मेरी आठवीं कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा

दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर

तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ

चौथी कहानी- बाबा की माया

पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की

छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा

सातवीं कहानी-थमा दो गर मुझे सत्ता

आठवी कहानी- मेड फॉर ईच अदर

 


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मेड फॉर ईच अदर
14 Mar 2009, 1538 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम 

राजीव तनेजा

हेलो। मे आई स्पीक टू मिस्टर राजीव तनेजा ? यस , स्पीकिंग। सर , मैं रिया बोल रही हूं। फ्लाना एंड ढीमका बैंक से। हां जी , बोलिए। सर , वी आर प्रवाइडिंग होम लोन एट वेरी रीज़नेबल रेट्स। सॉरी मैडम , आई एम नॉट इंटरेस्टिड। सर , बहुत अच्छी स्कीम दे रही हूं आपको।
हां जी , बताएं। सर , हम आपको बहुत ही कम ब्याज पर लोन प्रवाइड कराएंगे। अभी कहा न आपको कि नहीं चाहिए। सर , पहले मेरी पूरी बात सुन लें। प्लीज़ , अच्छा फटाफट बताएं , मैं रोमिंग में हूं। सर , आप अगर हमसे लोन लेते हैं तो उसका सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि समय पर किश्त न चुका पाने की कंडीशन में हम आपके घर अपने गुंडे और बदमाश नहीं भेजते हैं।

ओह , अच्छा ! फिर तो ठीक है। एक्चुअली , मुझे गुंडों और उनकी मार – कुटाई से बड़ा डर लगता है। यू नो , एक बार मेरे दोस्त कम पड़ोसी कम रिश्तेदार के घर पर काफी तोड़फोड़ और हंगामा कर गए थे। सर , वे उस एक्स कम्पनी के रिकवरी एजंट होंगे। यह तो पता नहीं। दरअसल , वे हैं ही बड़े बेकार लोग। बिना वजह कस्टमर्स को तंग करते हैं।

यह भी नहीं जानते कि ग्राहक तो भगवान का रूप होता है और कोई अपनी मर्ज़ी से थोड़े ही फंसता है , बैंकों के जाल में। ऊपर से बाज़ार में मंदा – ठंडा तो चलता ही रहता है। थोड़ा सब्र तो उन्हें रखना ही चाहिए कि कोई उनके पैसे खा थोड़े ही जाएगा। वैसे हमारे बैंक से लोन लेने के बाद तो वैसे भी आदमी किश्तें चुकाते – चुकाते अपने ही कष्टों से मर जाता है। ही … ही …. ही ..

क्या ? प्लीज़ , आप माइंड न करें। आप इतना सब उल्टा – सीधा बके चली जा रही हैं और मुझे कह रही हैं कि माइंड न करें। एक्चुअली , इट वॉज़ अ पी . जे। पी . जे माने ? प्योर जोक … प्रैक्टिकल जोक। ओह , फिर तो आप बड़े ही खतरनाक जोक मारती हैं मिस पिंकी। सर यह तो कुछ भी नहीं , मेरे जोक्स के आगे तो बड़े – बड़े हिल जाया करते हैं। ओह , रियली ? जी और सर , मेरा नाम पिंकी नहीं बल्कि रिया है। ओह , फिर तो आपने ठीक किया। क्या ठीक किया सर ?

यही कि अपना नाम बता दिया। वर्ना बेवजह कन्फ्यूज़न क्रिएट होता रहता। किस तरह का कन्फ्यूज़न सर ? एक्चुअली फ्रैंकली स्पीकिंग , इस तरह के दो – चार फोन तो रोज़ ही आ जाते हैं ना ! तो तो सबके नाम याद करने में अच्छी – खासी मुश्किल पेश आ जाया करती है। सर , जब आप हमसे एक बार लोन ले लेंगे न तो फिर कभी भी मेरा नाम नहीं भूल पाएंगे। और वैसे भी मैं भूलने वाली चीज़ नहीं हूं सर। जी , यह तो आपकी बातों से ही मालूम चल गया है। क्या मालूम चल गया है सर ?

यही कि आप बातें बड़ी दिलचस्प करती हैं। थैंक्स फॉर दा कॉम्प्लिमंट सर। एक्चुअली फ्रैंकली स्पीकिंग , यू हैव ए वेरी स्वीट एंड सेक्सी वॉयस। झूठे। फ्लर्ट करना तो कोई आप मर्दों से सीखे। प्लीज़ , इसे झूठ न समझें। सच में आपकी आवाज़ बड़ी ही मीठी और सुरीली है। तुम्हारी कसम। अच्छा जी , अभी मुझसे बात करते हुए सिर्फ आपको यही कोई दस – बारह मिनट हुए हैं और आप मेरी कसमें भी खाने लगे।

एक्चुअली , रिया वह क्या है कि किसी को समझने में पूरी उम्र बीत जाया करती है और किसी को जानने के लिए सिर्फ चंद सेकंड ही काफी होते हैं। यू नो , जोड़ियां ऊपर से ही बन कर आती हैं। जी , बात तो आप सही कह रहे हैं। सर ! वैसे आप रहते कहां हैं ? जी , शालीमार बाग। वहां तो प्रॉपर्टी के बहुत ज़्यादा रेट होंगे न सर ? जी , यही कोई सवा लाख रुपये गज के हिसाब से सौदे हो रहे हैं आजकल और अभी परसों ही डेढ़ सौ गज में बना एक सेकंड फ्लोर बिका है पूरे अस्सी लाख रुपये का।
गुड , मैं भी सोच रही थी कोई सौ – पचास गज का प्लॉट ले कर डाल दूं। आने वाले समय में कुछ न कुछ मुनाफा दे कर ही जाएगा। बिलकुल सही सोचा है आपने। किसी भी और चीज़ में इनवेस्ट करने से अच्छा है कि कोई प्लॉट या मकान खरीद कर रख लिया जाए। लेकिन , मुझे यह फ्लोर – फ्लार का चक्कर बेकार लगता है।

ये भी क्या बात हुई कि नीचे कोई और रहे और ऊपर कोई और। ऊपर छत पर सर्दियों में धूप सेंकनी हो या फिर पापड़ – वड़ियां सुखाने हों तो बस दूसरों के मोहताज हो गए हम तो। जी , ये बात तो है। इसमें कहां की अक्लमंदी है कि ज़रा – ज़रा से काम के लिए दूसरों को डिस्टर्ब कर उनकी घंटी बजाते रहो। जी , बिलकुल सही कहा सर आपने। सर , आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं ? अरे यार , इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? हक बनता है आपका। आप एक – दो क्या पूरे सौ सवाल पूछें तो भी कोई गम नहीं।
ये नाचीज़ आपकी सेवा में हमेशा हाज़िर रहेगा। टीं … टीं … बीप … बीप … बीप। ओह , लगता है कि बैलंस खत्म होने वाला है। मैं बस दो मिनट में ही रिचार्ज करवा कर आपको फोन करता हूं। हां , चिंता न करें मैं नम्बर सेव कर लूंगा। नहीं आप रहने दें , मैं ही कर लूंगी। हमें वैसे भी अपना दिन का टारगिट पूरा करना होता है।

ओ . के। ( दस मिनट बाद ) हैलो , राजीव ? हां जी। और सुनाएं , क्या हाल – चाल हैं ? बस , क्या सुनाएं ? कट रही है जैसे तैसे। ऐसे क्यों बोल रही हो यार ? बस ऐसे ही , कई बार लगता है कि जैसे जीवन में कुछ बचा ही नहीं है। चिंता ना करो , मैं हूं ना ? सब ठीक हो जाएगा।

कुछ ठीक नहीं होने वाला है। थोड़ी – बहुत ऊंच – नीच तो सब के साथ लगी रहती है। इनसे घबराने के बजाए इनका डट कर मुकाबला करना चाहिए। जी , खैर आप बताएं। क्या पूछना चाहती थीं आप ?
नहीं , रहने दें। फिर कभी , किसी अच्छे मौके पे। आज से अभी से अच्छा मौका और क्या होगा ? आज ही आपसे पहली बार बात हुई और आज ही आपसे दोस्ती हुई। और वैसे भी दोस्ती में कोई शक नहीं रहना चाहिए।

जी , सही कहा आपने। सर , मैं यह कहना चाहती थी कि … । पहले तो आप ये सर … सर लगाना छोड़ें। एक्चुअली , टू बी फ्रैंक बड़ा अजीब सा फील होता है जब कोई अपना इस तरह फॉरमैलिटी भरे लहज़े में बात करे। आप मुझे सीधे – सीधे राजीव कह कर पुकारें। जी सर , ऊप्स सॉरी राजीव।

हा हा हा हा … एक्चुअली क्या है राजीव कि मैंने कभी किसी से ऐसे ओपनली फ्री हो कर बात नहीं की है। हमें हमारे प्रफेशन में सिखाया भी यही गया है कि सामने वाला बंदा कैसा भी घटिया हो और कैसे भी कितना भी रूडली बात करे , लेकिन हमें अपनी पेशंस अपने धैर्य को नहीं खोना है और अपने चेहरे पर हमेशा मुस्कान बना कर रखनी है।

हमारी आवाज़ से किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि हमारे अन्दर क्या चल रहा है। यू नो प्रफेशनलिज़म। सही ही है , अगर आप लोग अपने कस्टमर्स के साथ बदतमीज़ी के साथ पेश आएंगे तो अगला पूरी बात सुनने के बजाए झट से फोन काट देगा। वही तो …

हां तो आप बताएं कि आप क्या पूछना चाहती थीं ? राजीव , किसी और दिन पर क्यों न रखें यह टॉपिक ? देखो , जब मैंने तुम्हें दिल से अपना मान लिया है तो हमारे बीच कोई पर्दा कोई दीवार नहीं रहनी चाहिए। जी , तो फिर पूछो न यार , क्या पूछना है आपको ? मैं तो सिम्पली बस यही जानना चाहती थी कि यहां शालीमार बाग में आपका अपना मकान है या फिर किराए का ? यार , यह किराया – विराया देना तो मुझे शुरू से ही पसन्द नहीं। इसलिए तो पांच साल पहले पिताजी का जमा – जमाया टिम्बर का बिज़नस छोड़ मैं अमृतसर से भाग कर दिल्ली चला आया कि कौन हर महीने किराया भरता फिरे ?

और आज देखो , अपनी मेहनत से मैंने सब कुछ पा लिया है। मकान , गाड़ी … । ओह , तो इसका मतलब खूब तरक्की की है जनाब ने दिल्ली आने के बाद। बिलकुल , लाख मुश्किलें आई मेरे सामने लेकिन ज़मीर गवाह है मेरा कि मैंने कभी हार नहीं मानी और कभी ऊपरवाले पर अपने विश्वास को नहीं खोया। उसी ने दया – दृष्टि दिखाई अपनी। वर्ना मैं तो कब का थक – हार के टूट चुका होता और आज यहां दिल्ली में नहीं बल्कि वापस अमृतसर लौट गया होता। .. ऐसे नहीं बोलते , अब मैं हूं न तुम्हारे साथ। तुम्हारे हर दुख हर दर्द की साथिन।

वैसे कितने कमरे हैं आपके मकान में ? क्यों ? क्या हुआ ? कुछ नहीं , वैसे ही पूछ लिया। पूरे छह कमरों का सेट है। छह कमरे ? वाऊ … दैट्स नाइस। लेकिन आप इतने कमरों का क्या करते हैं ? क्या बीवी … बच्चे ? कहां यार , अभी तो मैं कुंवारा हूं। व्हाट अ लवली कोइंसीडंस , मैं भी अभी तक कुंवारी हूं। फिर तो खूब मज़ा आएगा जब मिल बैठेंगे कुंवारे दो। जी बिलकुल , लेकिन आप अकेले इतने कमरों का करते क्या हैं ?
दो तो मैंने अपने पास रखे हैं और एक मेहमानों के लिए। बाकी के तीन कमरे , वो क्या है कि कई बार मैं अकेला बोर हो जाता हूं इसलिए फिलहाल किराए पर चढ़ा रखा है। ठीक किया। थोड़ी – बहुत आमदनी भी हो जाती होगी और अकेले बोर होने से भी बच जाते होंगे। जी। लेकिन अब चिंता न करें , मैं आपको बिलकुल भी बोर न होने दूंगी। जब कभी भी ज़रा सा भी लगे कि आप बोर हो रहे हैं तो आप कभी भी किसी भी वक्त मुझे फोन कर दिया करें। मेरा वायदा है आपसे कि आप मेरी कम्पनी को पूरा एंजाय करेंगे।

जी , ज़रूर। शुक्रिया। दोस्ती में … प्यार में … नो थैंक्स … नो शुक्रिया। बातों ही बातों में मैं ये पूछना तो भूल ही गया कि आप कहां रहती हैं ? घर में कौन – कौन हैं वगैरह। अब क्या बताऊं , घर में मां – बाप और बस हम तीन बहनें हैं। सबसे छोटी , सबसे लाडली और सबसे नटखट मैं ही हूं। और घर ? रहने को फिलहाल मैं जहांगीर पुरी में रह रही हूं। वह जो साईड पर लाल रंग के फ्लैट बने हुए हैं ? नहीं यार , जे . जे . कॉलनी में रह रही हूं। गुस्सा तो मुझे बहुत आता है अपने मम्मी – पापा पर कि उन्हें यही सड़ी सी कॉलनी मिली थी रहने के लिए , लेकिन क्या करूं मां – बाप हैं मेरे। बचपन से पाला – पोसा , पढ़ाया – लिखाया उन्होंने। उनके सामने फालतू बोलना ठीक नहीं।
खैर , आप बताएं , क्या – क्या आपकी हॉबीज़ हैं ? मुझे बढ़िया खाना , बढ़िया पहनना , बड़े – बड़े होटलों में घूमना – फिरना , स्वीमिंग करना , फिल्में देखना और फाइनली देर रात तक डिस्को में अंग्रेज़ी धुनों पर नाचना – गाना पसंद है। गुड , म्यूज़िक तो मुझे भी बहुत पसंद है। लेकिन , मुझे ये रीमिक्स वाले गाने तो बिलकुल ही पसंद नहीं। संगीत के अलावा और क्या – क्या शौक हैं आपके ? म्यूज़िक के अलावा मुझे हॉर्स राइडिंग पसंद है , लॉन्ग ड्राइव और हॉलीवुड मूवीज़ पसंद है। इसके अलावा और भी बहुत कुछ पसंद है , जब मिलोगी तब बताऊंगा। ओ . के। तो फिर कब मिल रही हैं आप ? देखते हैं। बताओ न , प्लीज़। क्या बात है ? बड़े बेताब हुए जा रहे हो मुझसे मिलने को ? ऐसा क्या है मुझमें ? और नहीं तो क्या , जिसकी आवाज़ ही इतनी खूबसूरत हो उससे पर्सनली मिलना भी तो चाहिए। पता तो चले कि ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में कौन सा नायाब तोहफा लिखा है।

इतना ऊपर न चढ़ाओ मुझे कि कभी नीचे उतर ही न पाऊं। बताओ न यार , कब मिल रही हो ? ओके , कल तो मुझे शापिंग करने करोल बाग जाना है। क्यों न आप भी मेरे साथ चलें। जी , बिलकुल। आप बताएं , कितने बजे मिलेंगी ? मैं आपको आपके घर से ही पिक कर लूंगा। नहीं , आस – पड़ोस वाले फालतू में बाते बनाएंगे। सुबह मुझे अपनी सहेली के साथ शालीमार बाग में ही काम है , वहीं से मैं आपके घर आ जाऊंगी। कोई प्रॉब्लम तो नहीं है न आपको ? नहीं , मुझे भला क्या प्रॉब्लम होनी है। मैं तो वैसे भी अकेला रहता हूं। आपने पता तो बताया ही नहीं ?

हां नोट करें , आपने ये केला गोदाम देखा है शालीमार का ? जी , अच्छी तरह। बस , उसी के साथ ही है। क्या BK-1 Block में ? नहीं , नहीं उस तरफ नहीं। दूसरी तरफ तो A-Pocket है। हां , उसी तरफ। इसका मतलब AA Block है आपका। नहीं यार , फिर कहां ? AA Block के साथ वो फोर्टिस वालों का अस्पताल बन रहा है न ? जी , बस उसी के साथ जो झुग्गी बस्ती है। हां , है। बस , उसी में … उसी में घर है मेरा।

क्या ? जी , लेकिन तुम तो कह रहे थे कि अपना मकान है , छह कमरों का। अरे , दिल्ली में अपनी झुग्गी होना मतलब अपना मकान होना ही है। पूरी छह झुग्गियों पर कब्ज़ा है मेरा और उन्हीं में से तीन किराये पर उठाई हुई होंगी ? जी , तुम तो ये भी कह रहे थे कि अमृतसर में तुम्हारे पिताजी का टिम्बर का बिज़नस है ? हां , है न। वहीं सदर थाने के पास वाले चौक पर ‘ दातुन ‘ बेचने का बरसों पुराना काम है हमारा। क्या ? और ये जो तुम म्यूज़िक और घुड़सवारी के शौक के बारे में बता रहे थे , वह सब भी क्या धोखा था ? जानू , ना मैंने तुम्हें पहले कभी झूठ कहा और न ही अब कहूंगा।
ये सच है कि म्यूज़िक का मुझे बचपन से बड़ा शौक है और इसी वजह से मैंने दिल्ली आने के बाद शादी – ब्याहों में ढोल बजाने का काम शुरू किया। ओह , इसका मतलब तभी बैंड – बाजे वालों की सोहबत में रहते हुए कई तरह के म्यूज़िक इंस्ट्रूमंटस को बजाना सीख लिया होगा ? जी।…और यह घुड़सवारी भी आपने वहीं से सीखी ? जी , दरअसल क्या है कि बैंड – बाजे वालों के यहां घोड़ी वाले भी आते रहते थे , तो उनसे ही ये हुनर सीख लिया।जी , ओ . के।
तो फिर कल कितने बजे आ रही हो ? आ रही हूं ? सपने में भी ऐसे ख्वाब न देखना। क्यों , क्या हुआ ? इडियट , मेरे साथ डेट पर जाना चाहता है ? ऐसी हालत करवा दूंगी कि न किसी को कहते बनेगा न छिपाते। एक मिनट , चुप बिलकुल चुप। मुझे इतना बोल रही है , तो तू कौन सा आसमान से टपकी है ? जानता हूं , अच्छी तरह जानता हूं। जहां तू रहती है न , वहां की एक – एक गली से एक – एक चप्पे से वाकिफ हूं मैं। तुम्हारे यहां किसी की भी सौ रुपए से ज़्यादा की औकात नहीं है। आऊंगा , आऊंगा तेरी ही गली आऊंगा और तुझसे नहीं बल्कि तेरी ही पड़ोसन के साथ डेट पर जाऊंगा।

शटअप , यू ऑलसो शटअप। गो टू हेल …

 

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मेरा खुला पत्र योगेश समदर्शी के नाम

rajiv holi cartoon

समदर्शी जी नमस्कार….

ये खुला पत्र मैँ आपको इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मेरे पास लिफाफा खरीदने के लिए खुले पैसे नहीं हैँ। एक्चुअली क्या है कि मेरे पास लिफाफे को बन्द करने लायक ज़रूरी गोंद नहीं थी तो मैँने सोचा कि…….अब आप कहेंगे कि गोंद नहीं थी तो क्या हुआ?…अपना चबड़-चबड़ करती गज़ भर लम्बी ज़बान तो थी…अपना झट से लिफाफे के किनारे पे उसी को सर्र से सरसराते हुए फिराते और फट से दाब देते अँगूठे से।….मुआफ कीजिएगा समदर्शी जी….आपने मुझे सही से नहीं पहचाना…..अपने शरीर के ‘अँगूठे’ जैसे पवित्र और पावन हिस्से को ऐसे बेकार के….. गैरज़रूरी कामों में ज़ाया कर  तिरसकृत  करने के बजाय मैँ उसका सदुपयोग लेनदारों को अँगूठा दिखाने में या फिर यार-दोस्तों को वक्त-ज़रूरत पर ठेंगा दिखाने में इस्तेमाल करना ज़्यादा बेहतर समझता हूँ और फिर आज के माड्रन ज़माने में…थूक से…..छी!…पढा-लिखा इनसान होने के नाते मैँ ऐसी घटिया सोच…ऐसा वाहियात ख्याल भी मैँ अपने दिल में कैसे ला भी  सकता हूँ?

नोट:होली के अवसर पर योगेश समदर्शी जी ने हम साहित्य शिल्पियों के काफी अच्छे कार्टून बनाए।अपने कार्टून को देख एक नया प्रयोग करने की सोची।उम्मीद है कि आप सभी को  पसन्द आएगा

बेकार की फुटेज ना खाते हुए मैँ सीधे-सीधे असल मुद्दे  पे आता हूँ।इसमें कोई शक नहीं कि आप एक कवि…लेखक होने के साथ-साथ कम्प्यूटर तकनीक के महान ज्ञाता भी हैँ।आप गुणी है….भगवान हैँ…..ऊपरवाले ने आपको एक नहीं…अनेक गुणों से लबरेज़ करके इस धरती पर भेजा है।आप में कार्टून बनाने की कला कूट-कूट कर भरी हुई है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आपको हर किसी के माखौल को उड़ाने का खुला लाईसंस मिल गया।

आपके नाम के अनुरूप मेरा ख्याल है कि आप योग वगैरा में काफी रुचि रखते हैँ।अच्छी बात है…इससे तन मन दोनों तंदुरस्त रहते हैँ।अगर मैँ सही हूँ तो समदर्शी का मतलब होता है …सबको समान दर्‍ष्टि से देखने वाला लेकिन यहाँ तो ये जान के घोर निराशा हुई किए आप तो समान दर्‍ष्टि से देखने के बजाए आप तो किसी को देखते ही नहीं है(कुछ लड़कियों को भी आपसे यही शिकायत है लेकिन उनकी गोपनियता और निजता के लिहाज से उनका नाम यहाँ मकड़जाल पर उजागर करना उचित नहीं होगा)हाँ!…तो मैँ कह रहा था कि आप किसी को देखते ही नहीं हैँ बल्कि जो मन में आता है…जैसा मन को भाता है…बिना कुछ सोचे समझे उसे तुरंत कर डालने पे उतारू हो जाते हैँ।

हाह!…मैँ आपको क्या समझा और आप क्या निकले?….

कुछ तो आपने अपना और मेरी इज़्ज़त का ख्याल किया होता।क्या सोचा था कि आपकी ऐसी हिमाकत देख के राजीव खुश होगा?… शाबाशी देगा?…ऑक थू…..रोना आ रहा है मुझे अपनी किस्मत पर।गली-मोहल्ले के छोटे-छोटे…नन्हें-मुन्ने बच्चे तक बड़े कांफीडैंस के साथ मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैँ कि ‘निक्कर’ वाले अँकल आ गए…‘निक्कर’ वाले अँकल आ गए।

कसम ले लो मुझसे उस काली कमली वाले परवरदिगार की कि मैँने उस “बिन माँगे मोती मिले” वाले भयानक हादसे के बाद से ही निक्कर पहनना छोड़ा हुआ है।सच!…कसम है मुझे काली दिवार पे सूखते सफेद पॉयजामे के मटमैले नाड़े की जो मैँ एक लफ्ज़ भी झूठ कहा हो।

अब आप कहेंगे कि बच्चे तो भगवान का रूप हुआ करते हैँ

झूठ…बिलकुल झूठ…..कभी हुई करते होंगे भगवान का रूप….आजकल तो इनसे बड़ा शैतान…इनसे बड़ा उत्पाती पूरे जहाँ में भी ढूंढे ना मिलेगा।क्या कहा?….विश्वास नहीं होता?….अरे!…हाथ कँगन को आरसी क्या और पढे-लिखे को फारसी क्या?..एक बार यहाँ….मेरे यहाँ आ के मेरे ही नासपीट्टे बच्चों के साथ दो-दो हाथ कर के देख लें…अपने आप पता चल जाएगा।आप चाहें तो बेशक तस्दीक के लिए गवाही के तौर पर अपने साथ कुछ निजी गवाह और बॉर्डीगॉर्ड भी ला सकते हैँ….आपको खुली छूट है लेकिन ये सब आपके अपने जोखिम और विवेक पर निर्भर करेगा कि आपका ऐसा करना उचित भी होगा या नहीं।

मानता हूँ कि चिट्ठाजगत में आप मेरे सबसे प्रिय हैँ…अभिन्न मित्र हैँ लेकिन फिर भी मैँ यही कहूँगा कि आपने मेरे साथ अच्छा नहीं किया।अरे!…सच्चे दोस्त वो होते हैँ जो वक्त-ज़रूरत पर दोस्ती के लिए खुद को कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटरे और कुछ दोस्त आप जैसे नामुराद भी होते हैँ जो मौका देखते ही जले पे नमक छिड़कना नहीं भूलते।

जैसे कमान से निकल चुके तीर को रोका नहीं जा सकता और ज़बान से निकले हुए शब्दों को फिर से पलटा नहीं जा सकता और पलटना भी नहीं चाहिए क्योंकि क्षत्रिय जो एक बार ठान लेते हैँ…सो ठान लेते हैँ।

चलो!…जो किया सो किया…लेकिन ये तो सोचा होता कम से कम कि किस बेस पे आप मुझ जैसे जवाँ मर्द पट्ठे की रोएंदार टाँगों को क्लीनशेव्ड दिखा रहे हैँ?….तनिक सा….तनिक सा भी ख्याल नहीं आया आपके दिल में एक बार कि क्या बीतेगी राजीव बेचारे पर?…कैसे सामना करेगा वो इस जग-जहाँ के निष्ठुर तानों का?….कैसे पिएगा वो शर्बत इतने अपमानों का?….कैसे वो  बरसों की मेहनत से बनाया हुआ अपना छद्दम मैचोइज़्म बरकरार रख पाएगा।…कैसे “फड़ के किल्ली…चक्क दे फट्टे” का नारा बुलंद कर पाएगा?

नहीं!….कुछ नहीं सोचा आपने….अगर सोचा होता तो इस कार्टून में मैँ नहीं बल्कि वो नुक्कड़ पे बैठने वाला ब्ळॉगर ‘मौदगिल’ जी को भिगो रहा होता।हाँ!….नुक्कड़ से याद आया कि आखिर क्या मिल जाता है आपको किसी को ऐसे टिप्पणी माँगते हुए दिखाने से?….या फिर किसी बेचारे बुज़ुर्ग ब्लॉगर को लाईफ टाईम ऐचीवमैंट अवार्ड देने के बजाय ज़बरदस्ती किसी महिला के हाथों पकड़वा के रंग डलवाने में?….अब वो बेचारी महिला शान से अपनी चाय पत्ती बेचें या फिर कविताएँ लिखें?…

आखिर!….आप साबित क्या करना चाहते हैँ?….वैसे भी आपको पता होना चाहिए कि शेर खुद अपने दम पे अकेले ही शिकार किया करता है।ये याद दिलाने की मैँ ज़रूरत नहीं समझता कि उसे किसी चारे या फिर सहारे की ज़रूरत नहीं होती।खास कर के किसी औरत के सहारे की तो बिलकुल नहीं लेकिन ये गूढ ज्ञान की बातें आप क्या समझेंगे?….आप!….आप तो बस अपने गाँव और गाँव की कविताओं में ही डूबे रहिए…रमे रहिए।वैसे मैँने शायद आपके मुँह से ही उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि आपका कोई कविता संग्रह भी जल्द ही छपने वाला है।अगर ऐसा सचमुच में है तो आपके मुँह में घी-शक्कर।मेरी तरफ से अग्रिम बधाई स्वीकार कर लें।अग्रिम इसलिए कि इतना सब कुछ होने के बाद मैँ इस निष्ठुर ज़माने में जी भी पाऊँगा या नहीं…इसका मुझे डर है।…..

इस जीवन को अपना साथी बनाने से पहले मेरी जॉन मुझे बहुत कुछ सोचना है।

ठीक है…माना कि मैँ निराश हूँ…उदास हूँ…हताश हूँ  लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ मत समझिएगा कि पाँच महीने से मैँने कुछ नहीं लिखा…इसलिए मैँ चुक गया हूँ ।बस इतना समझ लीजे कि ‘लॉट सॉहब’ आराम फरमावत रहे।

और हाँ!…किसी झूठे गुमान में ना रहिएगा कि मैँ आपसे हार मान गया हूँ या फिर आपसे डर गया हूँ। वैसे मैँ आपकी जानकारी के लिए बता दूँ तो इस पूरे जहाँ में मुझे डर लगता है सिर्फ दो चीज़ों से…एक…ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा से और दूसरा नीचे बैठी अपनी महरारू….याने के अपनी घरवाली से ।ऊपर बैठे परमात्मा से तो खैर सभी डरते हैँ क्योंकि हमारे हर अच्छे-बुरे काम का वो गवाह होता है और फिर हमारी जीवन नैय्या का रिमोर्ट कंट्रोल भी तो उसी के हाथ में होता है ना?…इधर हमने कुछ गड़बड़ करी नहीं कि उधर उनका हाथ सीधा रिमोर्ट के बटन की तरफ झपट पड़ना है।उनसे कैसे कोई पंगा ले सकता है?…रही बात बीवी की तो…भईय्या….क्या बताएँ?….उससे तो इसलिए डर लगता है कि पापी पेट का सवाल जो छाया रहता है हरदम हमारे दिमाग पर।

“क्या कहा?…नहीं समझे”……

“अरे बाबा!…खाना जो उसी ने पका के खिलाना होता है हमको …सिम्पल…और ये तो आप भली भांति जानते ही हैँ कि तीनो टाईम बिना डट खाए तो हमसे रहा नहीं जाता।…..अब ऐसी खाए-पिए की जगह नहीं डटेंगे तो क्या अपनी ऊ.पी वाली ‘मायावती’ बहन जी के आगे जा के कटेंगे?

एक शिकायत और है मुझे आपसे कि इतने बड़े तुर्रम खाँ कवि कम शायर….कम ब्लॉगर….कम आयोजनकर्ता को भिगोने के लिए आपने मेरे हाथ में ‘A.K 47′ या फिर ‘A.K 3 पकड़ाने के बजाए ये बच्चों का सा फिस्स-फिस्स करता फिस्सफिस्सा सा झुनझुना पकड़ा दिया…ये बहुत गलत किया।….

“क्या कहा?…क्या गलत है इसमें?”……

“हद हो यार!…तुम भी?…..अब इतने बड़े कवि सम्राट को चारों खाने चित्त करना है तो क्या ऐसे ‘फिस्स’…..’फिस्स’…’फचाक्क’….करके ढेर करूँगा?…..

नहीं!…अब और बे-इज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं होती मुझसे।मैँ आपके खिलाफ मानहानि का केस दायर करने जा रहा हूँ।…जी हाँ!…मानहानि का….अगर नकद गिन के पूरे सवा इक्यावन रुपए ना धरवा लिए इस हथेली पे तो मेरा भी नाम राजीव तनेजा नहीं।….वो इसलिए कि क्या आपको डाक्टर ने कहा था कि मेरे काम-धन्धे का ढिंढोरा पूरे जहाँ में पीट डालो?…अरे!….खुशी से नहीं करता हूँ इसे….काम है मेरा ये …बच्चे जो पालने हैँ लेकिन अफसोस….अब तो शायद बच्चे भी ठीक से ना पाल पाऊँ….पहले ही उधार वालों से परेशान हूँ…ऊपर से आपने जग-जहाँ को अपनी एक पोस्ट द्वारा बतला दिया कि राजीव का रैडीमेड दरवाज़े-खिड़कियों का काम है।अब तो जिसको नहीं भी बनाना होगा…वो भी सोचेगा कि चल यार!…दो कमरे एक्स्ट्रा डाल लेते हैँ….अपना क्या जाता है?…..आए-गए के काम आएँगे।…..राजीव है ना

उम्मीद है कि अब सीधा कोर्ट में ही मुलाकात होगी…..नोटिस बस पहुँचता ही होगा।…..और हाँ!….ध्यान रहे कि ‘पूरे सवा इक्यावन रुपए’ का क्लेम ठोका है आपके ऊपर…

ना एक पैसा कम…ना एक पैसा ज़्यादा।

फिलहाल इतना ही…बाकि फिर कभी

आपका शुभेच्छु,

राजीव तनेजा

आसमान से गिरा

holi

***राजीव तनेजा***

‘हाँ आ जाओ बाहर… कोई डर नहीं है अब…चले गए हैं सब के सब।’
मैं कंपकंपाता हुआ आहिस्ता से जीने के नीचे बनी पुरानी कोठरी से बाहर निकला। एक तो कम जगह ऊपर से सीलन और बदबू भरा माहौल, रही-सही कसर इन कमबख़्तमारे चूहों ने पूरी कर दी थी। जीना दूभर हो गया था मेरा। पूरे दो दिन तक वहीं बंद रहा मैं। ना खाना, ना पीना, ना ही कुछ और। डर के मारे बुरा हाल था। सब ज्यों का त्यों मेरी आँखों के सामने सीन-दर-सीन आता जा रहा था। मानों किसी फ़िल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो। बीवी बिना रुके चिल्लाती चली जा रही थी…

नोट:इस बार आलस्य या फिर व्यस्त्तता के चलते कुछ नया नहीं लिख पाया तो सोचा कि होली के मौके पर अपनी एक पुरानी कहानी को आप लोगों के साथ बांटू,इसे मैँने दो साल पहले होली के मौके पर लिखा था।उम्मीद है कि यह आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी।

‘अजी सुनते हो? या आप भी बहरे हो चुके हो इन नालायकों की तरह? सँभालो अपने लाडलों को, हर वक़्त मेरी ही जान पे बने रहते हैं। तंग आ चुकी हूँ मैं तो इनसे …काबू में ही नहीं आते। हर वक़्त बस उछल कूद और…बस उछल कूद और कुछ नहीं। ये नहीं होता कि टिक के बैठ जाएँ घड़ी दो घड़ी आराम से… ना पढ़ाई की चिंता ना ही किसी और चीज़ का फिक्र…हर वक़्त सिर्फ़ और सिर्फ़ शरारत…बस और कुछ नहीं। ऊपर से ये मुआ होली का त्योहार क्या आने वाला है, मेरी तो जान ही आफ़त में फँसा डाली है इन कमबख़्तों ने। उफ!…बच्चे तो बच्चे….. बाप रे बाप, जिसे देखो रंग से सराबोर| कपड़े कौन धोएगा?…. तुम्हारा बाप?

भगवान बचाए ऐसे त्योहार से।रोज़ कोई ना कोई शिकायत लिए चली आती है।
”इसने मेरी खिड़की का काँच तोड़ दिया और इसने मेरी नई शिफॉन की साड़ी की ऐसी-तैसी कर दी”…
”अरे!…डाक्टर ने कहा था कि काँच लगवाओ खिड़की में? प्लाई या फिर लकड़ी का कोई मज़बूत सा फट्टा  नहीं लगवा सकती थी क्या उसमें?”

“और ये साडी-साडी क्या लगा रखा है?”…

“कोई ज़रूरी नहीं है कि हर वक़्त अपना पेट दिखाती फिरो”…

“कोई ज़रूरी नहीं कि सामने वाले मनोज बाबू को यूँ छुप-छुप के ताकती फिरो खिडकी से हर दम” ….

“ज़्यादा ही आग लगी हुई है तो भाग क्यों नहीं खडी होती उनके साथ?” “शरीफ़ों का मोहल्ला है ये। लटके-झटके दिखाने हैं तो कहीं और जा के मुँह काला करो अपना” बीवी ने तो अपनी नौटंकी दिखा सबको चलता कर दिया पर ‘शर्मा जी’ वहीं खडे रहे….टस से मस ना हुए…बोल्रे..

“मेरे चश्मे का हाल तो देखो…अभी-अभी ही तो नया बनवाया था”…..
“दो दिन भी टिकने नहीं दिया इन कम्भखतो ने”
“बस मारा गुब्बारा खींच के ‘झपाक’ और कर डाला काम-तमाम”
“टुकडे-टुकडे कर के रख दिया”

“अब पैसे कौन भरेगा?”शर्मा जी गुस्से से बिफरते हुए बोले

बीवी ने आवाज़ सुन ली थी शायद, लौटे चली आई तुरंत..बोली…
“अब शर्मा जी… बुढ़ापे में काहे अपनी मिट्टी पलीद करवाते हो? और मेरा मुँह खुलवाते हो। राम कटोरी बता रही थी कि चश्मा लगा है आँखे खराब होने से और आँखे ख़राब हुई हैं दिन-रात कंप्यूटर पे उलटी-पुलटी चीज़ें देखने से। इसीलिए तो काम छोड़ चली आई ना आपके यहाँ से?”

शर्मा जी बेचारे सर झुकाए पानी-पानी हो लौट गए। उनकी हालत देख मेरी मन ही मन हँसी छूट रही थी। अभी दो दिन बचे थे होली में, लेकिन अपनी होली तो जैसे कब की शुरू हो चुकी थी। बस छत पर चढ़े और लगे गुब्बारे पे गुब्बारा मारने हर आती-जाती लड़की पर….ले दनादन और…दे दनादन…
“पापा!… पापा!…सामने वालों की हिम्मत तो देखो…अपुन के मुकाबले पर उतर आए हैं।” अपना चुन्नू बोल पड़ा।
“हूँ…अच्छा! तो पैसे का रौब दिखा रहे हैं स्साले!….चॉयनीज़ पिचकारियाँ क्या उठा लाए सदर बाज़ार से, सोचते हैं कि पूरी दिल्ली को भिगो डालेंगे? अरे!…बाप का राज समझ रखा है क्या?…अपुन अभी ज़िंदा है, मरा नहीं। क्या मजाल जो हमसे कोई हमारे ही मोहल्ले में बाज़ी मार ले जाए। दाँत खट्टे ना कर दिए तो अपुन भी एक बाप की औलाद नहीं।”
यह सामने वाले के प्रति मेरे मन की ईर्ष्या थी या होली का उन्माद मैं खुद भी नहीं समझ सका पर जोश सातवें आसमान पर था तो हो गया मुकाबला शुरू।

कभी वो हम पे भारी पड़ते तो, कभी हम उन पे। कभी वो बाज़ी मार ले जाते तो कभी हम, कभी हमारा निशाना सही बैठता तो, कभी उनका। गली मानो तालाब बन चुकी थी लेकिन…कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था। कभी अपने चुन्नू को गुब्बारा पड़ता तो कभी उनके पप्पू का। धीरे-धीरे वो हम पे भारी पड़ने लगे। वजह?
“सुबह से कुछ खाया-पिया जो नहीं था, बीवी जो तिलमिलाई बैठी थी और वो स्साले! बीच-बीच में ही चाय-नाश्ता पाड़ते हुए वार पे वार किए चले जा रहे थे। बिना रुके उनका हमला जारी था। और इधर अपनी श्रीमती नाराज़ क्या हुई चाय-नाश्ता तो छोड़ो हम तो पानी तक को तरस गए।

हिम्मत टूटने लगी थी कुछ-कुछ…थक चुके थे हम और इधर ये पेट के नामुराद चूहे स्साले!…नाक में दम किए हुए बैठे थे। भूख के मारे दम निकले जा रहा था और बदन मानो हड़ताल किए बैठा था कि “माल बंद तो काम बंद”। ठीक कहा है किसी बंदे ने कि खुद मरे बिना जन्नत नसीब नहीं होती सो!…अपने मन को मार, खुद ही बनानी पड़ी चाय।
“ये देखो!…स्सालों, हम खुद ही बनाना और पीना जानते हैं…मोहताज नहीं हैं किसी औरत के।चूड़ियाँ पहन लो चूड़ियाँ ….हुँह!…जिगर में दम नहीं कहते हैँ “हम किसी से कम नहीं”। तुम्हारी तरह नहीं है हम, हम में है दम। ये नहीं कि चुपचाप हुकुम बजाया और कर डाली फरमाईश।अरे!…तुम्हें क्या पता कि अपने हाथ की में क्या मज़ा है? बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद?

अभी पहली चुस्की ही भरी थी कि फटाक से आवाज़ आई और सारे के सारे कप-प्लेट हवा में उड़ते नज़र आए, चाय बिखर चुकी थी और कप-प्लेट मानों अपने आखिरी सफ़र के कूच की तैयारी में जुटे थे। ऐसा लगा जैसे मानों, समय थम-सा गया हो। खून भरा घूंट पी के रह गया मैँ लेकिन एक मौका ज़रूर मिलेगा और सारे हिसाब-किताब पूरे हो जाएँगे। बस यही सोच मै खुद को तसल्ली दिए जा रहा था कि सौ सुनार की सही लेकिन जब एक लोहार की एक पड़ेगी ना बच्चू….तो सारी की सारी हेकड़ी खुद-ब-खुद बाहर निकल जाएगी। मैं चुपचाप बाहर आकर बालकनी में बैठ गया।

“देखो…देखो…पापा! कैसे बाहर खड़ा-खड़ा…गोलगप्पे पे गोलगप्पा खाए चला जा रहा है” अपना चुन्नू बोल पड़ा,
“निर्लज्ज कहीं का…ना तो सेहत की चिंता और ना ही किसी और चीज़ का फिक्र। पहले अपनी सेहत देख, फिर उस गरीब बेचारे गोलगप्पे की सेहत देख…कोई मेल भी है?
कुछ तो रहम कर। स्साला! चटोरा कहीं का। देख बेटा!… देख, अभी मज़ा चखाता हूँ। ले स्साले!… ले और खा गोलगप्पे…

“चिढाता है मेरे ‘चुन्नू’ को?”मैँने निशाना साध खींच के फेंक मारा गुब्बारा… ये गया….और….वो गया…
“फचाक्क”…. आवाज़ आई और कुछ उछलता सा दिखाई दिया।
“मगर ये क्या? जो देखा, देख के विश्वास ही नहीं हुआ। पसीने छूट गए मेरे। थर-थर काँपने लगा, हाथ-पाँव ने काम करना बंद कर दिया। दिमाग जैसे सुन्न-सा हुए जा रहा था…
“पकड़ो साले को, “भागने ना पाए” जैसी आवाज़ों से मेरा माथा ठनका। कुछ समझ नहीं आ रहा था। ध्यान से आँखे मिचमिचाते हुए फिर से देखा तो अपना पड़ोसी सही सलामत भला चंगा, पूरा का पूरा, जस का तस खड़ा था और बगल में शम्भू गोलगप्पे वाला सोंठ से सना चेहरा और बदन लिए गालियों पे गालियाँ बके चला जा रहा था। उसका नया कुर्ता झख सफ़ेद से अचानक नामालूम कैसे चॉकलेटी सा हो चुका था।

“दरअसल!…हुआ क्या कि बस पता नहीं कैसे एक छोटी-सी बहुत बड़ी गल्ती हो गई और मुझ जैसे तुर्रमखाँ निशानची का निशाना ना जाने कैसे चूक गया और गुब्बारा सीधा दनदनाता हुआ गोलगप्पे वाले के चटनी भरे डिब्बे में जा गिरा धड़ाम और….बस्स!…हो गया काम।
“पापा!…भागो….सीधा ऊपर ही चला आ रहा है लट्ठ लिए।” चुन्नू की मिमियाती सी आवाज़ सुनाई दी।
मैंने आव देखा ना ताव कूदता-फांदता जहाँ रास्ता मिला भाग लिया। कुछ होश नहीं कि कहाँ-कहाँ से गुज़रता हुआ कहाँ का कहाँ जा पहुँचा। हाय री मेरी फूटी किस्मत!… इसी समय निशाना चूकना था? जैसे ही छुपता-छुपाता किसी के घर में घुसा ही था कि वो लट्ठ बरसे बस… वो लट्ठ बरसे कि बस पूछो मत….कोई गिनती नहीं।

उफ़!…कहाँ-कहाँ नहीं बजा लट्ठ? स्सालों! कोई जगह तो बख्श देते कम से कम, सुजा के रख दिया पूरा का पूरा बदन। कहीं ऐसे खेली जाती है होली? अरे!..रंग डालो और बेशक भंग(भाँग) डालो लेकिन ज़रा सलीके से, स्टाईल से, नज़ाकत से, ये क्या कि आव देखा ना ताव और बस सीधे-सीधे भाँज दिया लट्ठ? ठीक है!…माना कि रिवाज़ है आपका ये लेकिन पहले देखो तो सही कि सामने कौन है?… कैसा है?…. कहाँ का है?… कुछ जान-वान भी है कि नही? स्टैमिना तो देखो कि सह भी सकेगा या नहीँ?

स्सालों!…खेलना है तो टैस्ट मैच खेलो… आराम से खेलो मज़े से, मज़े-मज़े में खेलो। ये क्या कि फिफटी-फिफ्टी भी नहीं…सीधे-सीधे ही टवैंटी-टवैंटी? ये बल्ला घुमाया…वो बल्ला घुमाया और कर डाली सीधा चौकों-छक्कों की बरसात। ठीक है!… माना कि इसमें जोश है…जुनून है… एक्साईट्मैंट है….दिवानापन है… खालिस…विशुद्ध एंटरटेनमैंट है लेकिन वो भी दिन थे जब सामने वाले को भी मौका दिया जाता था कि ले बेटा!…हो जाएँ दो-दो हाथ। कमर कस तू भी और कमर कसें हम भी…फिर देखते हैँ कि कौन?…कैसे? …और किस पे …कितने हाथ साफ करता है?….ये क्या कि सामने वाले को न तो सफ़ाई का मौका दो और ना ही दम लेने का वक्त?बस!…सीधे-सीधे  बरसा दिए ताबड़-तोड़ लट्ठ। इंसान है वो भी, मानवाधिकारों के चलते कुछ तो हक बनता है उसका भी।

कई बार समझा के देख लिया कि भईय्या…अभी तो होली आने में दो दिन बाकि हैँ लेकिन कोई मेरी सुने…तब ना।कहने लगे…अभी तो रिहर्सल ही कर रहे हैँ….फाईनल तो होली वाले दिन ही खेला जाएगा।उफ्फ!…स्सालों ने अपनी प्रैक्टिस-प्रैक्टिस के चक्कर में अपुन पर ही हाथ साफ़ कर डाला”
“जानी!…होली खेलने का शौक तो हम भी रखते है और खेल भी सकते हैं होली लेकिन तुम छक्कों के साथ होली खेलना हमारी शान के खिलाफ़ है।” इस डायलॉग से खुद को समझाता, बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ा जैसे ही बाहर निकला तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर पे अटका। बाहर लट्ठ लिए नत्थू गोलगप्पे वाला पहले से ही मौजूद था, मेरा ही इंतज़ार था उसे। दौड़ फिर शुरू हो चुकी थी मैं आगे-आगे और वो पीछे-पीछे। ये तो शुक्र है उस कुत्ते का जिसे मैंने कुछ ख़ास नहीं बस तीन या चार गुब्बारे ही मारे थे कुछ दिन पहले और निरे खालिस सफ़ेद से बैंगनी बना डाला था पल भर में, वही मिल गया रास्ते में, मुझे देख ऐसे उछला जैसे बम्पर लाटरी लग गई हो, पीछे पड़ गया मेरे। पैरों में जैसे पर लग गए हों मेरे। किसी के हाथ कहाँ आने वाला था मैं?…ये गया और वो गया।

“नत्थू क्या उसका बाप भी नहीं पकड़ पाया। हाँफते-हाँफते सीधे जीने के नीचे बनी कोठरी में डेरा जमाया। और आखिर चारा भी क्या था? वो स्साला!….नत्थू का बच्चा जो दस-बीस को साथ लिए चक्कर पे चक्कर काटे जा रहा था बार-बार। ये तो बीवी ने समझदारी से काम लिया और कोई ना कोई बात बना उन्हें चलता कर दिया तो कहीं जा के जान में जान आई।

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

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