“बोया पेड बबूल का”
***राजीव तनेजा***
“चेहरा उदास हो चला था और माथे का पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था”
“कंपकपाते हुए हाथों से फोन को वापिस रख…
मैँ निढाल हो वहीं का वहीं’धम्म’जा गिरा”
“सोच-सोच के परेशान हुए जा रहा था कि ….
“क्या होगा?”….
“कैसे होगा?”…
“कैसे’मैनेज’करुंगा सब का सब?”
“कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि…
‘क्या किया जाए?’और….
‘कैसे किया [...]
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