Posted on August 29, 2007 by राजीव् तनेजा
“मेरा नाम करेगा रौशन”
***राजीव तनेजा* **
“तुझे क्या सुनाऊँ ए दिल्रुरुबा…तेरे सामने मेरा हाल है”
“मेरी हालत तो छुपी नहीं है तुझसे” ….
सोच-सोच के परेशान हो उठता हूँ कि….“उसे क्या नाम दूँ?”
“क्या कह के पुकारूँ उसे?”
दिल में कंभी ये ख्याल उमडता है तो कभी वो कि…
“मैँ उसे क्या नाम दूँ?”
“उसे दोस्त कहूँ या के दुशमन?”
“उसे अच्छा कहूँ [...]
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Posted on August 28, 2007 by राजीव् तनेजा
हँसते रहो Hanste Raho: “पूरे चौदह साल”#links
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Posted on August 28, 2007 by राजीव् तनेजा
“पूरे चौदह साल”
***राजीव तनेजा***
“आज वक़्त नहीं था मेरे पास”,..“इधर-उधर भागता फिर रहा था” ,…“सारे काम मुझे ही जो संभालने थे”…
“मेहमानों का जमघट लग चुका था,…“उनकी खातिर् दारी में ही फंसा हुआ था सुबह से”
“खूब रौनक-मेला लगा था”…“बच्चे उछल कूद रहे थे”…
“मैँ कभी टैंट वाले को,तो कभी हलवाई को फोन घुमाए चला जा रहा था”..
“साले [...]
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Posted on August 27, 2007 by राजीव् तनेजा
“खेल खिलाडी का”***राजीव तनेजा***
नोट: “जंतर मंतर काली कलंतर” का दूसरा भाग लिखने की कोशिश की है,उम्मीद है कि आप सभी को पसन्द आयेगा
ज्योतिषी बनने के चक्कर में जेल की हवा खाने पडी ,
कोई खास नहीं बस तीन महीने की हुई
बोरियत का तो सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि अपने सभी यार-दोस्त तो वहाँ [...]
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Posted on August 25, 2007 by राजीव् तनेजा
“रुखसाना को नहीं छोडुंगा”
***राजीव तनेजा***
“चाहे कुछ भी हो जाए मैँ इस रुखसाना की बच्ची,दाल-दाल कच्ची को छोडने वाल नहीं”
“दो दिन में ही तारे दिखा दिए इसने तो मुझे ,कहीं का नहीं छोडा”
बडे मज़े से मेल भेजा कि “आपकी तो इतनी लंबी मेलिंग लिस्ट है ,कैसे मैनेज करते हैम ये सब ?”
“मेरा भी एक छोटा [...]
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Posted on August 24, 2007 by राजीव् तनेजा
“जन्तर मन्तर काली कलन्तर”
बडे दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे,कोई काम-धाम तो था नहीं बसकभी-कभार कमप्यूटर खोला और थोडी बहुत ‘चैट-वैट’ ही कर ली।सच पूछो तो यार ‘बेरोज़गार’था मैं और इसमेंअपनी सरकार का कोई दोष नहीं,दरअसल अपनी पूरी’जैनरेशन”ही ऐसी है।
अब कोई छोटी- मोटी नोकरी तो हम करने से रहे ।
अब यार हर किसी ऐरे-गैरे [...]
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Posted on August 24, 2007 by राजीव् तनेजा
“जन्तर-मन्तर काली कलन्तर”
***राजीव तनेजा***
बडे दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे,कोई काम-धाम तो था नहीं बस
कभी-कभार कमप्यूटर खोला और थोडी बहुत ‘चैट-वैट’ ही कर ली।
सच पूछो तो यार ‘बेरोज़गार’था मैं और इसमें
अपनी सरकार का कोई दोष नहीं,दरअसल अपनी पूरी’जैनरेशन”ही ऐसी है।
अब कोई छोटी- मोटी नोकरी तो हम करने से रहे ।
अब यार हर किसी ऐरे-गैरे [...]
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Posted on August 19, 2007 by राजीव् तनेजा
“घूमती है दुनिया घुमाने वाला चाहिए”
***राजीव तनेजा***
“आय हाय …..
“आज फ़िर् कबाड उठा लाए? बीवी ‘वी.सी.डी’ भरे लिफ़ाफे को ..
पलंग पे पटकते हुए बोली
“कुछ अकल-वक्ल भी है कि नहीं?
“अभी पिछ्ली वाली तो देखी नहीं गयी ढंग से …..
ऊपर [...]
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Posted on August 17, 2007 by राजीव् तनेजा
“डंडा किसका है?”
***राजीव तनेजा***
एक बार एक सरदार जी को किसी आदमी ने ताना मारा
“ओ सरदार जी ,आपकी तो हिन्दोस्तान मैं कोई कदर ही नहीं है “.
सरदार:”ओये, क्या बकवास कर रहा है?”
आदमी:”नहीं जी मैं सच कह रहा हूँ , आपकी तो इस देश मैं कोई कदर ही नहीं है.”
सरदार:”ओये हुन्न तू फालतू बोला ना , तो [...]
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Posted on August 4, 2007 by राजीव् तनेजा
“धोबी का कुत्ता”
***राजीव तनेजा***
आखिर एक दिन बीवी को मुझ गरीब पर तरस आ ही गया,दर असल हुआ ये के एक दिन उसके हुकुम के मुताबिकपूरे घर मे मै पोछा लगा रहा था कि अचानक मेरी सास बिन बुलाये मेहमान की तरह आ धमकीअब मुझे क्या पता था कि वो कम्भखत मारी सीधे दौड्ती चली आएगी [...]
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