"मेरा नाम करेगा रौशन"

“मेरा नाम करेगा रौशन”

***राजीव तनेजा* **

“तुझे क्या सुनाऊँ ए दिल्रुरुबा…तेरे सामने मेरा हाल है”

“मेरी हालत तो छुपी नहीं है तुझसे” ….

सोच-सोच के परेशान हो उठता हूँ कि….
“उसे क्या नाम दूँ?”

“क्या कह के पुकारूँ उसे?”

दिल में कंभी ये ख्याल उमडता है तो कभी वो कि…

“मैँ उसे क्या नाम दूँ?”

“उसे दोस्त कहूँ या के दुशमन?”

“उसे अच्छा कहूँ या फिर बुरा?”

“या फिर उसे ‘देव’ कहूँ या फिर ‘दानव’…

“कभी वो ‘अच्छा’ लगता है तो कभी ‘बुरा’…

“कभी ‘पागल’ लगता है तो कभी ‘स्याना’..

“कभी वो ‘अपना’ सा लगता है तो कभी ‘पराया’…

“कभी ‘मेहनती’ लगता है तो कभी एक्दम ‘आलसी’…

“कभी वो ‘जवान’ लगता है तो कभी एक्दम ‘बुढा’….

“कभी वो ‘सही’ लगता है तो कभी ‘गलत’…

“कभी वो ‘नायक’ लगता है तो कभी ‘खलनायक’..

“कभी ये भी सोचता हूँ कि उसने आखिर एसा किया क्यों?”

“कभी-कभी दिल में ख्याल आता है कि अच्छा ही किया हो शायद उसने”

“मेरा भला ही सोचा हो शायद”

“अब ये तो पता नहीं कि उसके दिल में आखिर था क्या?”

“कभी-कभी ये भी सोचता हूँ कि इस सब से उसे मिलेगा आखिर क्या?”

“शायद किसी दूसरे को इतना….

‘बेबस’,….

‘मजबूर’,.

‘तन्हा’,…

‘अकेला’,…

‘लाचार’,देख चेहरा खिल उठता होगा उसका”

“खुशी के मारे बावला हो उठता होगा शायद वो”

“ये भी हो सकता है कि इंसानी फितरत है …..

खाली नहीं बैठा गया होगा उससे तो सोचा होगा कि..

“चलो आज इसी पे हाथ आज़मा लिया जाए”

आखिर पता तो चले खुद को कि ….

“कितने पानी में हूँ मैँ?”

साथ ही साथ पूरी दुनिया को भी पता चल जाएगा कि…

“हम में है दम”

खुद को बार-बार तसल्ली देता रहता हूँ मैँ कि …

“ऊपरवाले के घर देर है पर अन्धेर नहीं”

“और भला कर भी क्या सकता हूँ मैँ?”

“कभी तो पुकार सुनी जाएगी मेरी भी उस ‘परवर् दिगार के दरबार में”

“कभी-कभी गुस्सा बहुत आता है और दिल ये कह उठता है कि..

‘कोई ना कोई’…

‘कभी ना कभी’…

‘सवा सेर’ तो उससे भी टकराएगा और तभी फैसला होगा कि …

“किस में कितना है दम?”

“कभी तो ऊँट पहाड के नीचे ज़रूर आएगा”

“कई बार तो गुस्से से भर उठता हूँ मैँ और जी चाहता है कि …

कहीं से बस घडी भर के लिये ही सही …

कैसे भी …

किसी भी तरह से मिल जाए…

‘36′ या फिर ‘47′

“कर दूँ अभी के अभी शैंटी-फ्लैट “

“हो जाएगा फुल एण्ड फायनल”

“कोई कसर बाकि नहीं रहेगी”

“बडा तीसमार खाँ समझता है ना खुद को ….

सारी हेकडी निकल जाएगी बाहर “

“अरे अगर वार करना ही था तो सामने से आकर करता …

“ये क्या? कि पीठ पीछे वार करता है”

“बुज़दिल कहीं का”

“लेकिन फिर सोच के रह जाता हूँ कि शायद वो अपने दिमाग का इम्तिहान ले रहा हो कि …

कुछ है भी उसमें?”…

“या फिर खाली डिब्बा खाली ढोल”

“लेकिन फिर दिल तडप उठता है कि इस भरी पूरी दुनिया में क्या मैँ ही मिला था निठल्ला?”

“जो मुझ पर ही हाथ साफ कर गया”

“लेकिन एक बात की तो दाद देनी पडेगी कि बन्दा है बडा ही चलाक”

“शातिर दिमाग है उसका”

“खुली आँखो से ऐसे काजल चुरा ले गया कि …

“कब मेरा सब कुछ अब मेरा नहीं रहा”

“बडे अरमान संजोए थे मैने “

“क्या-क्या सपने नहीं देखे थे मैने कि उसके पहले जन्मदिन पर एक बडा सा केक मँगवाउंगा”

“खूब पार्टी -शार्टी करूँगा”

“इसको बुलाउंगा और उसको भी बुलाउंगा”

“बडे ही जतन से पाला-पोसा था मैने उसे “

“अभी तो उसने अपने पैरों पे चलना भी नहीं सीखा था ढंग से “

“नन्हा सा जो था अभी”

“मैँ तो ये सोच-सोच के खुश हुए जा रहा त हा कि एक दिन…

“हाँ एक दिन …

“मेरा नाम करेगा रौशन…जग में मेरा राजदुलारा”

“मुझे क्या पता था कि एक दिन…

‘मेरी सारी मेहनत’…

‘मेरे सारे ओवर टाईम’ पर कोई पानी फेर जाएगा मिनट दो मिनट में”

“पता नहीं मै कैसे रात-रात भर जाग-जाग कर….

पाल-पोस कर बडा कर रहा था उसे”

“यहाँ तक कि मैने किसी की भी परवाह तक नहीं की”

“बीवी की भी नहीं”

“किस-किस के आगे माथा नहीं टेका?”

“कहाँ-कहाँ नहीं गया मैँ?”

“किस-किस जगह सर नहीं झुकाया?”

‘मन्दिर’,..

‘मस्जिद’,.

‘चर्च’,…

‘गुरुद्वारा’,..सभी तक तो हो आया था मैँ

‘ओह’…

‘ओह’…..

‘ओह माय गाड’

“देखा?”…

“देखा तुमने?”

“हाँ….हाँ देखो “

“ऊपरवाले ने मेरी पुकार सुन ली “

“आखिर पसीज ही गया वो “

“दया आ ही गयी उसे मुझ गरीब पर”

“बाल भी बांका नहीं होने दिया उसने मेरी अमानत का “

“जस की तस”…

“वैसी की वैसी”…

“दूध में धुली”…

मेरी ‘याहू आई.डी’(‘Yahoo ID’)लौटा कर उस हैकर ने मुझे दिल की हर खुशी दे दी”

“हे ऊपरवाले तेरा लाख-लाख शुक्र है”

“आज यकीन हो चला है कि इस दुनिया में तू है ज़रूर”

“अगर सिर्फ ‘आई डी’ की बात होती तो कोई बडी बात नहीं थी,..

उनका आना-जाना तो चलता ही रहता है”

“इतना परेशान नहीं हो उठता मैँ,…

बहुत कुछ जुडा हुआ था उस ‘आई डी’के साथ जैसे….

“बहुत सी प्यारी-प्यारी लडकियों के मेल अड्रैस” ,….

“लव लैटर्स” वगैरा-वगैरा और …

वो सब उलटी-पुलटी मेल्ज़ भी जिन्हे मैँ सबकी नज़रों से छुपा के रखता था”

“यहाँ तक कि अपनी बीवी को भी हवा तक ना लगने दी थी “

“सबसे बडी बात कि मेरा याहू ग्रुप भी तो हैक हो गया था ना”

http://movies.groups.yahoo.com/group/fun_m…yguid=242693898

“छिन गया था वो मुझ से “

“हैकर के पास जा पहुँचा था उसका कंट्रोल “

“उसी को तो मैने जन्म दिया था”

“अपनी औलाद से बढ कर माना था उसे “

“रात-रात भर जाग-जाग के मैँ मेलज़ लिखता था”

“इधर-उधर से नकल मार दूसरों के माल को अपना बना फारवड किया करता था “

“हाँ हाँ ….

अब यकीन हो चला है कि एक ना एक दिन….

“मेरा नाम करेगा …रौशन जग में मेरा राजदुलारा”

***राजीव तनेजा***

हँसते रहो Hanste Raho: "पूरे चौदह साल"#links

"पूरे चौदह साल"

“पूरे चौदह साल”

***राजीव तनेजा***

“आज वक़्त नहीं था मेरे पास”,..
“इधर-उधर भागता फिर रहा था” ,…
“सारे काम मुझे ही जो संभालने थे”…

“मेहमानों का जमघट लग चुका था,…
“उनकी खातिर् दारी में ही फंसा हुआ था सुबह से”

“खूब रौनक-मेला लगा था”…
“बच्चे उछल कूद रहे थे”…

“मैँ कभी टैंट वाले को,तो कभी हलवाई को फोन घुमाए चला जा रहा था”..

“साले पता नहीं कहाँ मर गये सब के सब ?”

“कम्भखत जब से फ्री इनकमिंग का झुनझुना थमाया है इन मुय्ये मोबाईल वालों ने जिसे देखो….

कान पे लगाए लगाए तमाशबीनी करता फिरता है गली गली”

“मानो फोन ना हुआ माशूका का लव-लैटर हो गया”

“जी ही नहीं भरता सालों का “

“और ऊपर से कुछ कंपनियों ने आपस में अनलिमिटिड टाक टाईम दे के तो…

अपनी और साथ-साथ दूसरों की भी वाट लगा डाली”

“अरे बेवाकूफो अपना…लिमिट में बातें करो”

“ये क्या कि…माशूका से मतलब की बातें करने के बजाय…

‘क्या बनाया है’या फिर…

‘क्या पकाया है ?’….

‘कौन से कपडे पहने हैँ?”…

“कितने बजे सोई थी?”

“और जब कुछ ना मिले कहने को तो ‘और सुनाओ’….

‘और सुनाओ’करके गेंद सामने वाले के पाले में डाल दो कि….

ले बेटा अब तू ही नई-नई बातें ढूंढ करने के लिये”

“अपना कोटा तो हो गया पूरा”

“उफ: कितना बिज़ी रखते हैँ फोन?”

“ढोलवाला पूरी लगन से मगन हो ढोल बजाए चला जा रहा था और. …

बजाता भी क्यों न?” …

“मनमानी दिहाडी जो मिल रही थी”…

“सब मेहमान ढोल की ताल पे नाचे चले जा रहे थे

“इंगलिश की पेटियाँ तो एडवांस में ही मंगवा ही चुका था मैँ,….

इसलिए दारू-शारू की कोई चिंता नहीं थी कि …

बीच में ही खत्म हो गयी तो मज़ा किरकिरा ना हो जाए कहीं”

“दुलहन की तरह सजा हुआ था मेरा बंगला”

“मज़े ले ले कर तर माल पे हाथ साफ किया जा रहा था”…

“किसी की बाप का कुछ जा जो नहीं रहा था”

“जा तो अपुन का रहा था ना?

“लेकिन बरसों बाद मिली खुशी के आगे सब कुर्बान”

“बस सबके चेहरे पे एक ही सवाल घूमडता दिखाई दे रहा था कि …

आखिर माजरा क्या है ?”

“ये कंजूस-मक्खी चूस आखिर इतना दिलदार कैसे हो गया?”

“कहीं कोई लाटरी तो नहीं लग गयी ?

“कहीं ना कहीं दाल में काला है ज़रूर”

“अरे तुम क्या जानो यहाँ तो पूरी दाल ही काली है” मैँ मन ही मन खुश हुए जा रहा था

“मुफ्त में माल जो मिल रहा था तो सभी खामोश थे कि… .

“अपुन को क्या?”

“कोई मरे या जिए”वाला भाव उनके चेहरे पर था

“क्या कोई लाटरी लगी है?”

“किस खुशी के मौके पे दावत दी जा रही है जनाब?”कोई ना कोई इस तरह के बेतुके सवाल दागे ही दे रहा था बीच-बीच में

“अरे तुम्हें टटटू लेना है?”

“अपना खा-पी और मौज कर “

“क्यूं फटे छेद में से बोरी के भीतर घुसने में वक्त ज़ाया कर रहे हो ?”

“कुछ समझ्दार इंसान भी थे जो खाओ-पिओ और अपना रास्ता नापो की पालिसी पे चल रहे थे “

“बीच-बीच में कोई ना कोई ढीठ बन के पूछ ही बैठता तो उसे जवाब तैयार मिलता कि…

“ये सब ना पूछो,बस मौज करो”

“मेहमान-नवाज़ी के चक्कर में थकान के मारे हालत पतली हुए जा रही थी लेकिन…

खुशी का मौका ही ऐसा था कि उछलता फिर रहा था मैँ”

“आखिर खुश क्यों नहीं होता मैँ?”

“पूरे चौदह साल बाद खुशी के ये पल जो नसीब हुए थे”

“लगता था जैसे चौदह साल का वनवास काट मैँ राजगद्दी संभाल रहा हूँ “

“खुशी से मन ही मन इस गीत के बोल फूट रहे थे ….

“दुख:भरे दिन बीते रे भईया ,अब सुख: आयो रे”…

“नौकर-चाकर भी तो कम ही पड गये थे आज”

“सब के सब मेरी खातिर पूरे जी-जान से हर काम में हाथ बटा रहे थे,….

अच्छे ईनाम का लालच जो था”

“इस सब आपा-धापी के चक्कर में शायद कही मैँ कुछ भूले जा रहा था”,

“कहीं कोई यार-दोस्त,रिश्तेदार बुलाए जाने से तो नहीं रह गया है कहीं कि बाद मे ताने सुनने पडें सो अलग “

“बडी ही बारिकी से लिस्ट को चैक करने के बाद भी कहीं कोई गल्ती या कमी नज़र नहीं आ रही थी”

“लेकिन कुछ ना कुछ तो छूटा है ज़रूर”मैँ अपने आप से बातें करता हुआ बोला

माथे पे ज़ोर डाल मैँ सोचे चला जा रहा था कि अचानक सब याद आ गया…

“ओह!”..

“हे भगवान!अब क्या होगा?….

“ये मैने क्या किया?”

“कहाँ मति मारी गयी थी मेरी जो इतनी ज़रूरी बात दिमाग से उतर गयी?”

“बेवाकूफी के भी हद होती है”

“इतना ना-समझ मैँ कैसे हो गया?”

“रौंगटे खडे होने को आए थे”

“लेकिन हिम्मत तो करनी ही होगी”….

“जितने जल्दी हो सके इस काम को निबटा ही दूँ”

“साँप के बिल से निकलने से पहले ही लाठी भांज देता हूँ”

“बस यही सोचकर फोन घुमा दिया”…

“वही हुआ जिसका मुझे डर था”,

“सामने से कडकती हुई अवाज़ आई,..

“कब?”…

“कहाँ?”…

“कितने बजे?”

“पहले फोन क्यों नहीं किया?”

“पता नही साला दिमाग को क्या हुए बैठा था जो वहाँ भी यही निकल पडा…

“तुम्हें टट्टू लेना है? अपना खाओ-पिओ और मौज करो”

“साले!…सीधी तरह बताता है कि नहीं?”उधर से गुर्राते हुए अवाज़ आई

“और ये बैण्ड बाजे का क्या शोर हो रहा है ?”

“मैँ सकपका गया और धीरे से बोला “जी मेरी बीवी भाग गयी है ना…सो थोडा बहुत इंजाय कर रहे थे”

“जल्दी से पूरा नाम-पता बता, अभी तेरी खबर लेते हैँ “

“साले जब रिमांड के आगे तो अच्छों के बोल बचन फूट पडते हैँ तेरी क्या औकात ?”

“बैण्ड तो अब तेरा बजेगा बच्चू”

“हमें बरगलाता है “कहते हुए दूसरी तरफ से फोन पटक दिया गया

“कुछ और नहीं बक सकता था मैँ?”

“शेर की दहाड सुन हिरन बावला हो उठा”

“कंठ सूखे जा रहा था “,…

“मन ही मन काँप रहा था कि पता नहीं साले क्या -क्या पूछेगे?”

“और मै क्या-क्या जवाब दूंगा?”

“टटटू जवाब दूगा?”

“फ़टी तो अपनी पहले से पडी है”

“इसी उधेड्बुन में ही था कि पुलिस का सायरन सुनाई दिया”,

“क्या सिर्फ हिन्दी फिल्मों में ही पुलिस देर से आती है?”

“असल ज़िन्दगी में पुलिस इतनी तेज़ होती है ?”

“इस से तो फिल्में ही अच्छी हैँ “

“कम से कम ,कुछ पल के लिये ही सही लेकिन दर्द-ओ-गम तो भुला देती हैँ”

“एस.एच.ओ’साहब खुद ही दल-बल के साथ ही पधारे थे”

“एक कडक अवाज़ सुनाई दी “ओए ..ये राजीव का बच्चा कौन है?”

“कोई नहीं बोला”..

“‘एस.एच.ओ’चिल्लाया “ओए राजीव के बच्चे …बाहर निकल”

“मैँ डरते -डरते आहिस्ता से सामने आया”

“सर्दी के मौसम मे भी पसीने छूटे चले जा रहे थे”

“जी….मै ही हूँ राजीव “

“चल तेरे से प्राईवेट मेँ कुछ बात करनी है”वो मेरा हाथ थामे कोने में ले गया

“इधर-उधर देखने के बाद फुसफुसाते हुए बोला”यार!… ये कमाल तूने कैसे कर दिखाया?”

“जी वो…जी वो….”

“अबे ये जी वो…जी वो से आगे भी बढेगा या वहीं चिपक गया?”पुलसिया रौब झाडता हवलदार बोल पडा

“चुप…बिलकुल चुप” एस.एच.ओ’ हवलदार इशारा करा हुआ बोला

“तुम बताओ” एस.एच.ओ. की मीठी अवाज़ सुनाई दी

“बात दर असल ये है कि”….मेरी ज़ुबान लडखडा रही थी

“एस.एच.ओ. साहब ने इधर-उधर देखते हुये चुपचाप हज़ार-हज़ार के दो कडकडाते हुए नोट मेरी हथेली पे धर दिए”

“मै मना करता रहा लेकिन वो नहीं माना”

“मेरी ना-नुकर देखते हुए उन्होंने आँखो ही आँखो में आपस में बात की और फिर ….

खुद ‘एस.एच.ओ’ साहब ने आठ नोट और मेरी जेब के हवाले कर दिए और बोले…

“आज तो बस इतनी ही दिहाडी बनी है ” ….

“समझा करो”…

“ये भी मैँ और चारों हवलदार मिलकर दे रहे हैँ”

“कौन कहता है कि अपने देश में एकता नहीं है ?”

“यहाँ सब मिल-बांट के खाते हैँ”

“हाथ-कंगन को आरसी क्या?” और …

“पढे लिखे को फारसी क्या?”

“जीता-जागता नमूना तो मैँ खुद अपनी खुली आँखो देख रहा था”

“आजकल मंदा बहुत चल रहा है यार “

“कोई दे के राज़ी ही नहीं है”

“ये भी किसी गरीब मानस के ड्ण्डा चढाया तो जा के बडी मुशकिल से इक्ट्ठा हुए हैँ”

“इसी भर से काम चला लो गुरू”

“हम सब की यही प्राबल्म है ….कोई जुगाड बताओ “

“अरे आप तो मेरे ही भाई-बन्धु निकले…..

आपको तो बताना ही पडेगा”खिसियाते हुए मैँ नोट अपनी जेब के हवाले करता हुआ बोला

“कुछ ना कुछ आप हर रोज़ ऐसा करें कि मुसीबत खुद ही एक ना एक दिन …

परेशान हो के अपने आप ही भाग जाये”

“किसको पढा रहे हो गुरू?”

“ये सब तो हमें भी पता है”…

“आज़मा चुके हैँ कई बार”

“लेकिन क्या करें?…..

“साली .. अपनी है कि भागने का नाम ही नहीं लेती है”वो सब के सब एक साथ बोल पडे

“अरे यार पहले पूरी बात तो सुन लो….
लगे बीच में ही टोका-टाकी करने “
“जहाँ करनी है टोका-टाकी वहाँ तो बोल नहीं फूटते होंगे ज़बान से “

“सब चुप ….लगे टकटकी बाँध मेरी तरफ देखने”

“उसके हर काम में ‘टोका-टाकी’ करो ….

“घडी भर भी चैन से बैठने ना दो”

“कभी ‘ये …ला’…. तो कभी….

‘वो…ला’ करते रहो”…

“खाना जितना मर्ज़ी स्वादिष्ट बना हो लेकिन एक बात गांठ बांध लो कि….

तारीफ तो कभी भूल के भी करनी ही नहीं है ना”

“खाने की तरफ देख के नाक-भोहं ज़रूर सिकोडो”….

“पडोसन की बार-बार और… जी भर तारीफ करो”…..

“राह में आती-जाती हर किसी की….माँ-बहन एक करो “

“इस सब में तो हम सभी एकदम एक्सपर्ट हैँ”एक हवलदार बोल पडा

“उसकी बात को अन-सुना करता हुआ मैँ आगे बोला “हर लडकी/औरत को छेडो…

“चाहे वो उमर में तुमसे दुगनी ही क्यों ना हो”

“बेशक माँ बराबर हो, फिर भी उसे ज़रूर घूरो”

“बीवी की कोई बहन या सहेली हो तो उसे बिना नागा लाईन मारो”..

“उलटी-सीधी फब्तियाँ कसो “

“अपने लिये नए-नए कपडे खरीदो और उसके लिये फूटी-कौडी भी नहीं खर्चा करो “

दहेज के नाम पे बार-बार तंग करो”

“उसके हर काम में कोई ना कोई नुक्स ज़रूर निकालो”

“इससे बात नहीं करनी है, उसको नहीं देखना है” वगैरा वगैरा अपने पैट डायलाग बना लो”

“उसके रिश्तेदारों को हर् वक्त बे-इज्जत करो”

“और सबसे इम्पोर्टैंट बात कि …

चाहे उसका मन (*&ं%$#@ के लिये करे ना करे लेकि न तुम (*&ं%$#@ …. तुम ज़रूर करो”

“अरे यार ये सब तरीके तो आज़माए हुये है लेकिन….कोई फायदा नहीं”एस.एच.ओ.बोला

“कोई नया जुगाड बताओ जिसके काटे का इलाज ना हो “

“अरे अगर ऐसी बात है फिर ‘पुल्सिया हाथ’है आपका ….

दिखा दो…

एक-दो में ही शैंटी-फ्लैट हो जाएगी “…

“दो सीधा खींच के …कान के नीचे…..

“झटाक….”कहते हुए मैने गलती से ‘एस.एच.ओ.’साहब के ही कान पे एक धमाकेदार रसीद कर दिया

“साले!…..पुलिस पे हाथ उठाता है” ….

“ले ‘थपाक’….और ले …’थपाक’…

“गाल पे पाँचो उंगलियाँ छप चुकी थी”

“पता नहीं मार का असर था के फिर कुछ और….

‘एस.एच.ओ.’साहब की अवाज़ कुछ-कुछ ..बदली-बदली सी लगने लगी थी

“शायद कुछ-कुछ ‘ज़नाना’ सी”

“ध्यान से आँखे मिचमिचाते हुए देखा कि मैँ गाल पे हाथ धरे धरे पलंग से नीचे गिरा पडा हूँ और…

सर पे बीवी खडी-खडी चिल्ला रही है ….

“उठ …उठ…’कुंभकरण’ की औलाद… उठ ….

“किसको शैंटी-फ्लैट कर रहे थे?”

“और ये किसे उल्टी पट्टी पढाई जा रही थी?”

“मैँ घडी दो घडी के लिये बाहर क्या गयी….

सब काम-धन्धा छोड अराम फरमाया जा रहा है “

“बरतन कौन मांजेगा?”

“तुम्हारा बाप?”

“और ये कपडे कैसे धोए हैँ?…

“किसी पे ‘नील’नहीँ लगा है और किसी का ‘कालर’ गंदा “

“पूरे चौदह साल हो चुके हैँ तुम्हें समझाते-समझाते लेकिन …

दिमाग जैसे घास चरने गया रहता है हर-दम “

“लगता है जब ऊपरवाला अक्ल बांट रहा था तब भी तुम सो ही रहे होगे”

“हुँह!….बडे आए ‘शैंटी-फ्लैट’ करने”

***राजीव तनेजा***

"खेल खिलाडी का "

“खेल खिलाडी का”

***राजीव तनेजा***

नोट: “जंतर मंतर काली कलंतर” का दूसरा भाग लिखने की कोशिश की है,उम्मीद है कि आप सभी को पसन्द आयेगा

ज्योतिषी बनने के चक्कर में जेल की हवा खाने पडी ,

कोई खास नहीं बस तीन महीने की हुई

बोरियत का तो सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि अपने सभी यार-दोस्त तो वहाँ पहले से ही मौजूद जो थे

कोई दो साल के लिए तो कोई पाँच साल के लिए अन्दर था

ये तो मैँ ही था जो कुछ ले-दे के सस्ते में छूट गया था

बाकि सब के सब साले कंगाल….

सोचते थे कि बाहर निकल के तो फिर कोई ना कोई काम-धन्धा करना ही पडेगा
सो यहीँ ठीक है,….

दो वक्त की आराम से मिल जाती है

सही कहा है किसी भले-मानस ने कि…

“जब मुफ्त में मिले खाने को,

तो कद्दू जाए कमाने को”

साले सब के सब निठल्ले ….कामचोर की औलाद

मुफ्त में जेल की रोटियाँ तोडे जा रहे थे

बाकि सब तो ठीक ही था लेकिने…

एक ही ख्याल दिल में उमड रहा था बार-बार कि आखिर जेल से छूटने के बाद करूगा क्या?

अपुन का इरादा तो लम्बा हाथ मारने का था लेकिन कोई आईडिया ही साला इस भेजे में घुसने को राज़ी ही नहीं था

और घुसता भी कैसे?

आदत तो अपुन को थी तर माल पाडने की और ये साला जेल का खाना…

माशा-अल्लाह

अब क्या बताऊँ “ये अफसर लोग ही सब का सब हडप जाते हैँ खुद ही

“डकार तक नहीं लेते “

छोड देते हैम हम जैसों के लिए मूंग धुली का पानी और कुछ अधजली कच्ची-पक्की रोटियाँ

बाहर किसी कुत्ते को भी डालो तो काटने दौडेगा और हम थे कि काटना तो दूर सही ढंग से भौंक भी नहीं सकते थे”

“भौंकना और काटना सब अफसर लोगों के जिम्मे जो था”लेकिन एक दिन सब काया-पलट होते नज़र आया

‘सफेदियाँ’हो रही थी”….

‘फ्रिज’…..

‘सोफा’…

‘प्लाज़मा टीवी’….

‘गद्देदार पलंग’और ना जाने क्या-क्या

मैने मन ही मन सोचा कि “ये सब साले इतना सुधर कैसे गये?”

“किसी से पता किया तो जवाब मिला कि “इतना परेशान ना हो ,एक ‘वी.आई.पी’ आ रहा है कुछ हफ्तों के लिये…

उसी की खातिर-दारी में ये सब हो रहा है”

“बाजू वाली बैरक में ठहरने का इंत्ज़ाम किया गया है “

“एक ठुल्ले से अपुन ने अच्छे ताल्लुक बना लिए थे …

बस कुछ खास नही यार …वही पुराने ज्योतिष के हथकण्डे अपनाए “

“आठ-दस उल्टे-सीधे डायलाग मारे”

“तीन-चार का तुक्का फिट बैठा और हो गया चेला तैयार “

“बस फिर क्या था उसी को मस्का लगाया कि…
“एक बार…बस एक बार,किसी भी तरह से इंट्रोडक्शन भर करवा दो”…

“बाकि सब मैँ अपने आप सलट लूँगा”

“उसी की तो ड्यूटी लगी थी ना उस ‘वी.आई.पी’ के साथ “

“सो अगले दिन ही अपुन उसके दरबार में हाज़िर था”

“ये लो ..उसे तो मैँ पहले से ही जानता था,..

‘वी.आई.पी’ बनने से पहले साला मिट्टी का तेल ब्लैक किया करता था”

“तेल का डिपो जो था उसका”

“खूब नोट छापे पट्ठे ने और आज ठाठ तो देखो”

“बन्दे को बन्दा नहीं समझता है”

“देखते ही झट से पहचान गया मैने भी पूछ ही लिया कि “अरे नेताजी आप यहाँ कैसे?”

“अरे यार कुछ ना पूछ सब इन मुय्ये चैनल वालों का किया धरा है “…

“साले सोचते हैँ कि मैँ यूँ ही मुफ्त में सवाल पूछता फिरूँ “

“अरे मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो मैँ फोकट में अपनी ज़बान काली करता फिरूँ?”

“इन सालों को क्या पता कि कितने खर्चे हैँ?”

“किस-किस को हफ्ता पहुँचाना पडता है”

“ऊपर से नीचे तक कोई साला बिना लिए रहता नहीं है”

“ऊपर से नीचे तक?”

“हाँ भाई हाँ”….

“ऊपर से नीचे तक”

“सभी इस हमाम में नंगे हैँ”

“यहाँ तो गांव बाद में बसता है,भिखमंगे साले पहले कटोरा हाथ में लिए नज़र आते हैँ”

“आपको पता भी ना चला कि कब साले फोटू खींच ले गये?”मैने हैरानी से पूछा

“पता होता तो सालों का टेंटुआ ना दबा देता वहीं के वहीं”

“जी ये तो है”आज लग रहा था जैसे अपने नेताजी चुप नहीं बैठेंगे,

कोई सुनने वाल जो मिल गया था”

“अभी तक कोई इनकी सुन ही कहाँ रहा था और मैँ भी तो अपने मतलब की खातिर उनकी लल्लो-चप्पो किए जा रहा था

मैने मस्का लगाते हुए कहा कि “नेताजी आपका तो तेल का डिपो था ना?….

फिर ये नेतागिरी की लाईन में कैसे आ गये?”

“अरे अपुन को तो कमाई दिखनी चाहिए…भले ही कोई हमसे अपने बच्चे तक पिटवा ले “

“तेल के डिपो की वजह से अपनी जान-पह्चान बहुत थी “

“जी”..

जान-पहचान तो अपुन की भी बहुत है ,मैँ मन ही मन मुस्काया लेकिन ऊपर से एकदम अनजान बनता हुआ बोला

“जी उस से क्या होता है ?”

“अरे यार इलैक्शन के टाईम पे सभी पार्टी वाले अपुन को ही तो याद करते थे,….

चाहे वो ‘भगवे’ वाले हों,

या फिर ‘हाथी’ वाले,

या फिर ‘हाथ’वाले या फिर कोई और”

“उनसे जो माल-मसाला मिलता था बांटने के लिए ,उसका आधे से ज़्यादा तो मै ही डकार जाता था और चूँ तक नहीं करता था”

“लेकिन हिसाब-किताब कैसे देते थे उनको?”

“हिसाब-किताब?”

“हा हा हा हा”

“अरे बुद्धू ये सब दो नम्बर के धन्धे होते हैँ,इनका हिसाब-किताब नहीं रखा जाता”

“लेकिन फिर भी थोडी-बहुत लिखा-पढी तो करनी ही पडती होगी?”

“हाँ यार इतना हिसाब तो देना ही पडता है…..

कुछ उलटे-सीधे खरचे लिखा दिए बस और हो गयी खाना-पूर्ती जैसे….

‘दारू की पेटियाँ’……

‘जूते-चप्पल’.. ..

‘साडियाँ’…..

‘झण्डे’….

‘बैनर’…

‘ड्ण्डा घिसाई’वगैरा वगैरा….”

“नेता जी अपने आप ही सब उगलते जा रहे थे और मैँ था कि चुप-चाप सब सुनता जा रहा था”

“आज चुप रह कर मतलब निकालने की मेरी आदत काम आ ही गई”

सोच रहा था कि अब बताउंगा बीवी को कि “देख चुप रहने के कितने फायदे हैँ”

“हर वक़्त बकती रहती थी कि “सिर्फ मेरे आगे ही ज़ुबान लडाते हो,कभी बाहर मुँह खोलो तो जानुं”

“बाहर तो आपकी घिघ्घी बंध जाती है,ज़ुबान को ताला लग जाता है और चाबी जाने कहाँ गुम हो जाती है ?”

“कहाँ खो गये?” नेताजी की अवाज़ सुनाई दी तो हकबकाते हुए जवाब दिया कि “बस ऐसे ही”

“कई बार तो एसा होता था कि मैँ अकेला ही पूरा का पूरा माल हज़म कर जाता था” नेताजी बात आगे बढाते हुए बोले

“पूरा?” मैने हैरानी से पूछा

“अरे हाँ यार पूरा”

“फिर बांटते क्या थे?”…

“टट्टू?”

“अरे पूरे इलाके में अपुन की धाक जम चुकी थी…

सो सभी काम-धन्धा करने वालों के यहाँ अपने गुर्गे भेज देता था कि …

‘पार्टी-फंड’के नाम पे चन्दा दो “

“सब काम खुद-बा-खुद निबट जाता था”

“सब के सब भला कहाँ देते होंगे?”

“अरे है कोई माई का लाल जो अपुन को इनकार कर सके?”

“साले का जीना हराम ना कर दूंगा?”

“पर कोई ना कोई तो अडियल मिल ही जाता होगा?” मैँ फिर बोल पडा

“ऐसे तो घटिया इनसान हर कहीं भरे पडे है थोडे-बहुत”

“तो फिर उनसे कैसे निबटते थे ?

“दो-चार के यहाँ ‘इनकम टैक्स वालों का छापा पडवा दिया और …

नकली माल बनाने वालों के लिए तो एक फोन घुमाना ही काफी था”

“साले अगले दिन ही नाक रगडते हुए आते थे खुद ही कि ….

“जी हमारी तरफ से भी पार्टी फंड ले लो”

“एक साला फैक्ट्री वाला थोडी दिक्कत कर रहा था …

ऐसा अडियल निकला कि ‘टस से मस’ना हुआ”

“फिर?”

“लेकिन अपुन के पास हर साँप के काटे का इलाज है “

“इस जोड का तोड निकाल ही लिया”

“साले की फैक्ट्री में हडताल करवा दी लाल झण्डे के तले”

“दो-चार को चाकू मरवाया और लगवा दिया ताला पट्ठे की फैक्ट्री में “

“जब हफ्ते भर ताला लटका रहा तो खुद-बा-खुद सारी हेकडी ढीली हो गयी”

“तो क्या सारा का सारा माल-पानी बांट देते थे?”

“इतना येढा समझा है क्या?…अपुन भिण्डी बाज़ार की नहीं दिल्ली की पैदाइश है दिल्ली की”

“अगर सब कुछ बांट दूंगा तो मैँ क्या गुरुद्वारे जाउंगा?”

“ये ‘बंगला-गाडी’….

ये ‘नौकर-चाकर’

ये’शोरूम’…

ये’फार्म हाऊस’….

ये’फैक्ट्री’

सब का सब क्या आसमान से टपका है कि मंतर मारा और सब हाज़िर”

“अरे बुद्धू …नोट खर्चा किए हैँ नोट,और नोट जो हैँ….

वो पेड पर नहीं उगा करते कि….

हाथ बढाया और तोड लिए हज़ार-दो-हज़ार”

“थोडा-बहुत तो बांटना ही पडता था झुग्गी-बस्तियों में”

“आखिर वोट बैंक जो थे”

“बस बस्ती के खास बन्दे को अपनी मुट्ठी में कर लिया तो किला फतेह समझो”

“यही तो सबसे मुश्किल काम होता होगा?”

“कोई भी काम मुश्किल नहीं है अपुन के लिए….

बस मुन्नी बाई को इशारा किया और पहुँच गई अपने दल-बल के साथ “

“उसके लटके-झटकों पे तो पूरी दिल्ली फिदा है तो इन प्रधानों-वरधानों की क्या मजाल जो काबू में नहीं आते”

“देसी की पेटियाँ तो हम मंगवा ही लेते थे पहले से ही”

“देसी?” मैँ मुँह बिचकाता हुआ बोला

“हाँ भाई ‘देसी’…..सालों को इंगलिश पचती नहीं है ना ….

कहते हैँ कि आहिस्ता-आहिस्ता चढती है और तब तक सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है “

“लेकिन कुछ अंग्रेज़ी के शौकीन भी तो होते होंगे …उनका क्या?”

“ऐसे नमूनों के लिये तो दो-नम्बर का माल तैयार करवा लेते थे आर्डर पे “

“तैयार करवा लेते थे आर्डर पे ?”

“जी समझा नहीं”

“ज़रा खुल के बताएं”

अब नेताजी इधर-उधर देखते हुए आहिस्ता से बोले…

“यार दो-नम्बर का माल माने …

‘बोतल असली लेकिन माल नकली’

“माल नकली? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था

“अरे बेवाकूफ…बोतल से असली माल सिरिंज के जरिए बाहर और सिरिंज से ही नकली माल अन्दर”

“जी समझ गया….जी समझ गया”

“और तुम जैसे कुछ खास गिने-चुने बन्दो के लिए डाइरैक्ट फैक्ट्री से ही खालिस माल मँगवा लेते थे “

“वो तो काफी मँहगा होता होगा?’

“अरे यार वो मँहगा होता है तुम जैसों के लिए…

अपुन के लिये क्या देसी? और क्या विलायती? सब बराबर है “

“मतलब?”

“अरे यार डाइरैक्ट फैक्ट्री से ही …बिना एक्साइज़ ड्यूटी के “

“बिना एक्साइज़ ड्यूटी के ?”

“एक अफसर को जो अन्दर जाने से बचाया था एक बार …..

पट्ठा आज तक नहीं भूला…..यारी हो गयी अपने साथ “

“लेकिन यारी हर किसी की कहाँ हो सकती है? मैँ उदास मन से बोला

“होने को तो सब कुछ हो सकता है….

बस पैसा फैंको और तमाशा देखो “

“जी सही फरमाया आपने” मैँ मुंडी हिलाता हुआ बोला

“लेकिन पिछली बार तो अपोज़ीशन वालों का ज़ोर था ना?”

“फिर कैसे आपके साथी जीत गये थे?”

“अरे ये ज़ोर-वोर सब बे-फिजूल की बातें हैँ….

“असल मुद्दा तो होता है कि जीता कौन?”

“और जीते तो हम ही थे ना?”

“बात तो आप सोलह आने दुर्रस्त फरमा रहे है”लेकिन ये कमाल आपने कैसे कर दिखाया?”

“अब तुम तो जानते ही हो कि यार कि अपुन को जवानी में द्ण्ड पेलने का बडा ही शौक था”

“जी ये तो बच्चा-बच्चा जानता है “

“सो दिन भर अखाडे में ही पडे रहते थे “….

“जी”

“बस अपनी यारी पहलवानों से हो गयी,उन्ही का इस्तेमाल किया और मार लिया मैदान”

“लेकिन आठ-दस से भला किसी का क्या उखडता होगा?”चेहरे पे असमंजस के भाव लाता हुआ मैँ बोला

“सही कह रहे हो आठ-दस से तो किसी का बाल भी बांका नहीं होता”

“तो फिर?”

“इन सबके भी अपने -अपने लिंक होते हैँ .मँगवा लिए पडोसी शहरों से ठेके पे “

“आखिर पडोसी भला किस दिन काम आएंगे?”

“काम आएंगे?”

“यार सीधा सा हिसाब है ….

“इस हाथ दे और उस हाथ ले”

“जब उनको ज़रूरत पड्ती है तो ये वहाँ पहुँच जाते हैँ अपना कमाल दिखाने”

“लेकिन आप तो कह रहे थी कि ‘ठेके’पे?”मैँ फिर बीच में बोल पडा

“हाँ भाई हाँ, ठेके पे …

अब कौन हिसाब रखता फिरे कि कितनों की टांगे तोडी और कितनों के सर फोडे …

कितनो को अस्पताल पहुँचाया?और …

कितनों को सरेआम ही शैंटी-फ्लैट”

“लेकिन रेट कैसे फिक्स करते थे ?

“हर काम का अलग-अलग रेट होता है बन्धु,जैसे….

‘टांग तोडने के इतने पैसे’ और…

‘मुँह तोडने के इतने पैसे’,

‘हाथ-पैर दोनों एक साथ तोडने के इतने पैसे,

‘धमकाने के इतने पैसे’”

“और बूथ-कैपचरिंग के और बोगस वोतिंग के ? मैने सवाल दाग दिया

“ये की ना तुमनी हम नेताओं जैसी बात “

“कहीं मेरी ही वाट लगाने का इरादा तो नहीं है?”

“ही…ही…ही….जी मेरी क्या औकात तो मैँ आपके सामने सैकण्ड भर भी ठहर सकूँ”मैँ खिसियानी हँसी हँसता हुआ बोला

“फिर ठीक है “

“हाँ तो बात हो रही थी ‘बोगस वोटिंग’ और ‘बूथ कैपचरिंग’की “

“जी”

“तो यार इन सब के लिए तो अलग से पैकेज देना पडता है कि …

इस इलाके के लिए इतने खोखे और उस इलाके के लिये इतने खोखे”

“सालों ने पूरा सर्वे किया होता है कि फलाने इलाके में …इतने पटाखे फोडने पडॆंगे और

फलाने इलाके में इतने”

“खोखे?” मेरा मुँह खुला का खुला ही रह गया

“और तुम इसे क्या दस-बीस पेटी का खेल समझे बैठे थे?”

“अरे पच्चीस-पचास से तो मेरे ‘पी.ए’ की भी दाढ गीली नहीं होती है तो अपना तो सवाल ही पैदा नहीं होता “

“अब मुझे हर तरफ खोखे ही खोखे दिखाई दे रहे थे ,…

बस अब तो इसी का इंतज़ार था कब छूटूं और कब कूद पडूं मैँ भी इस खेल में

आखिर ‘खोखों का सवाल जो था.

***राजीव तनेजा***

"रुखसाना को नहीं छोडुंगा"

“रुखसाना को नहीं छोडुंगा”

***राजीव तनेजा***

“चाहे कुछ भी हो जाए मैँ इस रुखसाना की बच्ची,दाल-दाल कच्ची को छोडने वाल नहीं”

“दो दिन में ही तारे दिखा दिए इसने तो मुझे ,कहीं का नहीं छोडा”

बडे मज़े से मेल भेजा कि “आपकी तो इतनी लंबी मेलिंग लिस्ट है ,कैसे मैनेज करते हैम ये सब ?”

“मेरा भी एक छोटा सा ‘याहू’ग्रुप है , प्लीज़ जायन कर लें “

“मैने सोचा कि औरत ज़ात है और अपुन की तारीफ भी कर रही है …..

अब इसको क्या मना करूँ?

जहाँ इतने सही वहाँ एक और सही लेकिन ..

किंतु….

परंतु…

“मुझे क्या पता था कि ये मैम्बर बना के अपने ग्रुप की रौनक बढाने के बजाय मेरे ही जीवन में अन्धेरा कर डालेगी”

“इसने एक तो जो मेल पे मेल भेजना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया और …

मेल भी ऐसी ऐसी कि बन्दा तो बस अपनी माशूका की तारीफों में ही पूरा जीवन गुज़ार दे”…

“पता नहीं दुनिया भर की शायरी कहाँ से बटोर लाती थी ?”

“हमें जैसे कोई काम ही नहीं है ना दुनिया में?बस उसी की ये नासपीटी शायरी ही पढते रहें “

“बच्चे कौन पालेगा?”

“इन मेल्ज़ को पढने के चक्कर में जो काम बचे रह गये हैँ ,उनको शायद ये मोहतरमा …..

सीधे क्ज़ाकिस्तान से दिल्ली की फ्लाईट पकड कर आएंगी और पूरा करेंगी(वहीं रहती है ना वो)”

“आ जाए अगर कसम से तो एयरपोर्ट पर ही गिन-गिन के बदले ले लूं”

“मेरी ज़िन्दगी जो कभी जन्नत से कम नहीं थी ,इस मुई का ग्रुप जायन करते ही नर्क से भी बद्तर हो गयी”

“बेडा गर्क कर के रख दिया”

अब आप पूछेंगे कि “इसमें उस बेचारी रुखसाना का क्या कसूर?”

“और लो!…. पूछ रहे हैँ कि क्या कसूर?”

“अरे मेरी इक्लौती बीवी ने गल्ती से उसकी एक मेल जो पढ ली,…

“पड गयी हाथ धो के मेरे पीछे कि अब मैँ उसकी तारीफ में कोई….

‘गज़ल’,….

‘शेर’…. या फिर कोई ….

‘डायलाग’ ही बोल दूँ”

“अब यार क्या बताऊँ कि इन सब मामलों में अपुन पूरे के पूरे फिसड्डी हैँ और बीवी थी कि वहीं के वहीं अटक के खडी हो

गयी”

“एक ना सुनी”,बोली कि “आज से चाय-नाश्ता सब बन्द”

“क्या करता मैँ बेचारा?कुछ तो बोलना ही पडा और गल्ती से कहो कि मैँ उसको उसी के ऊपर एक ‘चुटकला’ सुना बैठा”

“बस चुटकला सुनना था और उसका भडकना था, तपाक से बोली …

“मैँ तो चली मायके,अब उसी कलमुँही ‘रुखसाना’ को ही बुला लो रोटियाँ सेंकने”

“उसको मनाने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी उस’रुखसाना’की बच्ची ने बीवी के जलते हुए सीने पर धडाक से एक

और मेल दाग दी”

“पता नही किस जन्म का बदला ले रही थी”

“बीवी का पारा सातवें आसमान तक जा पहुँचा और गुस्से में ‘मोगैम्बो’ की तरह फुफकारते हुए बोली …

“अभी कम्प्यूटर उठा के पटक दूँगी ,फिर करते रहने मज़े इस ‘रुखसाना’ की बच्ची से “

लाख मनाया पर न मानी,काफी जी-हजूरी करने के बाद बोली…

“पहले मेल तो खोलो,देखूँ तो सही कि क्या ऊट-पटांग भेजती रहती है ये मुसटंडी आपको?”

“मैने डरते-डरते मेल खोली कि पता नहीं इस बार क्या निकल आए और मेरी आफत खदी हो जाए “

“लेकिन मेल खुलते ही बीवी का चेहरा खिल उठा,”

“बांछे खिल उठी”

“ये रुखसाना तो बहुत अच्ची है”

“मैँ तो नाहक ही गरम हुए जा रही थी”

“आप भी तो समझा सकते थे ना मुझे ?”

“आप एक काम करो इसे ही ले आओ”

“किसको?”

“रुखसाना को ?”

“मेरे तो करम ही फूट गये जो इस बावले संग ब्याह रचाया,किस्मत ही फूटी थी मेरी “

“अरे बेवाकूफ आँखे हैँ कि बटन?दिखाई भी नहीं देता कि क्या भेजा है मेरी बहन ने ?”

“बहन? यहाँ तो रिश्तेदारी तक बात पहँचने वाली है

झट से मेल देखा तो मेरे होश उड गये,

माथा पकड के बैठ गया,

दिमाग सुन्न हुए जा रहा था

“कम्भखत मारी ने मेरी वाट लगाने की पूरी तैयारी से मेल भेजी थी”

“ऐसी-ऐसी फोटू देखी कि सर चकराने लगा

बीवी बोली चलो “अभी के अभी”

कोई चारा भी तो ना था ,हाँ में हाँ मिलानी पडी

ना मन होते हुए भी वो सब करना पडा जिससे मैँ कतराया करता था

पूरे बीस हज़ार का फटका लगा तभी बिगडी बात बनी,बीवी मायके जाने को जो तैयार बैठी थी वरना मैँ और नोट खर्चा?

“बाप रे बाप”

कम्भखत मारी रुखसाना ने मेल में ऐसी ऐसी मँहगी ‘बनारसी साडियों’ के फोटू भेजे कि बीवी से रहा नहीं गया और..

ज़िद पे अड बैठी कि लेनी है तो बस यही वाली लेनी है

Posted in Uncategorized. Tags: . 4 Comments »

"जन्तर मन्तर काली कलन्तर"

“जन्तर मन्तर काली कलन्तर”

बडे दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे,कोई काम-धाम तो था नहीं बस
कभी-कभार कमप्यूटर खोला और थोडी बहुत ‘चैट-वैट’ ही कर ली।
सच पूछो तो यार ‘बेरोज़गार’था मैं और इसमें
अपनी सरकार का कोई दोष नहीं,दरअसल अपनी पूरी’जैनरेशन”ही ऐसी है।

अब कोई छोटी- मोटी नोकरी तो हम करने से रहे ।

अब यार हर किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे’को घडी घडी कौन सलाम बजाता फिरे?

कोई छोटा- मोटा धन्धा करना तो अपने बस की बात नहीं।

बाप- दादा जो थोडी बहुत पूंजी छोड गए थे,
वो भी आहिस्ता- आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी।

आखिर वो भी भला कब तक साथ देती?

बीवी के तानों का तो शुरु से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था।
उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता।

कई बार तो कान में घुसने तक ही न देता।

पहले ‘नकदी’ खत्म हुई फिर,
‘गहने-लत्तों’का नम्बर भी आ गया।
एक एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थी लेकि्न
मेरी अकड ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एक दिन मज़े से टीवी पे ‘नो-एन्टरी’ फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा।

इसलिए नहीं कि् फिल्म बहुत ही ‘फैन्टास्टिक’ थी बल्कि…

अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था ‘नोट’ कमाने का।

अरे नोट कमाने का क्या वो तो नोट छापने का आइडिया था ।

जैसे ही बीवी को बताया कि् एक आइडिया मिला है
नोट छापने का तो वो गश खा के गिरी धडाम और वहीं के वहीं ‘बेहोश’ हो गई।

होश मे आने के बाद बोली”बस जेल जाने की कसर ही बाकि रह गई थी,….
नोट छाप के वो भी पूरी करने का इरादा है जनाब का ।”

मेरी हंसी रोके ना रुकी बोला “अरी भागवान ‘नोट छापने’ का असली मतलब सचमुच में नोट छापना’नहीं है।”

“तो फिर?”

“देखा नहीं फिल्म में उस ज्योतिषी को?….

कितनी सफाई से ‘सलमान’ से पैसे ऐंठ लेता है और ‘अनिल कपूर’ का फुद्दू खींच डालता है”

“तो क्या हुआ?”

“अपुन का भी बस यही आइडिया है”

“तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ‘ज्योतिषी’ हुआ है जो तुम बनोगे?”

“है तो नही लेकिन हमारी आने वाली नसलें ज़रूर ‘राज ज्योतिषी’ कहलाऐंगी।”

“पर ये सब करोगे कैसे?”

“अरे कुछ खास नहीं बस ठोडा- बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा “

“वो भला कैसे?”

अरे ये ‘हीरो-कट” बाल छोड सीधे -सीधे लम्बे बाल रखूंगा”

“उसमें तो नाई का खरचा भी बचेगा” बीवी चहक उठी

“कर दी ना तुमने दो कोडी वाली बात ,….
अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी- छोटी बातों पर नज़र गडाए बैठी हो।”

“लेकि्न आता जाता तो कुछ है नहीं खाली वेष बदलने से क्या होगा?” बीवी फिर बोल पडी

“अरे यार पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले”

“जी बताऒ” बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली

“हाँ तो मैं त्याग करने की बा कह रहा था तो दूसरा त्याग ये करना पडेगा कि….

ये ‘गोविंदा’ छाप कपडे छोड ‘धोती-कुरता’ पहनना पडेगा”

“वो तो शादी का पडा-पडा अभी तक सड रहा है अलमारी में” बीवी चहकते हुए फिर बोल पडी

“चलो ये काम तो आसान हुआ, अब कोने वाले कबाडी की दुकान से ‘रददी’ छांटनी पडेगी”

“आय-हाय अब क्या ‘रददी’ भी बेचोगे?”

“जब पता नहीं होता तो बीच में ‘चोंच मत लडाया कर’ मैं आँखे तरेरता हुया बोला

“बेवाकूफ पुरानी अखबारों में जो ‘भविष्यफल’ आता है उसकी कतरनों को सम्भाल के रखूंगा
‘वक्त-बेवक्त’ काम आऐंगी और

अगर ‘एस्ट्रोलोजी’ से रिलेटिड कोई किताब मिल गई तो…

‘पौ-बारह’ समझो”

“पौ-बारह’ मतलब?”

“अरे बेवाकूफ ‘पौ-बारह’ मतलब’लॉटरी’ लग गइ समझो “

“लेकि्न ये ‘जन्तर-मन्तर’ भला कहाँ से सीखोगे भला?”

“कोई खास मुश्किल नहीं है ये सब भी, बस….

‘बल्ली सागू’ या फिर ‘बाबा सहगल’ के किसी भी ‘रैप सान्ग’ को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि्

किसी के पल्ले कुछ ना पडे ,बस हो गया….

‘जन्तर-मन्तर काली कलन्तर’ “

“ऒह समझ गई…. समझ गई”

बस फिर क्या था मोटी कमायी के चक्कर में बीवी के बटुए का मुँह खुल चुका था ।

ज़रूरी सामान इक्टठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पडा बाज़ार ।

पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुँचा बाज़ु वाले कबाडी की दुकान पर ।

एक-दो ‘पेग’मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया ।

अब ‘दिन-रात’ एक करके हम मियाँ- बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस् नतीजे पे पहुँचे कि ……

“पूरी दुनिया मैं इस से आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता”…..

अब यार आप पूछोगे की ,”वो भला कैसे?”

“तो यार ये मैं आपको क्यूं बताऊं?”और …..

“अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाडी” मार डालूं”….

“कहीं मुझसे ही कम्पीटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका?”

“क्या कहा ?….

“चिंता ना करूँ?”

“ओ.के ,आपकी बात पे विश्वास करते हुए बता ही देता हूँ..

आप भी क्या याद करोगे कि किसी दिलदार से पाला पडा है”

“कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है ये सब ….

बस सिम्पल सी कुछ बातें गाँठ बाँध लो कि ..

“हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है”

“हर-एक को यही लगता है कि वो सही है और बाक़ी सब ग़लत”

“कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक”

“वो अपनी तरफ़ से कडी-मेहनत्त करता है लेकिन उसका पूरा-फल नहीं मिलता”

“दिमाग़ वो लड़ाता है ,फ़ायदा कोई और उठा ले जाता है”

“सब के सब उसकी कामयाबी से जलते हैं”

“कोई उसका भला नहीं चाहता”….

“दोस्त-यार”…

“रिश्तेदार”….

“भाई-बहन”…..

“पड़ोसी”….

“सब् के सब् मतलबी-इंसान हैं”…

“कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं है”

“वो सब पे तरस ख़ाता है लेकिन कोई उस पे नहीं”….

“किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है”…

या फ़िर् उसकी दुकान या मकान बाँध दिया है”

बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख के अंदाज़ा लगाओ की उस पर कौन कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे”

“बस चौखटा देखो और मार दो हथोड़ा”

“अगर तीर सही निशाने पे लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी”

“और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?”

“फिकर नाट ..वरी करी घुमा-फिरा के दो-चार डायलॉग और मार दो बस….

“कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर” और हाँ…..

“अगर “ऊँचे-लैवल का गेम खेलना है तो दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो “

“अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ”

“बड़े बे-रोज़गार हैं ,कोई ना कोई अपने मतलब का मिल् ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि ….

चेला रखना है गुरु नहीं”…

“कहीं अगले दिन ही वो तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बँटाधार करने की फिराक में हो”

“चौक पे बिकने वाला तोता अगर मिल जाए तो धंधे में और रौनक आ जाएगी”

“अब आप कहोगे कि वो साले!तो एकदम एक जंगली होते हैं “

“उनका क्या करोगे ?”

“तो यार वो अनाडी हैं तो क्या हुआ ?”

“हम तो खिलाड़ी हैं”

“बस उसको भूखा रखना है और ……

भविष्य की प्रचियों में अनाज का दाना चिपका देना है”

“पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली परची उठाएगा और

‘बकरा’बेचारा बस यही समझेगा कि ‘मिट्ठू माहराज ने उसका नसीब बांच दिया है”

“और उस परची के अंदर लिखा क्या होगा?” बीवी बोल पड़ी …..

“हे भागवान पूरी रामायण खत्म होने को आई और ये पूछ रही है कि …

सीता,राम की कौन थी?”

“अरी भागवान अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ…

कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर”

“हूँ !”बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी…..

सो एक दिन ऊपेरवाले का नाम लिया और जा पहुँचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया

“कोई ना कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी

“किसी को कुछ ,तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बिमारी का”

“कमाई के साथ साथ तीन पत्ती की लत भी लग चुकी थी

“एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे….

बड़ी आई थी मज़े से कि महाराज बच्चा नहीं होता है, कोई उपाय बताओ”

“अरे नहीं होता है तो कुछ ‘ओवर-टाइम’ लगाओ,

‘माल-शाल ‘खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी’डॉक्टर-शाक्टर के पास जाओ”..

“ये क्या ? की सीधे मुँह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई”

अब यार अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से “…

“ओवर-टाइम कौन कंभखत करता फिरे ?”

लेकिन धन्धा तो धन्धा है सो ,उस बेचारी को कुछ उलटी-पूलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे…

‘काली शेरनी का दूध…..

‘जंगली भैसे का अंडा’….

‘शतुर्मुर्ग का कलेजा’ और ना जाने क्या क्या….

मुँह उतर आया उस बेचारी क कि मैं अबला नारी ….
“कहाँ से लाऊंगी ये सब?”

मैने कहा “आप चिंता ना करें परसों मेरा शागिर्द नेपाल से आने वाला है
उसको को फ़ोन किए देता हूँ ,वही सब इंतज़ाम कर देगा ….

“उसने हामी भर् दी”…

“और चारा भी क्या था उसके पास?”….

“नकद गिन के ‘पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने”…

“फिर जाने दिया उसे”

“मोटी-कमाई हो चुकी थी सो मैने अपना ‘झूल्ली बिस्तरा’संभाला और चल पड़ा घर की ओर”

“रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला”…..

“ख़ुश बहुत था मैं ,…

बस पीता गया….

पीता गया”

“कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी” …

“होश आया तो बीवी ने बताया कि …

“पूरे तीन दिन तक टुल्ली थे आप”….

“ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन ….

कोई फ़ायदा नहीं”.

“तो क्या पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही?”

“और नहीं तो क्या?”

मैं झट से खड़ा हूया और भाग लिया सीधा दुकान की ओर…

पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि …

तीन दिन मैं पता नहीं …
कितने का नुक़सान हो गया होगा?”

कई बार तो पता नहीं कैसे मेरा तुक्का सही लगने लगा था और …

किसी किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन….

‘आठ-दस’बार शिकायतत भी आई कि ……

“माहराज आपकी तरकीब तो काम ना आई”

“कोई और जुगाड बताओ”..
ऐसे बकरों का तो मुझे बे-सबरी से इंतज़ार रहता था…

“एक ही पार्टी को दो-दो दफा शैंटी -फ्लैट करने का मज़ा ही कुछ और है”

“उसके द्वारा किए गये इलाज में कोई ना कोई कमी ज़रूर निकलता और ….

नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार”

“पुरानी कहावत भी तो है कि…..

“खरबूजा चाहे छुरी पे गिरे या फ़िर् छुरी खरबूजे पे,

कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है

अपुन का कानफीडैनस ‘टॉप-ओ-टॉप बढता ही जा रहा था कि ….

एक दिन एक ‘जाट-मोलढ’टकरा गया”….

“पूरी कहानी सुनने के बाद मैने उससे,उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर …..

दो-हज़ार माँग लिए”

वो साला जाट बावली पूंछ ,सौदे-बाज़ी पे उतर आया

आख़िर में सौदा साढ़े चार सौ मैं पटा ……

उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी

नज़र धोती मैं बंधी नोटों की गड्डी पे जा अटकी

“लेकिन दोस्त ,अब क्या फ़ायदा?”…

“जब चिड़िया चुग गयी खेत”….

“मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब-मानुस है …..

इसे तो कम से कम बक्श ही दूं”

आख़िर ऊपेर जाने के बाद वहाँ भी तो हिसाब देना पड़ेगा”

“लेकिन ये साला तो मोटी आसामी निकला…..

“यहीं तो मार खा गया ‘इंडिया’..”…

साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुँह से बस यही निकला …..

“ताऊ…काम तो करवा रहे हो पूरे ढाई-हज़ार का और नोट दिखा रहे हो ट्ट्टू “

बेटा ट्ट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है?”…..

“वो तो अब मैं तुम्हे दिखाऊगा”कहते हुए उसने किसी का इशारा किया और ….
तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी .

“साले!.

“पब्लिक” का फुद्दू खींचता है”….

“अब बताएँगे तुझे…

“चल …थाने….

बड़ी “शिकायतें” मिली हैं तेरे खिलाफ़”……

“साले !…. वो “S.H.O”साहेब की ….

“Madam” थी…

जिस से तूने बारह हज़ार ठगे थे “……

“चल अब हम तुझे बताते हैं कि….

‘बच्चा’ कैसे होता है

***राजीव तनेजा ***

“जन्तर-मन्तर काली कलन्तर”

“जन्तर-मन्तर काली कलन्तर”

***राजीव तनेजा***

बडे दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे,कोई काम-धाम तो था नहीं बस
कभी-कभार कमप्यूटर खोला और थोडी बहुत ‘चैट-वैट’ ही कर ली।
सच पूछो तो यार ‘बेरोज़गार’था मैं और इसमें
अपनी सरकार का कोई दोष नहीं,दरअसल अपनी पूरी’जैनरेशन”ही ऐसी है।

अब कोई छोटी- मोटी नोकरी तो हम करने से रहे ।

अब यार हर किसी ऐरे-गैरे  नत्थू-खैरे’को घडी घडी कौन सलाम बजाता फिरे?

कोई छोटा- मोटा धन्धा करना तो अपने बस की बात नहीं।

बाप- दादा जो थोडी बहुत पूंजी छोड गए थे,
वो भी आहिस्ता- आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी।

आखिर वो भी भला कब तक साथ देती?

बीवी के तानों का तो शुरु से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था।
उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता।

कई बार तो कान में घुसने तक ही न देता।

पहले ‘नकदी’ खत्म हुई फिर,
‘गहने-लत्तों’का नम्बर भी आ गया।
एक एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थी लेकि्न
मेरी अकड ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एक दिन मज़े से टीवी पे ‘नो-एन्टरी’ फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा।

इसलिए नहीं कि् फिल्म बहुत ही ‘फैन्टास्टिक’ थी बल्कि…

अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था ‘नोट’ कमाने का।

अरे नोट कमाने का क्या वो तो नोट छापने का आइडिया था ।

जैसे ही बीवी को बताया कि् एक आइडिया मिला है
नोट छापने का तो वो गश खा के गिरी धडाम और वहीं के वहीं ‘बेहोश’ हो गई।

होश मे आने के बाद बोली”बस जेल जाने की कसर ही बाकि रह गई थी,नोट छाप के वो भी पूरी करने का इरादा है जनाब का ।”

मेरी हंसी रोके ना रुकी बोला “अरी भागवान ‘नोट छापने’ का असली मतलब सचमुच में नोट छापना’नहीं है।”

“तो फिर?”

“देखा नहीं फिल्म में उस ज्योतिषी को?….

कितनी सफाई से ‘सलमान’ से पैसे ऐंठ लेता है और ‘अनिल कपूर’ का फुद्दू खींच डालता है”

“तो क्या हुआ?”

“अपुन का भी बस यही आइडिया है”

“तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ‘ज्योतिषी’ हुआ है जो तुम बनोगे?”

“है तो नही लेकिन हमारी आने वाली नसलें ज़रूर ‘राज ज्योतिषी’ कहलाऐंगी।”

“पर ये सब करोगे कैसे?”

“अरे कुछ खास नहीं बस ठोडा- बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा “

“वो भला कैसे?”

अरे ये ‘हीरो-कट” बाल छोड सीधे -सीधे लम्बे बाल रखूंगा”

“उसमें तो नाई का खरचा भी बचेगा” बीवी चहक उठी

“कर दी ना तुमने दो कोडी वाली बात ,….
अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी- छोटी बातों पर नज़र गडाए बैठी हो।”
“लेकि्न आता जाता तो कुछ है नहीं खाली वेष बदलने से क्या होगा?” बीवी फिर बोल पडी

“अरे यार पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले”

“जी बताऒ” बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली

“हाँ तो मैं त्याग करने की बा कह रहा था तो दूसरा त्याग ये करना पडेगा कि….

ये ‘गोविंदा’ छाप कपडे छोड ‘धोती-कुरता’ पहनना पडेगा”

“वो तो शादी का पडा-पडा अभी तक सड रहा है अलमारी में” बीवी चहकते हुए फिर बोल पडी

“चलो ये काम तो आसान हुआ, अब कोने वाले कबाडी की दुकान से ‘रददी’ छांटनी पडेगी”

“आय-हाय अब क्या ‘रददी’ भी बेचोगे?”

“जब पता नहीं होता तो बीच में ‘चोंच मत लडाया कर’ मैं आँखे तरेरता हुया बोला

“बेवाकूफ पुरानी अखबारों में जो ‘भविष्यफल’ आता है उसकी कतरनों को सम्भाल के रखूंगा
‘वक्त-बेवक्त’ काम आऐंगी और

अगर ‘एस्ट्रोलोजी’ से रिलेटिड कोई किताब मिल गई तो…

‘पौ-बारह’ समझो”
“पौ-बारह’ मतलब?”

“अरे बेवाकूफ ‘पौ-बारह’ मतलब’लॉटरी’ लग गइ समझो “
“लेकि्न ये ‘जन्तर-मन्तर’ भला कहाँ से सीखोगे भला?”

“कोई खास मुश्किल नहीं है ये सब भी, बस….

‘बल्ली सागू’ या फिर ‘बाबा सहगल’ के किसी भी ‘रैप सान्ग’ को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि्

किसी के पल्ले कुछ ना पडे ,बस हो गया….

‘जन्तर-मन्तर काली कलन्तर’ “

“ऒह समझ गई…. समझ गई”
बस फिर क्या था मोटी कमायी के चक्कर में बीवी के बटुए का मुँह खुल चुका था ।

ज़रूरी सामान इक्टठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पडा बाज़ार ।

पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुँचा बाज़ु वाले कबाडी की दुकान पर ।

एक-दो ‘पेग’मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया ।

अब ‘दिन-रात’ एक करके हम मियाँ- बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस् नतीजे पे पहुँचे कि ……

“पूरी दुनिया मैं इस से आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता”…..

अब यार आप पूछोगे की ,”वो भला  कैसे?”

“तो यार ये मैं आपको क्यूं बताऊं?”और …..

“अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाडी” मार डालूं”….

“कहीं मुझसे ही कम्पीटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका?”

“क्या कहा ?….

“चिंता ना करूँ?”

“ओ.के ,आपकी बात पे विश्वास करते हुए बता ही देता हूँ..

आप भी क्या याद करोगे कि किसी दिलदार से पाला पडा है”

“कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है ये सब ….

बस सिम्पल सी कुछ बातें गाँठ बाँध लो कि ..

“हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है”

“हर-एक को यही लगता है कि वो सही है और बाक़ी सब ग़लत”

“कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक”

“वो अपनी तरफ़ से कडी-मेहनत्त करता है लेकिन उसका पूरा-फल नहीं मिलता”

“दिमाग़ वो लड़ाता है ,फ़ायदा कोई और उठा ले जाता है”

“सब के सब उसकी कामयाबी से जलते हैं”

“कोई उसका भला नहीं चाहता”….

“दोस्त-यार”…

“रिश्तेदार”….

“भाई-बहन”…..

“पड़ोसी”….

“सब् के सब् मतलबी-इंसान हैं”…

“कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं है”

“वो सब पे तरस ख़ाता है लेकिन  कोई उस पे नहीं”….

“किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है”…

या फ़िर् उसकी दुकान या मकान बाँध दिया है”
बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख के अंदाज़ा लगाओ की उस पर कौन कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे”

“बस चौखटा देखो और मार दो हथोड़ा”

“अगर तीर सही निशाने पे लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी”
“और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?”

“फिकर नाट ..वरी करी  घुमा-फिरा के दो-चार डायलॉग और मार दो बस….

“कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर” और हाँ…..

“अगर “ऊँचे-लैवल का गेम खेलना है तो  दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो “

“अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ”

“बड़े बे-रोज़गार हैं ,कोई ना कोई अपने मतलब का मिल् ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि ….

चेला रखना है गुरु नहीं”…

“कहीं अगले दिन ही वो तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बँटाधार करने की फिराक में हो”

“चौक पे बिकने वाला तोता अगर मिल जाए तो धंधे में और रौनक आ जाएगी”
“अब आप कहोगे कि वो साले!तो एकदम एक जंगली होते हैं “

“उनका क्या करोगे ?”

“तो यार वो अनाडी  हैं तो क्या हुआ  ?”

“हम तो खिलाड़ी हैं”

“बस उसको भूखा रखना है और ……

भविष्य की प्रचियों में अनाज का दाना चिपका देना है”

“पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली परची  उठाएगा और

‘बकरा’बेचारा बस यही समझेगा कि ‘मिट्ठू माहराज  ने उसका नसीब बांच दिया है”
“और उस परची के अंदर लिखा क्या होगा?” बीवी बोल पड़ी …..

“हे भागवान पूरी रामायण खत्म होने को आई और ये पूछ रही है कि …

सीता,राम की कौन थी?”

“अरी भागवान अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ…

कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर”

“हूँ !”बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी…..

सो एक दिन ऊपेरवाले का नाम लिया और जा पहुँचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया

“कोई ना कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी

“किसी को कुछ ,तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बिमारी का”

“कमाई के साथ साथ तीन पत्ती की लत भी लग चुकी थी

“एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे….

बड़ी आई थी मज़े से कि महाराज बच्चा नहीं होता है, कोई उपाय बताओ”
“अरे नहीं होता है तो कुछ ‘ओवर-टाइम’ लगाओ,

‘माल-शाल ‘खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी’डॉक्टर-शाक्टर के पास जाओ”..

“ये क्या ? की  सीधे मुँह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई”

अब यार अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से “…

“ओवर-टाइम कौन कंभखत करता फिरे ?”

लेकिन धन्धा तो धन्धा है सो ,उस बेचारी को कुछ उलटी-पूलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे…

‘काली शेरनी का दूध…..

‘जंगली भैसे का  अंडा’….

‘शतुर्मुर्ग का कलेजा’ और ना जाने क्या क्या….

मुँह उतर आया उस बेचारी क कि मैं अबला नारी ….
“कहाँ से लाऊंगी ये सब?”

मैने कहा “आप चिंता  ना करें परसों मेरा शागिर्द  नेपाल से आने वाला है
उसको को फ़ोन किए  देता हूँ ,वही सब इंतज़ाम कर देगा ….

“उसने हामी भर् दी”…

“और चारा भी क्या था उसके पास?”….

“नकद गिन के ‘पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने”…

“फिर जाने दिया उसे”

“मोटी-कमाई हो चुकी थी सो मैने अपना ‘झूल्ली बिस्तरा’संभाला और चल पड़ा घर की ओर”

“रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला”…..

“ख़ुश बहुत था मैं ,…

बस पीता गया….

पीता गया”

“कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी” …

“होश आया तो बीवी ने बताया कि …

“पूरे तीन दिन  तक टुल्ली थे आप”….

“ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन ….

कोई फ़ायदा नहीं”.
“तो क्या पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही?”

“और नहीं तो क्या?”

मैं झट से खड़ा हूया और भाग लिया सीधा दुकान की ओर…

पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि …

तीन दिन मैं पता नहीं …
कितने का नुक़सान हो गया होगा?”

कई बार तो पता नहीं कैसे मेरा तुक्का सही लगने लगा था और …

किसी किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन….

‘आठ-दस’बार शिकायतत भी आई कि ……

“माहराज आपकी तरकीब तो काम ना आई”

“कोई और जुगाड बताओ”..
ऐसे बकरों का तो मुझे बे-सबरी से इंतज़ार रहता था…

“एक ही पार्टी को दो-दो दफा शैंटी -फ्लैट करने का मज़ा ही कुछ और है”

“उसके द्वारा किए गये इलाज में कोई ना कोई कमी ज़रूर निकलता और ….

नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार”

“पुरानी कहावत भी तो है कि…..

“खरबूजा चाहे छुरी पे गिरे या फ़िर् छुरी खरबूजे पे,

कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है

अपुन का कानफीडैनस ‘टॉप-ओ-टॉप बढता ही जा रहा था कि ….

एक दिन एक ‘जाट-मोलढ’टकरा गया”….

“पूरी कहानी सुनने के बाद मैने उससे,उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर …..

दो-हज़ार माँग लिए”

वो साला जाट बावली पूंछ ,सौदे-बाज़ी  पे उतर आया

आख़िर में सौदा साढ़े चार सौ मैं पटा ……

उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी

नज़र धोती मैं बंधी नोटों की गड्डी पे जा अटकी

“लेकिन दोस्त ,अब क्या फ़ायदा?”…

“जब चिड़िया चुग गयी खेत”….

“मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब-मानुस है …..

इसे तो कम से कम बक्श ही दूं”

आख़िर ऊपेर जाने के बाद वहाँ भी तो हिसाब देना पड़ेगा”

“लेकिन ये साला तो मोटी आसामी  निकला…..

“यहीं तो मार खा गया ‘इंडिया’..”…

साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुँह से बस यही निकला  …..

“ताऊ…काम तो करवा रहे हो पूरे ढाई-हज़ार का और नोट दिखा रहे हो ट्ट्टू “

बेटा ट्ट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है?”…..

“वो तो अब मैं तुम्हे दिखाऊगा”कहते हुए उसने किसी का इशारा किया और ….
तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी .

“साले!.

“पब्लिक” का फुद्दू खींचता है”….

“अब बताएँगे तुझे…

“चल …थाने….

बड़ी “शिकायतें” मिली हैं तेरे खिलाफ़”……

“साले !…. वो “S.H.O”साहेब की ….

“Madam”थी…

जिस से तूने बारह हज़ार ठगे थे “……

“चल अब हम तुझे बताते हैं कि….

‘बच्चा’ कैसे होता है
***राजीव तनेजा ***

"घूमती है दुनिया घुमाने वाला चाहिए"

“घूमती है दुनिया घुमाने वाला चाहिए”

***राजीव तनेजा***

“आय हाय …..

“आज फ़िर् कबाड उठा लाए? बीवी ‘वी.सी.डी’ भरे लिफ़ाफे को ..

पलंग पे पटकते हुए बोली

“कुछ अकल-वक्ल भी है कि नहीं?

“अभी पिछ्ली वाली तो देखी नहीं गयी ढंग से …..

ऊपर से और उठा लाए “…

“फ्री में बंट रही थी क्या ?”

“हमेशा ‘पैसे उजाडने’ की ही सोचा करो ….

ये नहीं की कुछ ऐसा काम करो कि ….

‘नोटों की बारिश’हो .”

“उल्टे जो थोड़े-बहुत हैं उनका भी …

‘बँटाधार’ करने पे तुले हो”

बीवी जो एक बार शुरू हुई तो बिना रुके बोलती चली गयी….

“अरे यार सस्ती मिल रही थी तो मैं ले आया “

“हुँह …सस्ती मिल रही थी तो पूरी दुकान ही उठा लाए जनाब ?”

“अब तुम भी ना”..

“पता नहीं क़ब् अकल आएगी तुम्हे ?”..

“जो चीज़ देखते हो सस्ती …..

‘थोक के भाव’उठा लाते हो”….

“भले ही बाद मैं पडी पडी सड्ती फिरे ….तुम्हारी बला से.”

“अब उस दिन आलू क्या दो रुपए किलो मिल गये …..

‘पूरी बोरी’ ही लाद लाए.”

“मैं तो तंग आ चुकी हूँ….

दिन भर् ‘आलू’बनाते और खाते”…..

“यार बच्चों को पसंद है”…..

“तो क्या उन्हें भी अपनी तरह तोन्दुमल बना डालोगे?”

“कुछ तो ख़्याल किया करो अपनी सेहत का”……

“कोई फ़िक्र है ही नहीं “…..

“सब् की सब् टैंशन मेरे ही ज़िम्मे जो सौंप रखी हैं….

“ये नहीं की कोई अच्छा काम करते और …

नोट कमाने का बढिया सा जुगाड़ ढूढते ”

“ये क्या की हर वक़्त बस नोट फूँकने के तरीक़े तलाशते रेहते हो?”….

“अरे पूरी दुनिया लखपति हुए जा रही है और ….

तुम हो कि करोड्पति से लखपति पे आ गये.”…..

“अब क्या कंगाल होने का इरादा है?”

मुझसे रहा ना गया और दाँत पीसते हुए बोला…

“बडी अपने को अकलमंद समझती हो तो फ़िर्…

तुम ही कोई आईडिया क्यूं नहीं दे देती खुद ही कि….

कैसे रातों-रात लखपति बना जाए.”

“इसमें भला कौन सी बडी बात है ?” बीवी ने तपाक से उत्तर दिया….

“रेडियो’,टीवी ना देख के इन मुई फिल्मों के चक्कर मैं रातें काली करते फ़िरोगे तो यही होगा ना .”

“ना दींन-दुनिया की ख़बर ना ही किसी और चीज़ की फ़िक्र.”..

“बस खोए रहते हैं इस मुई ‘ऐश्वर्या’ के चक्कर में.”

“अरे बीस-बीस बार एक ही फिल्म देखने से गोद में नहीं आ बैठेगी.”

“तुम्हारी किस्मत मैं मैं ही लिखी हूँ बस “…..

“ख़बरदार जो किसी की तरफ़ आँख उठा के भी देखा तो….

“वहीं के वहीं खींच के बेलन मारूंगी कि सर पे पट्टी बांधे डोलते फ़िरोगे इधर उधर”

वो फ़िर् जो शुरू हुई तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी कि ….

मुझे मजबूरन बीच मैं टोकना पडा…..

“तुम तो लखपति बनने के ‘जुगाड़’ बता रही थी….

“क्या हुआ ?”

“कहाँ गया आइडिया?”

“बस निकल गई हवा ?”

“हा !… कहना कितना आसान है ….

बस मुँह खोला और झाड़ दिए दो-चार लेक्चर”…

“इसमें कौन सा टैक्स लग रहा है?”….

बीवी ग़ुस्से से मेरी तरफ़ देखती हुई बोली

“अरे बेवकूफ़ अकल लडा और ‘एस.एम.एस’भेज…..”

“एस.एम.एस’ भेज के अक्ल लडाऊं?”

“ये कौन सा तरीक़ा है लखपति बनने का ?”

“अरे बाबा रोज़ तो आ रहा होता है टीवी पे कि फलाना और ढीमका लिख के …..

फलाने -फलाने नंबर पे ‘एस.एम.एस’करो और लाखों के ईनाम पाओ “

“अब कल ही तो आ रहा था कि ‘जैकपाट’ लिखो और फलाने नंबर पे ‘एस.एम.एस’ करो …

“पता नहीं कितने लखपति बन चुके होंगे अभी तक और हम हैं कि बैठे हैँ वहीं के वहीं “

“कुछ का तो नाम भी बार-बार अनाउंस कर रहे थे और एक-दो क फोटू भी छपा देखा था अखबार में”

“पता है कितना खर्चा है एक ‘एस.एम.एस’ का?मैने ‘तिरछी नज़र’ से देखते हुए कहा……

“पूरे दस क नोट स्वाहा हो जात है एक ही बार में “

“अरे कुछ नहीं है बस ‘फुद्दू’ खींच डाल रहे हैं सरासर और …

पब्लिक है कि मानो जन्म से ही तैयार बैठी हो जैसे कि

“आओ भाईजान… आ जाओ ,तुम ही बताओ कि कहाँ माथा टेकना है ?”

“अरे घूमती है दुनिया घुमाने वाला चाहिए”

“दस-दस करके पता नहीं कितने का गेम बजा डालते है रोज़ के रोज़ ” और ….

बाँट डालते हैँ आठ-दस लाख दिखावे की खातिर”….

“इनके बाप का जाता ही क्या है आखिर?”

“बाक़ी सब् का क्या होता है?” बीवी उत्सुकता से मेरी तरफ ताकती हुई बोली

“सब् का सब् डकार जाते हैं साले खुद ही”

“लेकिन पैसा तो मोबाइल कंपनी वालों को मिलता है ….

‘रेडियो-टीवी वालों को भला इसमें क्या फ़ायदा?”

“अच्छा ? साले सब के सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैँ “…..

“मिलीभगत है सबकी “

“इस हमाम में सभी नंगे हैँ”

“टी वी वाले या फिर कोई और”

“सब मिल-बांट के खाते हैँ”

“सबका हिस्सा होता है ”

“हाँ… लेकिन एक बात की तो दाद देनी पडेगी “….

“वो भल्ला क्या?”

“होते साले बडे ही ईमानदार हैँ “

“ईमानदार ?”

“भांग तो नहीं चढ़ा रखी कहीं?…..

‘अभी-अभी तो केह रहे थे कि……

सब् साले चोर हैं और अब ये क्या बके चले जा रहे हो ?”

“किसी एक बात पे तो टिका करो ”

“अरे तो क्या ईमानदारी का ठेका सिर्फ हमने या फिर तुमने ही लिया हुआ है ?”

“ये किसने कह दिया कि चोर ईमानदार नहीं होते ?”

“पाई-पाई क हिसाब एकदम एकूरेट रखते हैँ साले “

“जिसका जितना बनता है …

बिना मांगे ही पहुँच जाता है उसके ‘खाते’ मैं .”

“और लो…..

अब तो इन मुए अखबार वालों को भी चाव चढ चुका है इस कंभखत मारी’एस.एम.एस’ नाम की बिमारी का”

“वो भी कूद पडे हैँ इस गोरख-धन्धे में”

“बस कोई बात हो या ना हो ‘एस.एम.एस के जरिए सबकी वाट लगाने को तैयार बैठे रहते हैँ हरदम”

“अब तू खुद ही बता कि एक भाई ने दूसरे को गोली मार दी तो इसमें’एस.एम.एस’भला कहाँ से आ गया?”….

“फिर भी ये साले टीवी वाले कहते हैँ कि ‘एस.एम.एस’ भेजो कि बंदा बचेगा कि नहीं ? “

“अगर बचेगा तो ‘Y’ टाईप करो और . ..

अगर लुडकेगा तो ‘N’ टाईप करो “

“अब भले ही वो बचे ना बचे लेकिन इनका तो बचत खाता खुल ही गया मलाई मार के “

“चाहे प्रोग्राम कोई रोने-धोने वाला सास-बहू टाईप हो या कोई हँसाने वाला या फिर कोई …

खबरों का सबसे ‘तेज़ चैनल’ही क्यों ना हो ,.. .

सभी के सभी लूटने में मस्त हैँ”

“इनका बस चले तो निचोड ही डालें आम आदमी को “

“थोडे से ईनाम का झुनझुना दिखा के लार टपका डालते हैँ और फिर जेब का ढीला होना तो लाज़मी ही समझो “

“अब पहले तो किसी एक बंदे को पूरे एक करोड का लालीपाप दिखाओ और बाँध डालो एग्रीमैंट के चक्कर में कि ….

ले बेटा अब तू गा और बजा आराम से पूरे साल,इंडिया का आईडल जो है तू”

“मानो इनसान ना हुआ कोई गाय-भैंस हो गयी कि पूरे एक साल तक जी भर के दुहो “

“बाप का राज़ जो है “

“लेकिन किस्मत तो जाग उठी न उसकी? मेरा भी फेवरेट है वो” बीवी कह उठी …

“चलो माना कि किस्मत जाग उठी उसकी , लेकिन किनकी जेबों की कीमत पर?”

“हमारी तुम्हारी ही जेबों पर पानी फिरा है ना?”

“पता नहीं कितनो की जेबें ढीली हुई और कितनो ने तिज़ोर्रियाँ भरी”

“इसको बताने वाला कोई नहीं”…….

“अगर कुछ बांट भी दिया तो कौन सा उनके बाप का गया?”

“चैनल की ‘टी.आर.पी’ बडी सो अलग “

“सालों ने अपनी खुद ही किस्मत बना डाली है और पब्लिक है कि …

ऊपरवाले के भरोसे बैठी है कि वो ही आएगा और उनकी किस्मत संवारेगा एक दिन “

“अरे बेवाकूफो .. कोई नही आने वाला”

“सरेआम लूट है लूट.”

“कोई ‘रोकने’ वाला नहीं”…

“कोई ‘टोकने’ वाला नहीं”

सब एक-दूसरे का फुद्दू खींच रहे हैँ “

“मैँ तो यही सोच रहा था कि सिर्फ हिन्दोस्तान में ही फुद्दू बसते हैँ लेकिन …

अब तो ये जग-जाहिर हो गया है कि पूरी दुनिया ही भरी पडी है ऐसे बावलों से “

“वो भला कैसे?” बीवी असमंजस भरी निगाहों से मेरी तरह देखते हुए बोली

“अब तुम खुद ही देखो ना…

“कुछ गिने-चुने बंदो ने दिमाग लडाया और पूरी दुनिया को ही एक झटके में शीशे में उतार डाला….

साले खुली आँखो से ऐसे काजल चुरा ले गये कि जागते हुए भी सोते ही रह गए सब के सब ”

“कोई कुछ भी उखाड नही पाया उनका”

“वो भला कैसे?”

“साले कुछ गिने-चुने नमूनो ने ‘सात अजूबों’ के नाम पे एक वैब साईट बनाई और …

पूरी दुनिया को चने के झाड पे चढा पे चढा के कहते हैं कि …

‘वोट’करो और साबित करो कि दुनिया के सात अजूबे कौन कौन से हैँ?”

“इन साले नमूनो के चक्कर में ‘एस.एम.एस’ भेज भेज के पूरी दुनिया खुद ही नमूना बन बैठी”

“पैसे तुम्हारा बाप देगा ‘एस.एम.एस’ के ?

“और तुम गवर्नर हो जो तुम्हें साबित करें?”

“आखिर तुम होते कौन हो ये सब तय करने के लिये?”

“किसने तुम्हें अधिकार दिया?”

“ना तुम ‘यू.एन.ओ’ से हो न ही किसी और ‘विश्व-व्यापी’ संस्था से “

“ये तो माना कि दूसरे की जेब से पैसा निकालना आसान नहीं लेकिन….

इन सालों ने मिल कर ऐसा फूल-प्रूफ जुगाड़ बना डाला है कि….

सब के सब मरीज़ बने बैठे हैँ इस ‘एस.एम.एस’ रूपी बिमारी के”

“जेब से नोट खिसकते जा रहे हैं लेकिन ….

किसी को कोई फिक्कर-ना-फाका”

“उलटे साले बंदे को ये खुश-फहमी और दे डालते हैँ कि …

‘ये हुआ’ तो या फिर ‘वो जीता’ तो सिर्फ और सिर्फ उसके ‘एस.एम.एस’ की वजह से

और बंदा बेचारा फूल के कुप्पा हुए जाता है कि चलो एक नेक काम तो किया “

“खाक अच्छा काम किया?”

“सरे बाज़ार कोई कपडे उतार ले गया और साहब को इल्म ही नहीं”

“उलटे खुशी से अगले ‘एस.एम.एस’ की तैयारी में जुटे दिखाई देते हैँ जनाब”

लगता था कि आज सारा का सार गुस्सा इन चोरों पर ही निकल पडेगा कि अचानक…

कॉल बेल बजी और साले सहब के चहकने की आवाज़ सुनाई दी

मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए ख़ुशी के मारे उछल् रहे थे

“लो जीजा जी मुँह मीठा करो”

मिठाई देखते ही मुँह में पानी आ गया….

टूट पडा मिठाई पर

दो-चार टुकडे मुँह में ठूसने के बाद डकार मारता हुआ बोला…

“जनाब किस खुशी में मिटाई बांटी जा रही है?”

इस पर बीवी बोल पडी …

“इतनी देर से यही तो गा रही हूँ लेकिन तुम्हारे पल्ले बात पडे तब ना “

“ईनाम निकला है मेरे भाई का “

‘एस.एम.एस’ भेजा था”

“अच्छा…”

“कितने का ईनाम निकला है ?”

“पूरे पचास हज़्ज़र का”

“ओह…ज़रा टीवी तो ओन करना “मैँ मोबाईल संभालता हुआ बोला

“क्यूँ?”…

“क्या इरादा है जनाब का?” बीवी मंद-मंद मुस्काते हुए बोली

“एस.एम.एस’ का ही इरादा होना है और भला किसका ” मैँ झेंपता हुआ बोला

"डंडा किसका है?"


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

“डंडा किसका है?”

***राजीव तनेजा***

एक बार एक सरदार जी को किसी आदमी ने ताना मारा
“ओ सरदार जी ,आपकी तो हिन्दोस्तान मैं कोई कदर ही नहीं है “.

सरदार:”ओये, क्या बकवास कर रहा है?”

आदमी:”नहीं जी मैं सच कह रहा हूँ , आपकी तो इस देश मैं कोई कदर ही नहीं है.”

सरदार:”ओये हुन्न तू फालतू बोला ना , तो मैं तेरा मुह तोड़ दूँगा.”

आदमी;”ओ जी मैं साबित कर सकता हूँ.. जी.’
सरदार:’ओये…फिर कर के तो दिखा.”

आदमी:”सरदार जी ,हिंदुस्तान के झंडे मैं तीन रंग होते हैं ना ?”
सरदार;’हाँ होते हैं… फिर?”

आदमी:”कौन…कौन से होते हैं जी?”
सरदार;”ओये…”संतरी”, “सफ़ेद” और “हरा”…फिर?”

आदमी:”संतरी” रंग तो हिंदूओ का हो गया.”
सरदार:”फिर?”

आदमी:”सफेद…रंग..तो..जैन..धर्म वालो का हो गया “
सरदार:”ओये..फिर मैं क्या करूँ?”

आदमी:”सरदार जी पेहले पूरी बात तो सुन लो.”
सरदार:”चंगा .. हुन्न बोल फटाफट.”

आदमी:”और ये जो हरा रंग है ,वो तो मुस्लिम भाइयों का हो गया.”
सरदार:”ओये फिर मैं की कराँ ?”

आदमी:”इस झंडे मैं तो आप सरदारों का तो कुछ भी नहीं है.”
सरदार:”ओये ये डंडा तेरे प्यो(बाप)दा है?”

Posted in Uncategorized. Tags: . 1 Comment »

"धोबी का कुत्ता"

“धोबी का कुत्ता”

***राजीव तनेजा***

आखिर एक दिन बीवी को मुझ गरीब पर तरस आ ही गया,दर असल हुआ ये के एक दिन उसके हुकुम के मुताबिक
पूरे घर मे मै पोछा लगा रहा था कि अचानक मेरी सास बिन बुलाये मेहमान की तरह आ धमकी
अब मुझे क्या पता था कि वो कम्भखत मारी सीधे दौड्ती चली आएगी अपनी औलाद से मिलने ………
(जॆसे बिना मिले उसकी बाजुएँ अकड गयी हो)

बस फिर क्या था जनाब उसका दौड्ते हुए आना था और सीधे बाल्टी से टकराते हुए मुझ सीकियाँ पहलवान पे गिरना था कि ….
मै लुडकता-पुडकता चारो खाने चित्त.

डाँ.को बुलाया तो शुक्र है ऊपर वाले का कि उसने मुझ बेचारे पर तरस खाते हुए बिलकुल ही हिलने-डुलने से मना कर दिया.

अब बीवी के साथ-साथ सास भी परेशान हो उठी कि …
“अब घर के सारे काम कौन करेगा?” क्योकि …
“बीवी बेचारी तो नाज़ुक कली थी सो काम कैसे करती?

जब कोई चारा समझ नही बैठा तो अनमने मन से बीवी ने नौकरानी रखने की सोची
मेरा दिल खुशी के मारे झूमने लगा क्योकि मै भी रोज़-रोज़ दाल खाते-खाते तंग आ चुका था.

क्या यार आप तो उलटा सोचने लगे, मै घर की मुरगी दाल बराबर वाली बात नही कर रहा हूँ बल्कि
सचमुच की दाल की बात कर रहा हूँ

अरे यार रोज़-रोज़ मुझे ही तो दाल बनाने पड्ती थी.
सोचने लगा कि अब नौकरानी के हाथ से तर माल पाडने का अच्छा मौका हाथ लगेगा

पास मे ही एक ‘प्लेस्-मैंट एजेंसी’ थी,वहाँ गये तो एक सुन्दर सी लडकी दिखाई दी बिलकुल अपनी …..
‘सानिया मिरज़ा’ की तरह
वोही छोटी सी स्कर्ट ….
दिल खुशी के मारे फुदकने लगा था कभी इधर तो कभी उधर कि अब तो तर माल के अलावा और भी बहुत कुछ…..

( अब बहुत कुछ का मतलब खुल कर लिखने कि ज़रूरत नही है मेरे ख्याल से सब समझदार लोग है यहाँ अपने आप समझ जाएगे )….

सीधा उसी क तरफ इशारा करता हुए मेरे मुँह से यही निकला कि “ये वाली नौकरानी चलेगी”

मेरा इतना कहना था कि तपाक से मुँह पे एक झापड पडा और आवाज़ आई……
“मै तुझे नौकरानी दिखती हूँ?”…..

“तेरे जैसे छ्त्तीस तो मेरे जूते साफ करते है”

“गधे के बच्चे मै यहाँ अपने कुत्ते के लिए नौकर ढूढने आई हूँ”

मन ही मन मै सोच रहा था कि काश मै ही इसका नौकर होता

मै सोच ही रहा था कि मैने पाया कि वो तो गायब हो चुकी है

इतने मे बीवी कि कडकती आवाज़ सुनाई दी”अब यही खडे रहोगे क्या?”
“और खबरदार एक शब्द भी मुँह से निकाला तो”

बीवी ने अन्दर जा के बात की तो उन्होने एक नौकरानी दिखाई,….

दिखाई क्या….बिलकुल जैसे तवे का उल्टा हिस्सा

ना चाहते हुए भी मुँह से निकल पडा कि….

“ये तो बिलकुल काली है” तो जवाब मिला कि……

“आपने काम ही तो करवाना है कौन सा इसे चाटना है?”

मुझ पागल से रहा नही गया और मुँह से ना चाहते हुए निकल ही पडा कि “होने को तो कुछ भी हो सकता है”

बस मेरा इतना केहना था की अब मैं आगे-आगे और …..
पीछे-पीछे “प्लेसमेंट ” वाले “लठ” “ले कर और…
उनके पीछे- पीछे मेरी बीवी..

ख़ैर् किसी तरह चकमा दे कर पिछली दीवार फान्द कर्….
जैसे तैसे मैं अन्दर् पहुँचा…
अब बीवी के ” हाथ पाँव ” जोड़े तो उसको थोड़ा तरस आया .

अगले वो किसी और “नौकरानी” को दूसरी एजेन्सी से ले आई…
वो तो पिछ्ली वाली से भी “गई-बीती” थी ….

साथ ही पत्ता चला कि प्लेसमेंट वालों ने पूरे….
5000. का फटका लगा दिया था.
कुछ “रेजिस्ट्रेशन” के नाम पे तो कुछ
तो कुछ
“कमिशन”के नाम पे…

इसके अलावा “तेल”,शैम्पू” ,कंघी ,”ब्रश”….

कलर टी.वी केबल के साथ…”,

गर्मी मैं “कूलर” और …….

हर दो महीने मैं एक “सूट’या साडी
का वादा भी ले लिया था उन् करम जलो ने

एक दो दिन् मे पता चला की उसको “काम- धाम” तो कोई ख़ास ….
आता नही था…लेकिन “नखरे” किसी “महारानी” से कम नही

टी.वी देखने का बड़ा “शौक” था उसको …बोली
मैं तो “जस्सी” की दीवानी हूँ और “सास-बहू के सीरियल तो
कभी छोड़ती नही और . …

अभिजीत सावंत ” तो मेरा भी “आइडल ” है…

पेहले ही दिन् “दूध से मलाई ग़ायब ” हो चुकी थी…
धीरे धीरे छोटे मोटे समान भी “ग़ायब” होने लगे थे लेकिन …
मैं चुप् लगा के बैठ गया क्योकि . ..

उसके जाने के बाद फ़िर् से मेरी हालत वैसे ही जो हो जाती.

उसको इशारे बहुत किए मैने पर अपनी दाल नही गली…

पता नही किस मिट्टी की बनी थी

उसका “ध्यान” पता नही कहाँ रेहता था…?

कुछ दिन् बाद पता चला कि उसकी “सेटिग” “

तो अपने पड़ोसी से हो गयी है..
(कपडे सूखने डालने के बहाने कंभखत मारी….
छत्त पे जो जाती थी बार बार…)

मुझे खुन्दक आ गयी कि “साली खाती तो हमारे घर् का है…
और गुल-छ्र्रे उड़ाती है दूसरे के साथ ..

” मैं भला क्या मॅर गया हूँ….?”..

अब काम काज वो सीख चुकी थी तो…
उसके नखरे और बढने चालू हो गये …

एक दिन बोली की “ट्रेड फेयर देखने जाउंगी”

ना चाहते हुए भी उसे “ख़र्चा पानी ” दे के भेजना पड़ा ….

रात हो गयी थी लेकिन वो वापिस नही आई ..

अगले दिन पता चला की अपने पडोसी .. का भी कुछ अता -पत्ता नही है…

बस फ़िर् क्या था अब प्लेसमेंट वालो की बारी थी बोले….

” आपने ग़ायब कर् दिया है हमारी बेटी को…”

“कोर्ट-कचहरी ” तक की नौबत आ पहुँची…

बडी मुशकिल से कुछ ले दे के पीछा छुड़ाया..
तो जान मैं जान आई….”

लगा कि सारे तीरथो के दर्शन् कर् लिए…..

अब मेरा तो वही हाल है जैसे ….
धोबी का कुत्ता …ना घर् का ना घाट का “

पहले तो कभी कभी बीवी से …….’ #@#@#@#@’ …

अब अपने मुँह से कैसे कहूँ ? ..

“मेलोडी खाओ… ख़ुद जान जाओ”…

अब उस कम्भख्त नौकरानी के चक्कर मे उसका’( @#@#@#@)’ तो
सवाल ही पैदा नहीं होता ना…

अब मैं ऊपर वाले से यही पूछता हूँ बार बार कि …

क़ब् इस ‘झाड़ू’और ‘पोछे ‘से पीछा छूटेगा?”

तो पीछे से बीवी की आवाज़ आती “कभी नही ..कभी नहीं…”

***राजीव तनेजा***