“आदमी गर आदमी”

“आदमी गर आदमी”***प्रभाकर***(मेरे अँकल द्वारा लिखी एक और गज़ल)
आदमी गर आदमी को ही न जाने लगे
खुदा की ज़ात को वो कैसे पहचाने लगे
तेरी रहमत ने बदल डाले रुख रिन्दों के
मयखाना छोड अब तो शिवाले जाने लगे
खुदापरस्त, राजा-रंक में फर्क क्या जाने
सोना मिट्टी समझ,मिट्टी में ही मिलाने लगे
खुमारी-ए-खुदा की में हुए मदहोश इस कदर
कि बेखबरी में [...]