क्या लिखा है?”…

“क्या लिखा है?”…

“यही कि वो(दोस्त की बीवी) उसकी चहेती सहेली थी”…

“चहेती माने?”…

“उड़ती-उड़ती सी अफ्फाहें सी सुनी हैँ कईयों ने कि दोनों रोज़ शाम को एक साथ घूमा करते थे कभी पालिका बाज़ार तो कभी हॉट बाज़ार”…

“हाँ!…एक ने तो उन्हें चाँदनी रात के सन्नाटे में इण्डिया गेट पे हाथों में हाथ डाले घूमते हुए भी देखा था”….

“ओह”…

लेकिन उसकी बात का कोई भरोसा नहीं”…

“क्यों?”…
“स्साले!…के चश्मे का नम्बर ना जाने कब से बढा हुआ है और वो कंजूस-मक्खीचूस अभी भी वो दो दशक पुराना चश्मा ही घसीटे जा रहा है”…

“देख के बताओ तो ज़रा कि क्या दिल्ली की ही रहने वाली है वो?”
“नहीं?”…

“फिर वो उसे कहाँ मिल गई?”…

“बाहरले गाँव से आ के ठहरी हुई थी उसी के यहाँ”…

“काहे को?”…

“अरे!…उसके पति की एक्सीडैंट में मौत हो गई थी”…

“तो?”…

“काम की तलाश में दिल्ली आई थी कि यहाँ रहकर …

“आई क्या होगी?…

इसी ने खुद ज़िद कर के बुलवा लिया होगा कि यहाँ दिल्ली आ जाओ…नौकरी लगवा दूँगा”…

“फिर?”…

“अरे!…नौकरियाँ क्या पेड़ पे लटकती फिरती हैँ कि जब जी चाहा…कोई अच्छी सी  लपक ली?”…

“कई दिनों तक लारा-लप्पा लगाता रहा कि आज मिलेगी नौकरी या फिर कल मिलेगी नौकरी”…

“खुद की बीवी मायके गई हुई थी तो पीछे से एक दिन नीयत डोल गई और कर बैठा बलात्कार”…

“अभी तुम तो कह रही थी कि कोशिश में पकड़ा गया”….

“एक ही बात है….वहाँ इज़्ज़त आबरू बच गई तो क्या?….

“ये मीडिया और पुलिस वाले वकीलों के साथ मिलकर वाले बार-बार बेहूदे सवाल पूछ के उसकी रही सही इज़्ज़त भी निलाम कर देंगे कि नहीं?”…

“पता नहीं इनके घर में भी माँ-बहन होती होंगी या नहीं?”…

“सारा दोष उस बेचारे अकेले के ही नाम क्यों …गलती तो उसकी बीवी की भी है इसमें”…

“क्यों?…क्या गल्ती है इसमें बीवी की?”…

“उसने क्या किया है?”…

“सौ ना सही!…तो कम से कम चालीस परसैंट भागीदार तो उसकी बीवी भी है”…

“इस बलात्कार में?”…

“और नहीं तो क्या”…

“वो कैसे?”…

“डाक्टर ने नहीं कहा था उसे कि सूखी घास-फूस को जलती डिबिया(दिया)के पास रख कर खुद मायके चली जाओ”…

“अरे!…उसके सामने तो भैय्या-भैया ही करती रहती होगी”

“तो क्या राखी भी बाँध दी थी?”

“मन तो करता है कि ध्यान ही ना दूँ ऐसी बातों पर लेकिन घूमफिर के फिर दिमाग उसी तरफ चला जाता है”…

“छोड़ो ना!..हमें क्या लेना दूसरे के पचड़े में खुद को फँसा के?”…

“कल की अखबार देखी कि नहीं?”…

“क्यों?…क्या लिखा है उसमें?”…

“यही कि एक कलयुगी भाँजा अपनी 55 वर्षीय लकवा ग्रस्त वृद्ध मामी के साथ ब्लात्कार कर भाग निकला”…

“ओह”…

“पता नहीं क्या होता जा रहा है हमारे समाज को”…

“रोज़ ही ऐसी खबरे मीडिया वाले बढा-चढा कर छाप रहे होते हैँ कि फलानी-फलानी जगह पर…फलाने फलाने मोहल्ले में में एक नाबालिग से ब्लात्कार किया गया”…

“ऐसी भी क्या अँधी हवस?”….

“मेरे एक बात समझ नहीं आती कि आखिर क्या मिलता होगा तुम मर्दों को किसी के साथ ऐसे ज़ोर-ज़बरदस्ती कर के?”…

“अरे!…मिलना-मिलाना क्या होता है?”…

“कु6थित मानसिकता के अलावा और कुछ नहीं है ये”…

“ये भी तो हो सकता है कि उस ब्लॉगर की ईगो को उस औरत ने जाने-अनजाने हर्ट किया हो और उसने अपने अहम की…अपने आत्म सम्मान की रक्षा की खातिर ऐसा कदम उठाया होगा”…

“हाँ!..जैसे तुम लड़कों का ही आत्म सम्मान होता है ..ईगो होती है…हम लड़कियों को तो भगवान ने ऐसे ही बेफाल्तू में बना के छोड़ दिया है ना?”…

“अब कोई फायदा है ऐसी बेफाल्तू की बेवजह में बहस करने का?”…

“तो मैँ कहाँ कह रही हूँ कि तुम मुझसे इस टॉपिक पे बात करो?”…

“मेरे ख्याल से तो इस सब पे रोक लगाने के लिए सरकार को ही पहल करनी होगी”…

“सख्त से सख्त कानून बना के?”…

“नहीं”…

“फिर?”…

“मेरे ख्याल से इसे वैध ठहरा के ही इस सब से मुक्ति पाई जा सकती है”…

“किसे वैध ठहरा के?”…

“ब्लात्कार को?”…

“अरे नहीं”…

“फिर किसे?”…

“ओपन सैक्स को”….”

“माने?”..

“अरे यार!…जैसे थाईलैंड और बैंकाक में होता है ना?”……

“ठीक वैसे ही अपने देश को भी सैक्स फ्री होना चाहिए?”…

“हाँ”…

“पागल हो गए हो क्या?”…

“ये तो सोचो कि कितनी लड़कियों को इस सब से रोज़गार मिलेगा…देश तरक्की के पथ पर दौड़ेगा”…

“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा”…

“अगर वो कम समय में..कम मेहनत से ज़्यादा पैसा कमाएंगी…तो इसमें हर्ज़ ही क्या है?”..

“ऊँचा रहन-सहन..ऊँचा खान-पान…फुल एंजायमैंट”…

“बस!..बहुत हो गया…

चुप हो जाओ अभी के अभी और ऐसे बेवाकूफी भरे फितूर अपनी दिमाग के भीतर ही रहने दो तो ज़्यादा अच्छा है”…

“क्यों?…आखिर बुराई ही क्या है इसमें?”..

“तुम खुद मर्द हो ना…इसलिए अपनी अय्याशी को लीगल तरीके से वैध ठहराना चाहते हो”…

“अरे!…मैँ तो देश के भले के लिए ऐसी राय दे रहा था”…

“ताकि तुम्हारे मशवरों पे अमल कर के दुनिया भर की बिमारियाँ हमारे देश में भी गली-गली घर बनाती फिरें?”…

“अरे! बढिया रहेगा ना फिर…जनसंख्या बोझ में भी तो कमी आएगी इस सब से”…

“सही कह रहे हो”…

“किसी और को ना कह देना ये सब…वर्ना इतने जूते पड़ेंगे कि गिनते-गिनते थक जाओगे”…

“कमाल की बात कर रही हो तुम भी….

tsunami 

‘सुनामी’…’नर्गिस’ जैसे तूफानों से…या फिर भूकंप जैसी किसी प्राकृतिक आपदा से तड़प-तड़प के मरने से या फिर किसी सीरियल ब्लास्ट की चपेट में आने और मंदिरों में रेलिंग टूटने से मचने वाली भगदड़ॉं में दब कर मरने से तो कहीं ज़्यादा अच्छा है ऐश ओ आराम की ज़िन्दगी जीते हुए शान ओ शौकत से मरा जाए”…

“क्यों?…है कि नहीं”…

“सब बकवास…निरी बकवास”…

“तो चलो!…तुम्हीं बता दो कि ब्लात्कार ना करें तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कहाँ जाएँ हम मर्द?”…

“ये तो तुम्हें तब सोचना चाहिए था जब हम लड़कियों की तुम हमारे पेट में ही भ्रूण हत्या करवा रहे थे”…

“जानते भी हो कि तुम मर्दों की इस करनी के चलते आज देश में लड़के-लड़कियों के अनुपात में कितना फर्क आ गया है?”…

“कितना?”…

“आज प्रति 1000 लड़कों के पीछे लगभग 712 के आस-पास लड़कियाँ हैँ पूरे देश में”…

“ओह”…

“हरियाणा और पँजाब में तो और भी बुरे हालात हैँ”…

“यहाँ के कई गांव तो बिना लड़कियों के सूने-सूने हो गए हैँ”…

“और गावों में काम का ज़्यादा बोझ होने की वजह से भी लोगों ने अपनी लड़कियों को गांवों में ब्याहना बन्द कर दिया है”…

“मजबूरी में इन गावों के लोग उड़ीसा और झारखण्ड से बीस-बीस हज़ार…पच्चीस-पच्चीस हज़ार में लड़कियाँ खरीद कर ला रहे हैँ और अपना वंश चलाने की खातिर उनसे ब्याह भी रचा रहे हैँ”..

‘हाँ!..ये तो मैँने भी अखबार में पढा था”…

“यही तो कमी है तुम मर्दों में”…

“क्या?”…

“यही कि सब जानते बूझते हुए भी आने वाले समय के भयावह हालात को अनदेखा कर रहे हो”…

“तो क्या करें?”…

“अपना घर फूंक तमाशा देखें?”…

“क्यों?…इसमें तमाशा देखने की क्या बात है?”…

“क्या गलत कह दिया मैँने?”…

“क्यों नहीं पढाते हो अपनी बच्चियों को?”….

“क्यों उन्हें लड़कों के बराबर अधिकार नहीं देता है तुम्हारा ये समाज?”…

“अरे!…जिसे घरवाले खुद ही बोझ समझ दुत्कार दें…स्वीकार ना करें…तो उसकी और भला कौन इज़्ज़त करेगा?”…

“अभी के हालात तो ये सिर्फ चेतावनी भर हैँ…अगर अभी भी नहीं चेते तो यकीनन एक दिन तुम्हें तमाशा भी देखना पड़ेगा”…

“हम्म!..बात में तो तुम्हारी दम है”..

“तो फिर उठाओ झण्डा…और लगाओ नारा कि ….

“लड़के-लड़कियाँ…एक बराबर”….

“एक बराबर….एक बराबर”….

“जय हिन्द”…

“भारत माता की जय”…

नोट:यह कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है।

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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