“क्या माजरा था?”
“क्या माजरा था?”
***राजीव तनेजा***
“आज जन्मदिन है मेरा..लेकिन दिल उदास है”
“पुरानी यादें जो ताज़ा हो चली हैँ”….
“उस दिन भी तो जन्मदिन ही था मेरा”…
“जब मै अड गया था कि गिफ्ट लेना है तो बस…
‘कप्यूटर ही लेना है”…
“उसके अलावा कुछ नहीं”
“ज़िद क्यों ना करता मैँ?”…
“आखिर पास जो हो गया था मैँ लगातार ….
तीन साल फेल होने के बाद”
“अब आपको भला क्यों बताऊँ कि कैसे पास हुआ था मैँ”
“पिताश्री के हज़ार ना-नुकुर करने के बाद भी ज़िद पे अडा रहा मैँ”…
“हज़ार फायदे समझाए कि… इस से ये कर सकते है और …वो भी कर सकते हैँ”
“तब जा के बडी मुशकिल से माने और कंपयूटर खरीद के देना ही पडा उनको”
“पूरे पचास हज़ार खर्चा हुए”
“अब तो खैर इतने में तीन भी आ सकते हैँ”
“ज़माना बदल गया है”
“आता-जाता तो कुछ था नहीं ,लेकिन….
एक दोस्त ने कुछ ऐसे गीत् गाए कंप्यूटर के कि…
“रहा ना गया”
“अब यार नयी-नयी जवानी की शुरूआत हुई थी और उस दोस्त ने जैसे …
‘बारूद’के ढेर को चिंगारी दिखा दी हो”
“जो मैँ कभी सपने में भी नहीं सोच सकता….
“उस सब भी दर्शन करवा दिये उसने बातों-बातों में”
“एक से एक टाप की आईटम”…वो कान में धीरे से फुसफुसाते हुए बोला
“अब अपने मुँह से कैसे कहूँ?”कि क्या-क्या सपने दिखाये उसने
“अब तो ना ‘टीवी’ की तरफ ही ध्यान था और ना ही ‘दोस्त-यारों’की तरफ”
“दाव लगा के ‘पत्ते’खेलना तो मैँ जैसे भूल ही गया था”
“मैने भी आव देखा ना ताव और चल दिया तुरंत ही कंप्यूटर खरीदने”….
“इंटर्नैट तो सबसे पहले लगवाना ही था”…
“सो…लगवा लिया”…
“उसके बिना भला कंप्यूटर किस काम का?”
“असली जलवा तो इंटर्नैट का ही था”….
“दोस्त ने कुछ उलटी-पुलटी ‘साईट्स’ के पते भी मुँह ज़बानी रटवा दिए थे अपुन को”
“सो जैसे ही नैट चालू हुआ…
इधर-उधर चुपके से देखा”…
“कोई नहीं था”…
“झट से दरवाज़ा बन्द किया और चला दी वही वाली स्पैशल वाली साईट”
“देख के चक्कर खा गया कि…
दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही है और हम है कि बस”….
“इतने में पता नहीं कहाँ क्लिक करने के लिए लिखा हुआ आया और…
मुझ नादान से वहीं क्लिक कर दिया”
“अभी देख ही रहा था कि क्या होता है…कि…
दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आयी”…
“घबरा के साईट बन्द करने की कोशिश कि तो …
“ये क्या?”….
“एक को बन्द करो तो साली फुदक के दूसरी टपक पडती”
“उसको बन्द करो तो कोई और टपक पडती”…
“पसीने छूट रहे थे इनके जलवे देख-देख”और उधर लग रहा था कि….
आज बाबूजी ने दरवाज़ा तोड डालने की ही सोची हुई है”
“खडकाए पे खडकाए चले जा रहे थे”
“तनिक भी सब्र नहीं “…
“बन्दे को सौ काम हो सकते हैँ”….
“अब कौन समझाए इनको कि अब मैँ बडा हो गया हूँ”…
“अब तो ये टोका-टाकी बन्द करो”
“इधर मुय्या कंप्यूटर था कि…
‘आफत पे आफत’ खडी करने को तैयार”
“कैसे बन्द करूँ इस मरदूद को?”
“कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?और क्या ना करू?”
“इतने में शुक्र है कि लाईट चली गयी और जान में जान आयी”
“दिमाग चक्कर खाने कोथा कि क्या ऐसा भी हो सकता है ?”
“जिनको हम बडे पर्दे पर देख-देख ‘आहें’भरा करते थे…
‘शरमाया’करते थे…
वो साक्षात मेरे सामने बिना…..”
“अब अपने मुँह से कैसे कहूँ?”
“लेकिन दिल था कि..खुशी के मारे उछल-उछल रहा था” …
“रात के तीन बज चुके थे….
“आँखे लाल हुए जा रही थी”….
“नींद आँखो से कोसों दूर …नामोनिशां भी नहीं था उसका”
“सर्दी के मौसम में भी पसीने छूट रहे थे”
“कहीं कुछ मिस ना हो जाए…इसलिए झट से प्रिंटर का बटन दबा दिया”.
“रूप की देवियाँ साक्षात मेरे सामने ….एक-एक करके प्रिंटर से बाहर …
खुद ही मुझ से मिलने को बेताब हुए जा रही थी”..
“मानो उनमें होड सी लगी थी कि पहले मैँ मिलूगी राजीव से ….और पहले मैँ”…
“कमर का एक-एक बल साफ झलक रहा था”
“हाय!… वो ‘लचकती’,..
‘बल खाती’कमर..
.
“हाय ..मैँ सदके जाऊँ”
“गला सूख रहा था लेकिन पानी के लिये उठने का मन किस कम्भख्त का कर रहा था?”
“सुबह तक कार्डिज की वाट लग चुकी थी”
“पता किया तो पूरे ‘ढाई हज़ार’ का फटका लग चुका था एक ही रात में”
“बाद में पता चला कि…
‘टेलीफोन’…
‘पेपर’…और ..
‘नैट’के पैसे एक्स्ट्रा”
“कुल मिला के ‘तीन हज़ार’मिट्टी हो चुके थे एक ही रात में”
“अगले दिन पिताश्री को कंप्यूटर दिखाने के लिये खोला तो…
आन करते ही फटाक से हडबडाते हुए तुरंत ही बन्द करना पडा”
“पता नहीं कहाँ से एक बालीवुड सुन्दरी की बिलकुल ही *&ं%$#@ फोटू…
आ के चिपक गयी थी मेन स्क्रीन पे”
“बहाना बनाना पडा कि “पता नहीं क्यों ‘शट डाउन’ हो रहा है अपने आप?”
“आन ही नहीं हो रहा है ठीक से”
“अब फोटू हटाना किस कम्भख्त को आता था?”
“फोन घुमाया तो मकैनिक ने जवाब दिया..”अभी टाईम नहीं है,अगके हफ्ते आऊँगा”
“लगता था जैसे बिजली टूट के गिरी मेरे सुलगते अरमानों पर”
“इतने दिन जिऊँगा कैसे मैँ? और…
“किसके लिये जिऊँ भी मैँ”
“निराश हो चला था “
“शायद बक्शीश ना देने का दंड भुगतना पड रहा था मुझे”
“बदला ले रहा था वो मुझसे”…
“बडी रिकवैस्ट की लेकिन वो नहीं माना”
“गुस्सा तो बहुत आया मुझे…
अगर मज्बूरी ना होती तो बताता इस बद-दिमाग को “…
“खैर थक हार कर जब जेब गरम करने का वादा किया तो..
अगले दिन आने की कह फोन काट दिया”
“साला!…लालच का मारा….
मतलबी इनसान”
“अब दिन काटे नहीं कट रहा था और …रात बीते नहीं बीत रही थी “
“बार-बार घडी देखता कि अब इतने घंटे बचे हैँ और अब इतने उसके आने में”
“घडी की सुइयाँ मानो घूमना ही भूल गयी थी”
“रत्ती भर भी खिसकना तो मानो जैसे गुनाह था उनके लिए”
“खैर किसी तरह वक़्त कटा और सुबह होने को आयी”
“आँखे दरवाज़े पर टिकी थी और कान घंटी की आवाज़ सुनने को बेताब “
“इंत्ज़ार की घडियाँ खत्म हुई और वो आ पहुँचा”
“कुछ इधर-उधर बटन दबाए और वो गायब हो चुकी थी”
“पैसे तो लग गये लेकिन जान में जान आ ही गयी”
“कुछ दिनों तक कंप्यूटर का गुलाम हो चुका था मैँ पूरी तरह से”….
“शायद पिताश्री को भनक लग गयी थी कुछ-कुछ”
“नज़र रखने लगे थे मुझ पर”…
“कुछ-कुछ शक सा भी करने लगे थे कि…
पूरी-पूरी रात जाग-जाग कर ये आखिर करता क्या है?”
“एक दिन वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था …
“पता नहीं पिताजी के हाथ वो प्रिंट-आउट कैसे लग गये?”
“मुझे नैट के साथ-साथ कंप्यूटर से भी हाथ धोना पडा”
“अब कंप्यूटर उनके कमरे में शिफ्ट हो चुका था”….
“पता नहीं क्या करते रहते हैँ पिताश्री सारी-सारी रात?”
“कमरा तो अन्दर से बन्द ही रहने लगा था”और…
“टेलीफोन भी कुछ ज़्यादा ही बिज़ी रहने लगा था”
“अब तो ये वो ही जाने या फिर ऊपरवाला जाने कि आखिर…
“माजरा क्या था?”
***राजीव तनेजा***