“आसमान से गिरा”
***राजीव तनेजा***
“हाँ आ जाओ बाहर…”…
“कोई डर नहीं है अब”….
“चले गये हैँ सब के सब”
“मैँ कंपकपाता हुआ आहिस्ता से’जीने’के नीचे बनी पुरानी कोठरी से बाहर निकला”
“एक तो….कम जगह…
ऊपर से’सीलन’और’बदबू’भरा माहौल”…
“रही-सही कसर इन कम्भख्त मारे चूहों ने पूरी कर दी थी”
“जीना दूभर हो गया था मेरा”
“पूरे दो दिन तक वहीं बन्द रहा मैँ”
‘ना खाना’…..
‘ना पीना’…
ना [...]
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