“बुरा दिन”

“बुरा दिन”

***राजीव तनेजा***

“मुँह में जो पानी ने आना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लिया”

“मेरी हालत देख बीवी से रहा ना गया….तुनक के बोली….

“अभी तो सिर्फ शादी का न्योता भर ही आया है और तुम्हारा ये हाल हुए जा रहा है….

“जब मौका आएगा तो कुछ’खान’पडेगा नहीं आपसे”
मैँ बोला”अरी भागवान!….कभी तो अपनी चोंच बन्द किया करो…

ये नहीं कि हर’टाईम’बस’बकर-बकर’..

“ऊपरवाले ने अगर ज़बान दी है तो वो दी है…’तर’माल पाडने के लिए….

“ये नहीं कि जब देखो करते जाओ …बस’चबड-चबड’…..और कुछ नहीं”…
“बिना आगा-पीछ सोचे बोलते जाओ…बस बोलते जाओ”…

“वो भी बिना किसी तुक के”
बीवी कहाँ रुकने वाली थी?तपाक से जवाब दिया…

“जानती हूँ आपको…

बातें ये लम्बी चौडी..और जब खाने की बारी आए तो…

“टाँय-टाँय-फिस्स”
“पिछली बार का याद है ना…जब गए थे शर्मा जी के बेटे की बारात में…

“क्या खाक माल पाडा था?”….

“बस दो-चार आल्तू-फाल्तू की चीज़ों में ही पेट पस्त हो गया था आपका”
“अरे!…वो तो मैँ ही थी जो …पूरे हफ्ते भर का माल-पानी समेट लाई थी एक ही झटके में”
“और हाँ!…जब जा ही रहे हो तो एक बात ध्यान से गाँठ बाँध लो”….

“खबरदार!..जो खाली हाथ वापिस आए”….

“घर में घुसने तक न दूंगी”…

“कहे देती हूँ!…कसम से”
“और हाँ!…वो’जैकेट’ले जाना मत भूल जाना कहीं”..
“बडी मुश्किल से’वाटर-प्रूफ’जेबें लगवाई हैँ….

‘गुलाब जामुन’और’रसमलाई’के लिए”…

“ये नहीं कि’वाटर प्रूफ’जेबों में’पकोडे’लाद लो और’गुलाब जामुन’दूसरी जेब में कि…

पूरे रास्ते भर’चासनी’ही टपकती रहे”…
“पता है ना?…पिछली बार कितनी’चींटियाँ’चिपक गयी थी मिठाई से”…
“पूरा बदन सुजा दिया था कम्भखत मारियों ने काट-काट के”….

“एक-एक को मिठाई से उखाड कर फैंकने से मिठाई खाना भी कितना बदमज़ा हो गया था ना?”
“अब भला सारी कहाँ छूट पायी थी?”…

“आठ-दस को तो निगलना ही पडा था”
“वो ही तो….”

“ध्यान रखना कि सबसे पहले किस चीज़ पे हाथ साफ करना है और बाद में किस पर”…
“खबरदार!…जो’पनीर’के अलावा किसी चीज़ को मुँह मारा तो”…

“खाना है तो ढंग की चीज़ खाओ”…

“ये क्या?कि बस यूँ ही मज़ाक-मज़ाक में उलटी-सीधी चीज़ों से’स्वाद-स्वाद’में ही निबट लो”
“अरे!…दावत तो होती थी हमारे टाईम में…

महीने भर पहले ही जा धमकते थे न्योता देने वालो के यहाँ कि…

“ले बेटा!..कर सेवा-पानी”…

“हमारा आशीर्वाद तेरे साथ है”
“अब तो बस नाम भर का ही रह गया है मिलना-मिलाना”

“किसे फुर्सत है अब एक दूसरे का हाल-चाल पूछने की?”…
“अब तो बस….

‘जाओ’….

‘शक्ल’दिखाओ ..

‘थोडा बहुत पेट में ठूसो’…

‘लिफाफा थमाओ’…

और हो लो रफूचक्कर”
“ऊपर से ये मुय्या’प्लेट सिस्टम’का फैशन खाने का तो मज़ा ही बद मज़ा करता जा रहा है”
“ये भी कोई बात हुई कि बस चुपचुपाते…’आर्डर’करो…’थोडी’अंटी’ढीली करो’…और हो गया काम”

“पडोस तक को भी ना पता चले कि कोई दावत-शावत का प्रोग्राम है”
“और ऊपर से ये साले!..’केटरिंग’वाले बडे ही चालू होते है….

जब’रेट’..’फाईनल’करने का वक्त होता है तो…

“जी!..ये परोसेंगे”…और…”वो भी परोसेंगे”….
“माँ….दा…सिर्…परोसेंगे”
“साले!… इतनी लम्बी-चौडी’लिस्ट..’रट्टू तोते’के माफिक’सुना डालते हैँ कि….

बन्दा तो बस बावला हो उनकी ही’डायलाग बाज़ी’सुनता रहे”…

“साले!…बातों की ही खाते हैँ और…बातों की ही खिलाते हैँ”

“कोई कसर बाकी  न रह जाए…यही सोच बन्दा चुप लगा जाता है”…

“इज़्ज़त जो प्यारी होती है सभी को”

“किसी को बिटिया के हाथ पीले करने होते हैँ..

“तो किसी को अपने पैसे की नुमाएश”
“इस चक्कर में ये भी भूल जाते हैँ कि..

“कम्भख्त साला पेट तो एक ही है”…

“क्या-क्या ठूसा जाएगा इसमें भला?”
“ईमानदारी की बात तो ये कि बन्दा अगर ढंग से खाने बैठे तो एक या दो’आईटम’में ही’कोटा’पूरा”
“लेकिन…”लालच बुरी बला है”…

“सो!…खाने वाला सोचता है कि अपने बाप का क्या जा रहा है?…

“थोडा खाओ…थोडा फैंको”
“चीज़ पसन्द भी आ जाए बेशक…लेकिन जैसे दूसरे की बीवी ज़्यादा सुन्दर लगती है…

ठीक वैसे ही..दूसरे की’प्लेट’में पडा खाना ज़्यादा’लज़्ज़तदार’दिखाई पडता है”
“इसलिए एक कौर मुँह में डाला नहीं कि बाकि सारा सीधा’डस्टबिन’में जाता नज़र आता है”
“फिर से नयी’प्लेट’में नयी’आईटम’”
“पट्ठे के पास…नम्बर दो का बडा माल है…

“कुछ तो कम हो”
“वर्ना’टैक्स-वैक्स’के लपेटे में आ गया तो वैसे ही लेने के देने पड जाएंगे”..

“कुछ तो भला हो किसी का”
“अब यार!…वैसे भी कौन सा अपनी जेब से’नोट’लग रहे हैँ?….

“जो एक ही प्लेट में सब कुछ खा डालने की सोचें”
“कई बार तो ऐसा होता है जैसा कभी दिल्ली की’डी.टी.सी’बसों का हाल हुआ करता था….

एक के ऊपर एक लदा दिखाई देता था जैसे…

जीते जागते इंसान न हुए किसी कसाई के पिंजरे में बन्द पडी मुर्गियाँ हों”
“ठीक वैसे ही’प्लेट’में पडे माल का हाल हो रहा होता है…
“पनीर के ऊपर’गोभी’चढी दिखाई देती है तो….

नीचे से जगह बनाते हुए चुपके से’दाल मक्खनी’अपनी’एंट्री’मार लेती है”
“बेचारा’पापड’तो अपनी किस्मत को रो रहा होता है कि…

उसे ऊपरवाले ने इतना कमज़ोर क्यों बनाया?”

“क्या बिगाडा था उसने किसी का जो उसे ऐसे दिन देखने पड रहे हैँ?”
“ऊपर से तो गर्मागर्म’गुलाब जामुन’चढ बैठा और नीचे से’दही भल्ले’की दही दाखिल हो गयी उसकी’टैरेटरी’में”
“ये साले!केटरिंग वाले भी किसी के सगे नहीं होते…

मौका मिला तो बस’आलू’उबाला और तल दिया अल्ग-अलग शक्ल में”
“किसी को’लम्बा’तो किसी को’गोल’…

तो कोई’तिकोना’बन अपने रूप पे इतरा रहा होता है”

“कुछ को’पीला’रंग डाला तो कुछ को’लाल’”
“बस!..हो गयी’वैराईटी’पूरी”
“पल्ले पड रही है ना बात?”या फिर…

भैंस के आगे बीन बजाए चली जा रही हूँ मैँ इतनी देर से?”बीवी गुस्से से बिफरती हुयी बोली
“अरे!…कुछ तो बोलो…”

“मुँह तो खोलो”..

“या ज़बान को ताला लग गया?”
“और हाँ…इसी बात पे याद आया…’सूटकेस’को ताला ज़रूर लगा लेना…

“कहीं बाद में पता चले कि…मेहनत तो हम करते मर गए और चटखारे कोई और मारता रहा”
“‘फाईव स्टार होटल’में पार्टी है…थोडा बन-ठन के जाना”
“क्या-क्या गायब करना है?….मालुम है ना?”…
“या!…बिलकुल ही दिमाग का बंटाधार कर बैठे हो इन बेवाकूफी भरी कहानियाँ को लिखने के चक्कर में”

“कितनी बार कह चुकी हूँ के बेफिजूल में’टाईम’खोटी ना किया करो”…
“जितने मर्ज़ी पन्ने काले करते फिरो..कोई नहीं पढ्ने  वाला”
 

“ना कोई आया है और ना ही कोई आएगा’फीतियाँ’लगाने”
“कभी एक-आध’कमैंट’मिला है ढंग का?”

“बस सब..यही कहते फितरते हैँ कि इतना’टाईम’कैसे निकाल लेते हो?”
“जिसका काम उसी को साजे”

“आँखे बनी हैँ लडकियों को ताडने के लिए और….

तुम सोचते हो कि ये ज़रूरी काम छोड हर कोई तुम्हारे इन कागज़ों में माथा-पच्ची करता फिरे”
“उफ!…कितने भोले हो तुम भी”
“अब किसे टाईम हैँ कि बेकार की रद्दी में आँखे गडाता फिरे?”

“अपनी तरह घर से फाल्तू समझ रखा है क्या सबको?”
“ये सब चिट्ठे-विट्ठे’बेकार के ढकोसले हैँ …कोई नहीं पढता इन्हें”…

“सिर्फ दिल की भडास निकलने का ज़रिया भर हैँ”

“अब अगर दो चार चेले मिल मिला भी गए अपवाद स्वरूप तो कौन सा तीर मार लोगे?”
“दो चार नमूनों ने कुछ झूठी-सच्ची तारीफ क्या कर दी…

सब काम छोड के जनाब लग गये’कीबोर्ड’की ऐसी तैसी करने में”
“तीन तो बदल चुके हो दो साल में”
“जिस दिन’कम्प्यूटर’खुद ही हाथ खडे कर देगा…तभी चैन पडेगा आपको”…

“कुछ तो बक्श ही दो मेरी खातिर”…

“थोडी’चैट-वैट’क्या कर लेती हूँ कभी-कभार”….

“मेरा सुख नही देखा जाता आपसे”कहते हुए बीवी ने झट से कम्प्यूटर बन्द कर दिया
“चिटठे और चिट्ठाजगत की बुराई सुनी ना गयी मुझसे और गुस्से से चिल्ला पडा..

“चुप होती है या दूँ एक खींच के ?”

“कितनी बार कहा है कि फाल्तू ना बोला कर…लेकिन तेरी ज़बान है या हिन्दुस्तान की अबादी?”..

“रुकने का नाम ही नहीं लेती”
“मेरी गीदड भभकी काम आई और बीवी चुप लगा के बैठ गयी”
“दर असल उसे मेरी चिंता नहीं लेकिन आने वाले माल-पानी की चिंता तो ज़रूर ही थी”
“खैर!…सब गिले-शिकवे छोड हम मियाँ-बीवी रात भर दावत के बारे में ही बातें करते रहे”

“कब आँख लगी कुछ पता नहीं”
“याद नहीं कि…अलसुबह के सपने में किसका चौखटा देखा था…

जो हर वक़्त बुरा ही बुरा हो रहा था मेरे साथ”
“पहले तो घर से निकलते ही बिल्ली रस्ता काट गयी और…ऊपर से पेट भी खराब हो चला था”
“पता नहीं बीवी किस भण्डारे से माल-पानी ले आई थी हफ्ता भर पहले?”

“कल तक तो ठीक ही था…एक दिन में ही इतना बिगड जाएगा…सोचा न था”
“पता होता तो कल ही सारा का सारा सफाचट न कर जाता भला?”
“अब यार!..रह रह कर पेट में गुड-गुड सी हो रही थी लेकिन…

‘ट्रेन’के छूट जाने का डर और नतीजन’बेलन’की मार पडने का खौफ…
सो!…मैँ’इंजन’की सीटी सुन भाग लिया सरपट’रेलवे स्टेशन’की ओर”
“बडी मुश्किल से आखरी डिब्बे में जगह बनाई”
“जल्दबाज़ी में पता ही नहीं चला कि’कम्पार्टमैंट’लेडीज़’है या फिर’जैंटस’”
“आव देखा ना ताव…सीधा भाग लिया’टायलेट’की तरफ”
“दरवाज़ा अन्दर से बन्द था”

“खूब खटखटाया…लेकिन कोई फायदा नहीं”
“आखिर तंग आ के ऊपर रौशनदान से झाँकने की कोशिश कि तो..

पीछे से एक जनाना आवाज़ों ने ध्यान बांट दिया”…
“बचाओ….बचाओ”…

“पुलिस…पुलिस”…की सी अवाज़ें सुनाई दे रही थी”
“किसी अनहोनी की आशंका से पलट के देखा तो सब कम्भखत मारियों का इशारा मेरी ही तरफ था”
“हडबडाहट में कहाँ कूदा…कैसे कूदा..कुछ याद नही….बस सीधा सरपट भाग लिया दूसरे डिब्बे की तरफ”
“लेकिन…हाय री!…. फूटी किस्मत”

“सामने से हवलदार आवाज़ें सुन के इधर ही चला आ रहा था”

“साथ में कई और’ठुल्ले’भी थे”

“मुझे भागते देख वो भी मेरे पीछे लपक लिए और धर दबोचा मुझ मासूम को’मुर्गे’की माफिक”
“साले!…लेडीज़ को छेडता है?”…

“अभी सिखाते हैँ तुझे सबक कि कैसे छेडा जाता है लेडीज़ को”

“चल!..टिकट दिखा”…
“मैँ चुप”….

“जब भला जब मेरे पूरे खानदान ने कभी टिकट नेहीं लिया तो मैँ भला क्यों लेने लगा?”

“फाल्तू पैसे नहीं हैँ हमारे पास कि यूँ ही मुफ्त में लुटाते फिरें”

“सो!..जेबें टटोलने का नाटक करते हुए बहाना बना डाला….
“जी!…लगता है जल्दबाज़ी में स्टेशन पे ही गिर गयी”
“मेरे सूट-बूट’का’एक्सरे’करने के बाद सबकी आँख बचा हवलदार ने जेब गर्म करने का इशारा किया”
“पागल कहीं का…इतना भी नहीं पता कि मैँ हमेशा माँगे हुए कपडों मे ही जचंता हूँ”
“पता नहीं’लालू’ने भी किस-किस को भर्ती कर डाला है?”
“बेवाकूफ!…अपनी बीवी ने कभी अपुन की जेब में चवन्नी के अलावा कुछ टिकने दिया है भला?…

जो आज कुछ माया-शाया दे देती”
“हुँह!…और ये जनाब चले हैँ’टिकट’वसूलने”
“जेब गर्म करने का तो भैय्या …सवाल ही पैदा नहीं होता”
“सीधे-सीधे ….साफ-साफ हाथ खडे कर दिए”और मिमियाते हुए बोला कि….

मेरा पेट खराब है..मुझे’टायलेट’जाने दो”…..
“प्लीज़”….
“हवलदार को गुस्सा तो मेरी कंगली हालत देख पहले से ही चढा था,बोला…
“साले!….

“एक तो बिना टिकट”…

“ऊपर से लेडीज़’कम्पार्टमेंट”

“और अब जनाब’टायलेट’भी…’लेडीज़’का ही इस्तेमाल करना चाहते हैँ”

“इसे कहते हैँ…’चोरी…ऊपर से सीना जोरी”
“तेरे जैसे’ड्रामे’के लिए तो हमने स्पैशल’जुगाड’बनाया हुआ है”…
“इसी की तनख्वाह मिलती है हमें”
“चल!..वहीं ले चलता हूँ”
“तू भी क्या याद करेगा कि किसी दिलदार से पाला पडा है”
“चेहरे पे मुस्कान उभरी….उम्मीद की किरण जो जाग चुकी थी कि…

इस हवलदार के बच्चे को वहीं से चकमा दे नौ दो ग्यारह हो जाउंगा”

“लेकिन वो साला!…भी किसी कमीने से कम नहीं था”…

“बहुत चतुर था”..

“इरादा भाँप गया मेरा और ज़बरदस्ती सारे कपडे उतरवा बन्द कर दिया एक सडियल से’टायलेट’में”
“मैने भी सोचा कि पहले ज़रूरी काम से तो फारिग हो ही लूँ”….
“बाद में निबटूंगा इस हवलदार के बच्चे से “
“लेकिन सालो ने बिना टिकट वालो के लिए जो’इंतज़ामात’किए हुए थे…

वो सब देख तो मेरे होश’फाख्ता’होने को आए”
“अब!…अपने मुँह से कैसे कहूँ?कि…कैसे-कैसे’शाही इंतज़ामात’थे”
“आप खुद समझदार हैँ…अपने आप अन्दाज़ा लगा लेना मेरी हालत का”


“बडी मुशकिल से मान-मनौवल कर किसी तरह हवलदार से पीछ छूटा…

“उसको भी अठन्नी का’पार्टनर’बनाना पडा शादी के माल-पानी में”

“अब वो उल्लू का पट्ठा भी दोस्त बन मेरे साथ ही जा रहा था शादी में”…
“वो भी बिना’टिकट’… “
***राजीव तनेजा***

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