“जन्तर-मन्तर काली कलन्तर”

“जन्तर-मन्तर काली कलन्तर”

***राजीव तनेजा***

बडे दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे,कोई काम-धाम तो था नहीं बस
कभी-कभार कमप्यूटर खोला और थोडी बहुत ‘चैट-वैट’ ही कर ली।
सच पूछो तो यार ‘बेरोज़गार’था मैं और इसमें
अपनी सरकार का कोई दोष नहीं,दरअसल अपनी पूरी’जैनरेशन”ही ऐसी है।

अब कोई छोटी- मोटी नोकरी तो हम करने से रहे ।

अब यार हर किसी ऐरे-गैरे  नत्थू-खैरे’को घडी घडी कौन सलाम बजाता फिरे?

कोई छोटा- मोटा धन्धा करना तो अपने बस की बात नहीं।

बाप- दादा जो थोडी बहुत पूंजी छोड गए थे,
वो भी आहिस्ता- आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी।

आखिर वो भी भला कब तक साथ देती?

बीवी के तानों का तो शुरु से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था।
उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता।

कई बार तो कान में घुसने तक ही न देता।

पहले ‘नकदी’ खत्म हुई फिर,
‘गहने-लत्तों’का नम्बर भी आ गया।
एक एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थी लेकि्न
मेरी अकड ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एक दिन मज़े से टीवी पे ‘नो-एन्टरी’ फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा।

इसलिए नहीं कि् फिल्म बहुत ही ‘फैन्टास्टिक’ थी बल्कि…

अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था ‘नोट’ कमाने का।

अरे नोट कमाने का क्या वो तो नोट छापने का आइडिया था ।

जैसे ही बीवी को बताया कि् एक आइडिया मिला है
नोट छापने का तो वो गश खा के गिरी धडाम और वहीं के वहीं ‘बेहोश’ हो गई।

होश मे आने के बाद बोली”बस जेल जाने की कसर ही बाकि रह गई थी,नोट छाप के वो भी पूरी करने का इरादा है जनाब का ।”

मेरी हंसी रोके ना रुकी बोला “अरी भागवान ‘नोट छापने’ का असली मतलब सचमुच में नोट छापना’नहीं है।”

“तो फिर?”

“देखा नहीं फिल्म में उस ज्योतिषी को?….

कितनी सफाई से ‘सलमान’ से पैसे ऐंठ लेता है और ‘अनिल कपूर’ का फुद्दू खींच डालता है”

“तो क्या हुआ?”

“अपुन का भी बस यही आइडिया है”

“तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ‘ज्योतिषी’ हुआ है जो तुम बनोगे?”

“है तो नही लेकिन हमारी आने वाली नसलें ज़रूर ‘राज ज्योतिषी’ कहलाऐंगी।”

“पर ये सब करोगे कैसे?”

“अरे कुछ खास नहीं बस ठोडा- बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा “

“वो भला कैसे?”

अरे ये ‘हीरो-कट” बाल छोड सीधे -सीधे लम्बे बाल रखूंगा”

“उसमें तो नाई का खरचा भी बचेगा” बीवी चहक उठी

“कर दी ना तुमने दो कोडी वाली बात ,….
अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी- छोटी बातों पर नज़र गडाए बैठी हो।”
“लेकि्न आता जाता तो कुछ है नहीं खाली वेष बदलने से क्या होगा?” बीवी फिर बोल पडी

“अरे यार पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले”

“जी बताऒ” बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली

“हाँ तो मैं त्याग करने की बा कह रहा था तो दूसरा त्याग ये करना पडेगा कि….

ये ‘गोविंदा’ छाप कपडे छोड ‘धोती-कुरता’ पहनना पडेगा”

“वो तो शादी का पडा-पडा अभी तक सड रहा है अलमारी में” बीवी चहकते हुए फिर बोल पडी

“चलो ये काम तो आसान हुआ, अब कोने वाले कबाडी की दुकान से ‘रददी’ छांटनी पडेगी”

“आय-हाय अब क्या ‘रददी’ भी बेचोगे?”

“जब पता नहीं होता तो बीच में ‘चोंच मत लडाया कर’ मैं आँखे तरेरता हुया बोला

“बेवाकूफ पुरानी अखबारों में जो ‘भविष्यफल’ आता है उसकी कतरनों को सम्भाल के रखूंगा
‘वक्त-बेवक्त’ काम आऐंगी और

अगर ‘एस्ट्रोलोजी’ से रिलेटिड कोई किताब मिल गई तो…

‘पौ-बारह’ समझो”
“पौ-बारह’ मतलब?”

“अरे बेवाकूफ ‘पौ-बारह’ मतलब’लॉटरी’ लग गइ समझो “
“लेकि्न ये ‘जन्तर-मन्तर’ भला कहाँ से सीखोगे भला?”

“कोई खास मुश्किल नहीं है ये सब भी, बस….

‘बल्ली सागू’ या फिर ‘बाबा सहगल’ के किसी भी ‘रैप सान्ग’ को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि्

किसी के पल्ले कुछ ना पडे ,बस हो गया….

‘जन्तर-मन्तर काली कलन्तर’ “

“ऒह समझ गई…. समझ गई”
बस फिर क्या था मोटी कमायी के चक्कर में बीवी के बटुए का मुँह खुल चुका था ।

ज़रूरी सामान इक्टठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पडा बाज़ार ।

पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुँचा बाज़ु वाले कबाडी की दुकान पर ।

एक-दो ‘पेग’मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया ।

अब ‘दिन-रात’ एक करके हम मियाँ- बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस् नतीजे पे पहुँचे कि ……

“पूरी दुनिया मैं इस से आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता”…..

अब यार आप पूछोगे की ,”वो भला  कैसे?”

“तो यार ये मैं आपको क्यूं बताऊं?”और …..

“अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाडी” मार डालूं”….

“कहीं मुझसे ही कम्पीटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका?”

“क्या कहा ?….

“चिंता ना करूँ?”

“ओ.के ,आपकी बात पे विश्वास करते हुए बता ही देता हूँ..

आप भी क्या याद करोगे कि किसी दिलदार से पाला पडा है”

“कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है ये सब ….

बस सिम्पल सी कुछ बातें गाँठ बाँध लो कि ..

“हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है”

“हर-एक को यही लगता है कि वो सही है और बाक़ी सब ग़लत”

“कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक”

“वो अपनी तरफ़ से कडी-मेहनत्त करता है लेकिन उसका पूरा-फल नहीं मिलता”

“दिमाग़ वो लड़ाता है ,फ़ायदा कोई और उठा ले जाता है”

“सब के सब उसकी कामयाबी से जलते हैं”

“कोई उसका भला नहीं चाहता”….

“दोस्त-यार”…

“रिश्तेदार”….

“भाई-बहन”…..

“पड़ोसी”….

“सब् के सब् मतलबी-इंसान हैं”…

“कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं है”

“वो सब पे तरस ख़ाता है लेकिन  कोई उस पे नहीं”….

“किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है”…

या फ़िर् उसकी दुकान या मकान बाँध दिया है”
बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख के अंदाज़ा लगाओ की उस पर कौन कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे”

“बस चौखटा देखो और मार दो हथोड़ा”

“अगर तीर सही निशाने पे लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी”
“और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?”

“फिकर नाट ..वरी करी  घुमा-फिरा के दो-चार डायलॉग और मार दो बस….

“कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर” और हाँ…..

“अगर “ऊँचे-लैवल का गेम खेलना है तो  दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो “

“अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ”

“बड़े बे-रोज़गार हैं ,कोई ना कोई अपने मतलब का मिल् ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि ….

चेला रखना है गुरु नहीं”…

“कहीं अगले दिन ही वो तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बँटाधार करने की फिराक में हो”

“चौक पे बिकने वाला तोता अगर मिल जाए तो धंधे में और रौनक आ जाएगी”
“अब आप कहोगे कि वो साले!तो एकदम एक जंगली होते हैं “

“उनका क्या करोगे ?”

“तो यार वो अनाडी  हैं तो क्या हुआ  ?”

“हम तो खिलाड़ी हैं”

“बस उसको भूखा रखना है और ……

भविष्य की प्रचियों में अनाज का दाना चिपका देना है”

“पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली परची  उठाएगा और

‘बकरा’बेचारा बस यही समझेगा कि ‘मिट्ठू माहराज  ने उसका नसीब बांच दिया है”
“और उस परची के अंदर लिखा क्या होगा?” बीवी बोल पड़ी …..

“हे भागवान पूरी रामायण खत्म होने को आई और ये पूछ रही है कि …

सीता,राम की कौन थी?”

“अरी भागवान अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ…

कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर”

“हूँ !”बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी…..

सो एक दिन ऊपेरवाले का नाम लिया और जा पहुँचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया

“कोई ना कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी

“किसी को कुछ ,तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बिमारी का”

“कमाई के साथ साथ तीन पत्ती की लत भी लग चुकी थी

“एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे….

बड़ी आई थी मज़े से कि महाराज बच्चा नहीं होता है, कोई उपाय बताओ”
“अरे नहीं होता है तो कुछ ‘ओवर-टाइम’ लगाओ,

‘माल-शाल ‘खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी’डॉक्टर-शाक्टर के पास जाओ”..

“ये क्या ? की  सीधे मुँह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई”

अब यार अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से “…

“ओवर-टाइम कौन कंभखत करता फिरे ?”

लेकिन धन्धा तो धन्धा है सो ,उस बेचारी को कुछ उलटी-पूलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे…

‘काली शेरनी का दूध…..

‘जंगली भैसे का  अंडा’….

‘शतुर्मुर्ग का कलेजा’ और ना जाने क्या क्या….

मुँह उतर आया उस बेचारी क कि मैं अबला नारी ….
“कहाँ से लाऊंगी ये सब?”

मैने कहा “आप चिंता  ना करें परसों मेरा शागिर्द  नेपाल से आने वाला है
उसको को फ़ोन किए  देता हूँ ,वही सब इंतज़ाम कर देगा ….

“उसने हामी भर् दी”…

“और चारा भी क्या था उसके पास?”….

“नकद गिन के ‘पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने”…

“फिर जाने दिया उसे”

“मोटी-कमाई हो चुकी थी सो मैने अपना ‘झूल्ली बिस्तरा’संभाला और चल पड़ा घर की ओर”

“रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला”…..

“ख़ुश बहुत था मैं ,…

बस पीता गया….

पीता गया”

“कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी” …

“होश आया तो बीवी ने बताया कि …

“पूरे तीन दिन  तक टुल्ली थे आप”….

“ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन ….

कोई फ़ायदा नहीं”.
“तो क्या पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही?”

“और नहीं तो क्या?”

मैं झट से खड़ा हूया और भाग लिया सीधा दुकान की ओर…

पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि …

तीन दिन मैं पता नहीं …
कितने का नुक़सान हो गया होगा?”

कई बार तो पता नहीं कैसे मेरा तुक्का सही लगने लगा था और …

किसी किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन….

‘आठ-दस’बार शिकायतत भी आई कि ……

“माहराज आपकी तरकीब तो काम ना आई”

“कोई और जुगाड बताओ”..
ऐसे बकरों का तो मुझे बे-सबरी से इंतज़ार रहता था…

“एक ही पार्टी को दो-दो दफा शैंटी -फ्लैट करने का मज़ा ही कुछ और है”

“उसके द्वारा किए गये इलाज में कोई ना कोई कमी ज़रूर निकलता और ….

नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार”

“पुरानी कहावत भी तो है कि…..

“खरबूजा चाहे छुरी पे गिरे या फ़िर् छुरी खरबूजे पे,

कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है

अपुन का कानफीडैनस ‘टॉप-ओ-टॉप बढता ही जा रहा था कि ….

एक दिन एक ‘जाट-मोलढ’टकरा गया”….

“पूरी कहानी सुनने के बाद मैने उससे,उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर …..

दो-हज़ार माँग लिए”

वो साला जाट बावली पूंछ ,सौदे-बाज़ी  पे उतर आया

आख़िर में सौदा साढ़े चार सौ मैं पटा ……

उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी

नज़र धोती मैं बंधी नोटों की गड्डी पे जा अटकी

“लेकिन दोस्त ,अब क्या फ़ायदा?”…

“जब चिड़िया चुग गयी खेत”….

“मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब-मानुस है …..

इसे तो कम से कम बक्श ही दूं”

आख़िर ऊपेर जाने के बाद वहाँ भी तो हिसाब देना पड़ेगा”

“लेकिन ये साला तो मोटी आसामी  निकला…..

“यहीं तो मार खा गया ‘इंडिया’..”…

साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुँह से बस यही निकला  …..

“ताऊ…काम तो करवा रहे हो पूरे ढाई-हज़ार का और नोट दिखा रहे हो ट्ट्टू “

बेटा ट्ट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है?”…..

“वो तो अब मैं तुम्हे दिखाऊगा”कहते हुए उसने किसी का इशारा किया और ….
तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी .

“साले!.

“पब्लिक” का फुद्दू खींचता है”….

“अब बताएँगे तुझे…

“चल …थाने….

बड़ी “शिकायतें” मिली हैं तेरे खिलाफ़”……

“साले !…. वो “S.H.O”साहेब की ….

“Madam”थी…

जिस से तूने बारह हज़ार ठगे थे “……

“चल अब हम तुझे बताते हैं कि….

‘बच्चा’ कैसे होता है
***राजीव तनेजा ***

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