Posted on September 30, 2007 by राजीव् तनेजा
“बुरा दिन”
***राजीव तनेजा***
“मुँह में जो पानी ने आना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लिया”
“मेरी हालत देख बीवी से रहा ना गया….तुनक के बोली….
“अभी तो सिर्फ शादी का न्योता भर ही आया है और तुम्हारा ये हाल हुए जा रहा है….
“जब मौका आएगा तो कुछ’खान’पडेगा नहीं आपसे”
मैँ बोला”अरी भागवान!….कभी तो अपनी चोंच [...]
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Posted on September 30, 2007 by राजीव् तनेजा
”है बस यही अरमान”
“देखा ना हाय रे!….
सोचा ना हाय रे!….
रख दी निशाने पे जान”
“कदमों में तेरे….
निकले मेरा दम…
है बस यही अरमान”
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Posted on September 28, 2007 by राजीव् तनेजा
“नया मेहमान”
***राजीव तनेजा***
“आजकल तबियत कुछ ठीक नहीं रहती थी….
सो!…एक दिन’अपाइंटमैंट’ले’बीवी के साथ जा पहुँचा’डाक्टर’के पास”
“इत्मीनान से चैक करने के बाद मुस्कुराते हुए’डाक्टर’साहब ने कहा…
“बधाई हो!….’नया मेहमान’आने वाला है”
“खुशी से फूला नहीं समा रहा था मैँ”…
“सीधा जा के बीवी को सारी बात बताई तो वो भी मुस्कुराते हुए बोली…
“मै तो पहले ही कह रही थी”….
“आप..माने तब [...]
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Posted on September 26, 2007 by राजीव् तनेजा
“आओ तौबा करें”
***राजीव तनेजा***
“कभी सोचा भी ना था कि ऐसा होगा”…
“इंसानियत का सरे बाज़ार’कत्लेआम’होगा”….
“हम इंसान के बजाए शैतान बनते जा रहे हैं”…
“कोई’शर्म-ओ-हया’बाकी नहीं रही अब”…
“जब इनसान ही इनसान के साथ ऐसा बर्ताव करेगा तो फिर…
उसमें और जानवर में क्या फर्क बाकी रहेगा?”…
“किसी को अगर उसके किए की सज़ा देनी भी है तो …
उसकी कोई ना [...]
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Posted on September 25, 2007 by राजीव् तनेजा
“बिन माँगे मोती मिले”
***राजीव तनेजा***
“बात सर के ऊपर से निकले जा रही थी”….
“कुछ समझ नहीं आ रहा था कि…
“आखिर!…माजरा क्या है?”..
“जिस बीवी को मैँ फूटी आँख नहीं सुहाता था,वो ही मुझ पर मेहरबान हुए जा रही थी और…
इस सब का कोई वाजिब कारण भी तो दिखाई नहीं दे रहा था”
“जो कल तक मुझे देख’नाक-भों’सिकोडा करती [...]
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Posted on September 22, 2007 by राजीव् तनेजा
“लेडीज़ फर्स्ट”
***राजीव तनेजा***
“आज घडी-घडी रह-रह कर दिल में ख्याल उमड रहा था कि..
“जो कुछ हुआ….क्या वो सही हुआ?”
“अगर सही नहीं हुआ तो फिर…आखिर क्यूँ नहीँ हुआ?और…
या फिर यही सही था तो फिर…
ऐसा क्यूँ हुआ?”
“आखिर’ऊपरवाले’से मेरी क्या दुशमनी थी?
“किस जन्म का बदला ले रहा था वो मुझसे?….
जो उसने मुझे’लडका’बनाया”….
“अगर लडकी बना देता तो…उसका क्या घिस जाता?”
“उसका [...]
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Posted on September 21, 2007 by राजीव् तनेजा
“सजन रे बूट मत खोलो”
***राजीव तनेजा***
“सजन रे’बूट’मत खोलो….अभी’बाज़ार’जाना है,
ना’दालें’हैँ ना’सब्ज़ी’है …अभी तो’राशन’लाना है”
“अरे ये क्या?”…
“ये तो मै असली गीत गुनगुनाने के बजाए उसकी’पैरोडी’ही गाने लगा”
“असली गाना तो शायद कुछ अलग तरह से था ना?”
“अरे हाँ!..याद आया,वो तो इस तरह से था…
“सजन रे’झूठ’मत बोलो,..’खुदा’के पास जाना है,
ना’हाथी’है ,ना’घोडा’है…वहाँ तो बस’पैदलजाना है”
“वाह!..वाह..क्या गाना था…वाह!”
“गुज़रा ज़माना याद आ [...]
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Posted on September 19, 2007 by राजीव् तनेजा
“आसमान से गिरा”
***राजीव तनेजा***
“हाँ आ जाओ बाहर…”…
“कोई डर नहीं है अब”….
“चले गये हैँ सब के सब”
“मैँ कंपकपाता हुआ आहिस्ता से’जीने’के नीचे बनी पुरानी कोठरी से बाहर निकला”
“एक तो….कम जगह…
ऊपर से’सीलन’और’बदबू’भरा माहौल”…
“रही-सही कसर इन कम्भख्त मारे चूहों ने पूरी कर दी थी”
“जीना दूभर हो गया था मेरा”
“पूरे दो दिन तक वहीं बन्द रहा मैँ”
‘ना खाना’…..
‘ना पीना’…
ना [...]
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Posted on September 16, 2007 by राजीव् तनेजा
“आदमी गर आदमी”***प्रभाकर***(मेरे अँकल द्वारा लिखी एक और गज़ल)
आदमी गर आदमी को ही न जाने लगे
खुदा की ज़ात को वो कैसे पहचाने लगे
तेरी रहमत ने बदल डाले रुख रिन्दों के
मयखाना छोड अब तो शिवाले जाने लगे
खुदापरस्त, राजा-रंक में फर्क क्या जाने
सोना मिट्टी समझ,मिट्टी में ही मिलाने लगे
खुमारी-ए-खुदा की में हुए मदहोश इस कदर
कि बेखबरी में [...]
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Posted on September 14, 2007 by राजीव् तनेजा
“बोया पेड बबूल का”
***राजीव तनेजा***
“चेहरा उदास हो चला था और माथे का पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था”
“कंपकपाते हुए हाथों से फोन को वापिस रख…
मैँ निढाल हो वहीं का वहीं’धम्म’जा गिरा”
“सोच-सोच के परेशान हुए जा रहा था कि ….
“क्या होगा?”….
“कैसे होगा?”…
“कैसे’मैनेज’करुंगा सब का सब?”
“कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि…
‘क्या किया जाए?’और….
‘कैसे किया [...]
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