Posted on October 31, 2007 by राजीव् तनेजा
“चौथा खड्डा”
बंता:संता सिंह जी!..ये खड्डा किसलिए खोदा जा रहा है?”
संता:ओ!..कुछ नहीं जी मुझे अमेरिका जाना है ना…इसलिए”
बंता:अमेरिका जाना है?”
संता:हाँ जी!..”
बंता:अमेरिका जाने के लिए खड्डा खोदना जरूरी है?
संता:ओ!..कर दी ना तूने अनाडियों वाली गल्ल…
बेवाकूफ पॉसपोर्ट बनवाने के लिए फोटो चाहिए होती है कि नहीं?
बंता:फोटो तो चाहिए होती है लेकिन…फोटो से खड्डे का क्या कनैक्शन है?
संता:अरे बेवाकूफ!पॉसपोर्ट [...]
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Posted on October 28, 2007 by राजीव् तनेजा
“गधे के पीछे गधा”
“सरदार संता सिंह अँग्रेज़ी का माना हुआ टीचर था”
“उनके विधार्थी हमेशा अव्वल आते थे”
“एक दिन स्कूल की इंस्पैकशन थी”….
“इंस्पैक्टर ने अँग्रेज़ी कक्षा का इम्तिहान लेने की सोची और…
वो चुपचाप क्लास के बाहर खडा होकर सुनने लगा कि…
संता सिंह क्या पढा रहा है?”
“इंस्पैक्टर बेचारा परेशान कि ये कैसी…किस तरीके की पढाई हो रही [...]
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Posted on October 25, 2007 by राजीव् तनेजा
“शाही पनीर फिर दाल मक्खनी”
***राजीव तनेजा***
“बहुत दिनों बाद एक दोस्त मिला…
आँखे सूजी हुई….
चेहरा पीला पडा हुआ….
थकान के मारे बुरा हाल…
नींद के नशे में ऐसे चूर…मानों कई बोतल एक साथ चढा रखी हों”
“मैँ चकराया कि ये बन्दा तो ऊपरवाले ने बडा ही नेक बनाया था”…
“इसे क्या हो गया?”
“खैर!..आराम से बिठाया अपने पास”…
“फिर एक ‘डबल डोज़’वाली कडक’कॉफी’बना [...]
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Posted on October 13, 2007 by राजीव् तनेजा
“स्टिंग आप्रेशन”
***राजीव तनेजा***
“हद हो गयी इन’स्टिंग आप्रेशनों’की”..
“किसी को भी नहीं बक्शते”
“पता नहीं क्या मिलता है इनको गडे मुर्दे उखाडने से?”या फिर…
“क्या मिल जाएगा इस सब से?”
“किसी की इज़्ज़त-आबरू को कुछ समझते ही नहीं ये’मीडिया’वाले”
“इन्हें तो बस अपनी’टी.आर.पी’की पडी होती है कि…
‘कैसे भी’…
‘किसी भी जायज़-नाजायज़ तरीके से बस बढनी चाहिए”
“पता नहीं किसका हाथ है इस सब [...]
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Posted on October 11, 2007 by राजीव् तनेजा
“दुनिया आपकी जेब में”
***राजीव तनेजा***
“हाँ!. ..हाँ!….
“जी हाँ”…
“एक रास्ता”…..
“सिर्फ’एक-इकलौता’रास्ता….
इस गलाकाट प्रतियोगिता से निबटने का”…
“जी हाँ!…”
“सिर्फ एक कदम”…
“या फिर”…
“एक सही फैसला”…और
“आप दुनिया की भीड में’सबसे अलग’…
‘सबसे जुदा’…
‘सबसे आगे’होंगे”
“मीलों आगे”…
“कोई’कम्पीटीटर’आस-पास भी नहीं फटक पाएगा
“बस एक!..’सीधा-सरल’रास्ता और….
“दुनिया आपकी मुट्ठी में”या यूँ कहें कि….
“दुनिया आपकी जेब में होगी”
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***राजीव तनेजा***
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Posted on October 6, 2007 by राजीव् तनेजा
“क्या मालूम कल हो ना हो?”
“राजीव तनेजा “
“अजी सुनते हो!…”
“चुप कराओ अपने इस लाडले को”
“रो-रो के बुरा हाल करे बैठा है”
“चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा”
“लाख कोशिशे कर ली पर ना जानें आज कौन सा भूत सवार हुए बैठा है कि…
उतरने का नाम ही नहीं ले रहा”
“अब क्या हुआ?”…
“सीधी तरह बताती क्यों नहीं?”
“जिद्द [...]
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Posted on October 3, 2007 by राजीव् तनेजा
“हर फिक्र को धुएँ में उडाता चला गया”
***राजीव तनेजा***
‘गान्धी जी’भी नहीं रहे….
‘सुभाष जी’भी चल बसे…
‘जवाहरलाल जी’भी कब के ऊपर पहुँच गए…
“मेरी भी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती…
“ना जाने कब लुढक जाऊँ”
“पता नहीं इस देश का क्या होगा?”
“अब रोज़-रोज़ बिना रुके लगातार’सूटटे’मारुंगा तो तबियत तो बिगडनी ही है लेकिन…
क्या करूँ ये साला!…दिल है के मानता नहीं”
“बहुत [...]
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Posted on October 1, 2007 by राजीव् तनेजा
***राजीव तनेजा***
“मैने उसे क्या समझा?और…वो क्या निकली”
“दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा…बरबादी की तरफ ला के छोडा”
“शायद ही इस पूरे जहाँ में मुझे कोई इतना प्यारा था लेकिन…
“जिस से जितना प्यार करो…वो उतना ही दूर भागता है”…
“ये बुज़ुर्गों का कहा आज मुझे समझ आया लेकिन क्या फायदा जब..
“चिडिया चुग गयी खेत”
“जिस कम्भख्त मारी के नाम [...]
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