“धन्यवाद चिट्ठाजगत”

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धन्यवाद चिट्ठाजगत, ….पाँच नए धमाल मचाते चिट्ठों मे शामिल करने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद…. उम्मीद से ज़्यादा….कभी सोचा भी ना था…

एक बार फिर से शुक्रिया आप सभी साथियों का जिनके सहयोग के बिना ये सम्भव ना था   

दोस्ती दोस्त ना रहा”

“दोस्त दोस्त ना रहा”

***राजीव तनेजा***

“दोस्त-दोस्त ना रहा…प्यार-प्यार ना रहा”….

“ऐ ज़िन्दगी हमें तेरा एतबार ना रहा”
“आज ये गाना मुझे बार-बार याद आ रहा था …और इस सब की वाजिब वजह भी तो मौजूद थी
“सच ही तो है…

आजकल कोई किसी का….

‘यार’नहीं,….

‘दोस्त’नही…..

‘सब के सब’मतलबी’इंसान”

“सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ”…
“मेरी ऊट्पटांग कहाँनियों और मेल्ज़ की तो मेरे सामने जी भर के तारीफ करते और….

पीठ पीछे बिना चैक किए ही डिलीट मार डालते”
“वाह!री दोस्ती…वाह!”

पूछो तो ….”यार अच्छी थी”….

“लेकिन याद नहीं”….

“सब की सब मिक्स हो गयी हैँ”…
“उनका भी क्या कसूर?”…

“आखिर वो सब भी तो तंग आ चुके थे….

उनकी’मेल आई.डी’…’जंक’मेल्ज़ का अड्डा जो बन चुकी थी मेरी वजह से”

“दर असल हुआ क्या कि कुछ ज़रूरत से ज़्यादा समझदार इंसानो ने…

पकी-पकायी खाने की सोची और’डाईरैक्ट’ही ‘कापी-पेस्ट’कर डाली मेरी’मेलिंग लिस्ट’
सोचा होगा कि “अब कौन कम्भख्त एक-एक’ग्राहक’ढूंढता फिरे गली-गली कि…

“अल्लाह के नाम पे….

‘मौला के नाम पे’,

‘ऊपरवाले के नाम पे’….

कोई तो मेरी’मेल’पढ लो बाबा”…
“बस एक-दो’मेल्ज़’और’कहानियों’का सवाल है बाबा…”

“ये तो वही बात हुई कि….

करे कोई और….भरे कोई”

“पंगा लिया दूसरों ने और कन्नी सब मुझसे काटने लगे”
“अब मुझे कोई काम-धाम तो होता नहीं था…

सो खाली बैठे -बैठे और क्या करता?”

“लगा रहता’मेल’पे’मेल’भेजने”

पहले तो मज़े-मज़े में सब कहते कि”आपकी कहानियाँ बडी ही’फन्नी’होती हैँ”

“अरे जब ऊपरवाले ने अपुन का चौखटा’फन्नी’बनाने में कोई कसर नहीं छोडी तो…

मैँ भला कौन होता हूँ …अपनी कहानियों को’फन्नी’बनाने से रोकने वाला?”
“सबको’ऎड’कर डालता अपनी’मैसेंजर’लिस्ट में”

“अब अपुन ठहरे पूरे के पूरे चेपू किस्म के इंसान”…

“बस एक मौका भर चाहिए…फिर देखो जलवा”…

“एक बार…हाँ बस एक बार…ज़रा सी लिफ्ट मिले सही फिर…

पीछा कौन कम्भख्त छोडता है?”
“सो तंग आ के किसी ने’आफ-लाईन’रहना शुरू कर दिया तो किसी ने’इगनोर’मारना”

“कुछ तो इस हद तक भी गिर गये कि सीधे-सीधे’ब्लैक लिस्ट’ही कर डाला”

“सारा का सारा टंटा ही खत्म”

“खेल खत्म और पैसा हज़म”
“और अपुन रह गये फिर वैसे के वैसे …

‘ठन-ठन गोपाल’
“सही कहा है किसी ने कि….

खाली बैठे इनसान का दिमाग ‘शैतान’का होता है और…

अपुन तो पूरे के पूरे सोलह-आने फिट बैठते थे इस बात पर”

“सो फटाक से अपुन के भेजे में एक कमाल का’आईडिया’भेज डाला ऊपरवाले ने”

“वाह!…क्या आईडिया था”

“वाह!….वाह!…”

“जी तो चाह रहा था कि किसी तरीके से अपनी गरदन ही लम्बी कर डालूं और….

खुद ही चूम डालूँ अपना’खुराफाती’दिमाग”
“अब कोई और तो तारीफ करने से रहा इस मतलबी ज़माने में”

“वाह!…वाह!  क्या दिमाग पाया है….वाह!…वाह!”…

“सुभान अल्लाह!…”
“अब आव देखा ना ताव और बना डाली दो-चार’फेक आई.डी’”

“अब देखता हूँ कि कैसे सब मुझे’इग्नोर’मारते हैँ?”
“अब सब्र कहाँ था मुझे?”…और…

रुकना भी कौन कम्भख्त चाहता था?”

“सो सीधा टपक पडा’इग्नोर’मारने वालों पर”…

“लो साला!…लो…’ऐड’का’इनवीटेशन’इधर से भी और उधर से भी”

“थपाक…थपाक”….
“देखता हूँ बच्चू कैसे बच निकलते हो मेरे इस मकड्जाल से?”
“लेकिन अफ्सोस …बात कुछ जम नहीं रही थी….

‘ऐरे-गैरे’…’नत्थू-खैरे’तो कूद-कूद के’रिप्लाई’देने लगे”

“जैसे मुझसे गले मिले बिना उनका बदन अकडे जा रहा था”

“ऐँठन नही छूट रही थी प्यार भरी’झप्पी’के बिना”

“मिलने को बेताब हो उठे थे साले!…लेकिन…

“जिसका मुझे था इंतज़ार…वो घडी नहीं आयी”

“अरे यार!..लडकियोँ की बात कर रहा हूँ”

“और मुझे भला किसका इंतज़ार होना था?”

“पता नही इन कम्भख्त मारियोँ को क्या’ऐलर्जी’है मुझसे?”

“बडा ही पुट्ठा उसूल जो बना डाला है खुद के लिये कि…

ये खुद तो जिसे चाहेँ अपनी मर्ज़ी से जोड डालें अपनी लिस्ट में लेकिन

इनकी खुद की मर्ज़ी के बिना कोई परिन्दा भी पर ना फडफडा सके इनके इलाके में”

“सही कहा है किसी ने कि …

“कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढा करता”

“तंग आ के मैने सोचा कि अब ये खुद तो घास डालने से रही मुझे …

सो अपने’चारे’का इंतज़ाम खुद ही करो”

“वैसे भी किसी कितान में पढा था कि …

“अपना काम स्वंय करना चाहिए”

“ये सोच मेरे खुराफाती दिमाग ने करवट ली और….

एक और’फेक आई.डी’बना डाली”

“आफकोर्स!…इस बार किसी लडकी के नाम से “

“बिना इस्तेमाल किये पडी रही कई दिनो तक”

मानो किसी महूरत का इन्तज़ार था उसे “

“और एक दिन वो शुभ घडी आ ही गयी”…

“निकल पडा महूरत”

“दर-असल हुया क्या कि एक दिन अपने एक लंगोटिया यार से….

फोन पर बात करते-करते मैने कुछ हवाई फायर कर डाले कि…

“अपनी तो निकल पडी”

“मुझ पर तो कई लडकियाँ मर मिटी हैँ”

“दोस्त को मानो यकीन ही नहीं हुआ”….

ताना मारते हुए बोला”लडकी?”….”और तुम पे?”

“हुह…किसी एक की’आई डी’तो बताओ ज़रा”

“आखिर  पता तो चले कि कितने पानी में हैँ हमारे हुज़ूर”
“मैने भी झट से थमा दी अपनी वही’फेक’वाली’आई डी”

“बस फिर क्या था जनाब!…

जो’आफलाईन’पे’आफलाईन’टपकने चालू हुए तो बस टपकते ही चले गये”

“शुरू-शुरू में तो’इग्नोर’मारता रहा लेकिन बाद में पता नहीं क्या शरारत सूझी और …

मैने भी पंगे लेने’स्टार्ट’कर दिए”

“अब उस से रोज़ ऐसे’चेट’करता जैसे मैँ कोई लडकी हूँ और….

किसी दूसरे शहर से उनके शहर में रहने के लिये नई-नई आई हूँ”

“फोटो तो मैँ किसी और की पहले ही चिपका चुका था अपनी इस’आई.डी’के साथ”

“पता नहीं किस की फोटू थी”…

“पर थी बडी ही’झकास’…

“पूरी’बम्ब’थी’बम्ब”

“अब अपने मुँह से कैसे कहूँ? कि किसी साईट से मारी थी….

“दोस्त ठहरा’आदम-ज़ात’….

‘लार’टपक पडी उसकी”…
“पटाने के चक्कर में लग गया”

“मैँ’लाईन क्लीयर’दूँ और वो न पटे?”

“ऐसी सोच भी भला कोई कैसे सोच सकता था?”
“लेकिन हद तो तब हो गयी जब….

वो साला!..हराम का जना ….

मेरा ही पत्ता काटने की फिराक में लग गया”
“एक दिन उसने बेशर्म हो कह ही दिया कि”तुम्हें इस राजीव से घटिया इंसान नहीं मिला पूरे’मकड्जाल’में?

“जो इस नामुराद से दोस्ती कर बैठी ?”

“इस से तो अच्छा था कि कहीं जा के ….

किसी और को ही पटा लेती”
“मैँ हक्का-बक्का सा रह गया”…लेकिन वो चुप नहीं हुआ
“है तो वो पचास के आस-पास लेकिन …

सभी लडकियों को’30+’ही बताता है और तो और….

“हिम्मत तो देखो मरदूद की…

‘फोटू’भी अपनी बीस साल पुरानी वाली दिखाता है”
“असल में उसके आठ बच्चे हैँ”…
“आठ?”मैँ चौकता हुआ बोला
“जी हाँ!…पूरे आठ”,..गोया…बच्चे ना हुए …पूरी पलटन हो गयी
“लेकिन वो तो सिर्फ दो ही बता रहा था “
“एक नम्बर का झूठा है साला”..

“अच्छा  …आ गया समझ”..

हूँ  तो जनाब!..नई वाली से दो बता रहे होंगे”…

“जनाब ने बाकि सारे गोल कर दिए”
“नई वाली से?”मैँ हैरान-परेशान होता हुआ बोला

“जी हाँ नई वाली से”…
“तो क्या उसने इस बारे में भी कुछ नहीं बताया?”अचरज भरे शब्दों में टाईप किया गया
“नहीं तो…

“आखिर बात क्या है?”….

“पता तो चले”….

“बताओ ना…प्लीज़”
“जब आप इतना’रिक्वैस्ट’कर रही हैँ तो बताए देता हूँ …

“लेकिन.. मेरा नाम ना लेना”….

“बुरा मान जाएगा”…

“जिगरी दोस्त है मेरा”…
“बरसों की दोस्ती….

पल भर में ना टूट जाए कहीं”दोस्त भावुक होता हुआ बोला
“अरे यार! इतनी बुद्धू भी नहीं हूँ कि…

ये भी ना जानू कि कौन सी बात कहनी है और …

कौन सी नहीं”मैने समझदारी से काम लेते हुए कहा
“पहले वाली तो उसे छोड भाग खडी हुई थी ना’ड्राईवर’के साथ”…
“मैँ सन्न रह गया”

“अब तक तो मैँ सारी बात मज़ाक-मज़ाक में ही ले रहा था लेकिन…

ये उल्लू का पट्ठा तो बिना रुके ऐसे….

झूठ पे झूठ बोले चला जा रहा था मानो….

‘बुश’के बाद इसी का नम्बर हो”
“पता नहीं कौन सी फीतियाँ लग जानी ठीक उसके कँधे पे?ये सब बोल-बोल के “
“कर कुछ नहीं पा रहा था मैँ”…

“पोल खुलने का डर जो था”सो चुप लगाना ही ठीक लगा

“मैने बडे ही प्यार से तिलमिलाते हुए पूछा”आखिर वो इसे छोड कर गयी ही क्यों?”
“अब ये तो ऊपरवाला ही जाने कि क्या चक्कर था …लेकिन…

अब अगर रोज़-रोज़ कोठे पे जाएगा तो ….

बीवी भी तो कहीं ना कहीं तो मुँह काला करेगी ही ना?”
“क्या उसके कुछ अरमान नहीं हो सकते?”और …

आखिर क्या नाजायज़ था इसमें?”
“मेरा गुस्सा आपे से बाहर होता जा रहा था लेकिन….

वो बेशर्म चुप होने के बजाए….

नये-नये…इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम थोपे चला जा रहा था”
“ये तो उसकी जुए की लत छुडवा दी मैने वर्ना कब का बे-भाव बिक गया होता बीच बाज़ार में”
“तो क्या जुआ भी खेलता है?”
“हाँ!…और नहीं तो क्या?”

“एक नम्बर का जुआरी है साला!”…

“एक दिन तो उसने दारू के नशे में…
“अब ये ना कहना कि तुम्हें दारू के बारे में कुछ भी नहीं पता”
“सच्ची…कसम से….नहीं पता….

बिलकुल नहीं पता….

तुम्हारी कसम …”
“कुछ सही भी बताया है उसने?”

“या सब क सब झूठ?”

मैने अनजान बनते हुए साफ मना कर दिया कि …
“मुझे कुछ भी नहीं मालुम”
“हद है….

पता नहीं इतना झूठ कैसे बोल लेते हैँ लोग?….

और वो भी ऐक लडकी से….

राम!….राम..

घोर कलयुग”

“पता नहीं ये’गान्धी-नेहरू’के देश को क्या होता जा रहा है”

“क्या यही शिक्षा दी थी हमारे कर्णधारों ने?”
“तुम दारू की बात कर रहे थे?…”
“अब छोडो यार ….

दोस्त है मेरा…

समझा करो…”
“कल को पता चला तो क्या मुँह दिखाउंगा?”

“बुरा ना बन जाउंगा दोस्त की नज़र में?”
“बताओ ना…किसी से कुछ भी नहीं कहूँगी”

“पक्का?”
“बिलकुल पक्का”
“बस यार ऐक दिन ऐसे बैठे-बिठाए खुद अपनी ही बीवी को हार बैठा जुए में”

“ये तो शुक्र है ऊपरवाले का कि सामने जीतने वाला मैँ ही था….

“सो बक्श दिया”…

“कोई और होता तो….

“सरे आम…जलूस निकाल देता”
“ओह!…”
“यार तुमसे एक बात कहनी थी”वो कुछ सकुचाते हुए बोला

“अगर बुरा ना मानो तो….
“जी कहें?”
“यार!…जब से आपसे’चैट’करने लगा हूँ,….

पता नही क्या होता जा रहा है मुझे”
“ना दिन को चैन …

और ना ही रात को आराम”
“हर वक़्त बस आपका ही सुरूर सा छाया रहता है दिल में”

“पहले कभी तो ऐसा नहीं हुआ”
“मुझे कुछ सूझा नहीं और बस ऐसे ही लिख दिया कि….

“सेम हीयर’…

“मेरा हाल भी कुछ-कुछ आप जैसा ही है”
“बस इतना लिखना था कि उसकी तो बाँछे खिल उठी”
“सारी हदें लाँघता हुआ’….

‘सारी दिवारें फाँदता हुआ’…

‘सारी लक्ष्मण रेखाएँ पार करता हुआ’…एकदम से बोल पडा

“अच्छा …फिर एक पप्पी दो ना”…
“नहीं”
“प्लीज़”…
“नहीं..कहा ना”
“अच्छा बाबा!…बस एक छोटी सी….’किस्सी’ही दे दो”
“उम..म्म्म.ऊय्या .. ह्ह”
“नहीं”….

“कभी नहीं”….

“मतलब ही नहीं”
“प्लीज़….”

“मैँ सकपका गया”….

“जी!…मिचलाने को हो आया था….”

“मुँह बकबका सा होकर रह गया”

“हाँ…अगर सामने लडकी होती…तो और बात होती”

“फिर कोई पागल ही मना करता”लेकिन

“पप्पी…वो भी एक लडके से..
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“क्या बकवास कर रहा है  साले!…?”…

“मै कोई लडकी-वडकी नहीं …

खुद पूरा का पूरा खालिस-शुद्ध एकदम ‘राजीव’हूँ”….

“बेशक छू के देख ले”मुझसे रहा ना गया और आपे से बाहर होता हुआ गुस्से से चिल्ला पडा”

“बस वो दिन है और आज का दिन है….

ऐसे गायब हुआ वो कि जैसे’गधे के सर से सींग’

“कभी आनलाईन ही नहीं हुआ”…

“और होता भी किस मुँह से?”

“लेकिन इधर मैने अपना मन बदल लिया था…

“सब गिले-शिकवे भूल मैँ उसी की बाट जोह रहा था”

“बरसों पुरानी दोस्ती यूँ ही छोटी-छोटी बातों पर खत्म करना ठीक नहीं”

“ऐसा भी क्या गलत किया उसने?”

“अगर उसकी जगह मैँ होता तो क्या मैँ भी यही सब ना करता?”

“आत्मग्लानी से भर उठा मैँ”

“इतना गुस्से में नहीं आना चाहिये था मुझे”

“हद होती है यार गुस्से की भी”

“इस गुस्से ने तो बडे-बडों को बरबाद करके रख दिया”

“अब तो बस सारा-सार दिन उसी के इंतज़ार में’आनलाईन ‘बैठा रहता हूँ कि….

शायद वो भी…कभी…किसी घडी…’आनलाईन’मिल जाए और…

मेरे गुनाह धुल सकें”

और मैँ उस से बस यही एक बात कह सकूँ के…..

“ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे….तोडेंगे उम्र भर…

तेरा साथ ना छोडेंगे …ये दोस्ती…”….

“बस अब तो एक ही तमन्ना बची है दिल में कि …

काश!…मुक्ति मिल जाए मुझे इस गुनाह से …”
“आखिर क्या फर्क पडता है?”….

“या क्या फर्क पड जाता?”

“अच्छा या बुरा सही”…

“लडकी नहीं तो…..लडका ही सही “
“बस काम चलना चाहिये”…

“चलता रहना चाहिए”

“जय हिन्द”
 

***राजीव तनेजा***

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