"खेल खिलाडी का "

“खेल खिलाडी का”

***राजीव तनेजा***

नोट: “जंतर मंतर काली कलंतर” का दूसरा भाग लिखने की कोशिश की है,उम्मीद है कि आप सभी को पसन्द आयेगा

ज्योतिषी बनने के चक्कर में जेल की हवा खाने पडी ,

कोई खास नहीं बस तीन महीने की हुई

बोरियत का तो सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि अपने सभी यार-दोस्त तो वहाँ पहले से ही मौजूद जो थे

कोई दो साल के लिए तो कोई पाँच साल के लिए अन्दर था

ये तो मैँ ही था जो कुछ ले-दे के सस्ते में छूट गया था

बाकि सब के सब साले कंगाल….

सोचते थे कि बाहर निकल के तो फिर कोई ना कोई काम-धन्धा करना ही पडेगा
सो यहीँ ठीक है,….

दो वक्त की आराम से मिल जाती है

सही कहा है किसी भले-मानस ने कि…

“जब मुफ्त में मिले खाने को,

तो कद्दू जाए कमाने को”

साले सब के सब निठल्ले ….कामचोर की औलाद

मुफ्त में जेल की रोटियाँ तोडे जा रहे थे

बाकि सब तो ठीक ही था लेकिने…

एक ही ख्याल दिल में उमड रहा था बार-बार कि आखिर जेल से छूटने के बाद करूगा क्या?

अपुन का इरादा तो लम्बा हाथ मारने का था लेकिन कोई आईडिया ही साला इस भेजे में घुसने को राज़ी ही नहीं था

और घुसता भी कैसे?

आदत तो अपुन को थी तर माल पाडने की और ये साला जेल का खाना…

माशा-अल्लाह

अब क्या बताऊँ “ये अफसर लोग ही सब का सब हडप जाते हैँ खुद ही

“डकार तक नहीं लेते “

छोड देते हैम हम जैसों के लिए मूंग धुली का पानी और कुछ अधजली कच्ची-पक्की रोटियाँ

बाहर किसी कुत्ते को भी डालो तो काटने दौडेगा और हम थे कि काटना तो दूर सही ढंग से भौंक भी नहीं सकते थे”

“भौंकना और काटना सब अफसर लोगों के जिम्मे जो था”लेकिन एक दिन सब काया-पलट होते नज़र आया

‘सफेदियाँ’हो रही थी”….

‘फ्रिज’…..

‘सोफा’…

‘प्लाज़मा टीवी’….

‘गद्देदार पलंग’और ना जाने क्या-क्या

मैने मन ही मन सोचा कि “ये सब साले इतना सुधर कैसे गये?”

“किसी से पता किया तो जवाब मिला कि “इतना परेशान ना हो ,एक ‘वी.आई.पी’ आ रहा है कुछ हफ्तों के लिये…

उसी की खातिर-दारी में ये सब हो रहा है”

“बाजू वाली बैरक में ठहरने का इंत्ज़ाम किया गया है “

“एक ठुल्ले से अपुन ने अच्छे ताल्लुक बना लिए थे …

बस कुछ खास नही यार …वही पुराने ज्योतिष के हथकण्डे अपनाए “

“आठ-दस उल्टे-सीधे डायलाग मारे”

“तीन-चार का तुक्का फिट बैठा और हो गया चेला तैयार “

“बस फिर क्या था उसी को मस्का लगाया कि…
“एक बार…बस एक बार,किसी भी तरह से इंट्रोडक्शन भर करवा दो”…

“बाकि सब मैँ अपने आप सलट लूँगा”

“उसी की तो ड्यूटी लगी थी ना उस ‘वी.आई.पी’ के साथ “

“सो अगले दिन ही अपुन उसके दरबार में हाज़िर था”

“ये लो ..उसे तो मैँ पहले से ही जानता था,..

‘वी.आई.पी’ बनने से पहले साला मिट्टी का तेल ब्लैक किया करता था”

“तेल का डिपो जो था उसका”

“खूब नोट छापे पट्ठे ने और आज ठाठ तो देखो”

“बन्दे को बन्दा नहीं समझता है”

“देखते ही झट से पहचान गया मैने भी पूछ ही लिया कि “अरे नेताजी आप यहाँ कैसे?”

“अरे यार कुछ ना पूछ सब इन मुय्ये चैनल वालों का किया धरा है “…

“साले सोचते हैँ कि मैँ यूँ ही मुफ्त में सवाल पूछता फिरूँ “

“अरे मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो मैँ फोकट में अपनी ज़बान काली करता फिरूँ?”

“इन सालों को क्या पता कि कितने खर्चे हैँ?”

“किस-किस को हफ्ता पहुँचाना पडता है”

“ऊपर से नीचे तक कोई साला बिना लिए रहता नहीं है”

“ऊपर से नीचे तक?”

“हाँ भाई हाँ”….

“ऊपर से नीचे तक”

“सभी इस हमाम में नंगे हैँ”

“यहाँ तो गांव बाद में बसता है,भिखमंगे साले पहले कटोरा हाथ में लिए नज़र आते हैँ”

“आपको पता भी ना चला कि कब साले फोटू खींच ले गये?”मैने हैरानी से पूछा

“पता होता तो सालों का टेंटुआ ना दबा देता वहीं के वहीं”

“जी ये तो है”आज लग रहा था जैसे अपने नेताजी चुप नहीं बैठेंगे,

कोई सुनने वाल जो मिल गया था”

“अभी तक कोई इनकी सुन ही कहाँ रहा था और मैँ भी तो अपने मतलब की खातिर उनकी लल्लो-चप्पो किए जा रहा था

मैने मस्का लगाते हुए कहा कि “नेताजी आपका तो तेल का डिपो था ना?….

फिर ये नेतागिरी की लाईन में कैसे आ गये?”

“अरे अपुन को तो कमाई दिखनी चाहिए…भले ही कोई हमसे अपने बच्चे तक पिटवा ले “

“तेल के डिपो की वजह से अपनी जान-पह्चान बहुत थी “

“जी”..

जान-पहचान तो अपुन की भी बहुत है ,मैँ मन ही मन मुस्काया लेकिन ऊपर से एकदम अनजान बनता हुआ बोला

“जी उस से क्या होता है ?”

“अरे यार इलैक्शन के टाईम पे सभी पार्टी वाले अपुन को ही तो याद करते थे,….

चाहे वो ‘भगवे’ वाले हों,

या फिर ‘हाथी’ वाले,

या फिर ‘हाथ’वाले या फिर कोई और”

“उनसे जो माल-मसाला मिलता था बांटने के लिए ,उसका आधे से ज़्यादा तो मै ही डकार जाता था और चूँ तक नहीं करता था”

“लेकिन हिसाब-किताब कैसे देते थे उनको?”

“हिसाब-किताब?”

“हा हा हा हा”

“अरे बुद्धू ये सब दो नम्बर के धन्धे होते हैँ,इनका हिसाब-किताब नहीं रखा जाता”

“लेकिन फिर भी थोडी-बहुत लिखा-पढी तो करनी ही पडती होगी?”

“हाँ यार इतना हिसाब तो देना ही पडता है…..

कुछ उलटे-सीधे खरचे लिखा दिए बस और हो गयी खाना-पूर्ती जैसे….

‘दारू की पेटियाँ’……

‘जूते-चप्पल’.. ..

‘साडियाँ’…..

‘झण्डे’….

‘बैनर’…

‘ड्ण्डा घिसाई’वगैरा वगैरा….”

“नेता जी अपने आप ही सब उगलते जा रहे थे और मैँ था कि चुप-चाप सब सुनता जा रहा था”

“आज चुप रह कर मतलब निकालने की मेरी आदत काम आ ही गई”

सोच रहा था कि अब बताउंगा बीवी को कि “देख चुप रहने के कितने फायदे हैँ”

“हर वक़्त बकती रहती थी कि “सिर्फ मेरे आगे ही ज़ुबान लडाते हो,कभी बाहर मुँह खोलो तो जानुं”

“बाहर तो आपकी घिघ्घी बंध जाती है,ज़ुबान को ताला लग जाता है और चाबी जाने कहाँ गुम हो जाती है ?”

“कहाँ खो गये?” नेताजी की अवाज़ सुनाई दी तो हकबकाते हुए जवाब दिया कि “बस ऐसे ही”

“कई बार तो एसा होता था कि मैँ अकेला ही पूरा का पूरा माल हज़म कर जाता था” नेताजी बात आगे बढाते हुए बोले

“पूरा?” मैने हैरानी से पूछा

“अरे हाँ यार पूरा”

“फिर बांटते क्या थे?”…

“टट्टू?”

“अरे पूरे इलाके में अपुन की धाक जम चुकी थी…

सो सभी काम-धन्धा करने वालों के यहाँ अपने गुर्गे भेज देता था कि …

‘पार्टी-फंड’के नाम पे चन्दा दो “

“सब काम खुद-बा-खुद निबट जाता था”

“सब के सब भला कहाँ देते होंगे?”

“अरे है कोई माई का लाल जो अपुन को इनकार कर सके?”

“साले का जीना हराम ना कर दूंगा?”

“पर कोई ना कोई तो अडियल मिल ही जाता होगा?” मैँ फिर बोल पडा

“ऐसे तो घटिया इनसान हर कहीं भरे पडे है थोडे-बहुत”

“तो फिर उनसे कैसे निबटते थे ?

“दो-चार के यहाँ ‘इनकम टैक्स वालों का छापा पडवा दिया और …

नकली माल बनाने वालों के लिए तो एक फोन घुमाना ही काफी था”

“साले अगले दिन ही नाक रगडते हुए आते थे खुद ही कि ….

“जी हमारी तरफ से भी पार्टी फंड ले लो”

“एक साला फैक्ट्री वाला थोडी दिक्कत कर रहा था …

ऐसा अडियल निकला कि ‘टस से मस’ना हुआ”

“फिर?”

“लेकिन अपुन के पास हर साँप के काटे का इलाज है “

“इस जोड का तोड निकाल ही लिया”

“साले की फैक्ट्री में हडताल करवा दी लाल झण्डे के तले”

“दो-चार को चाकू मरवाया और लगवा दिया ताला पट्ठे की फैक्ट्री में “

“जब हफ्ते भर ताला लटका रहा तो खुद-बा-खुद सारी हेकडी ढीली हो गयी”

“तो क्या सारा का सारा माल-पानी बांट देते थे?”

“इतना येढा समझा है क्या?…अपुन भिण्डी बाज़ार की नहीं दिल्ली की पैदाइश है दिल्ली की”

“अगर सब कुछ बांट दूंगा तो मैँ क्या गुरुद्वारे जाउंगा?”

“ये ‘बंगला-गाडी’….

ये ‘नौकर-चाकर’

ये’शोरूम’…

ये’फार्म हाऊस’….

ये’फैक्ट्री’

सब का सब क्या आसमान से टपका है कि मंतर मारा और सब हाज़िर”

“अरे बुद्धू …नोट खर्चा किए हैँ नोट,और नोट जो हैँ….

वो पेड पर नहीं उगा करते कि….

हाथ बढाया और तोड लिए हज़ार-दो-हज़ार”

“थोडा-बहुत तो बांटना ही पडता था झुग्गी-बस्तियों में”

“आखिर वोट बैंक जो थे”

“बस बस्ती के खास बन्दे को अपनी मुट्ठी में कर लिया तो किला फतेह समझो”

“यही तो सबसे मुश्किल काम होता होगा?”

“कोई भी काम मुश्किल नहीं है अपुन के लिए….

बस मुन्नी बाई को इशारा किया और पहुँच गई अपने दल-बल के साथ “

“उसके लटके-झटकों पे तो पूरी दिल्ली फिदा है तो इन प्रधानों-वरधानों की क्या मजाल जो काबू में नहीं आते”

“देसी की पेटियाँ तो हम मंगवा ही लेते थे पहले से ही”

“देसी?” मैँ मुँह बिचकाता हुआ बोला

“हाँ भाई ‘देसी’…..सालों को इंगलिश पचती नहीं है ना ….

कहते हैँ कि आहिस्ता-आहिस्ता चढती है और तब तक सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है “

“लेकिन कुछ अंग्रेज़ी के शौकीन भी तो होते होंगे …उनका क्या?”

“ऐसे नमूनों के लिये तो दो-नम्बर का माल तैयार करवा लेते थे आर्डर पे “

“तैयार करवा लेते थे आर्डर पे ?”

“जी समझा नहीं”

“ज़रा खुल के बताएं”

अब नेताजी इधर-उधर देखते हुए आहिस्ता से बोले…

“यार दो-नम्बर का माल माने …

‘बोतल असली लेकिन माल नकली’

“माल नकली? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था

“अरे बेवाकूफ…बोतल से असली माल सिरिंज के जरिए बाहर और सिरिंज से ही नकली माल अन्दर”

“जी समझ गया….जी समझ गया”

“और तुम जैसे कुछ खास गिने-चुने बन्दो के लिए डाइरैक्ट फैक्ट्री से ही खालिस माल मँगवा लेते थे “

“वो तो काफी मँहगा होता होगा?’

“अरे यार वो मँहगा होता है तुम जैसों के लिए…

अपुन के लिये क्या देसी? और क्या विलायती? सब बराबर है “

“मतलब?”

“अरे यार डाइरैक्ट फैक्ट्री से ही …बिना एक्साइज़ ड्यूटी के “

“बिना एक्साइज़ ड्यूटी के ?”

“एक अफसर को जो अन्दर जाने से बचाया था एक बार …..

पट्ठा आज तक नहीं भूला…..यारी हो गयी अपने साथ “

“लेकिन यारी हर किसी की कहाँ हो सकती है? मैँ उदास मन से बोला

“होने को तो सब कुछ हो सकता है….

बस पैसा फैंको और तमाशा देखो “

“जी सही फरमाया आपने” मैँ मुंडी हिलाता हुआ बोला

“लेकिन पिछली बार तो अपोज़ीशन वालों का ज़ोर था ना?”

“फिर कैसे आपके साथी जीत गये थे?”

“अरे ये ज़ोर-वोर सब बे-फिजूल की बातें हैँ….

“असल मुद्दा तो होता है कि जीता कौन?”

“और जीते तो हम ही थे ना?”

“बात तो आप सोलह आने दुर्रस्त फरमा रहे है”लेकिन ये कमाल आपने कैसे कर दिखाया?”

“अब तुम तो जानते ही हो कि यार कि अपुन को जवानी में द्ण्ड पेलने का बडा ही शौक था”

“जी ये तो बच्चा-बच्चा जानता है “

“सो दिन भर अखाडे में ही पडे रहते थे “….

“जी”

“बस अपनी यारी पहलवानों से हो गयी,उन्ही का इस्तेमाल किया और मार लिया मैदान”

“लेकिन आठ-दस से भला किसी का क्या उखडता होगा?”चेहरे पे असमंजस के भाव लाता हुआ मैँ बोला

“सही कह रहे हो आठ-दस से तो किसी का बाल भी बांका नहीं होता”

“तो फिर?”

“इन सबके भी अपने -अपने लिंक होते हैँ .मँगवा लिए पडोसी शहरों से ठेके पे “

“आखिर पडोसी भला किस दिन काम आएंगे?”

“काम आएंगे?”

“यार सीधा सा हिसाब है ….

“इस हाथ दे और उस हाथ ले”

“जब उनको ज़रूरत पड्ती है तो ये वहाँ पहुँच जाते हैँ अपना कमाल दिखाने”

“लेकिन आप तो कह रहे थी कि ‘ठेके’पे?”मैँ फिर बीच में बोल पडा

“हाँ भाई हाँ, ठेके पे …

अब कौन हिसाब रखता फिरे कि कितनों की टांगे तोडी और कितनों के सर फोडे …

कितनो को अस्पताल पहुँचाया?और …

कितनों को सरेआम ही शैंटी-फ्लैट”

“लेकिन रेट कैसे फिक्स करते थे ?

“हर काम का अलग-अलग रेट होता है बन्धु,जैसे….

‘टांग तोडने के इतने पैसे’ और…

‘मुँह तोडने के इतने पैसे’,

‘हाथ-पैर दोनों एक साथ तोडने के इतने पैसे,

‘धमकाने के इतने पैसे’”

“और बूथ-कैपचरिंग के और बोगस वोतिंग के ? मैने सवाल दाग दिया

“ये की ना तुमनी हम नेताओं जैसी बात “

“कहीं मेरी ही वाट लगाने का इरादा तो नहीं है?”

“ही…ही…ही….जी मेरी क्या औकात तो मैँ आपके सामने सैकण्ड भर भी ठहर सकूँ”मैँ खिसियानी हँसी हँसता हुआ बोला

“फिर ठीक है “

“हाँ तो बात हो रही थी ‘बोगस वोटिंग’ और ‘बूथ कैपचरिंग’की “

“जी”

“तो यार इन सब के लिए तो अलग से पैकेज देना पडता है कि …

इस इलाके के लिए इतने खोखे और उस इलाके के लिये इतने खोखे”

“सालों ने पूरा सर्वे किया होता है कि फलाने इलाके में …इतने पटाखे फोडने पडॆंगे और

फलाने इलाके में इतने”

“खोखे?” मेरा मुँह खुला का खुला ही रह गया

“और तुम इसे क्या दस-बीस पेटी का खेल समझे बैठे थे?”

“अरे पच्चीस-पचास से तो मेरे ‘पी.ए’ की भी दाढ गीली नहीं होती है तो अपना तो सवाल ही पैदा नहीं होता “

“अब मुझे हर तरफ खोखे ही खोखे दिखाई दे रहे थे ,…

बस अब तो इसी का इंतज़ार था कब छूटूं और कब कूद पडूं मैँ भी इस खेल में

आखिर ‘खोखों का सवाल जो था.

***राजीव तनेजा***

One Response to “"खेल खिलाडी का "”

  1. बहुत लंबा है भाई!!! हिस्सों मे दें तो ठीक..

    तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.

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