“बोया पेड बबूल का”
***राजीव तनेजा***
“चेहरा उदास हो चला था और माथे का पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था”
“कंपकपाते हुए हाथों से फोन को वापिस रख…
मैँ निढाल हो वहीं का वहीं’धम्म’जा गिरा”
“सोच-सोच के परेशान हुए जा रहा था कि ….
“क्या होगा?”….
“कैसे होगा?”…
“कैसे’मैनेज’करुंगा सब का सब?”
“कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि…
‘क्या किया जाए?’और….
‘कैसे किया जाए?’”
“बार-बार ऊपरवाले को याद कर यही प्रार्थना किए जा रहा था कि…
“काश ये होनी टल जाए किसी तरह”
“उनका आना किसी भी तरह’कैंसल’करवा दे भगवान!…”
“इक्यावन रुपए का प्रसाद चढाउंगा….
‘पूरे इक्यावन’का”
“सच ही तो कहा है किसी नेक बन्दे ने कि ….
“जब आफत लगी टपकने…तो खैरात लगी बटने”
“अन्दर ही अन्दर सोच रहा था कि ….
पहले काम तो बने …फिर देखुंगा कि’इक्यावन’का चढाऊँ के’इक्कीस’का?”
“या फिर’ग्यारह’में भी क्या बुराई है आखिर?”
“भोग ही तो लगाना है बस”…
“बाकी पाडना तो उसे अपुन जैसे’हाड-माँस’के इंसानो ने ही है”
“सो….कुछ कम या ज़्यादा से क्या फर्क पडने वाला है?”
“वैसे भी पत्थर की मूरत को क्या खबर कि …
‘देसी’की खुशबू क्या है और’डाल्डा’कि क्या?”
“हाँ..मुझ पागल को ही फोन उठाना था उनका….?”
“मति तो मेरी ही मारी गयी थी ना जो …
‘फ्री इनकमिंग’के लालच में’चार-चार’फोन लगवा डाले और…
रौब झाडने के चक्कर में’मामाजी’को सभी के सभी नम्बर थमा बैठा”
“अब साला!….’एक’फोन ना उठाओ तो तुरन्त ही’दूजे’की घंटी बज उठती है….
‘दूजा’ना उठाओ तो’तीजे’पे और ‘तीजा’ना उठाओ तो’चौथा’गला फाड चिल्लाने लगता है”
“साला! …मैँ तो तंग आ गया हूँ इन मुसीबत के मारे मोबाईलों से”
“सालों ने अच्छा’लाईफ टाईम’का पंगा डाल’पंगू’बना डाला पब्लिक को”
“पहले कितना अच्छा था कि’रीचार्ज’ना करवाओ तो साले!…
तुरंत ही’लाईन’काट डालते थे कि…
“ले बेटा!…हो जा आज़ाद”
“कोई नहीं करेगा अब तंग”
“और अब…भले ही जेब में’चवन्नी’हो ना हो लेकिन फोन’चालू का चालू’”
“बैलैंस हो ना हो कोई फर्क नहीं पडता”
“किसी को’गोली’देने लायक भी नहीं छोडा पट्ठों ने कि ….
“भैय्या मेरे…’फोन’में बैलैंस नहीं था….सो बन्द हो गया”…
“तो बात कैसे करता आपसे?”
“अच्छा ‘झुनझुना’थमाया पट्ठों ने ये’लाईफ टाईम’का”
“एक तो’काल’महँगी कर दी “….
“ऊपर से जिसे देखो साला!’मिस्ड काल’मार डालता है फ़ट से कि …
“बेटा!…अपना काम तो कर दिया हमने”…
“अब तू ही कर फोन”
“साला!…’चवन्नी-छाप’कहीं का”…
“पैसे कौन भरेगा?”…
“तेरा बाप!….?”
“पेड पर नहीं उग रहे और…
ना ही मेरा बाप कोई’मिल’चलता छोड गया है कि…
“ले बेटा …तू उडा”….
“मौज कर”….
“मैँ हूँ ना”
“अब अगर कोई लडकी’मिस्ड काल’करे तो बात समझ में भी आती है कि …
“कर ले बेटा फटाफट तू ही”….
“गर्ज़ जो अपनी है”….
“साली! कहीं किसी और के संग ही ना लडाने लगे नैन”
“पहुँच जाए किसी और के साथ’डेट’मारने और….
हम रुपये दो रुपये बचाने के चक्कर में पूरा लड्डू ही ना गवाँ बैठें हाथ से कहीं”
“बस यही बुदबुदाते हुए पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गयी”
“जाने कैसा शोर था कि चौंक के उठ खडा हुआ”
“देखा तो वही हुआ जिसका मुझे डर था”…
“मोबाईल ही घनघना रहा था”
‘डेट’…’कन्फर्म हो चुकी थी “
“ऊपरवाले ने एक ना सुनी और कर डाली अपनी मनमानी”
“लाख माथा फोडा उसके दर के आगे लेकिन कोई फायदा नहीं”
“कर ली उसने अपने दिल की पूरी”
“निकाल ली अपनी भडास”
“मैँ तो मज़ाक कर रहा था कि….
‘इक्यावन’या’इक्कीस’और उन्होनें झट से बुरा भी मान लिया”
“भला कोई’डाल्डा’का प्रसाद भी चढाने लायक होता है?”….
“जो मैँ चढाता?”
“अब यार ये क्या बात हुई कि….
वो खुद तो पूरी ज़िन्दगी हमसे मज़ाक करता फिरे…तो कोई बात नहीं?”…
“हमने ज़रा सी ठिठोली क्या कर ली,…
यूँ मुँह फुला के बैठ गये …जैसे…
“मैने कोई गुनाह कर डाला हो”…
“पाप कर डाला हो”
“मालुम है उनको भी कि…चलेगी तो उनकी ही”….
“सो….एक अदना से बन्दे की रज़ा पूछने की ज़रूरत ही क्या है?”
“क्या फर्क पडता है कि…
कोई’मरे’या’जिए’उनकी बला से”
“खुद तो बैठे हैँ मज़े ऊपर …सबकी ज़िन्दगी का फैसला करने को”
“अरे!…अपना काम करो और मस्त हो जाओ”
“नेकी करते जाओ और कुँए में डालते जाओ…बचपन से यही सुनते आ रहे हैँ”
“हमें सिखाते हैँ और खुद ही भूले बैठे हैँ जनाब!…”
“पूरी ज़िन्दगी का ठेका इन्हीं ने ले लिया हो जैसे”….
“हिसाब-किताब ऐसे सम्भाल के रखते हैँ मानो’गर्ल-फ्रैंड्ज़’के’मोबाईल नम्बर’कि…
एक भी ना छूट जाए कहीं भूले से भी”
“अब फलाने ने ये-ये अच्छा किया और ये-ये बुरा”
“अरे तुम्हे टट्टू लेना है?”
“अगले की मर्ज़ी …जो जी में आए सो करे”…
“बस पीछे ही पडे रहा करो हाथ धो के “…
“और कोई काम-धाम है कि नहीं?”
“ठीक है माना!…कि’पैदा’करने वाल’वो’…और
‘मारने’वाला भी’वो’”….लेकिन ये जो बीच का वक्त है …
“‘ज़िन्दगी’और’मौत’के…
उसे तो अपनी मर्ज़ी से जी लेने दो हमें कम से कम”
“यूँ ही मुफ्त में टांग अडाने चले आते हैँ मुँह उठा के”
“मन ही मन’उसे’कोसते हुए पता ही नहीं चला कि…
वक़्त कैसे तेज़ी से दौडे चला जा रहा था’फुल स्पीड’”
“रौंगटे खडे होने को आए थे कि वो भी एक-एक चीज़ का बदला ज़रूर लेंगे”
“कोई कसर बाकी नहीं रहने देंगे”
“आज महसूस होने लगा था कि …
‘एक ना एक दिन’….
‘सेर को सवा सेर’ज़रूर मिलता है”
“सही या गलत सब का हिसाब यहीं चुकाना पडता है”
“ये सब अगला’जन्म-वन्म’सब बे-फिजूल की बातें है”…
“इनका कोई मतलब नहीं”…
“असलियत से कोई सरोकार नहीं”
“जिसका जैसा मौका लगता है वो वैसा दाव चले बगैर नहीं रहता”
“अन्दर ही अन्दर’चोर दिल’कह रहा था कि …
“आखिर तुमने भी भला कौन सी कसर छोडी थी?”…
“जो अब उसकी तरफ’टुकुर-टुकुर’ताक रहे हो”…
“क्या अपना खुद का माल होता तो इस बेदर्दी से उडाते?”
“नहीं ना”…
“फिर भुगतो अब…”
“जैसा करोगे …वैसा तो भरना ही होगा”
“बोया पेड बबूल का तो…फल कहाँ से होय”
“जैसी करनी वैसी भरनी”
“खुद तो दूसरों के घर में’नवाब सिराजुदौला’बने बैठे थे जनाब!”
“बाप का माल समझ के उदा रहे थे ना?”
“अरे!…अगर सचमुच बाप का समझा होता तो आज ये नौबत नहीं आती कि…
खुद ही अपनी करतूतों से मुँह छुपाते फिरते”
“उस वक्त अक्ल क्या घास चरने गयी थी?जब’फोकट’का माल समझ…
“राम नाम जपना”…
“पराया माल अपना”की पालिसी पर चल रहे थे”
“हर चीज़ तो तोड-ताड के बन्ने मारी थी तुमने और तुम्हारी नालायक औलादों ने”
“कोई कंट्रोल-वंट्रोल भी होता है कि नहीं?
“या बस खुले साँड की तरह खोल डालो अपने नमूनों को कि….
“लो बच्चो!…सामने’पराया खेत’है….मनमर्ज़ी से रौन्द डालो”….
“कौन सा अपने बाप का है?”
“सैल्फ कंट्रोल भी कोई चीज़ होती है”
“अब भुगतो”
“गल्ती से ‘मुम्बई’आने का न्योता क्या दे बैठे’मामा जी’…
खुद ही अपने पाँव पे कुल्हाडी चला डाली”
“उनको क्या पता था कि पक्के बेशर्मों से पाला पडा है”
“न्योता क्या मिला…
पहुँच गये सीधा अगली ही’ट्रेन’से अपने सात बच्चों की’पलटन’लेकर”
“लेकिन…एक बात की तो’दाद’देनी ही पडेगी दोस्त!…
“माथे पे एक शिकन तक नहीं आई थी उनके और एक तुम हो कि….
“अभी से’साँस’फूलने लगी?”
“हुह!….”
“बारिश के आने से पहले ही’तम्बू’के छेद तक गिनने बैठ गये”
“बेवाकूफ!..”
“किस सोच में डूब गए?”
“कहीं उनके स्वागत की तैयारी के बारे में तो नहीं सोच रहे ना!..?”
“क्या कहा?”
“अक्ल क्या घास चरने गयी है तुम्हारी?”
“पता है ना कि कितने की’वाट’लगेगी?”
“यूँ हाथ पे हाथ धरे रहने से कुछ नहीं होगा”…
“सोचो”….
“सोचो कुछ”…
“दिमाग के घोडे दौडाओ”
“कोई तो हल निकलेगा इस मुसीबत का”
“क्या करूँ?”…
“कहाँ जाऊँ?”…
“कुछ समझ नहीं आ रहा”…
“हाँ!..एक आईडिया है”..
“यही ठीक भी रहेगा”
“घर को ही’ताला’लगा खिसक लेता हूँ कहीं बच्चों समेत”
“ना होगा बाँस और ना ही बजेगी बाँसुरी”
“कम्भख्त किसी का न्योता भी तो नहीं आया इस बार”
“पिछले साल का भूला नहीं हूँ मैँ”…
“बिना न्योते के ही जा पहुँचे थे”….
“आगे मुँह चिढाता’ताला’लटका मिला था”
“लेने के देने पड गए थे”
“आमदनी दुअन्नी भी नहीं और खर्चा चोखा”
“पूरे रास्ते बीवी(हाई कमाड) के ताने सुनने पडे…सो अलग!..”
“या कहीं जा के छुप ही जाऊँ?”…
“तो कैसा रहेगा?”
“नहीं ये ठीक ना होगा”…
“अपने घर से ही मुँह छिपाता फिरूँ?”…
“इसमें कहाँ की समझदारी है?”
“कोई ना कोई चक्कर तो ज़रूर ही चलाना पडेगा”
“एक और आईडिया है”…
“हाँ यही ठीक है”और…यही ठीक भी रहेगा”
“हमेशा के लिए ही रास्ता बन्द”
“पक्का बेशर्म बन जाता हूँ”…
“पैसे बचाने में कैसी शर्म?”
“अगर समझदार होंगे तो तुरंत ही अपना’झुल्ली-बिस्तरा’सम्भाल….
‘मुम्बई’वापसी का टिकट कटवा लेंगे”
“हाँ यही ठीक रहेगा”
“रोज़-रोज़ के टंटे से तो यही ठीक रहेगा”
“मुँहफट होना ही बेहतर है”
“सीधे-सीधे ही फोन कर के कहे देता हूँ कि…
“हम तो खुद ही जा रहे हैँ दो महीने के लिए’बाबाजी’के आश्रम”
“बीवी की तबियत जो ठीक नहीं रहती”…
“शायद’योगा-वोगा’से ही ठीक हो जाए”
“समझदार को इशारा काफी”
“नासमझ नहीं हैँ वो दोनों कि इतनी सी भी बात को ना समझें”
“अपने आप समझ जाएंगे सब और चलते बनेंगे”
“ये सोच खुशी भरी मुस्कान अभी ठीक से चेहरे पे आयी भी नहीं थी कि …
मुय्या फोन फिर से घनघना उठा”
“‘मोबाईल’वालों को सौ-सौ गाली बकते हुए’फोन’उठाया तो जो खबर मिली…सुन के…
फीकी पडती मुस्कान फिर से खिल उठी”
“मामा जी का ही फोन था”…
“खबर ही कुछ ऐसी थी कि….
‘बाँछो’ने तो खिलना ही था”…
“सो!…खिल उठी”…
“आना’कैंन्सल’जो हो गया था”
‘बाबाजी’के आश्रम जा रहे थे वे दोनों”
“मामी की तबियत जो ठीक नहीं रहती थी”
“सचमुच में’बाबाजी’के’योगा’में चमत्कार है”
“बडी-बडी बिमारियाँ भी जड से ठीक हो जाती हैँ…कुछ ही महीनों में”
“अब मैँ’मामाजी’को’बाबा’के योगा के गुण बढ-चढ कर बता रहा था”
***राजीव तनेजा***
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