हास्य और व्यंग्य की दुनिया में आपका स्वागत है

2011 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Syndey Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 9,100 times in 2011. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 3 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

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santa

संता(असमंजस भरे स्वर में): यार…एक बात समझ नहीं आ रही…

बंता: क्या?…

संता: यही कि जब मैं अपनी बीवी के मोबाईल से उसकी सहेली का नंबर मिलाता हूँ तब तो कुछ नहीं होता लेकिन जब उसी नंबर को मैं अपने मोबाईल से मिलाता हूँ तो उसकी सहेली के नाम के बजाय उसके पति का नाम आता है…

बंता: अरे!…यार…सिम्पल सी बात है…तेरा फोन नोकिया का और उनका सोनी एरिक्सन का है…

संता: ओह!..

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rajiv

अरे!…कोई समझाओ यार इन हिन्दी ब्लोगरों को…सैन्टुआ गए हैं ससुरे सब के सब…गए थे राम भजन को ओटने लगे कपास…

इसे कहते हैं मति-मति का फेर होना…

“अरे!..भईय्यी जिस काम से गए थे…उसी को करो ना ठीक से…. ये क्या कि वहाँ की मच्छी मार्का धरती पसंद आ गयी तो वहीँ बसने की सोच ली?”..

“आप तो ऐसे ना थे"….

“क्या कहा?…वापिस नहीं लौटोगे?”..

“ये तो कोई बात नहीं हुई कि वापिस नहीं लौटोगे….कल को तुम्हें ऐश्वर्या या फिर बिपाशा पसंद आ गयी तो क्या मैं उनके साथ पूरी जिंदगी तुम्हारी फोटो बनाता फिरूँ?”…

“और कोई काम है कि नहीं मुझे?”..

“अब कैटरीना या करीना की बात हो तो मैं थोड़ी मेहनत भी करूँ लेकिन ये क्या कि ऐश्वर्या और बिपाशा….वो भी असली वाली नहीं…डुप्लीकेट"…

“हुँह!…बड़े आए फोटो बनवाने वाले”…

“उतार दो…उतार दो अपने दिमाग से ये फितूर कि इस तरह भेष बदने से कोई तुम्हें पहचानेगा नहीं …दो मिनट में…हाँ!…दो मिनट में ही धार लिए जाओगे"…

“वर्क परमिट या फिर वीसा है तुम्हारे पास वहाँ ठहरने का?”…

“क्या कहा?…कोई नहीं पहचानेगा?”…

“अरे!…छोड़ो ये सुनहरे ख़्वाब देखना ….दो मिनट में ही पहचान लिए जाओगे खुद अपने ही संगी-साथियों द्वारा"…

“क्या कहा?…नहीं है विश्वास मेरी बात का"…

“ठीक है…तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या?…मैं खुद ही पूछ लेता हूँ उन सब से”….

“क्यों?…भाई लोग…क्या कहते हैं आप?”… 

“अरे!…छोड़ो ये पहेली-वहेली का चक्कर…पहले ही बहुत पका चुका हूँ उन सब को अपनी चित्रमयी पहेलियों से”…

“किसी का कोई सखा या फिर सहेली खामख्वाह नाराज़ हो गई इस चक्कर में मुझे लेने के बजाय उलटा देने पड़ जाएंगे…कमैंट्स उनके ब्लोगों पर जा-जा के”…

 

girish billore

 girish pankaj

 lalit

 ajay jha

 albela

 khushdeep......

 kokas

sameer and anup

satish

pabla

 padam

    shivam

अच्छा!…दोस्तों जैसा कि आप सभी जानते हैं कि ‘होली’ तो कब की हो..ली…इसलिए अब इस चुहलबाजी को यहीं विराम देते हुए इस श्रृंखला को यहीं समाप्त किया जा रहा है….

“अरे!…ये क्या?…आप तो छोटे बच्चों की तरह मायूस होने लगे…हट!…पगले…ऐसे भी कोई करता है क्या?…मैं अभी ज़िंदा हूँ…और फिर और भी तो मौके आएंगे इस सब के लिए”…

तो दोस्तों…जिंदगी के किसी ना किसी मोड पे फिर कोई नई चुहलबाजी ले के मैं हाज़िर हो जाऊंगा…आप चिंता क्यों करते हैं?…बस आप ‘हँसते रहो’ पे रेगुलर विज़िट ज़रूर करते रहना…आपको मेरी कसम"..

विनीत:

राजीव तनेजा

rajivtaneja2004@gmail.com

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anup and sameer

उफ्फ़!…तौबा ये वर्ल्ड कप वाले भी ना बस…वर्ल्ड कप वाले ही हैं…तुरन्त अपनी फटफटी पे आ के कहने लगे मुझसे… “मान ना मान..मैं तेरा मेहमान”…

मैंने पूछा उनसे कि… “भईय्या…वो कैसे?”…

छूटते ही कहने लगे “पहले आप अपने ये शब्द वापिस लें"…

मैंने कहा “कौन से?”…

वो बोले… “हम अपने मुँह से कैसे कहें?”…

मैंने कहा कि… “आपके मुँह में पान…गुटखा या फिर तम्बाकू है क्या?”…

वो बोले “कतई नहीं…इनसे तो कैंसर होता है"..

मैंने पूछा “फिर क्या दिक्कत है?”..

वो बोले.. “बोलने में ही तो दिक्कत है"…

मैंने कहा “तो फिर लिख के बता दीजिए"…

padam singh

“जी!…बिलकुल"…

“लेकिन हिन्दी में"…

“फिर तो मुश्किल है"…

मैंने कहा… “क्यों मुश्किल है?…इतना आसान तो है"…

“दरअसल!…हमें हिन्दी लिखना नहीं आता"…

“हिन्दी लिखना नहीं आता?…इतना आसान तो है… ‘ह’ के ऊपर छोटी ‘ई’ की मात्रा फिर आधा ‘न्’ और उसके बाद…

“न्न्..नहीं!…दरअसल हमें हिन्दी में लिखना ही नहीं आता"…

“क्या लिखना नहीं आता?”…

“क्क…कुछ भी नहीं"…

“क्क..क्या?”…

“जी!…

“लेकिन क्यों?”..

“क्यों…क्या?…कभी सीखने की ज़रूरत ही नहीं समझी"…

मैं बोला “वाह!…बहुत बढ़िया…हिन्दी लिखना नहीं आता है लेकिन हिन्दी वालों को अपना माल बेच पैसा कमाना आता है?”….

“ही…ही…ही…उसमें तो हम एक्सपर्ट हैं"..

“एक्सपर्ट नहीं हैं बल्कि हमारे देश की जनता पागल है जो आप जैसे अंग्रेज़ी के पिट्ठुओं के आगे-पीछे नाचती है"…

“खैर!…जो भी हो आप बस पहले अपना ये शब्द ‘भईय्या’ वापिस लें"…

“क्यों?…इसमें क्या दिक्कत है?”…

“दरअसल!…क्या है कि हम आपके इस पूरे देश पर…इसके दिल और दिमाग पर छा जाना चाहते हैं ना कि सिर्फ एक प्रदेश या राज्य पर"…

“ओह!…तो फिर ऐसा कहना था ना…बताइये…मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूँ"…

“बस!..आप अपनी ये पहले अंतराष्ट्रीय हिन्दी ब्लोगर सम्मलेन वाली रिपोर्ट से पहले हमारे कुछ खिलाड़ियों को अपने इस ब्लॉग मंच पर अपना जलवा बिखेरने का चाँस दे दें"…

“लेकिन!…क्यों?”…

“जब से आपने ND T.V के कार्यक्रम ‘हम लोग’ में डायलाग मारा है…तब से आपके ब्लॉग की टी.आर.पी बढ़ गयी है"…

“तो?”…

“हम उसी का फायदा उठाना चाहते हैं"..

“मुफ्त में?”…

“जी!…बिलकुल"…

“अच्छा!…तो फिर ठीक है…जाओ…मौज करो…आप लोग भी क्या याद करोगे कि किसी दिलदार से पाला पड़ा है"..

“जी!…शुक्रिया"…

dinesh rai

avinash

khushdeep 

sameer lal

 shivam 

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vandana gupta........

अल्ले…अल्ले अंटल जी…ये क्या कल लहे हैं आप?…बांग्लादेश में हिन्दी ब्लोगरों का सम्मलेन होने जा रहा है ना कि कोई क्रिकेट मैच….जाईये!…जाईये अपने घल जा के चौक्के-छक्के मालिये…

ajay jha

girish billore...

 

अल्ले ओ पैलवान अंटल जी…आप क्या कल लहे हैं…आपका बी वहाँ पर कोई काम नहीं है…

 

indu puri

 sanju taneja

  padam singh

अल्ले ओ मिच्छ यूनिवल्स की बच्ची…तेला बी वहाँ पे कोई काम नहीं है…जा..अपने घल जा के गुझिया-पकोडे बना…

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अल्ले ओ जमूरी….तू क्या कल लही है यहाँ पे…तेला बी कोई काम नहीं है वहाँ बांगलादेश में…जा अपने घल जा के लड्डू-पेड़े खा

vandana gupta

आय-हाय छम्मक-छल्लो…तू बी वहाँ पे जाएगी क्या?…

kokas 

 

khushdeep

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लो जी हो गई तैयारियां पूरी…पासपोर्ट रेडी और वीसा तैयार….ब्लोगर बांग्लादेश की मच्छी मार्का धरती पर कूच करने को तैयार…
अरे!…अरे…रुको तो सही…इतनी जल्दी काहे को करते हो मेरे यार?…पहले ज़रा किसी पण्डित…मौलवी या फिर पादरी से शुभ लग्न व मुहूर्त तो निकलवा लो…
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क्यों भाई लोग?…क्या कहते हैं आप…मुहूर्त निकलवाना चाहिए या नहीं?….
अच्छा!…ओ.के….चलिए मान लेते हैं आपकी बात कि शुभ मुहूर्त निकलवाना तो निहायत ही ज़रुरी है लेकिन यहीं से तो असली समस्या शुरू हो रही है जनाब कि  घूंघट के पट सबसे पहले कौन खोलेगा?….याने के पहला कदम कौन बढ़ाएगा?…
अब इसे टी.आर.पी का चक्कर कह लें या फिर कुछ और…सभी अपने-अपने ढंग से इस खेल की शुरुआत करना चाहते हैं…कोई मंत्रोचार के जरिये इस शुभ कार्य को प्रारम्भ करना चाहता है तो कोई अपनी पीपनी बजा के कूच का आगाज़ करना चाहता है……

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कोई अपनी दिव्य जोत से सबको विस्मित कर सबसे पहले निकलना चाहता है ….
girish pankaj
पंगे यहाँ पर एक नहीं अनेक हैं….
अब यहाँ पर कोई अपने संग विदेशी बाला को भी हिन्दी ब्लोगिंग के गुर-पेंच सिखाना चाहता है…

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तो कोई दो चुटकी सिन्दूर की कीमत का वास्ता देकर सबको भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रही है…. 
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तो कोई माला के मोतियों की भांति अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर बाज़ी मार ले जाना चाह रहा है…

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कोई अपनी पगड़ी का वास्ता दे सबसे अनुनय-विनय करता नज़र आ रहा है…
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खैर!…हमें क्या?…तरीक सबके अलग-अलग और विचार जुदा-जुदा हो सकते हैं लेकिन सबकी मंजिल तो एक ही याने के हिन्दी का उत्थान ही है ना?….तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि कोई कैसे भी अपने इष्ट को याने के अपनी मंजिल को पूजे…
अब इन सज्जन को ही लो…देखिये तो क्या रूप धरे बैठे हैं हिन्दी के उत्थान और खुद बिना मौसम के शाही स्नान की खातिर…
“अरे!…भाई…पता है हमको कि आप बांगलादेश जा रहे हैं लेकिन ये भी कोई बरसात का मौसम है जो आप छाता साथ ले के चल रहे हैं?…और फिर मान लो अगर बाय चांस…खुदा ना खास्ता…बीच रस्ते के आपकी लुंगी ढीली हो के खिसक गई तो हम तो कहीं के नहीं रहेंगे ना?…निम्बू निचोड़ के”
अरे!…माना कि लुंगी भी आप ही की है और छाता भी आप ही का है लेकिन इज्ज़त-आबरू तो हमरे देश की ही ना?…वो नीलाम होगी तो आपको कैसा लगेगा?…
छोडिये!…इस सब झमेले को यहीं पे और कोई अच्छा सा सूट विद बूट पहन के आइये  और अपने जलवे दिखाइए 
  satish sexena
ये लो…एक को समझाया और दूजा चला आया….

अरे भाई…वहाँ जा के किसके मुँह पे खरोचें मार उसे नोचना है जो इनकी धार तेज करवा के चले आ रहे हो?….
हटाओ!…हटाओं इस बिना तहजीब वाली आदत को अभी के अभी …
dinesh rai....

“अरे!…पापा जी…तुस्स हाले तईय्यार नहीं होए”…
“की करा बादशाहों…हाल्ले ते दाढी वी नहीं मुन्नी”…
“ते फेर छेत्ती-छेत्ती करों ना बादशाहों…सिर्फ त्वाडे लय्यी सारे वेक्खो किन्ने परेशान हो रहे नें”…








girish billore
हाय!…शुक्र है खुदा कि ये मस्त-मस्त हीरोइनें तो टाईम पे लक्क-झक्क तैयार हो गई हैं….
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तो दोस्तों… सम्मेल की तैयारियां तो पूरी हो गई….अब बाकी की फाईनल रिपोर्ट सम्मलेन हो जाने के बाद…
“क्यों?…सही कहा ना मैंने?”…

***राजीव तनेजा***
rajivtaneja2004@gmail.com
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anup and sameer

उफ्फ़!…तौबा…ये बच्चे भी ना…आफत हैं आफत….जैसे ही पता चला इनको कि हिन्दी ब्लोगरों का महा सम्मलेन होने जा रहा है बांग्लादेश में तो पड़ गए तुरंत मेरे पीछे कि “हम भी चलेंगे…हम भी चलेंगे” ….

albela

लाख समझाने की कोशिश की कि… “भईय्या मेरे…वहाँ पर हिन्दी ब्लोगिंग का परचम फहराने जा रहे हैं हम लोग कोई ट्वेंटी-ट्वेंटी के फिक्स्ड मैच खेलने नहीं कि तुम्हें भी अपने साथ ले चलें और फिर चलो खुदा ना खास्ता कैसे ना कैसे कर के ले भी गए तो वहाँ पर तुम्हारे पोतड़े कौन धोता और संभालता फिरेगा…अपने बस का तो है नहीं ये सब"…

lalit

“वो सब तो हम खुद ही कर लेंगे….डायपर मिलते हैं बाज़ार में"…

“मुश्किल है…मुश्किल क्या?…नामुमकिन है…मैं नहीं ले जा सकता तुम्हें वहाँ"..

इस पर पता है वो क्या कहें लगे?…कहने लगे कि

khush

“तुम तो ठहरे परदेसी….साथ क्या निभाओगे…चार दिन की ब्लोगिंग के बाद टंकी पे चढ़े नज़र आओगे"…

बात में उनकी दम तो था लेकिन ऐसे कैसे मैं इतनी आसानी से हार मान जाता?…प्यार से…मान-मनौव्वल से…चापलूसी से…चाटुकारिता से…हर तरह से उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन बदले में पता है उन्होंने मेरे साथ क्या किया?….

dev kumar jha

 

dinesh

अब खुद अपने मुँह से अपनी हालत कैसे बयाँ करे ये राजीव?…आप खुद ही देख लीजिए…

re5yteyte

इसलिए ना चाहते हुए भी मुझे उन्हें बल प्रयोग द्वारा जबरन खदेड़ देने की धमकी देनी पड़ी….

nirmala kapila

क्यों?…सही किया ना मैंने?

 

padam

shivam

    girish pankaj12

kokas

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हाँ!..तो मेहरबान…कद्रदान…थूकदान…पीकदान…जैसा कि आप जानते ही हैं कि आगामी 20 मार्च याने के ठीक होली के दिन प्रथम अंतराष्ट्रीय हिन्दी ब्लोगर सम्मलेन का बांग्लादेश में होना निश्चित हुआ है…तो उसी को मद्देनज़र रखते हुए देश-विदेश के नामी ब्लोगरों ने इसमें भाग लेने के लिए पूरे जोर-शोर से तैयारी शुरू कर दी है…कुछ एक ने तो अपनी पोस्टों के समर्थन में तालियाँ बजवाने तथा ठुमके लगवाने के लिए एकमुश्त तय रकम पर सुपर मॉडल टाईप चीयर लीडरज  का जुगाड भी कर लिया है..sammer lal

जिससे उनके विरोधी खेमे में ना चाहते हुए अफरा तफरी का माहौल देखा जा रहा है…ख़ुफ़िया सूत्रों के जरिये पता चला है रंग में भंग डालने के मकसद से नाना प्रकार की साजिशें रची जा रही हैं..जैसे हिट पोस्टों की हूटिंग करवाना …प्रत्याशियों पर ना ना करते हुए नाना प्रकार जूते-चप्पल चलवाना इत्यादि …इसी मकसद से सड़े हुए टमाटरों के सैंकडों टोकरों को रातोंरात दिल्ली की आजादपुर सब्जीमंडी से डाईरैक्ट बांग्लादेश एक्सपोर्ट कर दिया गया…साथ ही यह भी पता चला है कि हिट ब्लोगरों की छवि को धूमिल करने के मकसद से उनके ऊपर सड़े अंडे तथा टमाटर फिंकवाने के लिए नामी निशानचियों की सेवाएं भी लेने का मन बनाया जा रहा है…

अब देखना ये है कि इस महा समर में जीत किसकी होगी?…

  • “अच्छाई की या फिर बुराई की?”…
  • “भलाई की…या फिर बुराई की?”..

“आप क्या कहते हैं?”…

 

anup shukl

rajiv taneja12541

werfwerfe 

albela... 

 

avinash

cheerleader of golden days

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 girish

 khushdeep sehgal

 kokas

 lalit

 pabla

 qwdeqwde

 rajiv

 sanjeev tiwari

 sanjeev tiwari-1

 satish saxena

 shivam mishra

 siddheshwar singh

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पति:डार्लिंग…फटाफट तैयार हो जाओ…फिल्म की टिकट लाया हूँ…

पत्नी(खुश होकर):अरे!…वाह…कौन सी फिल्म है?

पति:सात खून माफ

पत्नी(मुँह बनाते हुए):दिमाग घास चरने चला गया है क्या तुम्हारा?…..मुझे नहीं देखनी ये बकवास फिल्म

पति:अरे!…तुम्हें नहीं पता…बहुत बढ़िया फिल्म है …इसमें प्रियंका चोपड़ा पूरे सात….

पत्नी:पता है…पता है…सब पता है…गिन के पूरे सात खून करती है…

पति:इसलिए तो चलो…चलकर देखते हैं कि  कैसे वो सच्चे प्यार की तलाश में भटकते हुए….

पत्नी:हुँह!…ऐसे अगर सच्चे प्यार की तलाश में खून होते चले जाएँ तो मेरा तो आधा मोहल्ला ही साफ़ हो जाए…

 

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***राजीव तनेजा***

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ये क्या?…गाँव अभी बसा नहीं कि….जगह-जगह से फोन आने भी शुरू हो गए… “अरे!…अरे…क्या करते हो?…पहले सम्मलेन को तो ठीकठाक से हो जाने दो…उसके बाद करते रहना आराम से नुक्ते की चिंदी-चिंदी लेकिन नहीं…बिना टोके चैन कहाँ पड़ता है हम हिंदुस्तानियों को?”…
“भईय्या!…ये कमी रह गई तो क्या होगा?”……
“भईय्या!…वो कमी रह गई तो क्या होगा?”…
“टट्टू होगा…वो भी अरबी नसल का…तुमसे मतलब?”…

sameer lal 
अब अपने इन चौधरी साहब को ही लो…क्या ज़रूरत पड़ गई थी इन जैसे हैवीवेट…स्वयंभू छाप पोल्ट्री के तकनीशियन को कि अपनी हरियाणे की अच्छी-भली…चली-चलाई…जमी-जमाई…सिंकी-सिंकाई मुर्गी संग मुर्गों की उछलकूद भरी फार्मिंग को छोड़ हम जैसे हिन्दी के तुच्छ ब्लोगरों के फटे में अपनी बिना रोओं वाली क्लीन शेव्ड जाँघ घुसाने की?…लेकिन नहीं…चैन कहाँ पड़ता है इन्हें किसी को अच्छे-भले ढंग से खाता-कमाता और महफ़िल जमाता देख के…कर दिया जींद से मित्राऊ जिले ताबडतोड फोन कि… “कित्त का छोरा सै रे तू?”…
मैंने तपाक से जवाब दिया “अपणे गाम का”…
तो पता है…क्या कहने लगे?…
कहने लगे कि… “अपणे गाम को तो मैं बी सूं लेकिन कुदरत की मार देख…ईब्ब!…छोरा रहेया कोणी’…
मैं मन ही मन हास पड़या के ताऊ जी इस्स उम्र में आ के म्हारे संग हू…तू तू खेलणा चाहवें सै”…
खैर!…उनकी बात को तो मैंने किसी ना किसी तरीके से आई-गई कर दिया लेकिन इस ससुरे… बिना मूँछ के सरदार का मैं क्या करूँ?…फोन उठाते ही तुरंत राशन-पानी ले के चढ गया कि… rajiv
“ओ!…तुस्सी ते छा गए गुरु…साड्डे दिल नूं भा गए गुरु”…
“जैसे कबूतर की दबदबी चीख से कौवा बिदक जाता है”…
“जैसे…लंगूर को मस्ती में आता देख बंदरिया से बन्दर चिपक जाता है”….
“जैसे…लाकअप में मुजरिम को देख पुलिस का तेल पिला बम्बू चमक के सरक जाता है”….
“ठीक!..वैसे ही…समीरलाल को आता देख अनूप शुक्ल ठिठक जाता है”…
“ठोको…ताली”….
मैंने मन ही मन सोचा कि… “यार!…ये सरदार तो वाकयी में असरदार है”…
अभी मैं अपनी इस सोच से उबरा भी नहीं था कि उन्होंने फोन पे ही एक जुगणी सुनानी शुरू कर दी… 
“ओSsss….जुगणी जा वड़ी जलन्धर…
ओहदे मुँह विच्च वड़ गया बन्दर…
के अद्धा बाहर….के अद्धा अन्दर”…
“ठोको!….ताली”….
मैं चुप्प…
“ओए!…ठोक वी हुण ताली…हत्थां नूँ तेरे क्यों जाम लग गया?…ओहना दी ग्रीस खतम हो गई क्या?”…
“म्म…मेरे हह…हाथ में दर्द है”…
“ड्रामा छोड़ और ठोक ताली…नहीं ते सुण मेरे से तू  माँ-प्यो ते भैण की गाली”….
मैंने तो डर के मारे फोन ही रख दिया जनाब…कि कौन इनके पंगे में पड़ता फिरे?…क्या पता कल को ताली बजाने का ऐसा शौक सर-माथे पे चढ के ऐसा बोलने लगे कि बाकी की सारी जिंदगी गली-गली में ताली बजाते हुए ही गुज़रे”…
“क्यों?…सही किया ना मैंने?”…
“अजी!…क्या ख़ाक सही किया?…फोन अभी क्रेडिल पे रखा ही था कि जमनापार से मच्छर सिंह पहलवान का मिमियाता हुआ फोन आ गया कि… afwesf
“क्यों…मियाँ?…सुना है कि आजकल बड़े छाए हुए हो हिन्दी ब्लॉगजगत में”….
“जी!…ऐसे तो कुछ खास नहीं”…
“सुना है कि बांग्लादेश की पावन मिट्टी से ‘पवन’ संग चन्दन-तिलक करने जा रहे हो?”…
“जी!…विचार तो कुछ ऐसा ही है”…
“अकेले जा रहे हो या जोड़े से?”…
“यहाँ घर से तो हम मियाँ-बीवी का जोड़ा ही जाएगा… बाकियों को तो चौड़े रस्ते से ही…
“तोड़े से जाना हो तो मुझे भी साथ ले चलो”…
“तोड़े से?…मैं कुछ समझा नहीं”..
“किसी के हाथ-पाँव तुडवाने हों तो मुझे भी साथ ले चलो”…
“अजी!..उसके लिए आप क्यों तकलीफ देते हैं?…इस काम में तो हम हिन्दी के ब्लोगर्ज़ आपस में ही काफी हैं”…
“ओह!…तो इसका मतलब जल्द ही मुझे अपना ये धंधा समेटना पड़ेगा”…
“अब….ऐसे…इस बारे में मैं…इस वक्त क्या कह सकता हूँ जी?…जैसा आपका अपना मन करे..वैसा ही करें”…
“ठीक है”…कह कर उन्होंने फोन रख दिया”…
अभी फोन रखा ही था कि…अमेरिका से किसी लिपस्टिक पुते मिलेट्री जनरल का आदेशनुमा फोन आ गया कि…arfqwred
“बांगलादेश जा तो रहे हो अपनी मर्जी से…वापिस आ नहीं पाओगे बिना हमारी मर्जी के”…
“वो किसलिए?”मैंने पूछा…
”पता भी है कि उल्फा वालों के कितने हार्ड कोर कैम्प लगे हुए हैं वहाँ?”…
“जी!..ऐसे तो कुछ खास पता नहीं है लेकिन…काफी होंगे”मैंने तुक्का भिडाने की कोशिश की…
“हाँ!…बहुत हैं…और उन्हें हिन्दी लिखने वाले ब्लोगरों की बड़ी ही सरगर्मी से तलाश है”…
“वो किसलिए?”…
“अपने विध्वंसक आलेखों को जन-जन तक…कण-कण तक पहुंचाने के लिए”…
“ओह!…तो फिर क्या किया जाए?”…
“चिंता ना करो…FBI के जांबाज़ जासूस चौबीसों घंटे तुम लोगों की सुरक्षा के लिए तुम्हारे इर्द-गिर्द ही रहेंगे”..
“ओह!…ओ.के…मैं आपका कैसे धन्यवाद करूँ?”…
“धन्यवाद की ज़रूरत नहीं है…बस!..ऐसे ही…एक छोटी सी कविता लिखी है…
“आपने?”…
“जी!…उस पर आपकी टिप्पणी मिल जाती तो….
“ओह!…तो क्या आप भी ब्लोगर हैं?”…
“जी!…बिलकुल”….
“दरअसल!..मैं अंग्रेज़ी में थोड़ा पैदल हूँ”…
“तो?…उससे क्या होता है?”…
“तो…मैं…कैसे?…उस पर टिपण्णी?”…
“अरे!…भाई…मेरा ब्लॉग हिन्दी में”…
“ओह!…अच्छा… लेकिन..ऐसे…कैसे?”…
“कैसे…क्या?…अपनी वन्दना गुप्ता जी ने सब सिखा दिया”…
“ओह!…
“दरअसल!…क्या है कि सभी जानते हैं कि विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार भारत है”…
“जी!…वो तो है”…
“तो यहाँ पर अपने पाँव जमाने के लिए हम सभी अंग्रेज़ी छोड़ हिन्दी सीख रहे हैं”…
“गुड!…गुड…वैरी गुड”…
“गुड!…नहीं…अच्छा…बहुत अच्छा बोलिए”…
“जी!…जी…बिलकुल”..
“ओ.के…मैं ज़रा बाकी के ब्लोगरों से भी इस बारे में बात कर लूँ”…
“जी!..ज़रुर…वैसे…अगर आप चाहें तो सिर्फ अविनाश वाचस्पति जी को ही फोन कर लें…बाकी सब तक वो आपकी बात पहुंचा देंगे…इस काम में वो बड़े माहिर है”…
avinash narad
“ओह!…थैंक्स फॉर दा सपोर्ट”…
“थैंक्स फॉर दा सपोर्ट नहीं …मदद के लिए शुक्रिया कहिये”…
“जी!…जी…ज़रूर…मदद के लिए शुक्रिया”…
“शुक्रिया कैसा?”…ये तो मेरा फ़र्ज़ था”…
“कभी मुझे भी यही मर्ज़ था….ओ.के…बाय”…
“बाय” कहकर मैंने भी फोन रख दिया …
उसके बाद तो जनाब क्या बताऊँ मैं आपको कि किसका फोन आया और किसका नहीं….कभी भाखड़ा-नंगल के नीले-नीले आसमान से घुर्र-घुर्र कर कलाबाजियां खाते हुए सुपरमैन का दुलार भरा फोन…..
nirmala kapila
तो कभी डाईरैक्ट हालीवुड से ‘एंजलीना जोली’  और ‘ब्रिटनी स्पीयर्स’ का दिमाग घुमाने में सक्षम आग्रह भर फोन…
pabla   salil

कभी…एक ही लंगोटे से बंधे हमारे देसी मॉडलज का फोन कि… “बढ़िया कर रहे हो…लगे रहो”..…
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यूँ समझिए कि एक से एक बड़े सेलिब्रिटी  ने फोन कर कर के नाक में दम कर दिया…कि… “भईय्या मेरे…ये क्या गज़ब कर रहा है?…हमें साथ लिए बिना ही वैतरणी पार कर रहा है?”….
vinod parashar 
  girish pankaj........
 kewal ram     
raj bhatia

माँ कसम… ‘भईय्या’ शब्द सुनते ही मानों मेरे तन-बदन में आग लग गयी…..मैंने तो साफ़ साफ़ कह दिया उन फिरंगी मेमों से कि… “तू होगी भईय्या…तेरी माँ होगी भईय्या…तेरा प्यो होगा भईया”…
“क्यों?…ठीक किया ना मैंने?”..
हद हो गई यार ये तो सरासर कि…मान ना मान…मैं तेरा मेहमान….एक तो पहले ही कोई मिलती नहीं है ढंग की…ऊपर से ये सेलिब्रिटी भी…भईय्या…छी”…
हुंह!…बड़ी आई भईय्या कहने वाली….इसीलिए फूंकते हैं क्या हम अपनी मेहनत की कमाई का पैसा इन फिरंगी सैलिब्रिटियों की फिल्में देखने के लिए कि वक्त-ज़रूरत और मौका पड़ने पर ये हमें?…अपने नारियल रुपी रियल फैन्ज़ को भईय्या कहती फिरें?…
“क्यों?…भाई लोग…क्या कहते हैं आप?”…
***राजीव तनेजा***

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नोट: निर्मल हास्य…बुरा ना मानों होली है

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