“पहला शेर”
January 30, 2008“पहला शेर”
***राजीव तनेजा***
कह दे आँखों से वो सब जॉना
जो ये खामोश लब न कह सकें
मुझ बेज़ुबान की ज़ुबाँ बन
बयाँ करना इन्हें खूब आता है
***राजीव तनेजा***
“पहला शेर”
***राजीव तनेजा***
कह दे आँखों से वो सब जॉना
जो ये खामोश लब न कह सकें
मुझ बेज़ुबान की ज़ुबाँ बन
बयाँ करना इन्हें खूब आता है
***राजीव तनेजा***
“मैडम जी..कहाँ थी आप?”
***राजीव तनेजा***
“अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव?”
“मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके”…
“हाँ!..उन्हीं के”….
“जिनकी वजह से तो आज मेरा ये हाल है”…
“आज अगर मेरा काम-धन्धा…मेरा घरबार…
सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण”
“दोराहे पे खडा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?”…
“इस ओर…या फिर उस ओर”…
“जाऊँ तो जाऊँ कहाँ…बता है दिल…कहाँ है मेरी मंज़िल?”
“कौन ऐसा नहीं होगा जो…मेरा मज़ाक…
मेरी खिल्ली नहीं उडाएगा?”….
“सब के सब यही कहेंगे कि बडा अपना ‘टीन-टब्बर’ सब उखाड ले गया था पानीपत कि..
अब तो वहीं सैट होना है”…
“वही मेरी कॉशी…वही मेरा मक्का”
“आ गए मज़े?”…
“ले लिए वडेवें?”…
“हर जगह अपनी ही चलाता था”…
“अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है?”जैसे ताने बारम्बार मेरे कानों के पर्दों को बेंध ना डालेंगे?”
“उनका भी क्या कसूर?”
“मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बडे-बडॆ दावे करता था कि…
‘मेरी दिल्ली मेरी शान’…
‘दिल्ली पैरिस बन के रहेगी’…
“माँ दा सिरर बन्न के रहेगी”…
“ढेढ साल में तो कुछ हुआ नहीं”….
“अब वैसे भी वक्त ही कितना बचा है मैडम जी के पास?”
“खेल सर पे तैयार खडे हैँ होने को और मैडम जी अभी ‘फ्लाईओवर’ भी पूरे नहीं बनवा पाई हैँ”…
“पिछले ढेढ साल में और अब में कितना फर्क पड गया है?”…
“टट्टू जितना भी नहीं”
“दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन …
हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ”…
“वही आँखे मूंद!..बेतरतीब दौडती भीड”….
“वही हमेशा!..दुर्घटनाएँ करती बेलगाम ब्लू लाईन बसें”….
“वही उनकी!..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग”…
“वही उनकी!..लफूंडरछाप दादागिरी”…
“कुछ भी तो नहीं बदला है”
“वही सरे आम!..अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले”…
“वही केंचुए की चाल!..रेंगता ट्रैफिक”
“वही बिजली के!..लम्बे-लम्बे कट”..
और वही जम्बो जैट के माफिक!..बिजली के तेज़ दौडते मीटर”
“कुछ बदला भी है कहीं?”…
“हाँ!..बदला है अगर कुछ…तो वो है आम आदमी का मायूस चेहरा”…
“हाँ!..मायूस कहना ही सही रहेगा”…
“इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरे के पीछे ज़रा ठीक से झांक कर तो देखो मैडम जी”
“कैसे मर-मर जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये”
“लेकिन पराई पीड आप क्या जानो?”…
“आपका क्या है?”..
“कौन सा आपको भाग कर बस या गाडी पकडनी है?”…
“कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?”…
“कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोडा बजाया जा रहा है?”
“कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को ‘सील’लग रही है?”…
“दिल्ली ‘पैरिस’ बने ना बने लेकिन इतना तो सच है …कि आपके घर ….
ऊप्स!…घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?”…
“सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ”…
“आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ”…
“हैँ ना!…?”…
“आपके बँगले बनेंगे…ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर”..
“यही सच है ना?”…
“पैरिस क्या…फ्राँस क्या…और लंदन क्या…
दुनिया के हर देश…हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे”
“और!…वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर”
“हाँ!…हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर”मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था
“पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया”..
“सालों साल एडियाँ रगड-रगड कर अपना रोज़गार जमाया”…
“जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि…
“चलो!..भागो यहाँ से”…
“टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर”..
“धब्बा हो दिल्ली की शान में”
“सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ”…
“तोड देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान”…
“नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने”…
“अरे!…काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?”..
“पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने”
“पता भी है तुम्हें कि कितने सालों से?”…
“क्या-क्या जतन करके…कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा और…
अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है…या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है”…
“हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?”
“हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है”
“चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है…
माने सरकारी ज़मीन लेकिन…
तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैस ए ले-ले यहाँ खेतों में धडाधड कलोनियाँ बसाई जा रही थी?”
“तब क्यों नहीं रोका था हमें?”
“तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?”
“वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे”मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला
“उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर ‘शटर’ के हिसाब से…
नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि…
“हाँ!…दल दो हमारे सीने पे दाल”..
“हम पत्थर दिल हैँ”…
“हमें कोई फर्क नहीं पडता”..
“ठीक उनके दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने”…
“कोई रोकने वाला…कोई टोकने वाला नहीं था…
नोटों भरा जूता जो मार चुका था पहले ही” ..
“ये तो बाद में पता चला कि सालों ने पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला सीने में”…
“सालों!..को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी”
“सो!…बेदाग बचाने को सारी कसरतें की जा रही थी”…
“ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना”…
“बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही”..
“वाह!…क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने”…
“जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही”
“कहने को तो जनता के सेवक हैँ”…
“सेवा करना इनका धर्म है…तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी”..
“अजी छोडो ये सब!…काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?”…
“सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे”
“लानत है ऐसे जीवन पर”…
“इनकी सेवा भी करो और इनका पानी भी भरो”
“मैडम जी!…आपका डिपार्टमैंट कहता है कि सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ”..
“अरे!…पहले ठीक से घर-घर पहुँचाओ तो सही इसे”…
“फिर हम ना पिएँ तो कहना”
“वैसे एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची?”
“आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?”….
“कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?”
“है ना?”…
“इसका मटमैला रंग देख तो उबकाई भी आने से मना कर देती है”..
“ठीक है!…माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ….
नहाने के लिए भी और *&ं%$# के लिए भी”…
“किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ”…
“अल्सेशियन जो ठहरे”
“अरे!…हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप”
“प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि…
ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें”
“तब कहाँ गई थी मैडम जी आप?”
“जब पुलिस वाले बीट आफिसर बारम्बार मोटर साईकिल पे चक्कर काट काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और…
बाद में चौकी इंचार्ज को भेज दिया था कि जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा”..
“हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली”
“आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो…
आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?”
“क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?”
“कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?”
“क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की…हमें नहीं?”
“क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ…हमारी नहीं?”
“अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया…ध्वस्त कर दिया लेकिन…
क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?”
“उचित समझा?”
“नहीं ना!…?…
“किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव …जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है”
“रेत के ढेर पे तुम भी खडे हो और हम भी पडे हैँ”…
“ना तुम सही हो…ना हम ही सही हैँ”
“अरे!..हमारा दिल देखो….हमारा जिगरा देखो”…
“आपने हथोडा बजाया”…
“कोई बात नहीं”…
आपने सील लगाई”…
“कोई बात नहीं”
“लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि…
अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो
कम से कम आपके वहाँ से हथोडी की महीन सी …बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि ..
कानून सबके वास्ते एक है”…
“हम चुपचाप संतोष कर अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि…
“कोई छोटा…कोई बडा नहीं है कानून की नज़र में”
“वो सबको एक आँख से देखता है”
“लेकिन अफ्सोस!…जो हुआ…जैसा हुआ…
उस से तो लगता है कि इससे तो अच्छा था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती”…
“यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता वो”..
“कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ”..
“अगर ये भ्रम मात्र है हमारा तो प्लीज़…इसे भ्रम ही रहने दें”
“करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ…जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है”
“तब कहाँ चली जाती हैँ मैडम जी आप?…
जब चौक पे खडे हो ड्यूटी बजाने के बजाए आपके ट्रैफिक हवलदार झाडियों के पीछे छुप…
पहले तो आम आदमी को कानून तोडने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर…
चालान से सरकारी खजाना भरने से पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ”…
“ठीक है!…माना कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के…कोई सीधे-सीधे दे के राज़ी नहीं है लेकिन…
ये कहाँ का इंसाफ है कि सीधे तरीके से जब घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?”
“चालान तो आपने वही रखा सौ रुपए का ही लेकिन…टैक्स के नाम पर पाँच सौ का फटका अलग से लगा दिया”…
“वाह री शीला!…देख लिया तेरा इंसाफ”
“ज़ोर का झटका…सचमुच बडी ज़ोर से लगा दिया ना?”…
“आप कहती हैँ कि इससे तो गाडे-घोडे वालों को ही फर्क पडेगा…आम आदमी को नहीं”…
“ये तो बताओ मैडम जी कि ये फालतू का खर्चा कहाँ से ओटेंगे वो बेचारे?”
“किराए बढा दिए जाएँगे…आटा…दाल-चावल…कपडा-लत्ता सब मँहगा हो जाएगा”
“कुछ खबर भी है आपको?”
“एक तो पहले से ही बढे हुए कम्पीटीशन से कमाई में कमी…
ऊपर से सीलिंग और मँहगाई की मार”…
“वाह मैडम जी…देखा तेरा पलटवार”
“अरे!…अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें…उनके बैंक एकाउंट…
उनके बँगले…उनकी जायदादें आदि…सब खंगाल मारो”…
“गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या…चौगुना क्या और सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा”
“क्यों ठिठक के रुक क्यों गयी आप?”…
“अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा होगा?”
“ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौ तरफी मार मारें आप?”
“एक तरफ सीलिंग का डंडा”…
“मँहगाई की मार”.. .
“हर समय घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर”
“आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ”…
“आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन…
फिर भी आम जनता बसों में बाहर तक लटकी क्योँ नज़र आ रही है?”
“आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन…
फिर भी छोटे अनाअथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड से क्योँ अटे पडे हैँ?…क्योँ भरे पडे हैँ?”..
“आप कहती हैँ कि सडकों की लम्बाई-चौडाई बढ रही है लेकिन…
फिर भी रेहडी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खडे हैँ?”
“आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन…
फिर भी सडको से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?”
“कहने को…लिखने…बहुत कुछ है बाकी है ए राजीव लेकिन…
बोल बोल के…सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने…
मेरा साथ छोड नींद का दामन थामने का ऐलान कर दिया है …
सो बाकी की अगली बार उगल देंगे”….
“फिलहाल चलता हूँ….लौट के जल्दी ही मिलता हूँ”…
“जय हिन्द”…
“मेरी दिल्ली मेरी शान”
***राजीव तनेजा***
“ये बस में नहीं है मेरे बात”
***राजीव तनेजा***
मैं तेरा साथ निभा सकूं,
ये बस में नहीं है मेरे बात ।
हमारे रास्ते हैं जुदा जुदा ,
ना मैं चल सकूंगा तेरे साथ।
फिर भी दिल की ये आरज़ू है कि ,
कभी तुम को अपना बना सकें।
काश ये तमन्ना हो पूरी,
तम्हें सदके दिल के अपना सकें।
तेरे सहारे कुछ गुज़ारें वक्त ,
कहें दिल की बातें बेधडक ।
कोई डर हो ना हो खौफ,
खुला आशियां हो और हो फलक।
ऊंची हमारी उडान हो,
चाँद को छू कर देख लें ।
मरने से पहले एक दफा ,
जीने का मतलब सीख लें ।
मर के भी ये एहसास हो
के तुम मेरे पास हो।
मंज़िल को पाने का मज़ा ही क्या?,
जो हमसफर ना साथ हो।
लेकिन………
तेरा साथ मैं निभा सकूं
ये बस में नहीं है मेरे बात
उल्फत -ऐ॒ मोहब्बत का क्या पता?
टूट जाए तुम्हें पाने के बाद
“बडा दिन”
***राजीव तनेजा***
“बात पिछले साल की है….चार दिन थे अभी त्योहार आने में…
मैँ मोबाईल से दनादन ‘एस.एम.एस’किए जा रहा था”
“क्रिसमस का त्योहार जो सिर पर था लेकिन ये ‘एस.एम.एस’ मैँ..
अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था”
“ये तो मैँ उन रेडियो वालों को भेज रहा था जो…
‘साँवरिया’ और ‘ओम शांति ओम’ के गानों के बीच-बीच में अपनी टाँग अडाते हुए बार-बार ..
फलाने व ढीमके नम्बर पे ‘एस.एम.एस’ करने की गुजारिश कर रहे थे कि…
फलाने-फलाने नम्बर पे ‘जैकपॉट’लिख के ‘एस.एम.एस’ करो तो…
‘साँता’आपके घर-द्वार आ सकता है ढेर सारे ईनामात लेकर”

“सो!…मैने भी चाँस लेने की सोची कि यहाँ दिल वालों की दिल्ली में लॉटरी तो बैन है ही …
तो चलो ‘एस.एम.एस’ ही सही”…
“क्या फर्क पडता है?”
“बात तो एक ही है”…
“एक साक्षात जुआ है तो दूसरा मुखौटा ओडे उसी के पद-चिन्हों पे खुलेआम चलता हुआ उसी का कोई भाई-भतीजा”
“साले!…यहाँ भी रिश्तेदारी निभाने लगे”
“सो!…अपुन भी किए जा रहे थे ‘एस.एम.एस’ पे ‘एस.एम.एस’कि….
जब खुद ऊपरवाला आ के छप्पर फाड रहा है अपने तम्बू का और…
बम्बू समेत ही हमें ले चल रहा है शानदार-मालादार भविष्य की तरफ कि…
“लै पुत्तरर !..कर लै हुण मौजाँ ही मौज़ाँ”
“हो जाण गे हुण तेरे वारे-न्यारे”
“अब ये कोई ज़रूरी नहीं कि हमेशा तीर ही लगें निशाने पे”…
“तुक्के भी तो लग ही जाया करते हैँ निशाने पे कभी-कभार”…
“कोई हैरानी की बात नहीं है इसमें जो इस कदर कौतुहल भरा चौखटा लिए मेरी तरफ ताके चले जा रहे हैँ आप”
“क्या किस्मत के धनी सिर्फ आप ही हो सकते हैँ?”
“मैँ नहीं”…
“उसके घर देर है …अन्धेर नहीं”…
“कुछ तो उसकी बे-आवाज़ लाठी से डरो”
“अब यूँ समझ लो कि अपुन को तो पूरा का पूरा सोलह ऑने यकीन ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास हो चला है कि…
अपनी बरसों से जंग खाई किस्मत का दरवाज़ा…
अब खुला कि….अब खुला”
“दिन में पच्चीस-पच्चीस दफा कलैंडर की तरफ ताकता कि अब कितने दिन बचे हैँ पच्चीस तारीख आने में”
“पच्चीस तारीख!…?”..
“अरे!…बुरबक्क…लगा दी ना टोक”
“हाँ!…पच्चीस तारीख”
“कितनी बार कहा है कि यूँ सुबह-सुबह किसी के शुभ काम में अढंगा मत लगाया करो लेकिन…
तुम्हें अक्ल आए तब ना”
“पच्चीस बार पहले ही बता चुका हूँ कि पच्चीस दिसम्बर को ही तो मनाया जाता है ‘बडा दिन’ दुनिया भर में”…
और आप हैँ कि हर बार इसे ‘बडा खाना’ समझ लार टपकाने लगते हैँ”
“पेटू इंसान कहीं के “…
“बडा खाना तो होता है फौज में लेकिन तुम क्या जानो ये फौज-वौज के बारे में”…
“कभी राईफल हाथ में पकड के भी देखी है या माउज़र चला के देखा है कभी?”
“छोडो!…अब ये तुम्हारे लडकियों की नाज़ुक कलाईयाँ को थामने को बेताब हाथ क्या राईफल-शाईफल पकडेंगे?”
“यू!..बेवाकूफ ‘सिविलियन’…”
“इन मेनकाओं का मोह त्याग …देश की फिक्र करो बन्धुवर…देश की”
“हाँ!..तो मैँ कह रहा था कि जैसे-जैसे पच्चीस तारीख नज़दीक आती जा रही थी…
मेरी ‘एस.एम.एस’करने की स्पीड में भी तेज़ी से इज़ाफा होता जा रहा था”…
“कई हज़ार के तो मैँ रिचार्ज करवा चुका था अभी तक “
“पुराना चावल जो ठहरा”
“मालुम जो था कि जितने ज़्यादा ‘एस.एम.एस’…उतना ही ज़्यादा चाँस जीतने का”
“सो!…भेजे जा रहा था धडाधड ‘एस.एम.एस’ पे ‘एस.एम.एस’”
“अब तो मोबाईल में भी बैलैंस कम हो चला था लेकिन फिक्र किस कम्भखत को थी?”
“लेकिन सच कहूँ तो थोडी टैंशन तो थी ही कि सब यार-दोस्त तो पहले से ही बिदके पडे हैँ अपुन से “…
“फाईनैंस का इंतज़ाम कैसे होगा?”.. .
“कहाँ से होगा?”
“ऐसे आडॆ वक्त पे अपने ‘जीत बाबू’की याद आ गयी”
“बडे सज्जन टाईप के इंसान हैँ”…
“किसी को न नहीं कहा आज तक”
“भले ही कितनी भी तंगी चल रही हो लेकिन कोई उनके द्वार से खाली नहीं गया कभी”
“किसी पराए का दुख तक नहीं देखा जाता उनसे”
“नाज़ुक दिल के जो ठहरे”
“जो आया…जब आया…हमेशा सेवा को तत्पर”
“इतने दयालु कि कोई गारैंटी भी नहीं माँगते”
“बस तसल्ली के लिए घर,दुकान,प्लाट या गाडी-घोडे के कागज़ात भर रख लेते हैँ अपने पास “
“वैसे औरों से तो दस टका लेते है मंथली का लेकिन…
अपुन जैसे पर्मानैंट कस्टमरज़ के लिए विशेष डिस्काउंट दे देते हैँ”
“बस बदले में उनके छोटे-मोटे काम करने पड जाते हैँ जैसे…
भैंसो को चारा डालना….
उनके ‘टोमी’ को सुबह-शाम गली-मोहल्ले में घुमा लाना”
“काम का काम हो जाता है और सैर की सैर”
“इसी बहाने अपुन का भी वॉक-शॉक हो जाता है”…
“वैसे इस बेफाल्तु से काम के लिए अपने पास अपने लिए भी टाईम कहाँ है?”
“ये तो बाबा रामदेव जी के सोनीपत वाले शिविर में उन्हें कहते सुना था कि…
सुबह-सुबह चलना सेहत के लिए फायदेमन्द है”
“फायदे की बात और वो मै ना मानूँ? …
“ऐसा हरजाई नहीं”
“ऐसी गुस्ताखी करने की मैं सोच भी कैसे सकता था?”
“सो!..अपुन ने भी सोच-समझ के अँगूठा टिकाया और…
अपने जीत बाबू से पाँच ट्के ब्याज पे पैसा उठा धडाधड झोँक दिया इस ‘एस.एम.एस’ की आँधी में”
“अब दिल की धडकनें दिन प्रतिदिन तेज़ होने लगी ठीक कि …
क्या होगा?…
“कैसे सँभाल पाउँगा इतनी दौलत को?”
“कभी देखा जो नहीं था ना ढेर सारा पैसा एक साथ”
“क्या-क्या खरीदूँगा?”…
“क्या-क्या करूँगा?”जैसे सैंकडो सवाल मन में उमड रहे थे”
“मैँ अकेली जान!..कैसे मैनेज करूँगा सब का सब?”
“हाँ!..अकेली ही कहना ठीक रहेगा”…
“बीवी को तो कब का छोड चुका था मैँ”
“वैसे!..अगर ईमानदारी से सच कहूँ तो उसी ने मुझे छोडा था”
“अब पछताती होगी “…
“उस बावली को मेरे सारे काम ही जो फाल्तू के लगते थे”..
“हमेशा पीछे पडी रहती थी के बचत करो…बचत करो”…
“कोई काम नहीं आया है और ना कोई आएगा”…
“काम आएगा तो सिर्फ गाँठ में बन्धा पैसा ही”
“दोस्त-यार…रिश्तेदार सब बेकार का…
फालतू का जमघट है”…
“बच के रहो इनसे”
“उस बावली को क्या पता कि ज़िन्दगी कैसे जिया करते हैँ”..
“उसे तो बस यही फिक्र पडी रहती हमेशा कि…
‘फीस का इंतज़ाम हुआ बच्चों की?’…
‘ये नैट कटवा क्यूँ नहीं देते?’…
‘कार साफ करने वाला पैसे माँग रहा था’…
‘गाडी की किश्त जमा करवा दी?’
“वो बोल-बोल के परेशान हुए रहती थी बे-फाल्तू में ही”
“शायद!…इसी चक्कर में दुबली भी बहुत हो गई थी”
“अरे!…अगर फीस नहीं भरी तो कौन सा आफत आ जाएगी?”…
“ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे?”…
“नाम ही काट देंगे ना?”
“तो काट दें साले!…”…
“कौन रोकता है?”…
“सरकारी स्कूल बगल में ही तो है”…
“एक तो फीस भी कम…
“ऊपर से पैदल का रास्ता”…
“बचत ही बचत”…
“उल्टा!..जो पैसे बच जाएंगे…
तो उनसे कार की किश्त भी टाईम पे भर दी जाएगी”
“वैरी सिम्पल”
“ये आना-जाना तो चलता ही रहता है”
“कभी इस स्कूल तो कभी उस स्कूल”
“कहती थी कि नैट कटवा दूँ”…
“हुँह!..बडी आई नैट कटवाने वाली”…
“इतनी जो फैन मेल बनाई है दो बरस में…
सब!..छू मंतर नहीं हो जाएगी?”
“गुरू!..यहाँ तो चढते सूरज को सलाम है”…
“दिखते रहोगे तो बिकते रहोगे”…
“दिखना बन्द तो समझो बिकना भी बन्द”
“बैठे रहो आराम से”
“फैनज़ का क्या है?”…
“आज हैँ…कल नहीं”…
“आज शाहरुख के कर रहे हैँ तो कल रितिक के पोस्टर रौशन करेंगे लडकियों के बैडरूम”
“टिकाऊ नहीं होती है ये प्रसिद्धी-वर्सिद्धी “…
“बडे जतन से संभाला जाता है इसे”
“अपने!..’कुमार गौरव’का हाल तो मालुम ही है ना?”
“वन फिल्म वण्डर”
“एक फिल्म से ही सर आँखों पे बिठा लिया था पब्लिक ने और…
अगले ही दिन दूजी फिल्म पे उसी दिवानी पब्लिक ने ज़मी पे भी ला पटका था”
“टाईम का कुछ पता नहीं”…
“आज अच्छा है”….
“कल का मालुम नहीं”….
“रहे…रहे”…
“ना रहे …ना रहे”
“क्या यार!…यहाँ तो पहले ही टैंशन है इतना कि मोबाईल में बैलैंस बचा पडा है और…
दिन जो हैँ वो प्रतिदिन कम होते जा रहे हैँ”
“कैसे भेज पाउंगा सारे पैसे के ‘एस.एम.एस’?”
“अब ये सब सोच-सोच के मैँ सोच में डूबा हुआ ही था कि घंटी बजी और लगा कि…
जैसे मेरे सभी सतरंगी सपनों के सच होने का वक्त आ गया”
“मेरे बारे में मालुमात किया उन्होंने ….
पूछने पे पता चला कि रेडियो वाले ही थे और मेरा नम्बर उन्होंने सलैक्ट कर लिया है बम्पर ईनाम के लिए “
“बाँछे खिल उठी मेरी”…
“इंतज़ार की घडियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी”
“प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा था लेकिन पानी पीने का होश और फुरसत किसे थी?”
डर जो था कि कहीं ‘साँता जी’ गल्ती से ही किसी और के घर ना जा घुसें”…
“खास कर के बाजू वाले शर्मा जी के यहाँ”…
“साले!…दोगले किस्म के इंसान”..
“सामने कुछ और…पीठ पीछे कुछ”
“ऊपर-ऊपर से तो बेटा-बेटा करते रहते थे और अन्दर ही अन्दर मेरी ही बीवी पे नज़र रखते थे”
“बडा समझाते रहते थे मुझे दिन भर कि …
“बेटा ऐसे नहीं करो…वैसे नहीं करो”
“अरे!…मेरा घर …मेरी बीवी…
मेरी मरज़ी जो जी में आए करूँ”
“तुम होते कौन हो बीच में अडंगी लगाने वाले?”
“कहीं!…बीवी ही तो नहीं सिखा के गई उन्हें ये सब?”
“क्या पता!..पीठ पीछे क्या-क्या गुल खिलते रहे हैं यहाँ?”
“ये सब सोच-सोच के मैँ परेशान हो ही रहा था कि साँता जी आ पहुँचे”…
“उनका ओज से भरा चेहरा देख ही मेरे सभी दुख ….सभी चिंताएँ हवा हो गई”
“लम्बा तगडा कसरती बदन”…
“सुर्ख लाल दमकता चेहरा”…
“झक लाल कपडे”..
“उन्होंने बडे ही प्यार से सर पे हाथ फिराया”…
“मस्तक को प्यार से चूमा”
“चेहरा ओज से परिपूर्ण था “
“नज़रें मिली तो मैँ टकटकी लगाए एकटक देखता रह गया”
“आँखे चौंधिया सी रही थी”…
“सो!…ज़्यादा देर तक देख नहीं पाया मैँ”
“निद्रा के आगोश ने मुझे घेर लिया था”
“आँखे बन्द होने को थी”
“मुँह में आए शब्द मानो अपनी आवाज़ खो चुके थे”…
“चाह कर भी मैँ कुछ कह नहीं पा रहा था”
“शायद पवित्र आत्मा से मेरा पहला सामना था इसलिए”
“ऐसा ना मैंने पहले कभी देखा था और ना ही कभी इस बारे में कुछ सुना था”
“शायद!…आत्मा से परमात्मा का मिलन इसे ही कहते होंगे “
“ये आम इंसान से परम ज्ञानी बनने का सफर बहुत भा ही रहा था मुझे कि …
उन्होंने पूछ लिया…
“बता वत्स !…क्या चाहिए तुझे?”
“बता!..क्या इच्चा है तेरी?”…
“मेरे कंठ से आवाज़ न निकली”
उन्होंने फिर प्रेम से पूछा”बता!…तेरी रज़ा क्या है?”
“चुप देख मुझे …
उन्होंने खुद ही ‘एयर कंडीशनर’ की तरफ इशारा किया”
“मैंने मुण्डी हिला हामी भर दी”
“फिर टीवी की तरफ इशारा किया तो मैँने फिर मुण्डी हिला दी”
“उसके बाद तो फ्रिज…
‘डीवीडी प्लेयर’…
‘होम थियेटर’…
‘हैण्डी कैम’…सबके लिए मैँ हाँ करता चला गया”
“वैसे होने को तो ये सारी की सारी चीज़े मेरे पास पहले से ही मौजूद थी लेकिन कोई भरोसा नहीं था इनका”
“बीवी के साथ कैसा जो चल रहा था कोर्ट में”
“क्या पता साली!…सब वापिस लिए बिना नहीं माने”
“इसलिए कैसे इनकार कर देता साँता जी को?”
“इतनी तो समझ है मुझे कि अच्छे मौके बार-बार नहीं मिला करते”
“सो!…हाथ आया दाव बिना चले कैसे रह जाता?”
“पहली बार तो मेरी किस्मत ने पलटी मारी थी और वो भी तब जब बीवी नहीं थी मेरे साथ”..
“शायद ऊपरवाले ने भी यही सोचा होगा कि इसके घर की लक्ष्मी तो हो गयी उडनछू….
तो क्यों न बाहर से ही कोटा पूरा कर दिया जाए इसका”
“नेक बन्दा है…कुछ ना कुछ बंदोबस्त तो करना ही पडेगा इसका”
“मैँ खुशी से पागल हुआ जा रहा था कि आवाज़ आई कि…
“वक्त के साथ-साथ मैँ भी बूढा हो चला हूँ”…
“इतना सामान कँधे पे उठा नहीं सकता और….
भला दिल्ली की सडकों पर बर्फ गाडी याने स्लेज का क्या काम?”
“इसलिए!…स्लेज छोड ट्रक ही ले आया हूँ मैँ”…
“वक्त के साथ-साथ खुद को भी बदलना पडता है…
“सो!…बदल लिया”साँता जी मुस्कुराते हुए बोले
“मैने भी झट से कह दिया कि आपक नाहक परेशान न हों…मैँ हूँ ना”
“उसी वक्त उनके साथ जा के सारा सामान ट्रक से अनलोड किया ही था कि इतने में नज़र लगाने को शर्मा जी आ पहुँचे”
बोले”ये क्या कर रहे हो?”…
“मैँ चुप रहा”..
“वो फिर बोल पडे”…
“मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन चुप रहा कि कौन मुँह लगे और अपना अच्छा-भला मूड खराब करे”
फिर बोल पडे”ये क्या कर रहे हो?”
“अब मुझसे रहा न गया”…
“आखिर बर्दाश्त की भी एक हद होती है”
“तंग आकर आखिर बोलना ही पडा कि…
“मेरा माल है”…
“मैँ जो चाहे करूँ”..
“आपको मतलंब?”
“शर्मा जी बेचारे तो मेरी डांट सुन के चुपचाप अपने रस्ते हो लिए”
“साँता जी के चेहरे पे अभी भी वही मोहिनी मुस्कान थी”
“उनकी सौम्य आवाज़ आई”अब मैँ चलता हूँ”….
“अगले साल फिर से मिलता हूँ”
“और वो पलक झपकते ही गायब हो चुके थे”
“मैँ खुशी से फूला नहीं समा रहा था कि अगले साल फिर से आने का वादा मिला है”…
“इस बार तो मिस हो गया लेकिन अगली बार नहीं”…
“अभी से ही लिस्ट तैयार कर लूंगा कि ये भी माँगना है और वो भी माँगना है”
“बार-बार सारे गिफ्टस की तरफ ही देखे जा रहा था मैँ”…
“नज़र हटाए नहीं हट रही थी कि पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गयी”
“सपने में भी उस महान आत्मा के ही दर्शन होते रहे रात भर”
“जब आँख खुली तो देखा कि दोपहर हो चुकी थी”
“सर कुछ भारी-भारी सा था”
“उनींदी आँखो से सारे सामान पे नज़र दौडाई”..
“लेकिन!…ये क्या?”
“जो देखा…देख के गश खा गया मैँ”…
“सब कुछ बिखरा-बिखरा सा था”
“न कहीं टीवी नज़र आ रहा था और ना ही कहीं फ्रिज और होम थिएटर”
“हैण्डी कैम का कहीं अता-पता नहीं था”
“कायदे से तो हर चीज़ दुगनी-दुगनी होनी चाहिए थी पर यहाँ तो इकलौता पीस भी नदारद था”
“देखा तो तिजोरी खुली पडी थी”
“कैश….गहने-लत्ते…क्रैडिट कार्ड….
कुछ भी तो नहीं था”
“सब का सब माल गायब हो चुका था”
“मैंने बाहर जा के इधर-उधर नज़र दौडाई तो कहीं दूर तक कोई नज़र नहीं आया”
“कोई साला!..मेरे सारे माल पे हाथ साफ कर चुका था”
“मैँ ज़ोर-ज़ोर से धाड मार-मार रोने लगा”…
“भीड इकट्ठी हो चुकी थी “
“सबको अपना दुखडा बता ही रहा था कि शर्मा जी की आवाज़ आई…
“क्यों अपने साथ-साथ सबका दिमाग भी खराब कर रहे हो बेफिजूल में?”…
“रात को सारा सामान खुद ही तो लाद रहे थे ट्रक में और अब ड्रामा कर रहे हो चोरी का”
“मैने अपनी आँखो से देखा और आपसे पूछा भी तो था कि ये आप क्या कर रहे हैँ?”
“आपने ने तो उल्टा मुझे ही डपट दिया था कि मैँ अपना काम करूँ”
“रेडियो स्टेशन से पता किया तो मालुम हुआ कि ईनाम पाने वालों की लिस्ट में मेरा नाम ही नहीं था”
“अब लगने लगा था कि वो साला साँता फ्राड था एक नम्बर का “
“किसी तरीके से मेरा नम्बर पता लगा लिया होगा उसने”
“और शायद मुझे हिप्नोटाईज़ कर चूना लगा गया”
“अब तो यही के उम्मीद की किरण बाकि है कि शायद वो अपना वायदा निभाए और अगले साल वापिस आए”
“एक बार मिल तो जाए सही कम्भख्त,फिर बताता हूँ कि कैसे सम्मोहित किया जाता है”
“बस इसी आस में कि वो आएगा मैँ इस बार भी ‘एस.एम.एस’ किए जा रहा हूँ…किए जा रहा हूँ”
“जय हिन्द”
***राजीव तनेजा***
“ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए”
***राजीव तनेजा***
“क्या मियाँ!….?”…
“अब तो दिवाली को गुज़रे हुए भी कई घंटे हो गए”…
“अब तो ये आलस-शालस को मारो गोली और सीधा बाथरूम में जा घुसो”…
“बाल्टी,साबुन.तेल,शैम्पू सब याद कर रहे हैँ”
“बाजुएँ अकड गयी हैँ उनकी तुमसे मिले बिना”
“और तुम हो कि….कोई फिक्र ना फ़ाका”..
“याद है ना…
‘शानू जी’के कवि सम्मेलन में जाना है?”और…
दो दिन बाद अपनी शायर फैमिली वाली’श्रधा जी’भी तो आ रही है सिंगापुर से”…
“उनसे भी तो मिलने जाना है पटपडगंज”
“आज ही तो पता और फोन नम्बर नोट कराया है उन्होंने”
“कहीं भूले तो नहीं बैठे हैँ जनाब?”
“कहा भी था कि अच्छी तरहा नक्शा-वक्शा बना लो दोनों पतों का”
“कहीं हम गली-गली भटकते फिरें और भूखे-प्यासे तब पहुँचे मँज़िल पे जब…
जूठे पत्तल चाटने के अलावा कोई और जुगाड ही न बचा हो”
“जल्दी से हो जाओ तैयार”…
“इंतज़ार हो रहा होगा हमारा वहाँ”…
“अब ये कोई ज़रूरी तो नहीं कि खुद ही फोन करें शानू जी और श्रधा जी कि….
“आ जाओ!…हम इंतज़ार कर रहे हैँ”
“इतने वी.आई.पी भी नहीं हम”
“सौ तरह के सौ-सौ काम होंगे उन्हें”
“हमारी तुम्हारी तरह वेली थोडी हैँ वो दोनों कि न्यौता आ जाए सही कहीं से और…
बस मुँह उठाएँ और चल दें “
“याद है ना पिछली बार जब चंबल से न्योता आया था अपुन को ?”…
“बडे मज़े से पहुँच गए थे अगली ही गाडी से लॉलीपॉप चूसते-चूसते”…
“ये तो वहाँ जा के पता चला था कि वो ‘इनवीटेशन कार्ड’नहीं बल्कि…
फिरौती के लिए लिखा गया पत्र था जिसे हम न्योता समझ कूदे-कूदे फिर रहे थे”
“ये तो शुक्र है कि उसी दिन पुलिस ने धावा बोल मुठभेड में’लाखन सिंह’को मार गिराया था”…
“वर्ना हम तो कब के लग गए होते ‘खुड्डल लाईन’”
“सब तुम्हारी बेवाकूफी का नतीज़ा था”…
“ना खुद खत ढंग से पढा और ना ही मुझे ठीक से पढने दिया”
“और नतीजे में!..याद है ना कैसे बीहडों में जाग-जाग काटी थी रात?”
“साले!…उन गीदडों ने भी तो हुआँ-हुआँ कर जीना हराम कर डाला था”
“हुह!…बडे आए कहने वाले तुम कि….
“पापा जी!..आप चिंता ना करें”…
“मैँ सब सम्भाल लूंगा”…
“कहीं उस दिन मेरी दौलत याने मेरी बीवी को ही संभालने की नहीं सोच रहे थे ना ?”
“ऐसा सोचने के बारे में सोचना भी मत”…
“इसलिए नहीं कि पराई नॉर पे नज़र डालना पाप है…गुनाह है “
“बल्कि इसलिए कि ऐसी सोच सोच के भी तुम पछताओगे”
“उफ!…किस मनहूस की याद दिला दी?”
“रोयाँ-रोयाँ तक काँप उठता है आज भी जब माथे पे हाथ फेरता हूँ”
“देख रहे हो ना?”
“अभी भी सूजन नहीं गई है उस दिन वाले बेलन की मार की”
“पट्ठी का निशाना ही इतना पक्का है कि बस पूछो मत”…
“सौ गज़ के फासले से भी अचूक वार करती है”…
“बचपन में मारन पिट्टी जो खेला करती थी”
“वैसे एक बात समझ नहीं आ रही कि मैँ ये सब राज़ की बातें मैँ तुमसे क्यों करता जा रहा हूँ?”
“खैर छोडो इन बेफिजूल की बातों को”…
“कुछ नहीं धरा इनमें”
“हाँ!…तो मैँ कह रहा था कि….
बेचारी शानू जी तो काम के बोझ से अधमरी हुई जा रही होंगी और श्रधा जी सफर की थकान के मारे चूर”
“शानू जी ही तो सब इंतज़ामात कर रही हैँ कवि सम्मेलन का”
“अपनी श्रधा जी भी कौन सी कम हैँ?”
“पूरा फोरम और ब्लॉग संभाल रही हैँ अपने दम पे”
“बहुत टैंशन हो जाती होगी इन दोनों को तो”…
“पता नहीं कैसे मैनेज कर लेती होंगी ये सब ?”…
‘बिज़िनस’संभालना…
‘घर-परिवार’देखना…
‘कविता’ लिखना….
‘शायरी’ झाडना….
‘ब्लॉग’ अप टू डेट रखना…
‘दूसरों के चिट्ठों पे टिपियाना वगैरा…वगैरा. ..”
“और अपुन?”…
“अपुन ठहरे रमते जोगी”…
“अपना क्या है…
“ऐन टाईम पे जाना है”…
“चाय-नाश्ता पाडना है”
“दो-चार बार जहाँ सबने ताली बजाई….
सो!…हमने भी बजा देनी है “
“थोडी बहुत वाह-वाह भी कर देंगे अपने गुरुदेव ‘समीर लाल जी’के लिए…
“वो भी तो आ रहे हैँ ना कनेडा से”
“सो!…तैयार हो जाओ फटाफट”
“कोई ज़रूरी नहीं कि पिछली होली और दिवाली की तरह इस बार भी तुम्हें ज़बर्दस्ती ही नहलाया जाए”
“अबकि बार तो आपको एक्दम से गोरा-चिट्टा बना के ही दम लेना है”…
“बॉय गॉड…कसम से”…
“अपनी श्रधा जी जो आ रही हैँ”
“उफ!…क्या गज़ब के क्यूट और हैंडसम लगोगे”
“पता है ना!….पिछली बार जो हैदराबाद वाली ऑंटी ताना मारा था कि…
खुद तो इतना बन-संवर के रहते हो और अपने दोस्त का कोई ख्याल नहीं”
“तो बन्धु मेरे..इस बार किसी को कोई शिकायत का मौका नहीं”
“अब ये उनींदी आँखो से नींद का पर्दा हटाओ और चौखटे पे पानी के छींटे मारते हुए सीधे जा घुसो नहाने को”…
“क्या कहा?”
“नींद आ रही है?”
“वाह रे!..मेरे कुम्भकरण…वाह”
“रामलीला कब की खत्म हो गयी और अब भी कुम्भकरण के पात्र को ही जिए चले जा रहे हो?”
“वाह!…”…
“ये तुम राजेश खन्ना कब से बन गए कि चाहे दस बरस पहले से ही बुढाए पडे हो लेकिन. ..
रोल ‘हीरो’का ही करना है उस्ताद ने”
“रजनीकाँत समझ रखा है क्या खुद को ?”
“अरे!…झंडू का च्यवनप्राश खाता है वो दिन में तीन-तीन दफा और तुम हो कि…
पैग पे पैग चढाए रहते हो हरदम”
“पता भी है कि दारू पीने से ‘लीवर’खराब होता है लेकिन अब इस बुड्ढे ‘काका’को समझाए कौन?”
“डिम्पल जी की बात तो सुनते ही कहाँ हैँ?”
“उफ!…किसका नाम ले लिया?”
“लुट गया ना सब सुख चैन मेरा?”
“याद दिला ना’बॉबी’की?”…
“अब रातें करवटें बदल-बदल ही काटनी पडा करेंगी”
“अपनी ‘बॉबी डार्लिंग’उर्फ श्रीमति मायके जो गयी हुई है”
“रात काटने से याद आया कि मियाँ!…कब तक यूँ कुँभकरण की नींद उँघाते रहोगे?”
“डाक्टर ने नहीं कहा था कि रामलीला में कुंभकरण का रोल करो?”…
“कोई और रोल नहीं था क्या करने को?”
“ह्म्म!…तो यहाँ भी तुम्हारे आलस ने ही ज़ोर मारा होगा कि…
‘सोने’को खूब मिलेगा और नाम का नाम होगा”…
“खाक!..सोना मिलेगा”….
“दिहाडी तो पूरी दी नहीं गयी इन मुय्ये रामलीला वालों से”…
“हुँह!…बडे आए सोना देने वाले”..
“एक पीतल का पानी चढी गद्दा थमाई…
वो भी ‘डिब्ब-खडिब्बी’ कि..
“ले बेटा!…चढ जा स्टेज पे”…
“छुडा दे छक्के”…
“मार ले मैदान”
“तुमने भी सोचा होगा कि चलो इसे ही बेच कुछ दाम वसूल लूगा”
“पर वो भी तो पट्ठों ने वापिस छीन ली और उल्टा पुलिस में जाने की धमकी देने लगे सो अलग”…
“और ले लो वडेंवे!…”…
“वाह!..रे मेरे बंटुक नाथ”…
“वाह”…
“बडे आए थे कहने वाले कि अब होंगे आम के आम और गुठलियों के भी पूरे-पूरे दाम”
“दिखा दी न तुमने अपनी बनिया बुद्धी”…
“हर चीज़ में फायदा ढूंढते हो”…
“अब!…ये जो दो-दो महीने नहीं नहाते हो”…
“तो!…इसमें भी कोई न कोई फायदा ही ढूँढते होंगे महाशय…?”
“है ना!…?”
“हाय!…अब क्या करूँ तुम्हारी इस मूढ बुद्धी का?”अब कह रहे हो कि….
‘साबुन’बचता है…
‘तेल’ बचता है…
‘तौलिया-कंघी’कम घिसते हैँ”
“और!..ये जो दो-दो महीने की मैल को जब चाकू से खुरच-खुरच के उतारते हो ?”
“वो सब क्या होता है?”
“याद है ना पिछली बार का?”…
“जब धार कुंद पड गयी थी चाकू की तो बीच में ही पिताश्री से ‘ब्लेड’माँग काम चलाना पडा था किसी तरह”..
“और ऊपर से कँजूसों के महा कँजूस तुम्हारे पिताजी”…
“थमा दिया उन्होंने दो साल से पडा-पडा जंग खा रहा ब्लेड”…
“वो भी पूरा नहीं…आधा ही थमाया था कि बचा हुआ आधा वक्त-बेवक्त काम आएगा”
“बचत में कैसी शर्म?”
“अगर ‘सैप्टिक-शैप्टिक’हो जाता तो उनकी बला से?”..
“फिर पता चलता बच्चू को”
“ट्ट्टू पता चलता तुम्हारे पिताश्री को?”
“उन्होंने तो उसी घसियारे ‘डाक्टर’के बच्चे से ही ठुकवा देने थे ‘इंजैक्शन’धडाधड”
“हाँ!..ठुकवाने ही तो थे”..
“कौन सा डिग्रीधारी था वो डाक्टर ?”…
“पट्ठा!..पंचर जो लगाया करता था पहले”…
“पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ पीछा छोडती हैँ?”
“पहले ‘टायर’से कील निकाला करता था अब अब बदन में कील घुसेडा करता है”..
“खैर छोडो…क्या रखा है टाईम खोटी करने में?”
“ये आलस का पुलिंदा छोडो और उठ के नहा लो फॅटाक से फटाफट “…
“नहीं तो!…पता है ना मेरा?”
“क्या कहा?”…
“नहीं पता?”
“तो!..तुम ऐसे नहीं मानोगे?”
“लगता है!..’थर्ड डिग्री’ही अपनानी पडेगी?”
“थर्ड डिग्री से याद आया कि स्कूल तो ‘थर्ड’ में ही छोड दिया था मैंने”..
“बस!..तभी तो पड गया था दो नम्बर के धन्धे में”…
“फिर आना-जाना तो लगा ही रहा ताउम्र”…
“कभी अपने देश में तो कभी परदेस में”…
“अब अपने देश वालों में इतना दम कहाँ कि वो अपने पर थर्ड डिग्री अपना सकें?..
“ये तो वो साले फिरंगी पुलिस वाले ही नहीं समझते किसी को कुछ”…
“ज़रा सी!..बस ज़रा सी ‘चूं-चपड’करुं सही…
उन्हें तो बस मौका भर चाहिए हाथ साफ करने का”…
“साले!…बन्दे को बन्दा नहीं समझते हैँ”…
“पता नहीं मेरे चौखटे में ऐसे कौन से सुरखाब के पर लगे हैँ जो देखते ही…
अपने-अपने लट्ठों को तेल पिलाना चालू कर देते हैँ”
“अब कुछ ना पूछो कि कैसे बचते बचाते जुगाड-पानी से दे-दिला कर…
उनका ‘तौलिया’गायब करवाया है खास तुम्हारे लिए”
“देख लिया ना?”
“आखिर दोस्त ही दोस्त के काम आता है!…दुशमन नहीं”
“अब तुम्हारे इस चक्कर में मेरी हालत का मुझे ही पता है कि क्या-क्या हुआ मेरे साथ”…
“आह!…पराया तन क्या जाने मेरी पीड”
“बडी मुशकिल से उसे ‘हिन्दोस्तानी’ ज़बान सिखाई है”…
“अब तो बेटे लाल!…इशारे पे नाचता है…इशारे पे”..
“तौलिया?”…
“नाचता है?”…
“इशारे पे?”दोस्त एक झटके से कई सवालों को चेहरे पे लिए उठ खडा हुआ
“हाँ!…मेरे प्यारे ‘बंटुक नाथ’..
“इशारे पे”…
“और आज इसी के दम पे ठान लिया है कि…
चाहे लाख तूफाँ आएँ…
चाहे जान भी अब तेरी चली जाए…
तुझे नहला के ही लेंगे हम दम…
ऐ सनम”…
“क्या कहा?”…
“ज़रा फिर से तो कहना”
“अच्छा!…नहीं नहाओगे?”…
“देखो!..हर फैसला यूँ जल्दबाज़ी में लेना ठीक नहीं”…
“अच्छी तरह सोच-विचार लो”
“फिर वो ही बात?”…
कह रहे हो कि….
“हमको नहला सके …ये ज़माने में दम नहीं…
हमसे है ज़माना…ज़माने से हम नहीं”
“कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ तुम्हें नहला सकने वाला?”
“ठीक है!…आज ही और अभी ही फैसला हो जाए फिर तो”…
“कल किसने देखा है?”…
“क्या मालुम कल को तुम ही…हो न हो”
“देखो!…दोस्त हो तुम मेरे,इसीलिए कह रहा हूँ फिर से”…
“मेरी बात मान लो और अच्छे बच्चों की तरह जा के चुपचाप से नहा लो”
“मालुम था मुझे!…”…
“हाँ!…मालुम था मुझे”
“तो फिर!…नहीं मानोगे तुम?”
“अच्छा!…एक बार….
बस एक बार…नज़र भर देख तो लो ‘तौलिए’को”
“फिर ये न कहना कि मौका नहीं दिया ‘राजीव’ने बचाव का”
“बच्चू!…किस फिराक में हो तुम?”
“भागने का मौका तक ना मिलेगा”…
“किस हवा में उडे-उडे फिर रहे हो तुम?”कि…
मैँ ये कर दूंगा…
मैँ वो कर दूंगा”
“बेटे लाल!…देसी नहीं…
खालिस सोलह ऑने शुद्ध विलायती तौलिया है…खालिस विलायती”
“बडों-बडों को तिगनी का नाच नचा दे ये तो”…
“तुम किस खेत की गाजर-मूली हो?”…
“ये क्या?…तुमने तो लपेटना चालू कर दिया?”
“अरे!…फैंक नहीं रहा हूँ मैँ..जो तुम लपेटे चले जा रहे हो”
“पता चल जाएगा कुछ ही पल में कि मैँ सच्ची बात कर रहा हूँ कि झूठी”…
“हाथ कँगन को आरसी क्या…पढे लिखे को फारसी क्या”
“खुद ही देख लो और भली भांति जाँच लो”…
“ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए…
ओ पुत्रा!..लिखना आए या ना आए…लिखना चाहिए”…
“अब ये!…लिखना-लिखाना तो तुम्हारे बस का है नहीं”
“तो!…क्या कहते हो?”…
“कर आऊँ गीज़र ऑन?”
“नहाना तो तुम्हें है ही”..
“दो मिनट पहले सही…दो मिनट बाद में सही”
“कहीं यही बहाना न मिल जाए बाद में तुम्हें कहीं कि…
“ठण्ड लग रही है”..
“अगली दिवाले पे नहा लूंगा”…
“पक्का!…’गॉड प्रामिस’
***राजीव तनेजा***




“मेरी कहानी नवभारत टाईम्स पर”
22.10.2007 को नवभारत टाईम्स में मेरी कहानी छपी है

![]()
“बताएँ तुम्हे बच्चा कैसे होता है” के नाम से
![]()
www.navabharattimes.com -पाठकपन्ना-कहानियाँ - बताएँ तुम्हें बच्चा कैसे होता है
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2480094.cms जिसे एक ब्लॉगर बन्धु श्री पवन कुमार मल्ल जी ने जस का तस कॉपी-पेस्ट कर डाला है अपने ब्लॉग पे …
http://pawankumarmall.blogspot.com/
उनका मैँ अत्यंत आभारी हूँ कि उन्होने कहानी के साथ मेरा नाम नहीं लिखा..जिसके लिए मैंने उन्हें कमैंट भी किया और उन्होंने इसके लिए सॉरी भी कहा …

लेकिन अभी भी वहाँ से मेरा नाम नदारद है …
चलो इसी बहाने एक पोस्ट और लिखने का मौका मिला और मेरी कहानी एक बार फिर से आप सभी ब्लॉगर बन्धुओं के सामने पेश है
बताएं तुझे कैसे होता है बच्चा…
बड़े दिन हो गए थे। खाली बैठे बैठे , कोई काम-धाम तो था नहीं, बस कभी-कभार कंप्यूटर खोला और थोडी-बहुत ‘ चैट-वैट ‘ ही कर ली। सच पूछो तो यार बेरोज़गार था मैं और इसमें अपनी सरकार का कोई दोष नहीं , दरअसल अपनी पूरी जेनरेशन ही ऐसी है। अब कोई छोटी-मोटी नोकरी तो हम करने से रहे। अब यार हर किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे को घड़ी-घड़ी कौन सलाम बजाता फिरे ? कोई छोटा- मोटा धंधा करना तो अपने बस की बात नहीं। बाप-दादा जो थोडी-बहुत पूंजी छोड गए थे , वो भी आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी। आखिर वह भी भला कब तक साथ देती ? बीवी के तानों का तो शुरू से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था। उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता। कई बार तो कान में घुसने तक ही ना देता।
पहले नकदी खत्म हुई फिर , गहने-लत्तों का नंबर भी आ गया। एक-एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थीं लेकिन मेरी अकड़ ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक दिन मज़े से टीवी पर ‘ नो-एंट्री ‘ फिल्म देखते-देखते अचानक खुशी के मारे उछल पडा। इसलिए नहीं कि फिल्म अच्छी थी बल्कि…अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था नोट कमाने का। अरे नोट कमाने का क्या, वह तो नोट छापने का आइडिया था। जैसे ही बीवी को बताया कि एक आइडिया मिला है नोट छापने का तो वह गश खा कर गिरी और वहीं बेहोश हो गई।
होश मे आने के बाद बोली, ” बस जेल जाने की कसर ही बाकी रह गई थी …. नोट छाप कर वह भी पूरी करने का इरादा है जनाब का? “
मेरी हंसी रोके ना रुकी। बोला, ” अरी भागवान , नोट छापने का असली मतलब सचमुच में नोट छापना नहीं है। “
” तो फिर ?”
” देखा नहीं, फिल्म में उस ज्योतिषी को ?…. कितनी सफाई से सलमान से पैसे ऐंठ लेता है और अनिल कपूर बेवकूफ बनाता है। “
” तो क्या हुआ ?”
” अपुन का भी बस यही आइडिया है। “
” तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ज्योतिषी हुआ है जो तुम बनोगे ?”
” है तो नहीं लेकिन हमारी आनेवाली नस्ल ज़रूर राज ज्योतिषी कहलाएगी। “
” पर ये सब करोगे कैसे ?”
” अरे कुछ खास नहीं, बस थोड़ा-बहुत त्याग तो मुझे करना ही होगा। “
” वह भला कैसे ?”
अरे ये हीरो-कट बाल छोड़ सीधे-सीधे लम्बे बाल रखूंगा। “
” उसमें तो नाई का खर्चा भी बचेगा, ” बीवी चहक उठी ।
” कर दी ना तुमने दो कौड़ी वाली बात …. अरे मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी-छोटी बातों पर नज़र गड़ाए बैठी हो। “
” लेकिन आता-जाता तो कुछ है नहीं, खाली वेष बदलने से क्या होगा ?” बीवी फिर बोल पड़ी।
” अरे यार, पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले। “
” जी बताऒ, ” बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली।
” हां, तो मैं त्याग करने की बात कह रहा था। तो दूसरा त्याग यह करना पडेगा कि….ये गोविंदा-छाप कपड़े छोड़ धोती-कुरता पहनना पड़ेगा। “
” वह तो शादी का पड़ा-पड़ा अभी तक सड़ रहा है अलमारी में, ” बीवी चहकते हुए फिर बोल पड़ी।
” चलो, यह काम तो आसान हुआ. अब कोने वाले कबाड़ी की दुकान से रद्दी छांटनी पड़ेगी। “
” आय-हाय। अब क्या रद्दी भी बेचोगे ?”
” जब पता नहीं होता , तो बीच में चोंच मत लड़ाया कर, ” मैं आँखे तरेरता हुआ बोला, ” बेवकूफ, पुराने अखबारों में जो भविष्यफल आता है, उसकी कतरनों को सम्भालकर रखूंगा, वक्त-बेवक्त काम आएंगी और अगर एस्ट्रॉलजी से रिलेटेड कोई किताब मिल गई तो… पौ-बारह समझो। “
” पौ-बारह मतलब ?”
” अरे बेवकूफ, पौ-बारह मतलब लॉटरी लग गई समझो। “
” लेकिन यह जन्तर-मन्तर कहां से सीखोगे भला ?”
” कोई खास मुश्किल नहीं है यह सब भी , बस…बल्ली सागू या फिर बाबा सहगल के किसी भी रैप सॉन्ग को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि किसी के पल्ले कुछ ना पडे। बस हो गया…. ‘ जन्तर-मन्तर काली कलन्तर… “
” ऒह समझ गई…. समझ गई। “
बस फिर क्या था मोटी कमाई के चक्कर में बीवी के बटुए का मुंह खुल चुका था। ज़रूरी सामान इकट्ठा करने के बहाने पैसे ले मैं चल पड़ा बाज़ार। पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुंचा बाज़ू वाले कबाड़ी की दुकान पर। एक-दो पेग मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया।
अब दिन-रात एक करके हम मियां-बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस नतीजे पर पहुंचे कि ” पूरी दुनिया में इससे आसान काम तो कोई हो ही नहीं सकता। ” अब आप पूछोगे कि , ” वो भला कैसे ?”
तो ये मैं आपको क्यों बताऊं ? और अपने पैर पर ख़ुद ही कुलहाड़ी मार लूं ? कहीं मुझसे ही कॉम्पिटीशन करने का इरादा तो नहीं है आपका ?
क्या कहा ?…. चिंता ना करूँ ?
तो सुन लीजिए…कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है यह सब…. बस सिम्पल-सी कुछ बातें गांठ बांध लो कि… ” हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है। “
हर-एक को यही लगता है कि वह सही है और बाक़ी सब ग़लत, कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक, वह अपनी तरफ़ से कड़ी मेहनत करता है लेकिन उसका पूरा फल नहीं मिलता, सबके सब उसकी कामयाबी से जलते हैं, कोई उसका भला नहीं चाहता … दोस्त-यार … रिश्तेदार .. भाई-बहन … पड़ोसी … सब के सब मतलबी हैं … कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं हैं…वह सब पर तरस ख़ाता है, लेकिन कोई उस पर नहीं खाता … किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है … या फ़िर उसकी दुकान या मकान बांध दिया है…
बस कुछ सामने वाले का चौख़टा देख कर अंदाज़ा लगाओ कि उस पर कौन-कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे। बस चौखटा देखो और मार दो हथौड़ा। अगर तीर सही निशाने पर लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी।
” और अगर निशाना ग़लत लगा तो ?”
फिकर नॉट… घुमा-फिरा कर 2-4 डायलॉग और मार दो बस… ” कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर। और हाँ… अगर ऊं चे लेवल का गेम खेलना है, तो दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो, एकाध चेली हो तो कहना ही क्या। अगर कोई ना मिले तो चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ।
बड़े बे-रोज़गार हैं , कोई ना कोई अपने मतलब का मिल ही जाएगा पर इतना ज़रूर ध्यान रखना कि….चेला रखना है गुरु नहीं … । कहीं अगले दिन ही वह तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा तुम्हारा ही बंटाधार करता न मिला। चौक पर बिकने वाला तोता अगर मिल जाए, तो धंधे में और रौनक आ जाएगी।
बस तोते को भूखा रखना है और… भविष्य की पर्चियों पर अनाज का दाना चिपका देना है। पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली पर्ची उठाएगा और बकरा बेचारा बस यही समझेगा कि मिट्ठू महाराज ने उसका नसीब बांच दिया है।
” और उस पर्ची के अंदर लिखा क्या होगा ?” बीवी बोल पड़ी।
” हे भागवान, पूरी रामायण खत्म होने को आई और यह पूछ रही है कि … सीता , राम की कौन थी ?”
” अरी भागवान, अभी ऊपर सारे मंतर तो बताता आया हूँ…कोई ना कोई तो फ़िट बैठेगा ज़रूर।”
” हुं! ” बीवी की समझ मैं बात आ चुकी थी।
सो एक दिन ऊपरवाले का नाम लिया और जा पहुंचा बीच बाज़ार और बरगद के पेड़ के नीचे डेरा जमाया। ” कोई न कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी। किसी को कुछ , तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बीमारी का। एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे। बड़ी आई थी मज़े से कि ” महाराज बच्चा नहीं होता है , कोई उपाय बताओ। “
मैंने सोचा, अरे नहीं होता है तो कुछ ‘ ओवर-टाइम ‘ लगाओ , ‘ माल-शाल खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बने तो किसी डॉक्टर-शॉक्टर के पास जाओ। यह क्या कि सीधे मुंह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई। अब यार, अपने घर की ड्यूटी तो बजाई नहीं जाती अपुन से, ओवरटाइम कौन कंबख्त करता फिरे ? लेकिन धंधा तो धंधा है सो , उस बेचारी को कुछ उलटी-पुलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे ‘ काली शेरनी का दूध… जंगली भैंसे का सींग … शुतुर्मुर्ग का कलेजा और न जाने क्या-क्या…
मुंह उतर आया उस बेचारी का कि मैं अबला नारी… ” कहाँ से लाऊंगी ये सब ?”
मैंने कहा, ” आप चिंता ना करें। परसों मेरा शागिर्द नेपाल से आनेवाला है, उसको फ़ोन किए देता हूँ , वही सब इंतज़ाम कर देगा। ” उसने हामी भर दी।
और चारा भी क्या था उसके पास ?
नकद गिन के पूरे बारह हज़ार धरवा लिए मैने। फिर जाने दिया उसे।
मोटी-कमाई हो चुकी थी, सो मैने अपना झुल्ली बिस्तरा संभाला और चल पड़ा घर की ओर।
रास्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला।
ख़ुश बहुत था मैं, बस पीता गया, पीता गया। कुछ होश नहीं कि कित