“क्या मालूम कल हो ना हो?”

“राजीव तनेजा

“अजी सुनते हो ॰॰॰

चुप कराओ अपने इस “लाडले” को ॰॰॰
रो-रो के ‘बुरा’ हाल करे बैठा है ॰॰॰
चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा ॰॰॰
लाख कोशिशे कर ली पर ना जानें ॰॰॰
आज कौन सा “भूत” सवार हुए बैठा है कि ॰॰॰
उतरने का ‘नाम ही नहीं ले रहा’ ” “अब क्या हुआ ? ॰॰॰
सीधी तरह बताती क्यों नहीं?”
“जिद्द पे अड़े बैठे है ‘जनाब’ कि ॰॰॰
‘चोकलेट’ लेनी है ॰॰॰
और वही लेनी है जिसका ‘ऐड’ बार-बार ‘टीवी’ पे आ रहा है”

“तो दिलवा क्यों नहीं दी?”
“अरे मैने कब ‘ना’ करी है? ॰॰॰
कईं बार तो भेज चुकी हूँ ॰॰॰
‘शम्भू’ को ‘बाजार’ ॰॰॰
खाली हाथ लौट आया हर बार”

“साले के भाव बढ़े हुवे हैं आजकल ॰॰॰

बैठ गया होगा कहीं ‘पत्ते’ खेलने ॰॰॰॰
घड़ी-घड़ी ‘ड्रामा’ करता है ॰॰॰
साला ‘नौटंकी कहीं का”

“अब नहीं मिली तो मैं क्या करुं?”
“‘चोकलेट’ नहीं मिली? ॰॰॰
अब तुम भी ना इतनी ‘भोली’ हो कि
कोई भी बस मिनट भर में ॰॰॰
कभी तो अक्ल से काम लिया करो”
“तो क्या मैं ‘झूठ’ बोल रही हूँ?”

“मैने ऐसा कब कहा?”
“मतलब तो यही है तुम्हारा ॰॰॰
अरे ॰॰॰॰ ‘सगी माँ हूँ’ हम कोई ‘सौतेली’ नहीं कि ॰॰॰
अपने ही बेटे की ‘खूशीयों’ का ख्याल ना रखुँ”"

‘शर्मा’ की दूकान पे जाना था न”

“अरे ‘शर्मा’ क्या? और

‘वर्मा’ क्या? ॰॰॰ सब जगह धक्के खा आई ॰॰॰
पर ना जाने क्या हुआ है ॰॰॰
इस मुई ‘चोकलेट’ को? ॰॰॰
जहाँ जाती हूँ पता चलता है कि ॰॰॰
‘माल’ खत्म ॰॰॰
अब अपने बस की बात नहीं है ॰॰॰
आप ही काबु करो अपने इस ‘नमुने’ को”
“माल खत्म?”
मेरे चेहरे पे ‘हेरत’ का भाव था
“कहीं वो मुऐ ‘चोकलेट’ फ़िल्म वाले ही तो नहीं उठा ले गये सब?॰॰॰
आजकल ‘पब्लिसिटी’ के चक्कर में॰॰॰
पता नहीं क्या-क्या ‘पापड़’ बेलते रहते है॰॰॰”
मैनें हँसते हुए कहा ॰॰॰॰

“अरे नहीं बाबा॰॰॰
बस नाम ही है फ़िल्म का ‘चोकलेट’
बाकि पूरी फ़िल्म में॰॰॰
‘चोकलेट’ का नामो-निशान भी नहीं है॰॰॰
अगर ‘विश्वास’ नहीं हो रहा है तो
खुद ही तस्सली कर लो अपनी”
“बाज़ार क्यों नहीं हो आते आप ? ॰॰॰
थोड़ी ‘वर्जिस’ भी हो जाएगी इसी बहाने ॰॰॰
खाली बैठे-बैठे वैसे भी कौन सा ‘तीर’ मार रहर हो?”

बीवी की बात ‘मानते’ हुए चल पड़ा ‘बाज़ार’ ॰॰॰
हैरानी की बात यह कि जहाँ-जहाँ गया॰॰॰
हर जगह सबकुछ मौजूद लेकिन॰॰॰
‘चोकलेट’ नदारद”
पता नहीं ऐसे कौन से ॰॰॰॰
पर लगे थे इसमें कि॰॰॰
पूरी ‘दिल्ली’ बावली हो उठी॰॰॰
इस ‘चोकलेट’ के ‘चक्कर’ में” मेरे मुह से निकला ही था कि
कहीं से आवाज आई

“दिल्ली?॰॰॰
अरे बाबूजी पूरे ‘हिन्दोस्तान’ की बार करो॰॰॰
पूरे ‘हिन्दोस्तान’ की॰॰॰
‘बिहार’ क्या॰॰॰
यूपी क्या॰॰॰
दिल्ली क्या॰॰॰
मुम्बई और कलकत्ता क्या॰॰॰

हर जगह से ‘माल’ गायब॰॰॰
सुना है अब तो ‘ब्लैक’ में भी नहीं मिल रही॰॰॰
कोई तो यह भी कह रहा था कि॰॰॰
‘पड़ोसी मुल्क में भी इसके दिवाने पैदा हो चले हैं अब तो”

“कहीं वहीं तो नहीं ‘स्पलाई’ गया
‘सब का सब’?”
बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी कि आखिर
हुआ क्या है?॰॰॰
माज़रा क्या है?॰॰॰

कईं-कईं तो ‘खाली हाथ’॰॰॰
बैरंग लौट गये॰॰॰
‘आठ-आठ’ घंटे लाईन में लगने के बाद॰॰॰
जब तक नम्बर आया तब तक॰॰॰
‘झाड़ु फिर चुका था ‘माल’ पे वही आवाज फिर सुनाई दी
“अरे ‘चोकलेट’ ना हुई ‘अफिम’ की गोली हो गई”

“आज की तारीख में ‘अफिम’ से कम भी नहीं है”
“पता नहीं क्या धरा है इस कम्बखत मारी में?”
मेरे मुह से निकला ही था कि
किसी ने कमेंट पास कर दिया -
“बंदर क्या जाने ‘अदरक’ का स्वाद”

अब अगर सचमुच में कुछ ॰॰॰
तनिक सा भी मालुम होता तो
‘मुह तोड़’ जवाब देता ॰॰॰
‘उत्सुकता’ बढ़ती जा रही थी लेकिन
कुछ समझ नहीं आ रहा था कि

आखिर चक्कर क्या है?,
यह चक्कर मुझे घनचक्कर बनाये जा रहा था,
“क्यों दिवाने हो चले हैं सब के सब?”
‘जितने मुँह उतनी बातें’ सुनने को मिल रही थी,
कोई कह रहा था कि इससे

‘डायबिटिज’ गायब हो जाती है कुछ ही हफ्तों में,
किसी को कहते सुना कि इससे ‘मर्दानगी’ बढ़ती है,
सबकुछ नया-नया सा लगने लगता है,
तो कोई कह रहा था कि ‘याद्दाश्त’ भी तेज होती है
इससे, ‘एक्ज़ामस्’ में अच्छे नम्बर आते है,
“बंदा बिमार नहीं पड़ता”
और पता नहीं क्या-क्या

‘सौ बतों की एक बात कि
‘चीज़ एक लेकिन फ़ायदे अनेक’

ना पहले कभी ‘सुना’ था,
ना कभी ‘जाना’ था
अब पता नहीं क्या ‘सच’ है और
क्या ‘झुठ’ -

“भाई मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा”
“अब आप भले ही ‘मानो या ना मानो’
बाकि सब बावले थोड़े ही है,
जो ‘आँखे मुंदे’ विश्वास करते चले गये”

“कुछ ‘थोड़ा-बहुत’ तो ‘सच’ होगा जरूर”

“अरे कुछ क्या?
‘सोलह आने सही बात’ है,
खुद ‘आजमाई’ हुई है ॰॰॰ एक आवाज सुनाई दी,

सब की ‘मुंडी’ उधर ही घूम गई,
देखा तो एक ‘सज्जन’ बड़े ही मजे से ‘सीना’ ताने खड़े थे -
“हाथ कंगन को आरसी क्या? और
पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या?”
“साबित कर सकता हूँ” ॰॰॰
वो झोले की तरफ इशारा करते हुए बोले
“हाँ अभी तो मौजुद नहीं है मेरे पास लेकिन
उसका खाली ‘व्रेपर’ ज़रूर है मेरे पास
अगर उसी भर से दिवाने ना हो गये तो
मेरा नाम भी ‘झुनझुनवाला’ नहीं”

बस उसका ‘झोले’ से ‘व्रेपर’ निकालना था कि
सब टूट पड़े,
‘छीना-छपटी’ में
‘व्रेपर’ के तो ‘चिथड़े-चिथड़े’ हो गये।
मेरी किस्मत अच्छी थी कि सबसे बड़ा टूकड़ा मेरे ही हाथ लगा।
देखते ही दंग रह गया,

सचमुच में ‘तारीफ़ के काबिल’,
जिसे मिल जाये उसकी तो सारी ‘तकलिफ़े’

सारे ‘दुःख-दर्द’,
सब मिनट भर में ‘गायब’,
स्वाद ऐसा कि कुछ याद ना रहे,
चारों तरफ़ खुशियाँ ही खुशियाँ।
‘वाह ॰॰॰ क्या ‘चोकलेट थी ॰॰॰

वाह वाह’
खाली ‘व्रेपर’ से भी ‘खूशबू के झोंके’
हवा को ‘खुशनुमा’ किये जा रहे थे।

अब यार क्या सोच रहे हैं आप?
थोड़ा नीचे जाओ और खुद भी दर्शन कर ही डालो
इस ‘चोकलेट’ के

क्या मालूम -कल हो ना हो…….


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